संपूर्ण साहित्यिक पुस्तकालय

मुंशी प्रेमचंद का संपूर्ण साहित्य संग्रह

उपन्यास, कहानियाँ, निबंध, सम्पादकीय, नाटक और अनुवाद सहित कुल 432 कालजयी रचनाओं की प्रामाणिक एवं वर्गीकृत सूची।

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कुल 432 रचनाएँ उपलब्ध
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कालजयी रचनामानसरोवर भाग 3

शतरंज के खिलाड़ी

Shatranj Ke Khiladi

प्रेमचंद की 'शतरंज के खिलाड़ी' उनकी सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक व्यंग्य-कथाओं में से एक है। 1856 के लखनऊ और अवध के अंग्रेजी अधिग्रहण की पृष्ठभूमि में लिखी गई यह कहानी दो सामंती जागीरदारों—मिर्जा सज्जाद अली और मीर रोशन अली—के शतरंज-प्रेम के माध्यम से उस वर्ग की राजनीतिक निष्क्रियता और सामाजिक पतन पर व्यंग्य करती है जो अपने कर्तव्य से विमुख होकर विलासिता में डूबा हुआ है। जब अंग्रेजी सेना अवध पर अधिकार कर रही है और वाजिद अली शाह का शासन समाप्त हो रहा है, दोनों मित्र वास्तविक राजनीतिक संकट से पूरी तरह उदासीन होकर शतरंज की बाजी में डूबे रहते हैं। शतरंज उनकी निजी लत ही नहीं बल्कि उस सामंती मानसिकता का प्रतीक बन जाती है जो वास्तविक सत्ता, स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के स्थान पर निजी मनोरंजन को प्राथमिकता देती है। कहानी का सबसे तीखा व्यंग्य तब सामने आता है जब ये दोनों वास्तविक राजनीतिक संघर्ष से बचते रहने वाले व्यक्ति शतरंज की एक चाल को लेकर एक-दूसरे पर तलवारें खींच लेते हैं।

1924•29 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

उद्धार

Uddhar

प्रेमचंद की 'उद्धार' सामाजिक सुधार और आत्म-त्याग की मार्मिक कहानी है। हजारीलाल क्षय रोग से पीड़ित है और डॉक्टर स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि विवाह उसके जीवन को और छोटा कर देगा। इसके बावजूद उसके माता-पिता उसका विवाह अंबा से करने पर अड़े रहते हैं। हजारीलाल अपने परिवार को समझाने में असफल रहता है और विवाह के दिन घर से गायब हो जाता है, ताकि एक निर्दोष लड़की को अल्पायु में विधवा होने के लिए विवश न होना पड़े। बाद में अंबा को उसके त्याग का पता चलता है और वह उसे अपना उद्धारक और जीवनदाता मानती है। प्रेमचंद इस कथा के माध्यम से बाल-विवाह, अदूरदर्शी अभिभावकीय निर्णय और ऐसी विवाह-व्यवस्था की आलोचना करते हैं जिसमें लड़की के जीवन और भविष्य से अधिक परिवार की सामाजिक इच्छा को महत्व दिया जाता है।

1924•24 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

उन्माद

Unmaad

प्रेमचंद की 'उन्माद' महत्वाकांक्षा, दांपत्य-त्याग, पश्चिमी जीवन के आकर्षण और स्वार्थ से पैदा होने वाली आत्म-विनाशकारी मानसिक स्थिति की त्रासद कहानी है। मनहर एक साधारण क्लर्क है, जिसकी पत्नी वागेश्वरी उसके अध्ययन और उन्नति के लिए अपना जीवन समर्पित कर देती है। उसकी मेहनत और त्याग से मनहर को इंग्लैंड जाकर गुप्तचर-कला का प्रशिक्षण लेने का अवसर मिलता है। इंग्लैंड पहुँचकर वह पश्चिमी सामाजिक जीवन, विलासिता और जेनी नामक अंग्रेज युवती के आकर्षण में पड़ जाता है। वह अपनी पत्नी के त्याग और सरलता को तुच्छ समझने लगता है और जेनी से विवाह कर लेता है। जेनी के सामाजिक प्रभाव से उसे भारत लौटने पर गुप्तचर विभाग में ऊँचा पद भी मिल जाता है। लेकिन दोनों के विवाह की बुनियाद अलग-अलग अपेक्षाओं पर है। मनहर जेनी से पारंपरिक पत्नी जैसी निष्ठा और अधीनता चाहता है, जबकि जेनी अपने स्वतंत्र जीवन और अधिकारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। संबंध बिगड़ते-बिगड़ते मनहर शराब और मानसिक विघटन की ओर चला जाता है। वर्षों बाद वह भारत लौटता है, लेकिन इंग्लैंड, जेनी और अपने ऊँचे पद से जुड़े जीवन की स्मृति लगभग खो चुका है। वागेश्वरी उसके साथ फिर भी वही प्रेम और सेवा करती है। अंततः जेनी मनहर को खोजते हुए आती है और वागेश्वरी पर हमला करने का प्रयास करती है। मनहर अपनी पहली पत्नी की रक्षा करते हुए पिस्तौल छीन लेता है और स्वयं को गोली मार लेता है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि जिस सफलता के लिए मनुष्य सच्चे संबंधों और कृतज्ञता को त्याग देता है, वह सफलता अंततः उसके लिए विनाश का कारण बन सकती है।

1931•49 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

एक आँच की कसर

Ek Aanch Ki Kasar

प्रेमचंद की 'एक आँच की कसर' सामाजिक और राजनीतिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य है। महाशय यशोदानंद समाज-सेवी, शिक्षित और दहेज-प्रथा के विरोधी नेता के रूप में प्रसिद्ध हैं। अपने बेटे के विवाह में वे सार्वजनिक रूप से दहेज की निंदा करते हैं और अपने छोटे बेटे से भी दहेज-विरोधी भाषण दिलवाते हैं। लेकिन पर्दे के पीछे उन्होंने वधू-पक्ष से भारी दहेज लेने का सौदा कर रखा है। उनकी बनाई हुई प्रतिष्ठा उस समय ध्वस्त हो जाती है जब उनका छोटा बेटा अनजाने में वधू-पक्ष का वह पत्र पढ़ देता है जिसमें पच्चीस हजार रुपये के दहेज को घटाकर बीस हजार करने का अनुरोध किया गया है। कहानी सुधारवादी भाषण और निजी लालच के बीच के अंतर को उजागर करती है और दिखाती है कि सामाजिक प्रतिष्ठा स्वयं छल का साधन बन सकती है।

1924•15 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

कानूनी कुमार

Kanooni Kumar

प्रेमचंद की 'कानूनी कुमार' कानून के माध्यम से हर सामाजिक समस्या का समाधान खोजने वाले एक आत्ममुग्ध विधायक पर तीखा व्यंग्य है। एम.एल.ए. कानूनी कुमार समाचारपत्रों और रिपोर्टों के ढेर के बीच बैठकर तंबाकू, पर्दा, भिक्षावृत्ति, चाय, होटल-जीवन, स्त्रियों की घरेलू स्थिति और अत्यधिक संतानोत्पत्ति जैसी समस्याओं के लिए एक के बाद एक कानून बनाने की योजना बनाते हैं। वे स्वयं को देश-सुधारक समझते हैं, लेकिन उनकी पत्नी उनके सुधारवाद की सबसे बड़ी कमजोरी सामने रखती है—दूसरों के जीवन को कानून से बदलने की इच्छा, जबकि अपने घर और अपने व्यवहार को बदलने की तैयारी नहीं। हास्य, अतिशयोक्ति और संवाद के माध्यम से प्रेमचंद दिखाते हैं कि कानून आवश्यक हो सकता है, लेकिन शिक्षा, सामाजिक चेतना और स्वैच्छिक सुधार के बिना केवल दंडात्मक कानून समाज को वास्तव में नहीं बदल सकता।

1929•29 मिनट
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मानसरोवर भाग 1

कायर

Kayar

प्रेमचंद की 'कायर' प्रेम, जाति और सामाजिक दबाव के सामने व्यक्ति के साहस की परीक्षा की त्रासद कहानी है। प्रगतिशील विचारों वाला ब्राह्मण युवक केशव वैश्य कन्या प्रेमा से प्रेम करता है और जातिगत बंधनों को तोड़कर उससे विवाह करना चाहता है। प्रेमा भी उससे प्रेम करती है, लेकिन प्रारंभ में माता-पिता और कुल-मर्यादा के प्रति अपनी जिम्मेदारी के कारण विवाह का निर्णय स्वयं लेने से हिचकती है। धीरे-धीरे वह अपने जीवन पर अधिकार और प्रेम-आधारित विवाह की आवश्यकता को स्वीकार करती है। लेकिन जब केशव के पिता उसे घर से निकालने और संपत्ति से वंचित करने की धमकी देते हैं, तो केशव अपने सिद्धांतों से पीछे हट जाता है और प्रेमा को स्वीकार करने से इंकार कर देता है। प्रेमा के लिए यह केवल प्रेम की असफलता नहीं बल्कि विश्वास का टूटना है। प्रेमचंद केशव की कायरता के माध्यम से दिखाते हैं कि सामाजिक रूढ़ियों का विरोध केवल भाषणों से नहीं, बल्कि उनके परिणामों को सहने के साहस से सिद्ध होता है।

1933•29 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

कुत्सा

Kutsa

प्रेमचंद की 'कुत्सा' चुगली, अपुष्ट आरोप और राजनीतिक-सामाजिक जीवन में फैली निंदा के दुष्परिणामों पर केंद्रित कहानी है। कथावाचक अपने मित्रों के साथ एक राष्ट्रीय संस्था के तीन प्रमुख कार्यकर्ताओं की आलोचना करता है और उन पर धन के दुरुपयोग, शराबखोरी तथा दिखावे जैसे आरोप लगाए जाते हैं। बाद में जब वह लगभग दस वर्ष की एक बालिका को उसके घर पहुँचाने जाता है, तो उसे पता चलता है कि वही अफवाहें बच्ची के मन में भी पहुँच चुकी हैं। कथावाचक स्वयं उन आरोपों की चर्चा कर चुका है, फिर भी वह बच्ची के निर्मल मन को कटुता और निंदा से बचाने के लिए उन्हें झूठा बताता है। कहानी का अंतिम व्यंग्य यही है कि उस दिन उसे एक सुरक्षात्मक झूठ बोलकर जितनी खुशी होती है, उतनी शायद कभी सच बोलकर भी नहीं हुई थी।

1932•13 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

कुसुम

Kusum

प्रेमचंद की 'कुसुम' पत्रात्मक शैली में लिखी गई ऐसी सामाजिक कहानी है जिसमें एक नवविवाहिता का पति विवाह के बाद उससे बात तक नहीं करता, क्योंकि वह चाहता है कि उसके ससुर उसे विलायत जाकर पढ़ने के लिए धन दें। कुसुम बार-बार प्रेम और विनम्रता से पत्र लिखकर पूछती है कि उससे क्या अपराध हुआ है, लेकिन पति कोई उत्तर नहीं देता। जब कुसुम के पिता पति की शिक्षा के लिए पैसे भेजने की सोचते हैं, तो कुसुम इसका विरोध करती है। वह समझ जाती है कि पति की उदासीनता वास्तव में एक आर्थिक रणनीति है—वह उसे भावनात्मक रूप से तोड़कर उसके मायके से अपनी शिक्षा का खर्च निकलवाना चाहता है। अंततः बार-बार संबंध सुधारने के प्रयास विफल होने पर कुसुम आत्मसम्मान को ऐसे विवाह से ऊपर रखती है जिसमें उसके साथ अन्याय हो रहा है। प्रेमचंद दहेज-सदृश आर्थिक मांग, पितृसत्तात्मक वैवाहिक सत्ता और उस दोहरे सामाजिक मानदंड की आलोचना करते हैं जिसमें पति पत्नी की उपेक्षा कर सकता है, लेकिन पत्नी के परिवार से लगातार त्याग की अपेक्षा की जाती है।

