दमन का बाजार गर्म है। निर्बल का एकमात्र आधार रोना है, सबल का एकमात्र आधार आंखें तरेरना। दौनों क्रियाएं आंखों से ही होती हैं; लेकिन उनमें कितना बडा अन्तर है | स्थेच्छाचारी सरकारों की बुनियाद पशु-बल पर होती है। वह हरेक अवसर पर अपना पशु-बल दिखाने को तैयार रहती हैं। प्रजा की हरेक शिकायत की दवा उनके पास संगीन और मशीनगन है। पशु-बल पर उनका अखंड विश्वास है। उनकी समझ में यह हरेक बीमारी की अचूक दवा है। वह कभी इसे स्वीकार नहीं करतीं, कि यह दवा कभी-कभी चूक भी जाती है। अगर पुराना इतिहास इसके विरुद्ध कोई प्रमाण देता है, अगर रूस, इटली, फ्रांस और स्वयं इंग्लैंड आदि देशों में इसका व्यर्थ होना सिद्ध हो गया है, तो हमारी सरकार इससे यह नतीजा निकालती है, कि उन देशों में उतना दमन नहीं किया गया, जितना जरूरी था। अगर पक्का, सोलहों आना दमन होता, तो मजाल थी, कि शासकों को सफलता न होती। उन देशों के शासक कच्चे थे, दमन करना न जानते थे। हमारी सरकार दमननीति के व्यवहार में सबसे बाजी लिये जा रही है और यह कौन कह सकता है, कि वह गलती पर है। पुरानी कहावत है, कि मार क॑ आगे भूत भागता हैं। आखिर आन्दोलन करने बाले आदमी ही तो हैं | मार्शल लॉ से, जेलखानों में बद 4 «# , सरकार उन्हें चुप कर सकती है, मगर जैसा जर्मनी क॑ प्रिंस बिस््मार्क जेसे पशबलवादी को भी स्वीकार करना पड़ा था, कि “'संगीन से तुम चाहे जो काम ले लो, पर उस पर बैठ नहीं सकते। '' हमारी सरकार दमन के व्यवहार से, चाहे जाति को चुप कर दे, पर उसे शान्त नहीं रख सकती। उसके लिए दोनों रास्ते खुले हुए हैं। एक तो प्रजा की शान्ति-उससे उत्पन्न होने वाली विभूतियों की ओर ले जाती है, दूसरी प्रजा की अशान्ति-उससे उत्पन होने वाली विपत्तियों की ओर। एक तरफ कीर्ति है, गौरव है, पारम्परिक सहानुभूति है, दूसरी ओर अपकीर्ति है, अन्याय है, नोच-खसोट है। हम यह कभी स्वीकार नहीं कर सकते, कि अंग्रेजों को नेकनामी से प्रेम नहीं। व्यक्ति की भांति ही कोई जाति इतनी पतित नहीं हो सकती , कि उसे बदनामी की लज्जा न हो। क्या आने वाली अंगरेज जाति इतिहास ऊ पन्नों में अपने पूर्वजों की क्रर कथाएं पढ़कर गोरवान्वित होगी? क्या अंग्रेज जाति चाहत॑ है, कि उसके और भारत क॑ बीच इतना वैमनस्थ हो जाय, जो सदियों म॑ भी न मिटे? अंग्रेजों का भविष्य उनके वाणिज्य और व्यवसाय पर है। क्या भारतीय जनता को असम्तुष्ट रखकर वह अपने व्यापार को जीवित रख सकते हैं? मि० वेजवुड बन ने अभी अपने व्याख्यान में कहा है, कि बड़ी से बडी फोजी ताकत भी भारतोय किसानों को अंग्रेजी चीजें लेने पर मजबूर नहीं कर सकती। तब जान-बुझकर सरकार क्यों इतनी निर्दयता से दमन पर कमर बांधे हुए है, यह हमारी समझ में नहीं आता। हमने मि० वेजबुड बन के व्याख्यान को बड़े ध्यान से पढा। उससे हमें घोर निराशा हुई। वह अभी तक भारतीय आन्दोलन का तत्त्व ही नहीं समझे, या शायद समझते हुए भी न समझने की चेष्टा कर रहे हैं। अगर उनका ख्याल है, कि यह आंदोलन कांग्रेस के थोडे-से आदमियों का खडा किया हुआ है ओर उन्हें जल में बन्द करके या डंडों से पीटकर इसकी जड़ खोदी जा सकती है, तो यह उनकी भूल है। यह एक राष्ट्रीय आंदोलन है, यट भारतीय आत्मा के स्वाधीनता- प्रेम की विकल जागृति है। महात्मा गांधी क्यों भारत के हृदय पर राज्य कर रहे हैं? इसीलिए कि वह इस विकल जागृति के जीते-जागते अवतार हैं।
