गमी का मूल पाठ
मुझे जब कोई काम-जैसे बच्चों का खेलना, ताश खेलना, हारमोनियम बजाना, सड़क पर आने-जाने वालों को देखना-नहीं होता तो अख़बार उलट लिया करता हूँ। अख़बार में पहले उन मुक्कदमों की रिपोर्ट पढ़ता हूँ, जिसमें किसी स्त्री की चर्चा होती है-जैसे आशनाई के, या भगा ले जाने के, या तलाक के या बलात्कार के। विशेषकर बलात्कार के मुकदमे मैं ड़े शौक से पढ़ता हूँ, तन््मय हो जाता हूँ।
कल संयोग से अखबार में ऐसा ही एक मुकदमा मिल गया। मैं संभल गया। ताबेदार से चिलम भरवाई और घड़ी-दो-घड़ी असीम आनन्द की कल्पना करके अखबार पढ़ने लगा-
यकायक किसी ने पुकारा-“बाबूजी...?”
मुझे यह 'मुदाखलत बेज़ा' बुरी तो लगी, लेकिन कभी-कभी इसी तरह निमंत्रण भी आ जाया करते हैं, इसलिए मैंने कमरे के बाहर आकर आदमी से पूछा-“क्या काम है मुझसे ? कहाँ से आया है ?”
उस आदमी के हाथ में न कोई निमंत्रण-पत्र था, न निमंत्रित सज्जनों की नामावली। इससे मेरा क्रोध और दहक उठा। मैंने अंग्रेजी में दो-चर गालियाँ दीं और उसके जवाब की अपेक्षा करने लगा।
आदमी ने कहा-“बाबू भागीरथप्रसाद के घर से आया हूँ। उनके घर में गमी हो गयी है।!”
मैंने चिन्तित होकर पूछा-'“कौन मर गया है ?"'
आदमी-“हुजूर, यह तो मुझे नहीं मालूम। बस इतना ही कहा है कि गमी की सूचना दे आ।"
यह कहकर वह चलता बना और मेरे मन में भ्रांति का एक तूफ़ान छोड़ गया-कौन मर गया ? स्त्री तो बीमार न थी, न कोई बच्चा ही बीमार था। फिर मर कौन गया ? अच्छा, समझ गया। स्त्री के बाल-बच्चा होने वाला था। उसी में कुछ गोलमाल हो गया होगा। बेचारी मर गयी होगी। घर उजड़ गया। कई छोटे-छोटे बच्चे हैं। कौन्न उन्हें पालेगा ? और तो और, इस जाड़े-पाले में नदी जाना और वह भी नंगे पैर और रात को नदी में स्नान। उसकी मृत्यु क्या हुई, हमारी मृत्यु हुई। यहाँ तो हवा जुकाम हुआ करती है, रात को नहाना तो मौत के मुँह में जाना है।
इस सोच में में कई मिनट मूढ़ बना खड़ा रहा | फिर घर में जाकर कपड़े उतारे, धोती ली और नंगे पाँव चला। भागीरथप्रसाद के घर पहुंचा तो चिराग जल गये थे। द्वार पर कई आदमी मेरी ही तरह धोतियाँ लिये एक तख्त पर बैठे हुए थे।
मैंने पूछा-““आप लोगों को तो मालूम होगा कौन मर गया है ?” एक महाशय बोले-“जी नहीं। नाई ने तो इतना ही कहा था, गमी हो गयी है। शायद स्त्री का देहांत हो गया है। भागीरथलाल को बुलाना चाहिए। देर क्यों कर रहे हैं ? मालूम नहीं कफन मँगवा लिया है या नहीं। अभी तो कहीं बाँस-फॉस का भी पता नहीं। सारी रात्त मरन है।”
मैंन द्वार पर जाकर पुकारा-“कहाँ हो भाई, क्या हम लोग अन्दर आ जायें ? चारपाई से तो उतार लिया है न ?”