1932•52 मिनट
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गुप्त-धन भाग 2

कोई दुख न हो तो बकरी ख़रीद लो

Koi Dukh Na Ho To Bakri Kharid Lo

प्रेमचंद की हास्य-व्यंग्य प्रधान कहानी ‘कोई दुख न हो तो बकरी ख़रीद लो’ एक घरेलू समस्या के आसान समाधान की तलाश में पैदा होने वाली नई परेशानियों का मनोरंजक चित्रण करती है। दूध की खराब गुणवत्ता से परेशान कथावाचक पहले गाय रखने और फिर बकरी पालने के बारे में सोचता है। पंडितजी बकरी के गुणों का ऐसा बखान करते हैं कि कथावाचक उसे खरीदे बिना ही उसका प्रशंसक बन जाता है। लेकिन बकरी घर में आने के बाद जिस सुविधा की उम्मीद थी, उसके बजाय नई जिम्मेदारियाँ, खर्च और झंझट सामने आने लगते हैं। प्रेमचंद इस छोटे-से घरेलू प्रसंग के माध्यम से मध्यवर्गीय जीवन, मानवीय स्वभाव और पुरानी परेशानी से छुटकारा पाने के प्रयास में नई परेशानी खड़ी कर लेने की प्रवृत्ति पर हास्यपूर्ण व्यंग्य करते हैं।

•32 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

कौशल

Kaushal

प्रेमचंद की 'कौशल' दांपत्य जीवन में संदेह, ईर्ष्या, स्वामित्व-बोध और बुद्धि के खेल की कहानी है। कमलाप्रसाद को संदेह है कि उसकी पत्नी सुमन किसी दूसरे पुरुष की ओर आकर्षित है। वह सीधे बात करने के बजाय उसकी निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए एक चाल चलता है। सुमन उसकी चाल को समझ जाती है और अपनी बुद्धि से उसी खेल को उसके विरुद्ध मोड़ देती है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि प्रेम में विश्वास के स्थान पर संदेह और परीक्षा आ जाए तो संबंध भीतर से कमजोर होने लगते हैं। साथ ही कहानी स्त्री की बुद्धि, आत्मसम्मान और भावनात्मक समझ को पुरुष के अधिकार-बोध के सामने रखती है।

1923•13 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

क्षमा

Kshama

प्रेमचंद की 'क्षमा' धार्मिक वैमनस्य, प्रतिशोध और मानवीय करुणा के बीच संघर्ष की ऐतिहासिक कहानी है। मुस्लिम शासन वाले स्पेन में ईसाई नेता दाऊद अपने देश की स्वतंत्रता और अपने समुदाय की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। एक बहस के बाद उसका मुसलमान युवक जमाल से संघर्ष होता है और जमाल मारा जाता है। दाऊद जान बचाकर भागता है और अंततः शेख हसन के घर शरण लेता है। उसे पता चलता है कि शेख हसन उसी जमाल का पिता है जिसे उसने मारा है। हसन के भीतर पुत्र-वियोग का असहनीय दुःख और शरणागत की रक्षा करने का धार्मिक कर्तव्य आमने-सामने आ जाते हैं। अंततः वह बदले के बजाय क्षमा को चुनता है और दाऊद को सुरक्षित भाग जाने देता है। इस अनुभव से दाऊद की मुसलमानों और इस्लाम के प्रति दृष्टि बदल जाती है। प्रेमचंद इस कहानी के माध्यम से धर्म और धर्म के नाम पर किए जाने वाले अत्याचार में अंतर करते हैं तथा दिखाते हैं कि क्षमा सामुदायिक प्रतिशोध की श्रृंखला को तोड़ सकती है।

1924•24 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

खुदाई फ़ौज़दार

Khudai Fauzdar

प्रेमचंद की 'खुदाई फ़ौज़दार' धन के लालच, धार्मिक पाखंड, पुलिस-व्यवस्था की भ्रष्टता और धनवानों के लिए उपलब्ध विशेष सुरक्षा पर तीखा व्यंग्य है। सेठ नानकचंद एक धनी महाजन हैं जो स्वयं को अत्यंत धर्मनिष्ठ और परोपकारी दिखाते हैं, लेकिन अपने असामियों से कठोर ब्याज वसूलते हैं। जब उन्हें पच्चीस हजार रुपये की फिरौती माँगने वाले धमकी भरे पत्र मिलते हैं, तो वे अपनी संपत्ति, बंदूकों और पुलिस पर भरोसा करते हैं। पुलिस के नाम पर आए कुछ लोग उन्हें समझाते हैं कि अपनी कीमती संपत्ति सरकारी खजाने में जमा कर दें। नानकचंद उनकी बात पर विश्वास कर लेते हैं। लेकिन यही लोग असली 'खुदाई फ़ौज़दार' निकलते हैं—ऐसे लुटेरे जो स्वयं को कानून और न्याय का रक्षक समझकर दूसरों पर अपना अधिकार जताते हैं। प्रेमचंद इस विडंबना के माध्यम से दिखाते हैं कि धर्म, धन और सरकारी अधिकार का बाहरी प्रदर्शन मनुष्य को वास्तविक नैतिकता से नहीं बचा सकता।

1934•31 मिनट
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मानसरोवर भाग 1

गिला

Gila

प्रेमचंद की 'गिला' पति-पत्नी के संबंधों में छिपी शिकायतों, असमान अपेक्षाओं और घरेलू जिम्मेदारियों पर केंद्रित एक रोचक व्यंग्यात्मक कहानी है। पत्नी की दृष्टि से कही गई कहानी में उसका पति बाहर के लोगों के प्रति अत्यंत उदार, विनम्र और परोपकारी है, लेकिन उसकी यही उदारता घर की आवश्यकताओं की उपेक्षा बन जाती है। वह मित्रों पर पैसे खर्च करता है, गरीबों को अपना सामान दे देता है, खराब दुकानदारों से सामान खरीदता है और बच्चों के प्रति अनुशासन में भी अत्यधिक नरम है। पत्नी की शिकायत केवल उसके व्यवहार से नहीं, बल्कि इस बात से है कि समाज जिस उदारता की प्रशंसा करता है, उसका भार घरवालों को उठाना पड़ता है। हास्य और घरेलू प्रसंगों के माध्यम से प्रेमचंद बाहरी यश और वास्तविक पारिवारिक जिम्मेदारी के बीच के विरोधाभास को उजागर करते हैं।

1932•38 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

गुरु-मंत्र

Guru Mantra

प्रेमचंद की 'गुरु-मंत्र' धार्मिक पाखंड और बनावटी साधु-संस्कृति पर केंद्रित एक संक्षिप्त व्यंग्य-कथा है। घर के झगड़ों और निमंत्रणों की कमी से परेशान पंडित चिंतामणि अचानक वैराग्य ग्रहण कर साधु बनने का निश्चय करते हैं। उनके मित्र पंडित मोटेराम शास्त्री उन्हें साधु बनने की व्यावहारिक कला सिखाते हैं—कैसे दान माँगना है, गृहस्थों को किस प्रकार संबोधित करना है और कैसी टेढ़ी-मेढ़ी भाषा बोलनी है। लेकिन चिंतामणि को शीघ्र ही पता चलता है कि साधु का वेश धारण करना और वास्तव में साधु-संस्कृति के आचरण निभाना अलग बातें हैं। गांजा पीने वाले साधुओं के बीच उनकी चिलम न पी पाने की असमर्थता उनकी पोल खोल देती है। प्रेमचंद हास्य और व्यंग्य के माध्यम से वास्तविक आध्यात्मिकता और धार्मिक प्रदर्शन के बीच का अंतर उजागर करते हैं।

1926•10 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

गृह-नीति

Grih Neeti

प्रेमचंद की 'गृह-नीति' सास-बहू के संघर्ष के माध्यम से घरेलू सत्ता, स्त्री की गरिमा और परंपरा तथा आधुनिक वैवाहिक संबंधों के टकराव को सामने लाती है। विधवा माँ लगातार अपने बेटे से बहू की शिकायत करती है। वह चाहती है कि बहू पुराने ढंग से सेवा करे, चरण दबाए, बड़ों के सामने झुके और घर के काम को अपना कर्तव्य माने। बेटा इस धारणा का विरोध करता है। वह कहता है कि पत्नी उसकी जीवन-संगिनी है, लौंडी नहीं, और पति-पत्नी दोनों बराबर हैं। बहू अचानक उनकी बातचीत सुन लेती है और स्पष्ट शब्दों में कहती है कि वह इस घर में गुलामी करने नहीं, जीवन-संगिनी बनकर आई है। उसके अनुसार कर्तव्य प्रेम से पैदा होना चाहिए, तिरस्कार और दबाव से नहीं। इसके बाद पति अपनी माँ के कथित हृदय-परिवर्तन की बात पत्नी को बताता है। बहू तुरंत बदला लेने के बजाय स्वयं आगे बढ़कर सास के प्रति प्रेम और सेवा का भाव अपनाने को तैयार हो जाती है। कहानी दिखाती है कि परिवार में अधिकार और परंपरा से पैदा हुआ संघर्ष संवेदना, संवाद और पारस्परिक सम्मान से समाप्त किया जा सकता है।

1935•36 मिनट
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गुप्त धन भाग 1

घमण्ड का पुतला

Ghamand Ka Putla

प्रेमचंद की ‘घमण्ड का पुतला’ सत्ता, स्वाभिमान, अहंकार और आध्यात्मिक श्रेष्ठता के अंतर को उजागर करने वाली कहानी है। सरयू नदी के किनारे पड़ाव डाले एक जिला मजिस्ट्रेट को कुंअर सज्जनसिंह के बारे में शिकायत मिलती है कि उन्होंने सरकारी अधिकारी के स्वागत में कोई खास सम्मान नहीं दिखाया। लेकिन सज्जनसिंह की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान अधिकारी की जिज्ञासा बढ़ा देते हैं। बाद में एक साधु के सामने सज्जनसिंह को विनम्र देखकर अधिकारी की दृष्टि बदल जाती है और उसे समझ आता है कि वास्तविक महानता धन, पद और बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आत्मिक शक्ति में हो सकती है।

1916•22 मिनट
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मानसरोवर भाग 1

घर जमाई

Ghar Jamai

प्रेमचंद की 'घर जमाई' आर्थिक निर्भरता, पारिवारिक स्वार्थ और आत्मसम्मान की मार्मिक ग्रामीण कहानी है। हरिधन विवाह के बाद ससुराल में ही बस जाता है और अपनी संपत्ति भी ससुरालवालों को सौंप देता है। उसे लगता है कि सास-ससुर और पत्नी का प्रेम सच्चा है और यही घर अब उसका स्थायी घर है। लेकिन जैसे-जैसे उसकी संपत्ति समाप्त होती जाती है, परिवार का व्यवहार बदल जाता है। जो दामाद कभी घर का लाड़ला था, वही धीरे-धीरे सबसे अधिक काम करने वाला और सबसे कम सम्मान पाने वाला व्यक्ति बन जाता है। उसे भोजन तक के लिए उपेक्षा और अपमान सहना पड़ता है। अंततः एक तीखी पारिवारिक घटना के बाद हरिधन अपने गाँव लौटता है। वहाँ वह अपनी माँ की स्मृतियों, अपनी जमीन और श्रम के माध्यम से फिर से आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान प्राप्त करता है। कहानी दिखाती है कि जब रिश्तों में आर्थिक स्वार्थ प्रवेश कर जाता है तो स्नेह भी शोषण में बदल सकता है।

1922•31 मिनट
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मानसरोवर भाग 1

घासवाली

Ghaswali

प्रेमचंद की 'घासवाली' जाति, गरीबी, स्त्री-अस्मिता और यौन उत्पीड़न पर केंद्रित एक सशक्त कहानी है। गरीब चमार स्त्री मुलिया घास बेचकर अपने परिवार का पालन करने में मदद करती है। ठाकुर चैनसिंह उसकी सुंदरता का लाभ उठाकर उसके साथ अनुचित व्यवहार करने की कोशिश करता है। मुलिया डरने या झुकने के बजाय उसके सामने निर्भीकता से खड़ी होती है और उसे बताती है कि उसकी हिम्मत का आधार केवल जातिगत और आर्थिक सत्ता है। उसके तीखे प्रश्न चैनसिंह को अपने व्यवहार और सामाजिक पूर्वाग्रहों पर विचार करने के लिए मजबूर करते हैं। इसके बाद चैनसिंह का व्यवहार बदलने लगता है और वह अपने मजदूरों के साथ अधिक मानवीय व्यवहार करने लगता है। कहानी दिखाती है कि गरीबी स्त्री को असुरक्षित बनाती है, लेकिन उसकी गरिमा और आत्मसम्मान को समाप्त नहीं करती।