वह भारत के सत्य, धर्म, नीति और जीवन के सर्वोत्तम आर्दश हैं। उन्हें जेल में बन्द करके सरकार ने अगर कोई बात सिद्ध की, तो वह यह है कि जिस शासन में ऐसा देव-तुल्य पुरुष भी स्वाधीन नहीं रह सकता, वह जितनी जल्द मिट जाय, उतना ही भारत के लिए और समस्त संसार के लिए कल्याणकारी होगा। मि० बेन फरमाते हैं, कि किसानों पर इस आंदोलन का असर नहीं है और न मुसलमानों पर है। हम मि० बेन को इतना सादालौह न समझते थे। स्व॒राज्य- आंदोलन खासकर किसानों ही का आंदोलन है। क्या किसान इतने बड़े मूर्ख हैं, कि वह अपना हित भी नहीं समझते? सम्भव है, कि उनके पास अपने भावों और विचारों के प्रकट करने का वैसा अवसर, साधन और साहस न हो, जिसका मि० बेन जैसे आदमी पर असर पड़ता, पर इसका यह आशय नहीं, कि वह इस आन्दोलन में शरीक ही नहीं है? अगर इस आन्दोलन में उनका कोई फायदा न होता, शिक्षित समाज ने उन्हें बेवकूफ बनाकर केवल अपना मतलब गांठना चाहा होता, तो सम्भव था, किसान शरीक न होते; लेकिन जब किसानों की आर्थिक कठिनाइयों का सुधार इस आंदलोन क॑ मुख्य तत्त्वों में है, तो किसान क्यों न शरीक होंगे? किसानों से ज्यादा कर और कौन देता है? उनके खेत में उपज हो या न हो, पर उन्हें लगान अवश्य देना पडेगा और लगान भी वह जा बराबर बढ़ता चला जाता है। क्या किसान बोलते नहीं, तो क्या अपनी दशा को महसूस भी नहीं करते? महात्मा जी ने तो खुद किसानों को ' बेजबान ' कहा है। अभी तो इस आंदोलन को चले हुए तीन महीने भी पूरे नहीं हुए। ईएवर ने चाहा, तो सरकार को यह भी मालूम हो जायगा, कि किसान इस आंदोलन में कहां तक शरीक हैं ' रहे मुसलमान। पिछले वैमनस्यों के कारण अभी कुछ मुसलमान जनता ऐसी अवश्य है, जो इस आंदोलन को शुबहे की निगाह से देखती है, पर अधिकांश लोग हमार माथ हैं, जेसा कि जमेयतुलउलेमा के फँंसले से जाहिर है। पेशावर मुसलमानों का शहर हे और वहां की जनता पर जो क॒छ हुआ है, उसने हमारे बहुत से मुसलिम भाइयों की आंख खाल दी हैं। अभी बम्बई के भिंडी घाजार में मुसलिम जनता पर जो क॒छ किया गया है, उसका असर भी जरूर होगा। फिर क्या यह अंगरेजी सरकार के लिए गौरव की बात हैं, कि वह आंदोलन क तत्व पर विचार न करक ऐसे विचारों से सन््तोष प्राप्त करे, कि इस आंदोलन मे फलां शरीक है, फलां नहीं शरोक हैं। यह एक प्रिय सत्य हैं पर उस विवश होकर कहना ही पढ़ता है कि मुसत्तिम लताओं में इस वक्त ऋछ एस लोग मौजद है, जिन पर मुसलिम जनता का विश्वास नहीं। कछ मुसलिम नता इस आन्दोलन से अपने मतलब गांठने की फिक्र