भागीरथप्रसाद एक मिनिट में पान और इलायची की तश्तरी लिये, फला-लेन का कुरता पहने, पान खाते हुए बाहर निकले। बाहर बैठी हुई शोक-मण्डली उन्हें देखकर चकित हो गयी। यह बात क्या है ? न लाश, न कफन, न रोना, न पीटना...यह कैसी गमी है। आखिर मैंने डरते-डरते कहा-कौन यानी किसके विषय में यही आदमी जो आपने भेजा था ? तो क्या देर है ? भागीरथ ने कुर्सी पर बैठकर कहा, “पहले आराम से बैठिये, पान खाइये, तब वह बात भी होगी। मैं आपका मतलब समझ गया। बात सोलहों आने ठीक है।”
“तो फिर जल्दी कीजिये, रात हो ही गयी है। कौन है ?”
भागीरथ ने अब की गम्भीर होकर कहा, “वही जो सबसे प्यारा, मेरा मित्र, मेरे जीवन का आधार, मेरा सर्वस्व, बेटे से भी प्यारा, स्त्री से भी निकट, मेरे 'आनन्द' की मृत्यु हो गयी। एक बालक का जन्म हुआ, पर मैं इसे आनन्द का विषय नहीं, शोक की बात समझता हूँ। आप लोग जानते हैं मेरे दो वालक मौजूद हैं। उन्हीं का पालन मैं अच्छी तरह नहीं कर सकता। दूध भी कभी नहीं पिला सकता, फिर इस तीसरे बालक के जन्म पर मैं आनन्द कैसे मनारऊँ ! इसने मेरे सुख और शान्ति में बड़ी भारी बाधा डाल दी। मुझमें इतनी सामर्थ्य नहीं कि इसके लिए दाई रख सकँ। माँ इसको खिलाये; उसका पालन करे या घर के दूसरे काम करे ? फर्ज यह होगा कि मुझे सब काम छोड़कर इसकी सुश्रूषा करनी पढेंगी। दस-पाँच मिनट जो मनोरंजन या सैर में जाते थे अब इसकी सत्कार की भेंट होंगे। में इसे विपत्ति समझता हूँ, और इसीलिए इस जन्म को गमी कहता हैं। आप लोगों को कष्ट हुआ। क्षमा कीजिये। आप लोग गंगा-स्नान के लिए तैयार होकर आये। चलिये, मैं भी चलता हूँ। अगर शव को कन्धे पर रखकर चलना ही अभीष्ट हो तो मेरे ताश और चौसर को लेते चलिये। इन्हें चिता में जला देंगे। वहाँ में गंगाजल हाथ में लेकर प्रतिज्ञा करूँगा कि अब ऐसी महान मूर्खता फिर न करूँगा।”
हम लोगों ने खूब कहकहे मारि, दावत खायी और घर चले आये पर भागीरथप्रसाद का कथन अभी तक मेरे कानों में गूँज रहा है।
गमी का सारांश
'गमी' मुंशी प्रेमचंद की एक अत्यंत चुटीली, विचारोत्तेजक और तीखी हास्य-व्यंग्यात्मक कहानी है, जिसमें सीमित आर्थिक साधनों वाले निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार में अनियंत्रित संतानोत्पत्ति के संकट और परिवार-नियोजन की आवश्यकता पर प्रभावी व्यंग्य किया गया है। कथावाचक घर पर फुर्सत के समय अखबार में चटपटी खबरें पढ़ रहे होते हैं, तभी बाबू भागीरथप्रसाद के घर से एक संदेशवाहक आकर खबर देता है कि उनके घर में 'गमी' (शोक/मृत्यु) हो गई है।
संदेशवाहक यह स्पष्ट नहीं बता पाता कि किसकी मृत्यु हुई है। कथावाचक कयास लगाते हैं कि संभवतः भागीरथप्रसाद की गर्भवती पत्नी प्रसव के दौरान चल बसी होंगी। वे जाड़े की रात में नंगे पैर श्मशान जाने और नदी में स्नान करने की विवशता पर मन ही मन खीझते हुए भागीरथप्रसाद के घर पहुँचते हैं। वहाँ मुहल्ले के अन्य लोग भी हाथ में धोती लिए इसी उलझन में बैठे मिलते हैं कि कफ़न और अर्थी के बाँस का प्रबंध हुआ या नहीं तथा रात भर की इस मुसीबत से कैसे निपटा जाए।