1929•32 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

चमत्कार

Chamatkar

प्रेमचंद की 'चमत्कार' प्रलोभन, नैतिक पतन और आत्मशुद्धि की कहानी है। गरीब लेकिन शिक्षित युवक चन्द्रप्रकाश ठाकुर साहब के बेटे को पढ़ाता है और परिवार में नौकर की तरह नहीं बल्कि घर के सदस्य की तरह सम्मान पाता है। जब उसे विवाह की पूरी व्यवस्था का जिम्मा मिलता है, तब वह महँगे गहनों को देखकर अपनी गरीबी और पत्नी चम्पा के अभाव से तुलना करने लगता है। ईर्ष्या धीरे-धीरे लालच और फिर चोरी में बदल जाती है और वह दुल्हन के गहने चुरा लेता है। बाद में चम्पा को गहने मिल जाते हैं और वह पति को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के बजाय उसे ठाकुर साहब के विश्वास और उपकार याद दिलाती है। उसके शब्द चन्द्रप्रकाश के विवेक को जगा देते हैं। वह अंततः गहने चुपचाप वापस रख देता है और परिवार को लगता है कि गहने किसी चमत्कार से वापस मिल गए। वास्तविक 'चमत्कार' किसी दैवी घटना में नहीं, बल्कि एक अपराध की ओर जा चुके मनुष्य के भीतर नैतिक चेतना के जागने में है।

1932•37 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

जादू

Jaadu

प्रेमचंद की 'जादू' एक अत्यंत संक्षिप्त, संवादप्रधान कहानी है जिसमें दो बहनों को पता चलता है कि एक ही पुरुष दोनों से प्रेम के समान दावे कर रहा है। नीला पहले मीना से इसलिए नाराज़ होती है कि वह उस पुरुष को पत्र क्यों लिख रही है जिसने पहले उसका अपमान किया और उसके नाम को बदनाम किया था। बातचीत आगे बढ़ने पर पता चलता है कि वह पुरुष मीना से भी वही बातें कहता है जो कभी नीला से कहता था—प्यार, मर जाने और ज़हर खा लेने जैसी भावुक धमकियाँ। दोनों बहनों को समझ में आता है कि उसकी प्रेम-भाषा वास्तव में छल और शिकार करने की एक तय तरकीब है। कहानी ईर्ष्या को बहनापा और समझ में बदलते हुए पुरुष की भावनात्मक चालबाजी तथा स्त्री के आत्मसम्मान पर तीखा व्यंग्य करती है।

1934•8 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

जीवन का शाप

Jeevan Ka Shaap

प्रेमचंद की 'जीवन का शाप' धन, विवाह, दांपत्य-संबंध और मनुष्य की इच्छाओं के भ्रम पर केंद्रित एक तीखा मनोवैज्ञानिक-सामाजिक व्यंग्य है। निर्धन समाचारपत्र-संपादक कावसजी अपने धनी मित्र शापूरजी के सुखी जीवन से ईर्ष्या करते हैं और उनकी पत्नी शीरीं में वह आदर्श देखते हैं जो उन्हें अपनी पत्नी गुलशन में दिखाई नहीं देता। लेकिन शीरीं बताती है कि धन और ऐश के बावजूद उसके विवाह में प्रेम और सहचर्य का अभाव है और शापूरजी रातें भोग-विलास में बिताते हैं। कावसजी धीरे-धीरे शीरीं के साथ नया जीवन बसाने की कल्पना करने लगते हैं। जब शीरीं सचमुच उनके साथ चलने के लिए तैयार हो जाती है, तब कावसजी पहली बार उस जीवन की वास्तविक आर्थिक कठिनाइयों के बारे में सोचते हैं जो वे उसे दे सकते हैं। उन्हें गुलशन की शिकायतों और कठोरता के पीछे छिपी निष्ठा, घरेलू जिम्मेदारी और त्याग दिखाई देने लगता है। अंततः गुलशन कहती है कि मनुष्य अक्सर उसी चीज की ओर दौड़ता है जिसमें उसका अमंगल छिपा होता है—यही 'जीवन का शाप' है।

1935•33 मिनट
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मानसरोवर भाग 1

ज्योति

Jyoti

प्रेमचंद की 'ज्योति' एक युवा विधवा बूटी के भीतर आए भावनात्मक परिवर्तन की कहानी है। पति की मृत्यु के बाद पाँच वर्षों से बूटी अपने तीन बच्चों को कठिन परिस्थितियों में पाल रही है। उसने अपने लिए दूसरा विवाह करने की संभावना छोड़ दी और अपनी इच्छाओं को दबाते-दबाते उसका स्वभाव कठोर हो गया। वह अपने बड़े बेटे मोहन के रूपिया से प्रेम को भी संदेह की दृष्टि से देखती है। लेकिन जब मोहन परिवार के प्रति स्नेह और उदारता दिखाने लगता है, तो बूटी के भीतर वर्षों से दबा मातृत्व और प्रेम फिर जाग उठता है। बाद में उसे पता चलता है कि जिसे वह केवल शौक-सिंगार में लगी लड़की समझती थी, वही रूपिया कठिन समय में पड़ोस की स्त्री की सहायता करती रही है। बूटी का संदेह करुणा में बदल जाता है और अंततः वह स्वयं मोहन और रूपिया के विवाह की बात आगे बढ़ाती है। कहानी दिखाती है कि स्नेह मनुष्य के भीतर जमी कटुता, अकेलेपन और संदेह को बदल सकता है।

•28 मिनट
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मानसरोवर भाग 1

झाँकी

Jhanki

प्रेमचंद की 'झाँकी' एक मध्यवर्गीय परिवार में सास-बहू के संघर्ष और उसके बीच पिसते पति की मनोवैज्ञानिक स्थिति की कहानी है। तीज के अवसर पर बहन के घर भेजे जाने वाले उपहारों को लेकर माँ और पत्नी विद्या के बीच विवाद शुरू होता है। घटती आय और बढ़ते खर्च के बीच यह मामूली आर्थिक प्रश्न धीरे-धीरे पुराने आरोपों, अधिकार-बोध, रूढ़ियों और बदलते समय के संघर्ष में बदल जाता है। जन्माष्टमी के दिन घर में ऐसा तनाव फैल जाता है कि बच्चों तक को स्नेह नहीं मिलता। एक धार्मिक झाँकी और उससे जुड़ी स्मृतियाँ कथावाचक के भीतर अचानक परिवर्तन पैदा करती हैं। उसे अपने मृत भाई, अपनी माँ और विवाह के शुरुआती दिनों की याद आती है और जिन लोगों से वह क्रोधित था, उन्हीं के प्रति उसके भीतर करुणा और प्रेम जाग उठता है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि स्मृति और आत्मचिंतन कभी-कभी लंबे समय से जमा पारिवारिक कटुता को पिघला सकते हैं।

1932•21 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

डिक्री के रुपये

Decree Ke Rupaye

प्रेमचंद की 'डिक्री के रुपये' मित्रता, रिश्वत, औपनिवेशिक शासन, पत्रकारिता और व्यक्तिगत निष्ठा तथा सार्वजनिक कर्तव्य के बीच के संघर्ष की कहानी है। मिर्जा नईम को विष्णुपुर रियासत के मैनेजर की हत्या की जाँच सौंपी जाती है। रियासत की ओर से उसे उपहार और बीस हजार रुपये का प्रलोभन मिलता है और वह ऐसी रिपोर्ट तैयार करता है जिससे युवा कुँवर साहब हत्या के संदेह से बच जाएँ। उसका पुराना मित्र कैलास सब कुछ जानता है, क्योंकि नईम ने उससे अपने निर्णय की पूरी बात कही थी। कैलास लंबे समय तक इस धर्म-संकट में रहता है कि मित्रता निभाए या अपने पत्रकार और सार्वजनिक कर्तव्य का पालन करे। अंततः वह सत्य प्रकाशित करता है। नईम उसके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा करता है, अदालत में सब कुछ नकार देता है और कैलास पर बीस हजार रुपये की डिक्री हो जाती है। कैलास की संपत्ति नीलाम होने और उसका अखबार बंद होने की नौबत आ जाती है। लेकिन अंत में नईम स्वयं उसके पास लौटता है और दोनों की मित्रता एक जटिल नैतिक रूप में सामने आती है—जहाँ एक मित्र सार्वजनिक रूप से दूसरे के विरुद्ध खड़ा होता है, फिर भी निजी रूप से उसे विनाश से बचाने का प्रयास करता है।

1925•39 मिनट
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मानसरोवर भाग 1

तावान

Tawan

प्रेमचंद की 'तावान' स्वदेशी आंदोलन, गरीबी और आर्थिक दबाव के बीच पैदा होने वाले नैतिक संघर्ष की कहानी है। छकौड़ीलाल एक गरीब कपड़ा व्यापारी है जो विदेशी कपड़े के बहिष्कार के आंदोलन में शामिल होता है। लेकिन घर में बूढ़ी माँ, बीमार पत्नी और पाँच बच्चों का खर्च चलाना कठिन हो जाता है। मजबूरी में वह फिर विदेशी कपड़ा बेच देता है। बहिष्कार समिति उस पर 101 रुपये का तावान लगा देती है, जबकि उसके घर में दो दिन से चूल्हा तक नहीं जला है। प्रेमचंद इस घटना के माध्यम से दिखाते हैं कि राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श और गरीब व्यक्ति की आर्थिक वास्तविकता हमेशा एक-दूसरे से आसानी से मेल नहीं खाते। कहानी आंदोलन की भावना का विरोध नहीं करती, बल्कि यह प्रश्न उठाती है कि क्या आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को सुधार या राष्ट्रहित के नाम पर ऐसी सजा देना न्यायपूर्ण है जो उसके परिवार को भूख के कगार पर पहुँचा दे।

1931•19 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

तेंतर

Tentar

प्रेमचंद की 'तेंतर' अंधविश्वास, पुत्र-प्राथमिकता और कन्या-भेदभाव पर तीखा प्रहार करने वाली कहानी है। पंडित दामोदरदत्त के तीन बेटों के बाद एक बेटी जन्म लेती है। परिवार की वृद्ध दादी मानती है कि तीन बेटों के बाद जन्मी लड़की 'तेंतर' होती है और उसके जन्म से माता-पिता या स्वयं लड़की पर कोई बड़ा अनिष्ट आता है। यह अंधविश्वास धीरे-धीरे पूरे परिवार के व्यवहार को प्रभावित करता है। माँ बच्ची की उपेक्षा करती है और उसे शांत रखने के लिए अफीम तक देती है। बच्ची भूख और उपेक्षा से कमजोर होती जाती है। दामोदरदत्त एक रात उसकी दशा देखकर समझते हैं कि किसी कल्पित अनिष्ट के डर से एक निर्दोष शिशु को दंड देना अमानवीय है। वे उसे स्नेह देते हैं और उनके बेटे भी अपनी छोटी बहन से प्रेम करने लगते हैं। वे एक बकरी का दूध पिलाकर उसका पालन करने में मदद करते हैं और बच्ची स्वस्थ होने लगती है। लेकिन दादी का अंधविश्वास समाप्त नहीं होता। अंततः जब वह स्वयं बीमार पड़ती है तो वह अपनी बीमारी को भी तेंतर के अभिशाप का प्रमाण मानती है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि अंधविश्वास केवल विचार की भूल नहीं है; वह परिवार के व्यवहार को बदलकर एक निर्दोष बच्चे के जीवन के लिए वास्तविक खतरा पैदा कर सकता है।

1924•24 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

दण्ड

Dand

प्रेमचंद की 'दण्ड' रिश्वत, जातिगत बहिष्कार और सामुदायिक दंड की विडंबना पर तीखा व्यंग्य है। मिस्टर सिन्हा एक सम्मानित जज हैं जो अपने न्यायप्रिय और कानूननिष्ठ होने की छवि बनाए रखते हैं, लेकिन जगत पांडे से रिश्वत लेते हैं। मुकदमा हार जाने के बाद जगत पांडे उनके बंगले के सामने अनशन करके बैठ जाता है और अपनी मृत्यु के माध्यम से सिन्हा के भ्रष्टाचार को सार्वजनिक करने की धमकी देता है। अंततः सिन्हा पाँच हजार रुपये देने को तैयार होते हैं, लेकिन रकम हाथ में आते ही जगत पांडे गिरकर मर जाता है। इसके बाद बिरादरी और समाज सिन्हा का बहिष्कार कर देते हैं। सबसे बड़ा संकट तब आता है जब उनकी बेटी त्रिवेणी विवाह योग्य होती है और कोई भी परिवार बहिष्कृत सिन्हा के घर से संबंध स्वीकार नहीं करता। प्रेमचंद इस स्थिति के माध्यम से प्रश्न उठाते हैं कि अपराध यदि पिता ने किया है तो उसकी सजा निर्दोष बेटी को क्यों मिले?