में पड़े हुए हैं और मुसलिम जनता क॑ हितों को अपन स्वार्थ पर बलिदान कर रहे हैं। क्या लगान कम हो जाने से कवल हिन्दू किसानों का हित होगा? क्या स्वदेशी के प्रचार से कंबल हिन्दुओं का हित होगा? मेम्बस्यों और ओहदों क॑ लिए झगड़ना मुसलिम जनता के हित्तों को थोड़ से शिक्षित समाज क स्वार्थ की भेंट करना है। हमें प्री आशा हैं, और उसके लक्षण भी दिखायी द॑ रहे हैं, कि बहुत जल्ड मुसलिम जनता अपने नेताओं से फिरकर इस आन्दोक्षन में शरीक हो जायगी। मुसलिम जनता को भी अब यह बात मालूम हो गयी है, कि सरकार को न हिन्दुओं से प्रेम है, न मुसलमानों से। उसके मार्ग में जो बाधक होगा, चाहे बह हिन्दू हो, यामुसलमान, उसक साथ किसी तरह की रिआयत न की जायगी। सरकार को नीच हिन्दू जातियों से भी कुछ आशा है। कहीं -कहीं उसकी तरफ से इस आन्दोलन के विरोध की आवाजें भी आ रही हैं। हमें इस बात से लज्जा और खेद है, कि ऊंची जातों ने नीची जातों के
साथ पूर्वकाल में ऐसा अच्छा सलूक नहीं किया, जैसा उन्हें करना चाहिए था, लेकिन जागा हुआ हिन्दू-समाज अब अपने पिछले दुर्व्यवहारों का प्रायश्चित कर रहा है और कांग्रेस उन पुराने लचर और अमानुषीय बन्धनों को तोड़ने में अपना पूरा जोर लगा रही है। कांग्रेसी हिन्दू की नजर में सभी हिन्दू बराबर हैं। वह किसी क॑ साथ मिलने, साथ भोजन करने, देवमन्दिरों में एक साथ पूजा करने में आना- कानी नहीं करता। वह हिन्दू-धर्म क॑ ठीकेदारों से लड़ने पर भी तैयार है। एक अछूत भाई से बराबरी के नाते से मिलकर कांग्रेसमैन-को जितना आनन्द होता है, उसे बयान करने की जरूरत नहीं। उसका बस चले, तो वह आज ही ऊंच-नीच के बन्धनों को तोड़ दे। हमें विश्वांस है, कि बहुत थोड़े दिनों में ऊंच-नीच का भेद कंवल इतिहास में रह जायगा, मगर हम सरकार से पूछते हैं, आप जा अछुतों के बड़े हितैषी बनते हैं, आपने उनक उद्धार के लिए कया किया है? आपने क्यों बेगार बन्द नहीं की? कया आपका यह नहीं मालूम कि बेगार जिनसे ली जाती है, वह यही नीच भाई हैं? जरायमपेशा जातियों की सृप्टि किसने की हें? आपने या कांग्रेस न? नीच भाइयों की शिक्षा के लिए प्रबन्ध करने मे आपने कितनी उदारता से काम लिया है? इन बातों के होते हुए भी आप किस मुंह सेपता के हितैपी बनते का दाला कर सकते हैं? हमारे आदि हिल््दू भाई अब अपनी दोस्त दृश्मस पहचानने लगे हैं और हमें पूरा विश्वास है कि वह इस अवसर पर अपनी समझ से काम लेगे। हम उ्ें विफक।स लाते हैं कि कांग्रस के द्वाग ही उनका उद्धार हो सकता है और काई शक्ति उनका उपकार नहीं कर सकती। जिस निर्दयता से दमन किया जा रहा है, उससे तो यह साफ मालम होता है, कि सरकार भारत को जागृति से बबड़ाई हुई है। | 0७ ताप जल का ढकोसला बनाकर सरकार खुद | 4७ बात जाप॑त को भंग कर रही हैं। कानून कंबल प्रजा ही के लिए नहीं है। सरकार पर भो उसके बनाये हुए कानत उतने हो लाग होते है, जितने प्रजा पर मगर हम यहा देखते है कि इस जागृति का