तभी भागीरथप्रसाद गर्म फलालेन का कुरता पहने, मुँह में पान दबाए और हाथ में इलायची-पान की तश्तरी लिए बाहर आते हैं। घर में न कोई शव है, न रोना-पीटना और न ही कफ़न। सभी उपस्थित लोग इस विचित्र 'गमी' को देखकर दंग रह जाते हैं। जब कथावाचक उनसे पूछते हैं कि आखिर किसकी मृत्यु हुई है, तो भागीरथप्रसाद अत्यंत संजीदगी से कहते हैं कि उनके सबसे प्यारे मित्र, जीवन के आधार यानी उनके 'आनंद' की मृत्यु हो गई है।
भागीरथप्रसाद बताते हैं कि उनके घर में तीसरे बालक का जन्म हुआ है, जिसे वे किसी उत्सव का नहीं बल्कि गहरी विपत्ति और शोक का विषय मानते हैं। उनका कहना है कि वे पहले से मौजूद दो बच्चों का ही भली-भाँति पालन-पोषण और दूध का प्रबंध नहीं कर पा रहे हैं, तो इस तीसरे बच्चे के जन्म पर आनंद कैसे मनाएँ? उनके पास न दाई रखने का सामर्थ्य है और न ही पत्नी अकेले सब कुछ संभाल सकती है। फलस्वरूप उनके जीवन का सारा सुख, चैन और थोड़ा-बहुत मनोरंजन भी इस नए शिशु की देखभाल की भेंट चढ़ जाएगा। वे व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि यदि शव ले जाना ही है तो उनके ताश और चौसर को चिता में जला दिया जाए और वे गंगाजल हाथ में लेकर प्रतिज्ञा करेंगे कि ऐसी भारी भूल दोबारा नहीं करेंगे। सभी लोग इस अनोखी बात पर ठहाके लगाते हैं और दावत खाकर लौट आते हैं, परंतु भागीरथप्रसाद का यह कड़वा सच कथावाचक के कानों में देर तक गूँजता रहता है।
प्रकाशन इतिहास
प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- मध्यमवर्गीय आर्थिक विषमता और परिवार नियोजन: प्रेमचंद ने बहुत पहले ही अनियोजित परिवार, बच्चों के लालन-पालन के यथार्थ खर्च और सीमित आय वाले परिवारों की मानसिक व आर्थिक दुर्दशा को उजागर किया।
- संतानोत्पत्ति संबंधी सामाजिक अंधविश्वास पर चोट: समाज में बच्चे के जन्म को बिना सोचे-समझे केवल ईश्वर की देन और मंगलकारी मानने की रूढ़िवादी धारणा पर भागीरथप्रसाद का तर्कसंगत दृष्टिकोण एक तीखा कटाक्ष है।
- सामाजिक औपचारिकता और आत्मकेंद्रित सोच: मृत्यु की सूचना पाकर भी लोगों का मृतक या शोकग्रस्त परिवार के प्रति संवेदना रखने के बजाय ठंड में नहाने और समय नष्ट होने जैसी अपनी निजी दिक्कतों पर खीझना यथार्थवादी सामाजिक मनोविज्ञान को दर्शाता है।
- हास्य और व्यंग्य का अनूठा कथा-शिल्प: 'गमी' (मृत्यु) के भ्रम के जरिए नवजात शिशु के जन्म को प्रस्तुत करना कथा में तीव्र कौतूहल और सशक्त व्यंग्यात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'गमी' अपने समय से बहुत आगे की प्रगतिशील और यथार्थवादी रचना है। यह मनुष्य को भाग्यवादिता छोड़कर व्यावहारिक विवेक, आर्थिक उत्तरदायित्व और परिवार नियोजन को अपनाने का स्पष्ट संदेश देती है।