1925•35 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

दामुल का कैदी

Damul Ka Kaidi

प्रेमचंद की 'दामुल का कैदी' वर्ग-संघर्ष, मजदूर-शोषण, नैतिक जागरण और प्रायश्चित की अत्यंत प्रभावशाली कहानी है। धनी मिल-मालिक सेठ खूबचंद भारी लाभ के बावजूद मजदूरों की मजदूरी घटा देता है और हड़ताल के उत्तर में पुलिस की हिंसा का सहारा लेता है। मजदूरों के नेता गोपीनाथ के सामने आने पर खूबचंद उसे गोली मार देता है। लेकिन मृत्यु के क्षणों में भी गोपीनाथ उत्तेजित मजदूरों को खूबचंद की हत्या करने से रोक देता है। एक निर्दोष और उदार मनुष्य की हत्या का अपराध खूबचंद के अंत:करण को झकझोर देता है। वह स्वयं अपना अपराध स्वीकार करता है और चौदह वर्ष के काले पानी की सजा पाता है। उसके पंद्रह वर्षों के निर्वासन में उसकी सारी संपत्ति नष्ट हो जाती है और उसकी पत्नी प्रमिला कठिन परिस्थितियों में बेटे कृष्णचंद्र का पालन करती है। लौटने पर खूबचंद देखता है कि उसका बेटा गोपीनाथ जैसा ही रूप और स्वभाव रखता है। कृष्णचंद्र मजदूरों का नेता बनता है और अंततः हड़ताल के दौरान गोलियों से मारा जाता है। खूबचंद अपने बेटे के बलिदान को शोक के बजाय न्याय के पक्ष में वीरगति के रूप में स्वीकार करता है। जो व्यक्ति कभी मजदूर नेता को गोली मार चुका था, वही अंत में मजदूरों के अधिकार के पक्ष में खड़ा हो जाता है।

1932•60 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

दीक्षा

Diksha

प्रेमचंद की 'दीक्षा' नशे की लत, आत्म-छल, सिद्धांतों से समझौते और औपनिवेशिक अपमान पर तीखा व्यंग्य है। कहानी का अनाम कथावाचक किशोरावस्था में नशानिवारणी सभा का उत्साही सदस्य बनता है और जीवन भर शराब न पीने की प्रतिज्ञा करता है। लेकिन कॉलेज, मित्रों का दबाव, पेशेगत तनाव और स्वयं को दिए गए तर्क धीरे-धीरे उसकी प्रतिज्ञा को कमजोर कर देते हैं। होली के दिन वह जानबूझकर शराब पीने की अपनी 'दीक्षा' की तैयारी करता है और मित्रों के दबाव में पहली बार पीता है। शीघ्र ही शराब मनोरंजन की वस्तु न रहकर उसके जीवन की आवश्यकता बन जाती है। एक बरसाती रात मुकदमे के सिलसिले में बाहर फँसे होने पर उसकी तलब इतनी बढ़ जाती है कि वह एक अंग्रेज अधिकारी के खानसामा से चोरी-छिपे शराब खरीदता है। चोरी पकड़ी जाती है और अंग्रेज साहब उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करते हुए उसके मुँह पर कालिख पोत देते हैं और लोगों के सामने दौड़ाते हैं। यही अपमान उसके लिए वह निर्णायक अनुभव बन जाता है जो उसके सभी पुराने तर्कों और प्रतिज्ञाओं से अधिक प्रभावी सिद्ध होता है। वह शराब पूरी तरह छोड़ देता है और पाँच वर्षों तक उसे हाथ नहीं लगाता। प्रेमचंद हास्य और आत्मव्यंग्य के माध्यम से दिखाते हैं कि मनुष्य अपने सिद्धांतों से गिरते समय किस प्रकार स्वयं को तर्क देकर धोखा देता है, साथ ही औपनिवेशिक सत्ता की नस्लीय और प्रशासनिक निरंकुशता को भी उजागर करते हैं।

1924•40 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

दूध का दाम

Doodh Ka Daam

प्रेमचंद की 'दूध का दाम' जाति-व्यवस्था, छुआछूत और श्रम के शोषण पर तीखा प्रहार करने वाली कहानी है। गरीब भंगी स्त्री भुंगी अपने बेटे मंगल के साथ-साथ जमींदार महेशनाथ के बेटे सुरेश को भी अपना दूध पिलाकर पालती है। उसका मातृ-दूध उस संपन्न परिवार के बच्चे के जीवन का आधार बनता है, लेकिन भुंगी और उसके बेटे को इसके बदले सम्मान या सुरक्षा नहीं मिलती। बाद में भुंगी को घर से निकाल दिया जाता है और उसकी मृत्यु के बाद मंगल अनाथ तथा निर्धन हो जाता है। सुरेश विशेषाधिकार और सुविधा में बड़ा होता है, जबकि मंगल जूठे भोजन और टुकड़ों पर जीवित रहने को मजबूर है। भुंगी के दूध के उस नैतिक ऋण को, जिसे समाज कहता है कि कोई चुका नहीं सकता, मंगल के हिस्से में सम्मान के बजाय भूख, अपमान और बहिष्कार मिलता है। शीर्षक इसी विडंबना को सामने लाता है।

1934•26 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

धिक्कार

Dhikkar

प्रेमचंद की 'धिक्कार' देशभक्ति, राष्ट्रहित और निजी स्वार्थ के बीच संघर्ष की तीखी राजनीतिक कहानी है। ईरान और यूनान के युद्ध के दौरान यूनान की जनता को डेल्फी की पुजारिन बताती है कि देश की पराजय का कारण कोई देशद्रोही है। वह देशद्रोही पासोनियस निकलता है, जो धन और विलास के लोभ में यूनानी सैन्य योजनाएँ ईरानियों को बताता है। पकड़े जाने के बाद उसे देवी के मंदिर में बंद कर दिया जाता है। कठोर यातना के बाद वह पश्चात्ताप का अभिनय करते हुए जनता की सहानुभूति प्राप्त कर लेता है और लोग उसे छोड़ने को तैयार हो जाते हैं। लेकिन उसकी माँ समझ जाती है कि वह फिर देश के साथ विश्वासघात कर सकता है। वह मातृ-स्नेह को राष्ट्रहित से ऊपर नहीं रखती और स्वयं मंदिर का द्वार बंद करवाकर अपने पुत्र को भीतर कैद रहने देती है। कहानी का केंद्रीय संदेश है कि देशहित के सामने निजी मोह और स्वार्थ का स्थान नहीं होना चाहिए।

1925•23 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

नया विवाह

Naya Vivah

प्रेमचंद की 'नया विवाह' वृद्धावस्था में एक पुरुष द्वारा युवा स्त्री से विवाह करके अपनी खोती हुई जवानी को फिर से पाने की मानसिकता की तीखी मनोवैज्ञानिक पड़ताल है। लाला डंगामल ने अपनी पहली पत्नी लीला के पच्चीस वर्ष के साथ को प्रेम और आत्मीयता में बदलने के बजाय उसकी ढलती उम्र को उसके विरुद्ध इस्तेमाल किया। लीला की मृत्यु के बाद वे युवा आशा से दूसरा विवाह करते हैं और मानते हैं कि नया विवाह उनके जीवन में फिर से यौवन भर देगा। लेकिन आशा उनकी तरह दिखावे, सैर-सपाटे और भोग-विलास में रुचि नहीं रखती। वह गृहस्थी, भोजन और सेवा को अधिक महत्व देती है। डंगामल उसकी उदासीनता को अपने प्रति असफलता मानते हैं। इसी बीच युवा नौकर जुगल आशा की ओर आकर्षित होने लगता है और आशा भी उसकी सहज प्रशंसा तथा सरलता से प्रभावित होती है। कहानी के माध्यम से प्रेमचंद पुरुष के स्वामित्व-बोध, उम्र के दोहरे मानदंड, विवाह में भावनात्मक उपेक्षा और खरीदी हुई सुख-सुविधा तथा वास्तविक आत्मीयता के बीच के अंतर को उजागर करते हैं।

1932•37 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

नरक का मार्ग

Narak Ka Marg

प्रेमचंद की 'नरक का मार्ग' एक ऐसी युवती की प्रथम-पुरुष आत्मकथात्मक कथा है जिसका विवाह उससे बहुत अधिक उम्र के, संदेहशील और अधिकारवादी पुरुष से कर दिया जाता है। विवाह उसे प्रेम, सहचर्य और मानसिक सुख देने के बजाय कैद जैसा अनुभव होता है। वह अपनी सहेली सुशीला के सुखी दांपत्य को देखकर उस प्रेम और आत्मीयता के लिए तरसती रहती है जो उसे अपने विवाह में कभी नहीं मिली। पति की मृत्यु के बाद उसकी यह आकांक्षा और तीव्र हो जाती है। एक वृद्धा उसे प्रेम पाने का आश्वासन देकर अपने साथ ले जाती है, लेकिन वह रास्ता अंततः उसे शोषण और सामाजिक पतन की ओर ले जाता है। कहानी के अंत में नायिका अपने पतन की जिम्मेदारी केवल स्वयं पर नहीं रखती, बल्कि उन माता-पिता और सामाजिक परंपराओं को भी दोष देती है जो लड़कियों का विवाह धन, संपत्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा देखकर असमान वरों से कर देते हैं।

1925•26 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

निर्वासन

Nirvasan

प्रेमचंद की 'निर्वासन' स्त्री की गरिमा, पितृसत्तात्मक नैतिकता और वैवाहिक विश्वास पर तीखा प्रश्न उठाने वाली कहानी है। धार्मिक मेले में भीड़ के कारण मर्यादा अपने पति परशुराम से बिछड़ जाती है और खोई हुई स्त्रियों के शिविर में पहुँचती है। घर लौटने की बेचैनी में वह एक ऐसे व्यक्ति के छल का शिकार होती है जो उसके पति को जानने का झूठा दावा करके उसे एक गलत स्थान पर ले जाता है। मर्यादा अपनी पवित्रता की रक्षा करते हुए वहाँ से भाग निकलती है और अंततः घर लौटती है। लेकिन परशुराम उसकी बात पर विश्वास नहीं करता। उसके लिए केवल यह तथ्य पर्याप्त है कि मर्यादा कई दिनों तक घर से बाहर रही और दूसरे पुरुषों की निगाहों तथा संगति के बीच रही। मर्यादा के साथ हुए अपराध का दोषी होने के बजाय वही संदेह और सामाजिक 'मर्यादा' के नाम पर उसे घर से निकाल देता है। कहानी दिखाती है कि पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की गरिमा को अक्सर उसके अपने चरित्र और अनुभव से नहीं, बल्कि पुरुष की दृष्टि और संदेह से आँका जाता है।

1924•18 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

नेउर

Neur

प्रेमचंद की 'नेउर' ग्रामीण श्रमजीवी जीवन, दांपत्य-प्रेम, धार्मिक छल, गरीबी, लज्जा और अंतरात्मा की कहानी है। पचास वर्ष से अधिक आयु का मेहनती मजदूर नेउर अपनी बूढ़ी पत्नी बुधिया के लिए दिन-रात काम करता है ताकि उसके बाद भी उसे किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। एक घूमता हुआ साधु उसे विश्वास दिलाता है कि उसकी चाँदी और पत्नी के गहने चमत्कार से बढ़कर धन बन सकते हैं। नेउर अपनी सारी बचत और बुधिया के गहने लेकर साधु को दे देता है और ठगा जाता है। गाँव में लोगों से उधार लिए पैसे लौटाने में असमर्थ होने के कारण वह शर्म से भाग जाता है और अंततः उसी प्रकार का साधु बन बैठता है जिसने उसे ठगा था। लेकिन जब एक दुखी युवती अपने पति को वश में करने की आशा में उसके सामने गहनों की पेटारी रखती है, तो नेउर की अंतरात्मा उसे वही छल दोहराने नहीं देती। वह गाँव लौटता है, जहाँ उसे पता चलता है कि बुधिया मर चुकी है। इसके बाद उसका जीवन मौन दुःख और निष्क्रिय अस्तित्व में बदल जाता है।