दबाने के लिए सरकार किसी कानून की परवता नहीं कर रही है। जिस अपराध के लिए जो दड नियत कर दिया गया है उसका बह दंड ने दकर सरकार जब जर्ता पर टूटी का पहार ऊगतो हैं ता ड्म न्याय संगत नहों कहा जा सतता। आमतोर पर यहां होता है कि काग्रस क' एक जुलस निकलता ह अगर जुलय का अपना गह चले जा» दया जाय ता काई च भी ने ऋर। कागस या उससे हमदर्दों रखने बालो जनता लटते के लिए जुलूस नहीं निकालतो , न शांति भंग करन के हद से चलतों है मगर सरतार इसे अपमान समझतों है और जुलूस को रोकते के लिए नये नये दफ लगाती है पुलीस से निहत्थों को पिटवाती है ओर जिस चीज की रक्षा के लिए वह यह सब कुछ करने का दावा करती हैं, वह इस कार्रवाई से भंग हो जाता है। पेणावर , पटना, कलकना, लगनऊ सभी जगह वहीं एक किस्सा है। हम लग्बनऊ को लेते हैं। जिस हजरतगंज से कांग्रेस के जुलूस को रोकने के लिए सैकडों सिर ताड दिये गये, उसी हजरतगज से उसके पहले दो बार कांग्रेस का जुलूस शान्तिपूर्वक निकले गया था और एक चींटी की भी जान न गयी थी। इससे स्पष्ट है, सरकार भारतीय जागृति को दमन के जोर से दबाना चाहती है। .0७ जात जतल कंवल बहाना है। शोलापुर को परिस्थिति पर सरकार ने जो विज्ञप्ति प्रकाशित की है, या पेशावर की तहकोकाती कमेटी के सामने श्रकारी कर्मचारियों ने जो बयान दिए हैं, उनसे भी यही प्रकट होता है, कि कर्मचारियों ने बेजा जल्दबाजी से काम लिया। पहले कहा गया था, कि शोलापुर में तीन पुलीसमेनों को
मारकर जला दिया गया था। अब खुद सरकारी रिपोर्ट कहती है, कि यह बात गलत थी। तो फिर मार्शल लो जारी करने और हत्याकांड का अपराधी कौन है? पेशाबर में तहकीकाती कमेटी के सामने जो बयान हो रहे हैं, उनसे विदित होता है, कि जब तक जनता के तीन आदमी सशस्त्र कारों से कुचल नहीं गये, किसी ने पत्थर नहों फेंक। एक कर्मचारी ने तो यहां तक कहा, कि फौज को बुलाने की कोई जरूरत न थी। फिर भी फोज बुलायी गयी ओर कितने हो आदमी मार डाले गये। क्या यही ,3% 0 002८ को रक्षा है? हम यह मानते हैं, कि कहीं-कऊहीं जनता ने पत्थर फेंके होंगे, पर उसी बकक्त, जब पुलीस या फौज ने कोई ज्यादती की होगी। खेद तो इस बात का है, कि सेक्रेटरी तक पुलीस की इन डण्डेबाजियों की तारीफें कर रहे हैं और हिज एक्सेलेंसी भी यही फरमाते हैं कि कहीं उससे ज्यादा सख्ती नहीं की गयी जितनी जरू ) थी। हमारे नेता गला फाड-फाडकर चिल्ला रहे हैं, कि पुलीस घोर अत्यायार कर रही है। इस कठोर दमन से उदासीन होकर लाग एसेम्बली और कोौन्सिलों से धडाधड इस्तीफे दे रहे हैं; पर सरकार यही कहे जाती है, कि ज़रूरत पल ज़्यादा सख्ती कहीं नहीं की गई। सेक्रटरी साहब ने तो इन इस्तीफों का जिक्र तक नहीं किया। अब ही स्त्रियों पर भी सख्ती होने लगी है। दखना चाहिए, यह दमन क्या-क्या गुल खिलाता है। हम तो इतना ही
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', मई, 1930 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]
