Cover Image for Japan Ke Log Lambe Ho Rahe Hain (जापान के लोग, लम्बे हो रहे हैं) by Munshi Premchand - Non-Fiction
Cover Image for Japan Ke Log Lambe Ho Rahe Hain (जापान के लोग, लम्बे हो रहे हैं) by Munshi Premchand - Non-Fiction
सम्पादकीय•1930•1 मिनट

जापान के लोग, लम्बे हो रहे हैं

Japan Ke Log Lambe Ho Rahe Hain

प्रेमचंद का सम्पादकीय नोट 'जापान के लोग, लम्बे हो रहे हैं' बेहतर खान-पान से जापानियों के शारीरिक विकास की तुलना भारत में गरीबी और कुपोषण की त्रासदी से करता है।

Work Details

प्रकार: सम्पादकीय
वर्ष: 1930
पठन समय: 1 मिनट (127 शब्द)

हिन्दुस्तान के लोग दिन दिन दुर्बल होते जाते हैं। लेकिन जापान के एक पत्र ने लिखा है-जापानियों का डील धीरे-धीरे ऊंचा हो रहा है। बलिष्ठ तो वे पहले भी होते थे, लेकिन अब व ऊंचे भी हो रहे हैं। इसका कारण है, रहन- सहन में सुधार। अब वे पहले से अच्छा और पुष्टिकारक भोजन पाते हैं, ज्यादा माफ ओर हवादार घरों में रहते हैं, आर्थिक चिन्ताओं का भार भी कम हो गया है। जहां अस्सी फी सैकड़े आदमी आधे-पेट भोजन नहीं पाते, वे क्या बढेंगे और क्‍या मोटाएंगे? शायद सो वर्ष क॑ बाद (८-दुस्तानियों की कहानी रह जायगी।


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', मार्च, 1930 में प्रकाशित। 'साहित्य का उद्देश्य' (प्रथम संस्करण) में संकलित। बाद के संस्करणों से हटाया गया। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]

इस रचना को उद्धृत करें

शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "जापान के लोग, लम्बे हो रहे हैं." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1930, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/japan-ke-log-lambe-ho-rahe-hain. Accessed 22 Sep. 2026.