1933•28 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

नैराश्य

Nairashya

प्रेमचंद की 'नैराश्य' पुत्र-प्राथमिकता, वैवाहिक क्रूरता और स्त्री पर सामाजिक दबाव की मार्मिक त्रासदी है। निरुपमा की तीन बेटियाँ हैं और उसका पति घमंडीलाल तथा उसका परिवार पुत्र न होने के कारण उसे अभागिनी समझते हैं। पति का प्रेम समाप्त हो जाता है, वह घर छोड़ने की धमकी देता है और निरुपमा को ऐसी बात के लिए दोषी ठहराता है जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं। निराश होकर निरुपमा की भाभी एक कथित महात्मा की कहानी गढ़ती है जो पुत्र का आशीर्वाद देने का दावा करता है। निरुपमा इस छल का सहारा लेकर घर लौटती है और कुछ समय बाद गर्भवती होने पर परिवार का व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है। परिवार को विश्वास है कि अब पुत्र ही होगा। निरुपमा को स्वयं पता है कि गर्भ में फिर बेटी है, लेकिन वह अपने साथ होने वाले व्यवहार को कुछ समय तक बनाए रखने के लिए गर्भावस्था के शुभ लक्षणों का अभिनय करती है। प्रसव के समय जब फिर बेटी जन्म लेती है तो परिवार का सारा उत्साह शोक और क्रोध में बदल जाता है। उसी समय निरुपमा की मृत्यु हो जाती है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि जिस समाज में स्त्री का सम्मान उसके मातृत्व के साथ-साथ बच्चे के लिंग पर निर्भर कर दिया जाए, वहाँ निराशा केवल मानसिक अवस्था नहीं रहती बल्कि जीवन-विनाशक सामाजिक शक्ति बन जाती है।

1924•27 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

नैराश्य लीला

Nairashya Leela

प्रेमचंद की 'नैराश्य लीला' बाल-विधवा के जीवन पर सामाजिक नियंत्रण और स्त्री की स्वतंत्रता की मार्मिक कहानी है। कैलासकुमारी का विवाह तेरह वर्ष की उम्र में हो जाता है और गौना होने से पहले ही वह विधवा हो जाती है। उसे अभी विवाह का अर्थ भी समझ में नहीं आया है, इसलिए माता-पिता के विपरीत वह पति की मृत्यु को वैसा शोक नहीं मानती जैसा समाज उससे अपेक्षा करता है। माता-पिता पहले उसका मन बहलाने के लिए थिएटर, संगीत, सैर और मनोरंजन की व्यवस्था करते हैं, लेकिन पड़ोस और बिरादरी विधवा के लिए ऐसे जीवन को अनुचित मानकर परिवार पर दबाव डालते हैं। इसके बाद कैलासकुमारी धार्मिक जीवन की ओर मुड़ती है और संन्यास लेना चाहती है। पिता उसे सेवा और शिक्षा के मार्ग पर ले आते हैं और वह बालिकाओं के लिए पाठशाला चलाने लगती है। लेकिन एक बीमार बालिका की सेवा करने और उसके घर कई दिन रहने पर समाज फिर उसके चरित्र पर प्रश्न उठाता है और पाठशाला बंद करनी पड़ती है। तब कैलासकुमारी खुलकर कहती है कि वह स्वयं को अभागिनी नहीं मानती और अपने आत्मसम्मान की रक्षा स्वयं कर सकती है। वह विधवा को जीवित रहते हुए सामाजिक मृत्यु स्वीकार करने से इंकार करती है। कहानी का अंत उसकी स्वतंत्रता की आकांक्षा और समाज की असहिष्णुता के बीच एक अत्यंत त्रासद टकराव पर होता है।

1923•32 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

न्याय

Nyay

‘न्याय’, जिसे ‘नबी का नीति-निर्वाह’ के नाम से भी जाना जाता है, प्रेमचंद की ऐसी कहानी है जिसमें न्याय की सर्वोच्च कसौटी यह है कि व्यक्ति अपने प्रियजन के साथ भी वही व्यवहार करे जो किसी दूसरे व्यक्ति के साथ करता। कहानी प्रारंभिक इस्लामी समाज की पृष्ठभूमि में जैनब और अबुलआस के दांपत्य को केंद्र में रखती है। जैनब नए धर्म के प्रति आकर्षित है, जबकि उसका पति अबुलआस अपनी स्वतंत्र विचारधारा और पुराने विश्वासों पर कायम रहता है। धार्मिक संघर्ष और युद्ध के बीच अबुलआस बंदी बना लिया जाता है और अंततः उसे पैगंबर मुहम्मद के सामने लाया जाता है। मुहम्मद उसे केवल अपना दामाद मानकर विशेष रियायत नहीं देते, बल्कि न्याय के समान नियम को उस पर भी लागू करते हैं। उनका व्यक्तिगत प्रेम कर्तव्य के आगे नहीं आता। कहानी न्याय को प्रेम और द्वेष दोनों से ऊपर उठकर नीति निभाने की क्षमता के रूप में प्रस्तुत करती है। अंततः अबुलआस अपने धन-संपत्ति का हिसाब साफ करके ऋण चुकाता है और स्वयं मुहम्मद की सेवा में लौट आता है।

1924•25 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

परीक्षा

Pariksha

प्रेमचंद की 'परीक्षा' व्यक्ति के वास्तविक चरित्र को उसकी डिग्री, पद या बाहरी व्यवहार के बजाय उसके कर्मों से परखने वाली कहानी है। देवगढ़ रियासत के वृद्ध दीवान सरदार सुजानसिंह चालीस वर्ष की सेवा के बाद अवकाश लेना चाहते हैं। राजा उनसे नया दीवान चुनने को कहते हैं। सुजानसिंह ऐसी परीक्षा रखते हैं जिसमें उम्मीदवारों की डिग्री से अधिक उनके आचरण, कर्तव्य-बोध और चरित्र को देखा जाना है। उम्मीदवार एक महीने तक अपने व्यवहार को कृत्रिम रूप से अच्छा दिखाने का प्रयास करते हैं। वास्तविक परीक्षा तब होती है जब एक गरीब किसान की अनाज से भरी गाड़ी कीचड़ में फँस जाती है। अधिकांश उम्मीदवार उसकी सहायता किए बिना निकल जाते हैं, लेकिन हॉकी खेल में घायल होने के बावजूद पंडित जानकीनाथ किसान की सहायता करते हैं और गाड़ी को बाहर निकाल देते हैं। सुजानसिंह इस घटना को छिपकर देख रहे थे। वे जानकीनाथ को नया दीवान चुनते हैं क्योंकि उनके कार्य में दया, साहस, आत्मबल और उदारता का वास्तविक प्रमाण मिलता है। कहानी का संदेश है कि शिक्षा और बाहरी शिष्टाचार से अधिक महत्वपूर्ण मनुष्य का चरित्र और कठिन परिस्थिति में किया गया निःस्वार्थ कर्म है।

1923•13 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

बाबाजी का भोग

Babaji Ka Bhog

प्रेमचंद की 'बाबाजी का भोग' धार्मिक आडंबर, अंधविश्वास और गरीब ग्रामीण परिवारों के शोषण पर तीखा व्यंग्य है। रामधन अहीर और उसकी पत्नी के घर में अनाज का लगभग कोई भंडार नहीं बचा है। महाजन और जमींदार के प्यादे उनकी उपज का बड़ा हिस्सा ले चुके हैं। ऐसे समय में एक साधु उनके द्वार पर आकर साधु-सेवा के नाम पर भोजन माँगता है। रामधन और उसकी पत्नी अपने घर के लिए बचाकर रखा थोड़ा-सा आटा, दाल, ईंधन, आलू और अंत में घी तक उसे दे देते हैं। साधु विधि-विधान से भोग तैयार करता है, स्वयं पेट भरकर खाता है और वहीं आराम से सो जाता है, जबकि रामधन का घर भूखा रह जाता है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि धार्मिक श्रद्धा जब विवेकहीन सामाजिक दबाव में बदल जाती है, तब वह गरीबों की सहायता करने के बजाय उनके सीमित संसाधनों के शोषण का माध्यम बन सकती है।

1926•8 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

बालक

Balak

प्रेमचंद की 'बालक' कहानी सामाजिक प्रतिष्ठा, विधवा-विवाह, जातिगत रूढ़ियों और मनुष्यता की वास्तविक कसौटी पर केंद्रित है। कथावाचक एक संपन्न जमींदार है, जिसके यहाँ गंगू नाम का नौकर काम करता है। गंगू ब्राह्मण है और अपने आत्मसम्मान के कारण सामान्य नौकरों की तरह मालिक की खुशामद नहीं करता। जब वह गोमती देवी नाम की एक विधवा से विवाह करने का निर्णय लेता है, तो कथावाचक इस विवाह को अनुचित समझता है। गंगू नौकरी छोड़ देता है और गोमती से विवाह कर लेता है। दोनों साधारण जीवन शुरू करते हैं और कुछ समय बाद उनके यहाँ एक बच्चा जन्म लेता है। बच्चे के प्रति गंगू का प्रेम, जिम्मेदारी और आत्मीयता धीरे-धीरे कथावाचक की धारणाएँ बदल देते हैं। कहानी दिखाती है कि सामाजिक पद, शिक्षा और प्रतिष्ठा मनुष्य के चरित्र के विश्वसनीय प्रमाण नहीं हैं; वास्तविक श्रेष्ठता स्वतंत्र विचार, प्रेम, जिम्मेदारी और मनुष्यता में है।

•24 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

बासी भात में खुदा का साझा

Basi Bhat Mein Khuda Ka Sajha

प्रेमचंद की 'बासी भात में खुदा का साझा' गरीबी, आस्था, अपराध-बोध और नैतिक दुविधा पर केंद्रित मनोवैज्ञानिक-सामाजिक कहानी है। एक वर्ष की बेरोजगारी और आर्थिक संकट के बाद दीनानाथ को पचास रुपये की नौकरी मिलती है और गौरी इसे ईश्वर की कृपा मानती है। कुछ समय बाद उसका मालिक उसे कार्यालय के हिसाब में जालसाजी करने के लिए तैयार करता है और तर्क देता है कि ऐसा करने से सौ कर्मचारियों की रोजी बच जाएगी। दीनानाथ अनिच्छा के बावजूद गलत काम कर देता है। उसे तरक्की और बोनस मिलता है, लेकिन उसका धार्मिक विश्वास उसे लगातार डराता रहता है कि इस पाप का दंड अवश्य मिलेगा। बच्चे के बीमार पड़ने और बाद में स्वयं दीनानाथ को मलेरिया होने पर वह सामान्य बीमारी को ईश्वरीय दंड समझने लगता है। उसकी पत्नी गौरी इन घटनाओं को ईश्वर की दया मानती है, जबकि दीनानाथ धीरे-धीरे ऐसे ईश्वर की धारणा को अस्वीकार करने लगता है जो मनुष्य को प्रेम के बजाय भय और दंड से नियंत्रित करता है। कहानी पाप, ईश्वरीय न्याय, मानवीय नैतिकता और आर्थिक विवशता के बीच के जटिल संबंध पर प्रश्न उठाती है।

1934•24 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

भाड़े का टट्टू

Bhade Ka Tattoo

प्रेमचंद की 'भाड़े का टट्टू' आदर्श और स्वार्थ, मित्रता और विश्वासघात तथा औपनिवेशिक सत्ता के दबाव में व्यक्ति की नैतिक परीक्षा की कहानी है। यशवंत और रमेश बचपन से मित्र हैं, लेकिन धन और जीवन-मूल्यों के विषय में दोनों की सोच अलग है। यशवंत आदर्शवादी होने का दावा करता है, जबकि रमेश खुलकर मानता है कि मनुष्य के लिए स्वार्थ का त्याग कठिन है। समय के साथ यशवंत मेहनत करके औपनिवेशिक न्याय-व्यवस्था में जिला-जज बन जाता है और रमेश निर्भीक राजनीतिक कार्यकर्ता तथा क्रांतिकारी बन जाता है। जब रमेश पर डकैती और हत्या का झूठा मुकदमा चलता है, यशवंत उसे निर्दोष जानते हुए भी अपनी नौकरी और प्रतिष्ठा के भय से उसके पक्ष में गवाही नहीं देता और उसे सात वर्ष की सजा सुना देता है। बाद में रमेश फिर पकड़ा जाता है। इस बार उसकी पत्नी यशवंत को भारी फीस और पचास हजार रुपये के इनाम का प्रस्ताव देती है। धन के लालच में यशवंत मुकदमा लड़ता है और रमेश को निर्दोष सिद्ध कर देता है। लेकिन रमेश उसके प्रति कृतज्ञ नहीं होता। वह कहता है कि यशवंत ने इस बार मित्रता या साहस से नहीं, बल्कि स्वार्थ से काम किया है। 'भाड़े का टट्टू' इस प्रकार केवल एक व्यक्ति का उपहास नहीं बल्कि उस नैतिक पतन का प्रतीक बन जाता है जिसमें सिद्धांत धन के सामने झुक जाते हैं।

1925•35 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

मनुष्य का परम धर्म

Manushya Ka Param Dharma

प्रेमचंद की 'मनुष्य का परम धर्म' धार्मिक पाखंड, रूढ़िवादिता और स्वार्थ के लिए धर्म के दुरुपयोग पर तीखा हास्य-व्यंग्य है। होली के दिन पंडित मोटेराम शास्त्री और उनके मित्र चिंतामणि इस बात से परेशान हैं कि कहीं से दावत का निमंत्रण नहीं आया। वे गंगा तट पर पहुँचकर अपनी भूख को धर्मोपदेश का रूप देते हैं। मोटेराम शास्त्रों की मनमानी व्याख्या करते हुए सिद्ध करते हैं कि चूँकि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से निकले हैं, इसलिए मुख को सुख देना मनुष्य का परम धर्म है और ब्राह्मणों को उत्तम-से-उत्तम मिठाइयाँ खिलाना सबसे बड़ा धार्मिक कर्तव्य है। उनका पूरा तर्क वास्तव में मुफ्त भोजन प्राप्त करने का साधन है। जब चिंतामणि भी मिठाइयों की श्रेष्ठता को लेकर अपना अलग 'शास्त्रोक्त' सिद्धांत पेश करता है, तो दोनों पाखंडी धर्माचार्य तर्क-वितर्क से आगे बढ़कर हास्यास्पद शारीरिक झगड़े में उतर आते हैं। प्रेमचंद इस हास्य के माध्यम से सच्चे धर्म और स्वार्थपूर्ण धार्मिक प्रदर्शन के बीच का अंतर उजागर करते हैं।

1920•16 मिनट
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मानसरोवर भाग 1

मनोवृत्ति

Manovritti

प्रेमचंद की 'मनोवृत्ति' समाज की उस मानसिकता पर तीखा व्यंग्य है जो किसी स्त्री के बारे में बिना सत्य जाने उसके चरित्र और नैतिकता के निर्णय कर देती है। गांधी पार्क की एक बेंच पर सोती हुई एक युवती को देखकर वहाँ आने वाले पुरुष और स्त्रियाँ अपने-अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर उसके बारे में तरह-तरह की धारणाएँ बनाने लगते हैं। कोई उसे वेश्या समझता है, कोई आधुनिकता का प्रतीक, तो कोई कुलवधू। अंत में युवती की वास्तविक स्थिति सामने आने पर स्पष्ट होता है कि लोगों के सारे अनुमान निराधार थे। प्रेमचंद इस विरोधाभास के माध्यम से स्त्री की स्वतंत्रता, सामाजिक निगरानी और लैंगिक दोहरे मानदंड पर प्रश्न उठाते हैं।

1934•17 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

माता का हृदय

Mata Ka Hriday

प्रेमचंद की 'माता का हृदय' एक माँ के प्रतिशोध से करुणा की ओर हुए नैतिक परिवर्तन की अत्यंत मार्मिक कहानी है। निर्धन विधवा माधवी का इकलौता बेटा आत्मानंद झूठी गवाहियों और राजनीतिक दमन से जुड़े मुकदमे में आठ वर्ष के कठोर कारावास की सजा पाता है। माधवी पुलिस अधिकारी मिस्टर बागची को अपने बेटे की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार मानकर उनसे बदला लेने का निश्चय करती है। वह मजदूरनी का वेश बनाकर उनके घर में नौकरी कर लेती है। लेकिन बागची के छोटे बच्चे को माधवी से गहरा लगाव हो जाता है। जब बच्चा गंभीर रूप से बीमार पड़ता है, तो माधवी अपना प्रतिशोध भूलकर पूरी निष्ठा से उसकी सेवा करती है। परिवार उसे बच्चे की वास्तविक माँ के समान मानने लगता है। बच्चे की अचानक मृत्यु के बाद माधवी का दुःख उसके पुराने प्रतिशोध से भी अधिक गहरा हो जाता है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि मातृत्व की करुणा व्यक्तिगत चोट, सामाजिक अन्याय और प्रतिशोध की भावना से भी अधिक शक्तिशाली हो सकती है।

1925•27 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

मुक्ति-मार्ग

Mukti Marg

प्रेमचंद की 'मुक्ति-मार्ग' ग्रामीण जीवन, अहंकार, ईर्ष्या और प्रतिशोध की विनाशकारी शक्ति की कहानी है। किसान झींगुर और गड़ेरिया बुद्धू के बीच एक मामूली खेत-विवाद से दुश्मनी शुरू होती है। झींगुर के अहंकार और क्रोध के कारण बुद्धू उसकी ऊख की फसल जला देता है। बदला लेने के लिए झींगुर हरिहर की सहायता से बुद्धू की बछिया को मरवा देता है और उस पर गोहत्या का आरोप लगवाकर कठोर प्रायश्चित का दंड दिलवाता है। इस दंड से बुद्धू की आर्थिक स्थिति नष्ट हो जाती है और दोनों अंततः मजदूर बन जाते हैं। निर्माण-स्थल पर फिर मिलने के बाद दोनों एक-दूसरे के सामने अपने अपराध स्वीकार करते हैं। उसी क्षण उनके भीतर का बैर समाप्त होता है। कहानी बताती है कि वास्तविक मुक्ति दूसरे को नष्ट करने में नहीं, बल्कि प्रतिशोध और अहंकार से मुक्त होने में है।

1924•29 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

मुक्तिधन

Muktidhan

प्रेमचंद की 'मुक्तिधन' ग्रामीण गरीबी, कर्ज, महाजनी व्यवस्था और हिंदू-मुस्लिम सौहार्द की अत्यंत मार्मिक कहानी है। गरीब मुसलमान किसान रहमान अपनी प्रिय गाय को इसलिए बेचने को मजबूर होता है क्योंकि उसे जमींदार के लगान संबंधी मुकदमे के लिए रुपये चाहिए। वह गाय को कसाइयों के हाथ जाने से बचाने के लिए दाऊदयाल को पाँच रुपये कम में बेच देता है। बाद में वह अपनी बूढ़ी माँ को हज कराने, उसकी बीमारी और मृत्यु से जुड़े खर्चों के लिए उसी महाजन से बार-बार कर्ज लेता है। फसल की बर्बादी और अंततः खेत में लगी आग उसके लिए कर्ज चुकाना असंभव बना देती है। फिर भी रहमान अपने कर्ज से भागना नहीं चाहता और दाऊदयाल से कहता है कि वह मेहनत-मजदूरी करके जीवन भर उनका पैसा चुकाएगा। दाऊदयाल को रहमान की पुरानी शराफत याद आती है। उन्हें एहसास होता है कि गाय ने अब तक उन्हें कर्ज से कहीं अधिक मूल्य का दूध और दो बछड़े दिए हैं। वे पूरा कर्ज माफ कर देते हैं और कहते हैं कि रहमान उनका कर्जदार नहीं, बल्कि मित्र है। कहानी आर्थिक लेन-देन को नैतिक संबंध में बदल देती है और करुणा, कृतज्ञता तथा हिंदू-मुस्लिम सौहार्द को वास्तविक 'धन' के रूप में प्रस्तुत करती है।

1924•29 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

मुफ़्त का यश

Muft Ka Yash

प्रेमचंद की 'मुफ़्त का यश' झूठी प्रतिष्ठा, अफसरी के प्रभाव और बिना किसी वास्तविक काम के मिलने वाले यश पर व्यंग्य करती है। कथावाचक एक लेखक है जो सामान्यतः सरकारी अधिकारियों से दूरी बनाए रखता है। एक दिन जिले के हाकिम उसे अपने बंगले पर बुलाते हैं। मुलाकात साधारण होती है, लेकिन समाज इस छोटी-सी निकटता को बढ़ा-चढ़ाकर यह मान लेता है कि हाकिम हर महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले लेखक से सलाह लेते हैं। कथावाचक का बचपन का मित्र बलदेवसिंह अपने बेटे को झूठे पुलिस मुकदमे से बचाने के लिए उसके पास आता है। कथावाचक केवल उससे पीछा छुड़ाने के लिए हाकिम से बात करने का झूठा वादा कर देता है, जबकि वास्तव में वह कुछ नहीं करता। संयोग से लड़का फिर भी छूट जाता है क्योंकि हाकिम पुलिस अधिकारी को डाँट देते हैं। बलदेवसिंह इसका श्रेय कथावाचक की सिफारिश को देता है और उसके लिए देहाती उपहार लेकर आता है। कथावाचक सच बताने की स्थिति में होते हुए भी इस 'मुफ़्त के यश' को छोड़ नहीं पाता। प्रेमचंद इसी आत्म-विडंबना के माध्यम से दिखाते हैं कि प्रतिष्ठा और प्रभाव का भ्रम मनुष्य के स्वाभिमान तथा नैतिकता को किस प्रकार कमजोर कर सकता है।

1934•23 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

मोटर के छींटे

Motor Ke Chhinte

प्रेमचंद की 'मोटर के छींटे' हास्य और व्यंग्य के माध्यम से वर्ग-अहंकार, सामाजिक असमानता और सार्वजनिक जीवन में शक्ति के असमान संबंधों पर चोट करती है। एक ब्राह्मण पंडित को तेज़ी से गुजरती मोटर कीचड़ के छींटों से भिगो देती है। अपमानित पंडित इसका बदला लेने के लिए मोटरवालों को रोकना शुरू कर देता है। धीरे-धीरे उसका निजी क्रोध सामाजिक प्रतिशोध का रूप ले लेता है। वह मोटरवालों को वही असुविधा और अपमान महसूस कराता है जिसे पैदल चलने वाले लोग झेलते हैं। एक अंग्रेज अधिकारी के साथ उसका टकराव कहानी के वर्ग और औपनिवेशिक सत्ता संबंधों को और तीखा कर देता है।

1936•14 मिनट
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मानसरोवर भाग 1

रसिक संपादक

Rasik Sampadak

प्रेमचंद की 'रसिक संपादक' संपादकीय सत्ता, पुरुष-मानसिकता और स्त्री लेखिकाओं के प्रति दोहरे व्यवहार पर तीखा और हास्यपूर्ण व्यंग्य है। 'नवरस' के विधुर संपादक पंडित चोखेलाल शर्मा स्त्री लेखिकाओं की रचनाएँ तुरंत स्वीकार करते हैं और उनकी अत्यधिक प्रशंसा करते हैं, जबकि पुरुषों की अच्छी रचनाएँ भी रद्दी में डाल देते हैं। लेकिन उनकी कथित साहित्यिक उदारता वास्तव में साहित्यिक गुणों से अधिक स्त्रियों के प्रति उनके आकर्षण पर आधारित है। कामाक्षी नाम की एक लेखिका की प्रेमपूर्ण कविता पढ़कर वे उसके बारे में अपनी कल्पना में एक सुंदर स्त्री की तस्वीर बना लेते हैं और उसे मिलने के लिए बुलाते हैं। जब कामाक्षी वास्तव में उनके सामने आती है और उनकी कल्पना से बिल्कुल अलग निकलती है, तो उनका सारा उत्साह समाप्त हो जाता है। प्रेमचंद इस विडंबना के माध्यम से दिखाते हैं कि स्त्रियों की प्रशंसा करने वाला पुरुष भी उन्हें स्वतंत्र रचनाकार के रूप में नहीं, बल्कि अपनी कल्पना और आकर्षण की वस्तु के रूप में देख सकता है।

1933•20 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

रियासत का दीवान

Riyasat Ka Deewan

प्रेमचंद की 'रियासत का दीवान' सत्ता, अंतरात्मा और नैतिक समझौते की गहरी राजनीतिक कहानी है। अंग्रेजी शासन के प्रभाव वाले एक देशी राज्य में दीवान मेहता वर्षों के अपमान के बाद यह सीख चुके हैं कि केवल ईमानदारी से काम करना पर्याप्त नहीं; राजा को प्रसन्न रखना ही पद और सम्मान बचाने का साधन है। वे धीरे-धीरे राजा के हर उचित-अनुचित आदेश का पालन करते हुए अपनी अंतरात्मा को दबा देते हैं। पोलिटिकल एजेंट के स्वागत के लिए किसानों से जबरन चंदा वसूला जाता है और मजदूरों से बेगार कराई जाती है। मेहता का बेटा जयकृष्ण इन अत्याचारों के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाता है और राज्य से निकाल दिया जाता है। मेहता अपने पद को बेटे से अधिक महत्वपूर्ण मानकर उसका साथ नहीं देते। बाद में उनकी पत्नी सुनीता भी बेटे के पक्ष में राजा के सामने बोलती है और उसे भी राज्य से निकाल दिया जाता है। मेहता अंततः तब जागते हैं जब राजा उनसे अपनी निजी वासना पूरी करने के लिए एक विवाहित साहूकार की बेटी का अपहरण कराने को कहता है। मेहता इस आदेश को नीति और धर्म के विरुद्ध मानकर ठुकरा देते हैं, इस्तीफा देते हैं और रियासत छोड़ देते हैं। कहानी दिखाती है कि निरंकुश सत्ता संस्थाओं को कैसे भ्रष्ट करती है और लगातार समझौता करते-करते मनुष्य अपनी अंतरात्मा को कैसे दबा देता है—लेकिन एक सीमा ऐसी होती है जहाँ नैतिक विवेक फिर जाग उठता है।

1934•49 मिनट
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मानसरोवर भाग 1

लांछन

Lanchhan

प्रेमचंद की 'लांछन' चुगली, अफवाह, नैतिक पहरेदारी और बिना प्रमाण स्त्रियों के चरित्र पर आरोप लगाने की प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य है। महिला-आश्रम की वृद्ध सेविका जुगनूबाई ने स्वयं को दूसरी स्त्रियों के चरित्र की अनौपचारिक प्रहरी बना लिया है। वह उनके निजी जीवन की टोह लेती, छोटी-छोटी बातों को संदेह की दृष्टि से देखती और फिर उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पूरे समाज में फैलाती है। जब नई शिक्षित प्रधानाध्यापिका मिस खुरशेद उसकी निगाह का निशाना बनती हैं, तो वे उसकी इसी प्रवृत्ति को उसके सामने उजागर करने का निर्णय लेती हैं। अपनी डॉक्टर मित्र लीलावती की सहायता से वे ऐसा अभिनय करती हैं जिससे जुगनूबाई को विश्वास हो जाता है कि उसने एक अनैतिक संबंध देख लिया है। जुगनूबाई बिना सत्य जाने यह अफवाह पूरे शहर में फैला देती है। अंत में पता चलता है कि जिस पुरुष को उसने विलियम किंग समझा था, वह वास्तव में डॉक्टर लीलावती थी जो पुरुष का वेश धारण किए हुए थी। इस प्रकार आरोप लगाने वाली स्वयं उपहास का पात्र बन जाती है। प्रेमचंद हास्य के माध्यम से दिखाते हैं कि अफवाह और चरित्र-हनन सामाजिक नियंत्रण के साधन कैसे बन जाते हैं और स्त्रियाँ स्वयं भी दूसरी स्त्रियों की स्वतंत्रता पर पहरा देने वाली व्यवस्था का हिस्सा कैसे बन सकती हैं।

1926•31 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

लैला

Laila

प्रेमचंद की 'लैला' प्रेम, जनसत्ता, राजसत्ता और त्याग को एक साथ रखने वाली राजनीतिक-रोमांटिक कहानी है। तेहरान में एक रहस्यमय गायिका के रूप में प्रकट होने वाली लैला अपने गीतों के माध्यम से गरीबों में आशा जगाती है, राजाओं के विलास पर प्रश्न उठाती है और प्रेम तथा न्याय पर आधारित समाज का स्वप्न दिखाती है। शाहजादा नादिर उसके प्रेम में पड़ जाता है और अंततः उससे विवाह करता है। नादिर के बादशाह बनने पर लैला मलका बनती है। उनका निजी दांपत्य आदर्श है, लेकिन राजनीति में दोनों की प्रवृत्तियाँ अलग हैं—नादिर राजसत्ता का प्रतिनिधि है और लैला प्रजासत्ता की। लैला राजमहल के खर्च घटाकर जनता के हित में धन लगाती है और अन्न पर लगने वाला कर कम करवाती है, लेकिन अंततः वही जनता उसके विरुद्ध विद्रोह कर देती है। जब नादिर विद्रोह को सेना के बल से कुचलना चाहता है, लैला रक्तपात स्वीकार नहीं करती। वह अपने प्रेम को सत्ता और हिंसा का कारण बनने देने के बजाय नादिर को छोड़कर चली जाती है। कहानी प्रेम और सिद्धांत के बीच उस अंतिम त्याग को सामने रखती है जिसमें व्यक्ति अपने प्रिय को बचाने के लिए स्वयं उसके जीवन से दूर हो जाता है।

1926•46 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

लॉटरी

Lottery

प्रेमचंद की 'लॉटरी' अचानक मिलने वाले धन की लालसा, कल्पना और मानवीय स्वार्थ पर व्यंग्यपूर्ण कहानी है। एक स्कूल-मास्टर और उसका मित्र विक्रम मिलकर लॉटरी का टिकट खरीदते हैं और दस लाख रुपये जीतने की कल्पना करने लगते हैं। पुरस्कार अभी मिला भी नहीं है, लेकिन दोनों उसके उपयोग की योजनाएँ बनाने लगते हैं। धीरे-धीरे धन की कल्पना उनके बीच विश्वास, साझेदारी और स्वार्थ के प्रश्न खड़े कर देती है। कहानी दिखाती है कि वास्तविक धन से पहले उसका भ्रम ही मनुष्य के व्यवहार को बदल सकता है। प्रेमचंद हास्य और विडंबना के माध्यम से यह भी पूछते हैं कि अचानक मिली संपत्ति के सामने दोस्ती और नैतिकता कितनी स्थिर रह सकती है।

1933•40 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

वज्रपात

Vajrapat

प्रेमचंद की 'वज्रपात' नादिरशाह के दिल्ली-विजय और मुगले-आजम हीरे के इर्द-गिर्द बुनी गई ऐतिहासिक कहानी है। दिल्ली में भयंकर कत्लेआम के बाद मुहम्मदशाह का वज़ीर अपनी काव्य-बुद्धि से नादिरशाह के क्रोध को शांत करता है। लेकिन शीघ्र ही नादिरशाह की लालसा मुगले-आजम नामक प्रसिद्ध हीरे पर केंद्रित हो जाती है, जिसके बारे में वह अलौकिक शक्तियों की कथाएँ सुन चुका है। मुहम्मदशाह हीरे को छिपा देता है और वज़ीर उसे पगड़ी में रखने की युक्ति बताता है। अंततः नादिरशाह संधि के अवसर पर पगड़ियों की अदला-बदली के बहाने हीरा प्राप्त कर लेता है। उसे लगता है कि यह रत्न उसकी विजय और भाग्य का प्रतीक है, लेकिन ईरान लौटने के बाद उसके पुत्र की अचानक हत्या हो जाती है। तब उसकी सारी विजय, संपत्ति और हीरे की लालसा अर्थहीन हो जाती है। अंत में वह हीरे को अपने मृत पुत्र के साथ दफना देता है।

1922•26 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

विचित्र होली

Vichitra Holi

प्रेमचंद की 'विचित्र होली' औपनिवेशिक सत्ता, अंग्रेज़परस्ती और राष्ट्रीय चेतना के जागरण पर केंद्रित तीखा राजनीतिक व्यंग्य है। होली के दिन अंग्रेज़ कलेक्टर मिस्टर क्रास शिकार पर गए हुए हैं और उनके भारतीय नौकर उनके बंगले के भोजन-कक्ष में स्वतंत्र होकर होली मनाने लगते हैं। खानसामा शेख नूरअली घोषणा करता है कि अब वह गुलामी नहीं करेगा और सबको शराब, गीत और नृत्य के लिए बुलाता है। अंग्रेज़ों का सहयोगी सेठ उजागरमल यह समझकर इस उत्सव में शामिल हो जाता है कि साहब ने स्वयं इसकी अनुमति दी है। क्रास लौटता है तो नौकर उसे रंग और कालिख से रंग देते हैं और वह उन्हें कोड़े से पीटता है। उजागरमल भी अपमानित होकर भागता है। यह अनुभव उसके भीतर औपनिवेशिक सत्ता के प्रति गहरा मोहभंग पैदा करता है। वह सीधे कांग्रेस की सभा में पहुँचता है, जहाँ हिंदू-मुसलमान और विभिन्न सामाजिक समूह मिलकर होली मना रहे हैं। वहाँ वह सार्वजनिक रूप से अंग्रेज़ी सत्ता के सहयोग से तौबा करता है और अपना तन-मन-धन राष्ट्रीय आंदोलन को समर्पित करने की घोषणा करता है। प्रेमचंद होली के हास्य और उन्मुक्तता को राजनीतिक मुक्ति के रूपक में बदल देते हैं।

1921•18 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

विद्रोही

Vidrohi

प्रेमचंद की 'विद्रोही' कृष्ण और तारा के बाल्यकाल से विकसित हुए प्रेम की मार्मिक कहानी है। दोनों परिवारों को विश्वास है कि उनका विवाह होगा, लेकिन कृष्ण के चाचा आठ हजार रुपये के दहेज के लालच में एक धनवान परिवार का रिश्ता स्वीकार करना चाहते हैं। तारा के पिता आर्थिक रूप से इतनी बड़ी रकम देने में असमर्थ हैं और वर्षों से चले आ रहे संबंध को ही पर्याप्त समझते हैं। चाचा इस पुराने संबंध से मुकर जाते हैं। कृष्ण को विवाद की पूरी सच्चाई जानने के बजाय चाची से एकतरफा विवरण मिलता है और वह स्वयं तारा या उसके माता-पिता से बात करने का साहस नहीं जुटा पाता। तारा भी उसके पत्र की प्रतीक्षा करती रहती है। दोनों की चुप्पी और गलतफहमी ऐसी दूरी पैदा कर देती है जिसे बाद में कोई साहस भी नहीं भर पाता। कृष्ण अंततः चाचा के निर्णय का विरोध करता है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। वह तारा का विवाह अपनी आँखों से देखता है और वर्षों तक उसी दुःख में जीता है। बहुत बाद में तारा के पति से उसे पता चलता है कि तारा ने भी उसे कभी नहीं भुलाया था और उनके प्रेम को अपने जीवन की सबसे मधुर स्मृति मानती थी। कहानी में 'विद्रोह' इसलिए विडंबनापूर्ण है कि कृष्ण परिवार और दहेज-आधारित विवाह के विरुद्ध विद्रोह तो करता है, लेकिन उसका साहस समय पर नहीं जागता। प्रेमचंद दहेज, पारिवारिक अधिकार और सामाजिक प्रतिष्ठा की आलोचना के साथ-साथ संकोच, आत्म-संदेह, मौन और गलतफहमी की मनोवैज्ञानिक त्रासदी को भी सामने रखते हैं।

1928•37 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

विनोद

Vinod

प्रेमचंद की 'विनोद' कॉलेज जीवन, प्रेम-आसक्ति, मित्रों की शरारत, पश्चिमी तौर-तरीकों की नकल और आत्मसम्मान पर आधारित हास्य-व्यंग्यात्मक कहानी है। पंडित चक्रधर एक गंभीर, धार्मिक और परंपरागत विद्यार्थी हैं। कॉलेज में नई आई लूसी के प्रति उनका आकर्षण उनके शरारती सहपाठियों नईम और गिरिधर सहाय की नजर से बच नहीं पाता। दोनों लूसी के नाम से नकली प्रेम-पत्र लिखकर चक्रधर को भेजते हैं। पत्रों को सच मानकर चक्रधर अपने कपड़े, बाल, भाषा और व्यवहार तक बदल डालते हैं। वे अंग्रेजी बोलने का अभ्यास करते हैं, खेलों में रुचि दिखाने की कोशिश करते हैं और लूसी को प्रभावित करने के लिए अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करते हैं। अंततः मित्रों की शरारत इतनी बढ़ जाती है कि चक्रधर लूसी के सामने अपने प्रेम का इजहार करने पहुँच जाते हैं और उसे अपमानजनक परिणाम भुगतना पड़ता है। बाद में उन्हें पता चलता है कि पूरा प्रेम-प्रसंग उनके मित्रों की बनाई हुई चाल थी। कहानी हास्य के माध्यम से युवा मन की कल्पना, दिखावे, मित्र-दबाव और पश्चिमी आधुनिकता की सतही नकल पर व्यंग्य करती है।

1924•48 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

विश्वास

Vishwas

प्रेमचंद की 'विश्वास' राजनीतिक चेतना, नैतिक विश्वास, प्रेम और आत्म-परिवर्तन की कहानी है। मिस जोशी बंबई के उच्चवर्गीय समाज की प्रभावशाली और आधुनिक विधवा है, जिसका संबंध गवर्नर मिस्टर जौहरी से है। दूसरी ओर आपटे गरीब, निर्भीक और जनपक्षधर राजनीतिक नेता हैं, जो अनाज पर लगाए गए कर और शासन की विलासिता के विरुद्ध जनता को संबोधित करते हैं। आपटे की गिरफ्तारी के बाद मिस्टर जौहरी मिस जोशी से उसे बदनाम और पराजित करने के लिए उसके विश्वास का लाभ उठाने को कहते हैं। लेकिन आपटे के घर जाकर उसके जीवन को जानने के बाद मिस जोशी का दृष्टिकोण पूरी तरह बदल जाता है। वह उसके निष्कपट चरित्र और त्याग से प्रभावित होकर अपने पुराने जीवन और सत्ता-सम्बंधों को चुनौती देती है।

1925•43 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

वेश्या

Veshya

प्रेमचंद की 'वेश्या' समाज द्वारा वेश्याओं के प्रति किए जाने वाले तिरस्कार और उसी समाज के पुरुषों के दोहरे नैतिक मानदंडों की कहानी है। दयाकृष्ण, सिंगारसिंह, लीला और माधुरी इसके प्रमुख पात्र हैं। संपन्न युवक सिंगारसिंह अपनी पत्नी लीला की उपेक्षा करके माधुरी के पास जाता है और विलासिता में डूब जाता है। उसका मित्र दयाकृष्ण शुरू में माधुरी के प्रभाव से सिंगारसिंह को बचाने के उद्देश्य से उसके पास जाता है, लेकिन धीरे-धीरे माधुरी की बुद्धिमत्ता, संवेदनशीलता और प्रेम की क्षमता को पहचानने लगता है। माधुरी ऐसे पुरुषों की आदी है जो उसे केवल भोग की वस्तु समझते हैं; इसलिए दयाकृष्ण का संयम और निःस्वार्थ व्यवहार उसके लिए नया अनुभव बन जाता है। दोनों के बीच वास्तविक भावनात्मक संबंध विकसित होता है, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा और 'कुलवधू' तथा 'वेश्या' के बीच बनाई गई नैतिक दीवार उनके संबंध को असंभव बना देती है। प्रेमचंद इस विरोधाभास के माध्यम से दिखाते हैं कि समाज पुरुषों को वेश्याओं का उपभोग करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन उन्हीं स्त्रियों को सम्मान और मानवीय प्रेम का अधिकार नहीं देता।

1933•55 मिनट
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मानसरोवर भाग 2

शूद्रा

Shudra

प्रेमचंद की 'शूद्रा' प्रवासी भारतीयों, गिरमिटिया मजदूरी, स्त्री की असुरक्षा और औपनिवेशिक शोषण की अत्यंत मार्मिक कहानी है। गरीब युवती गौरा का पति मंगरू वर्षों पहले बिना बताए घर छोड़कर चला जाता है। एक दिन एक बूढ़ा ब्राह्मण यह झूठ बोलकर गौरा को अपने साथ ले जाता है कि मंगरू ने उसे बुलाया है। गौरा पति से मिलने की आशा में कलकत्ता पहुँचती है और वहाँ से जहाज द्वारा मॉरिशस भेज दी जाती है। वहाँ उसे पता चलता है कि मंगरू स्वयं गिरमिटिया मजदूर के रूप में बंधा हुआ है और भारतीय मजदूरों तथा स्त्रियों का भयंकर शोषण होता है। जब एक अंग्रेज अधिकारी गौरा को अपने अधिकार में लेना चाहता है और उसके प्रतिरोध पर मंगरू को बुरी तरह पीटता है, तब गौरा अपने पति को बचाने के लिए स्वयं को बलिदान करने को तैयार हो जाती है। कहानी प्रवासी मजदूरों को बहकाकर विदेश ले जाने वाली व्यवस्था, औपनिवेशिक सत्ता की हिंसा और स्त्री के शरीर पर अधिकार जमाने की मानसिकता को उजागर करती है।

1926•54 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

सत्याग्रह

Satyagrah

प्रेमचंद की 'सत्याग्रह' औपनिवेशिक शासन, राजनीतिक स्वार्थ और धार्मिक आडंबर पर तीखा व्यंग्य है। वायसराय के बनारस आगमन के समय कांग्रेस शहर में हड़ताल का आह्वान करती है। सरकारी अधिकारी और राजभक्त स्थानीय अभिजात वर्ग दुकानों को खुला रखने की हर कोशिश में असफल होते हैं। तब वे कांग्रेस के नैतिक बल की नकल करने के लिए पंडित मोटेराम शास्त्री को अनशन पर बैठाने की योजना बनाते हैं। मोटेराम धन और प्रतिष्ठा के लालच में इस 'सत्याग्रह' को स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन उनका सबसे बड़ा शत्रु स्वयं उनका पेट बन जाता है। प्रेमचंद हास्य के माध्यम से दिखाते हैं कि धार्मिक आस्था और नैतिक बल का इस्तेमाल राजनीतिक स्वार्थ के लिए कैसे किया जा सकता है और नकली नैतिकता वास्तविक जन-आंदोलन की बराबरी नहीं कर सकती।

1923•38 मिनट
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मानसरोवर भाग 4

सवा सेर गेहूँ

Sava Ser Gehun

प्रेमचंद की 'सवा सेर गेहूँ' ग्रामीण ऋण-व्यवस्था, सूदखोरी, किसान-शोषण और बंधुआ मजदूरी पर तीखा प्रहार करने वाली कहानी है। गरीब किसान शंकर एक साधु अतिथि को भोजन कराने के लिए केवल सवा सेर गेहूँ उधार लेता है। बाद में वह खलिहानी में उससे अधिक अनाज दे भी देता है, लेकिन महाजन उस उधार को अपने बही-खाते में जीवित रखता है। सात वर्ष बाद वही छोटा-सा ऋण साढ़े पाँच मन गेहूँ और फिर साठ रुपये के दस्तावेजी कर्ज में बदल जाता है। बढ़ते ब्याज के कारण शंकर अंततः जीवन-भर के लिए बंधुआ मजदूर बन जाता है और उसकी मृत्यु के बाद वही कर्ज उसके बेटे पर डाल दिया जाता है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि गरीबी, अशिक्षा, धार्मिक भय और शोषणकारी ऋण-व्यवस्था मिलकर एक मामूली उधार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलामी में बदल सकती है।

1924•22 मिनट
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मानसरोवर भाग 1

सुभागी

Subhagi

प्रेमचंद की 'सुभागी' एक बाल-विधवा के श्रम, आत्मसम्मान और पारिवारिक कर्तव्य की अत्यंत प्रभावशाली ग्रामीण कहानी है। तुलसी महतो की बेटी सुभागी बचपन में ही विधवा हो जाती है, लेकिन अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बनने के लिए स्वयं विवाह से इंकार कर देती है। उसका भाई रामू आलसी और स्वार्थी है तथा उसे लगता है कि बहन और माता-पिता उसके ऊपर बोझ हैं। परिवार के बँटवारे के बाद भी सुभागी अपने माता-पिता की सेवा करती है और खेती तथा मजदूरी करके उनका जीवन चलाती है। माता-पिता की मृत्यु के बाद वह उनके अंतिम संस्कार पर लिया गया कर्ज अपने श्रम से चुकाने का संकल्प करती है और तीन वर्षों तक कठिन परिश्रम करके पाँच सौ रुपये का पूरा ऋण चुका देती है। उसकी मेहनत, आत्मनिर्भरता और चरित्र से प्रभावित होकर गाँव के मुखिया सज्जन सिंह उसे अपनी बहू बनाने का प्रस्ताव देते हैं। कहानी बेटी को बोझ और बेटे को स्वाभाविक सहारा मानने वाली मानसिकता को चुनौती देती है और स्त्री के श्रम तथा आत्मसम्मान को उसकी वास्तविक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है।

1930•24 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

सौभाग्य के कोड़े

Saubhagya Ke Kode

प्रेमचंद की 'सौभाग्य के कोड़े' नथुवा नामक अनाथ बालक की कहानी है, जो जातिगत भेदभाव और गरीबी के कारण एक संपन्न घर में नौकर जैसा जीवन बिताता है। एक दिन वह घर की बेटी रत्ना के पलंग पर सो जाता है और इसके लिए राय भोलानाथ उसे बुरी तरह कोड़े मारकर घर से निकाल देते हैं। घर से निकाला जाना उसके जीवन का निर्णायक मोड़ बनता है। उसे उस्ताद घूरे के पास संगीत सीखने का अवसर मिलता है और उसकी असाधारण प्रतिभा उसे आगे चलकर प्रसिद्ध आचार्य नाथूराम बना देती है। वह ग्वालियर में शिक्षा पाता है, यूरोप जाकर पश्चिमी संगीत का अध्ययन करता है और अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित करके लखनऊ लौटता है। वहाँ उसे पता चलता है कि राय भोलानाथ जुए और सट्टे में अपनी संपत्ति गँवा चुके हैं। रत्ना अब शिक्षित युवती है और नाथूराम के संगीत से प्रभावित है। दोनों में प्रेम विकसित होता है और विवाह हो जाता है। नाथूराम को भय रहता है कि यदि उसकी जातिगत पहचान सामने आई तो रत्ना उससे घृणा करेगी, लेकिन रत्ना पहले से जानती है कि वही बचपन का नथुवा है और फिर भी उसे स्वीकार करती है। कहानी जातिगत अपमान, प्रतिभा के दमन, शिक्षा और अवसर की शक्ति तथा मानवीय संबंधों की जाति से परे संभावनाओं को सामने लाती है।

1924•37 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

स्त्री और पुरुष

Stree Aur Purush

प्रेमचंद की 'स्त्री और पुरुष' बाहरी सौंदर्य और आंतरिक सौंदर्य, आकर्षण और प्रेम, तथा दांपत्य में स्त्री की गरिमा पर केंद्रित मनोवैज्ञानिक कहानी है। कवि विपिन बाबू ने अपने मन में एक आदर्श सुंदर स्त्री की कल्पना कर रखी है। विवाह के बाद जब उन्हें पता चलता है कि उनकी पत्नी आशा उस कल्पित सौंदर्य के अनुरूप नहीं है, तो वे उससे घृणा करने लगते हैं और उसका अपमान करते हैं। वे घर से दूर रहने और विषय-भोग में डूबने लगते हैं। लेकिन जब विपिन को लकवा मार जाता है और उनका अपना चेहरा विकृत हो जाता है, तब आशा बिना किसी प्रतिशोध के उनकी सेवा करती है। उसके त्याग और प्रेम से विपिन को समझ आता है कि वास्तविक सौंदर्य शरीर में नहीं, आत्मा और चरित्र में है।

1925•18 मिनट
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मानसरोवर भाग 3

स्वर्ग की देवी

Swarg Ki Devi

प्रेमचंद की 'स्वर्ग की देवी' लीला के त्याग, धैर्य, बुद्धिमत्ता और दांपत्य-प्रेम की कहानी है। शिक्षित और स्वच्छताप्रिय परिवार में पली लीला का विवाह सीतासरन से होता है, जिसके घर की रूढ़ियाँ और अस्वच्छ जीवन-पद्धति उसके संस्कारों से बिल्कुल अलग हैं। विवाह के बाद उसके दो बच्चों की हैजे से मृत्यु हो जाती है। लीला शोक में डूब जाती है, जबकि सीतासरन धीरे-धीरे अपने दुख से बचने के लिए भोग-विलास, शराब और बुरे मित्रों की संगति में पड़ जाता है। लीला स्वयं टूट चुकी होने पर भी समझती है कि यदि वह पति को छोड़ देगी तो उसका जीवन नष्ट हो जाएगा। वह अपने शोक को पीछे रखकर अपनी बुद्धि, धैर्य और स्नेह से उसे फिर परिवार की ओर खींचती है। अंततः सीतासरन उसकी इस निःस्वार्थ शक्ति को पहचानता है और उसे 'स्वर्ग की देवी' कहता है।

1925•27 मिनट
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मानसरोवर भाग 5

हिंसा परमो धर्म

Hinsa Parmo Dharma

प्रेमचंद की 'हिंसा परमो धर्म' धार्मिक पाखंड, सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा पर तीखा व्यंग्य है। सरल और परोपकारी स्वभाव का जामिद पहले इसलिए सम्मानित किया जाता है क्योंकि कुछ लोग उसे अपने धर्म में शामिल करना चाहते हैं, लेकिन जब वह एक हिंदू वृद्ध को अत्याचार से बचाता है तो वही लोग उस पर हमला कर देते हैं। बाद में वह एक हिंदू स्त्री को जबरन धर्मांतरण और अत्याचार से बचाता है। जामिद के अनुभवों के माध्यम से प्रेमचंद दिखाते हैं कि मनुष्य की नैतिकता उसकी धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और मानवता से निर्धारित होती है।

1926•27 मिनट
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