Cover Image for Dukhi Jeevan (दुखी जीवन) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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निबंध•1933•20 मिनट

दुखी जीवन

Dukhi Jeevan

सुख और दुःख के दार्शनिक पहलुओं पर प्रेमचंद का गंभीर निबंध, जिसमें वे परोपकार और सेवा को ही जीवन की सच्ची शांति का मार्ग बताते हैं।

Work Details

प्रकार: निबंध
वर्ष: 1933
पठन समय: 20 मिनट (2,933 शब्द)

हिन्दू दर्शन दु:खवाद है, बौद्ध दर्शन दु:खबाद ने और ईसाई धर्म भी दुःखवाद है | मनुष्य सुख की खोज में आदिकाल से रहा है और इस की प्राप्ति उसके जीवन का सदैव मुख्य उद्देश्य रही है। दुःख से वह इतना घबड़ाता है कि इस जीवन में ही नहीं, आने वाले जोवन के लिए ऐसो व्यवस्था करना चाहता है कि वहां भी सुख का उपभोग कर सके। जन्नत और स्वर्ग, मोक्ष और निर्वाण, सब उसी आकांक्षा की रचनाएं हैं। सुख को प्राप्ति के लिए ही हमने जीवन को निरस्सार और संसार को अनित्य कहकर अपने मन को शांत करने की चेष्य कौ। जब जीवन में कोई सार ही नहीं है और संसार अनित्य ही है, तो फिर क्‍यों न इनसे मुंह मोड़कर बैठें? लेकिन हम क्‍यों दुखी होते हैं, वह कौन-सी मनोवृत्ति है जो हमें दुःख की ओर ले जाती है, इस पर हमने विन्गर नहीं किया। आज #म्न इसी प्रश्न को मामांसा करेंगे और देखेंगे कि इस अंधकार में कहीं प्रकाश भी मिल सकता है या नहीं।

दुःख के दो कारण हैं-एक तो वे रूढ़ियां जिनमें हमने अपने को और समाज को जकड़ रखा है और दूसरे वे व्यक्तिगत मनोवृत्तियां हैं जो हमारे मन को संकुचित रखती हैं और उसमें बाहर की वायु और प्रकाश नहीं आने देतीं। रूढियों से तो हम

इस समय बहस नहीं करना चाहते, क्योंकि उनका सुधार हमारे बस की बात नहीं वह समष्टि की जागृति पर निर्भर है, लेकिन व्यक्तिगत मनोवृत्तियों का संस्कार हमारे बस की बात है और हम अपना विचार यहीं तक परिमित रकबखेंगे।

अक्सर ऐसे लोग बहुत दुखी देखे जाते हें जो असमय के कारण अपना स्वास्थ्य खो बेठे हैं, या जिन पर लक्ष्मी की अकृपा है। लेकिन वास्तव में सुख के लिए न धन अनिवार्य है न स्वास्थ्य। कितने ही धनी आदमी दुखी हैं, कितने ही रोगी सुखी हैं। सुखी जीवन के लिए मन का स्वस्थ होना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन फिर भी सुखी जीवन के लिए नीरोग शरीर लाजिमी चीज है। सभी तो ऋषि नहीं होते। बलवान्‌ ओर स्वध्य मन, बलवान ओर स्वस्थ देह में ही रह सकता है। साधना और तप इस विषय में अपताद उपस्थित कर सकते हैं, लेकिन साधारणत: स्वस्थ देह और स्वस्थ मन में कारण और कार्य का संबंध है। यद्यपि वर्तमान रहन-सहन ने इसे दुस्तर बना दिया है, तथापि सामान्य मनुष्य अगर बुद्धि से काम ले और प्राकृतिक जीवन के आदर्श की तरफ से आंख न बंद कर ले, तो वह -अपनी देह को नीरोग रख सकता है देह तो एक मशीन है। इसे जिस तरह कोयले-पानी की जरूरत है उसी तरह इससे काम लेने को जरूरत है। अगर हम इस मशीन से काम न लें तो बहुत थोडे दिनों में इसके पुर्जों में मोर्चा लग जाएगा। मजदूरों के लिए यह प्रशन ही नहीं उठता। यह प्रश्न तो केवल उन लोगों के लिए है जो गद्दी पर या कुर्सी पर बैठकर काम करते हैं। उन्हें कोई-न- कोई कसरत जरूर ही करनी चाहिए। क्रिकेट और टेनिस के लिए हमारे पास साधन नहीं हैं तो क्या, दम अपने घर में सौ-पचास डंड-बैठक भी नहीं लगा सकते? अगर हम स्वास्थ्य के लिए एक घंटा भी समय नहीं दे सकते तो इसका स्पष्ट अर्थ यही है कि हम सुख को ठोकरों से मारकर अपने द्वार से भगाते हैं।

भोजन का प्रश्न भी कुछ कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। क्या चीज किस तरह औः कितनी खाई जाय, इस विषय में मूर्खों से अधिक शिक्षित लोग गलती करते हैं। अधिकनर तो ऐसे आदमी मिलेंगे जो इस विषय में कुछ जानते ही नहीं। जिंदगी का सबसे बड़ा काम है भोजन। इसी धुरी पर संसार का सारा चक्र चलता है और इसी के विपय में हम कुछ नहीं जानते। बच्चों में शील ओर विनय का तथा बड़ों का संयम का पहला पाठ भोजन से आरंभ होता है। यह हास्यापद-सी बात है पर वास्तव में आत्मोन्‍लति का पहला मंत्र भोजन में पथ्यापथ्य का विचार है।

दुःख का एक बड़ा कारण है अपने आपमें डूबे रहना, हमेश अपने ही विषय में सोचते रहना। हम यों करते तो यों होते, वकालत पास करके अपनी मिट्टी खराब की, इससे कहीं अच्छा होता कि नौकरी कर ली होती। अगर नौकर हैं तो पछतावा है कि वकालत क्‍यों न कर ली। लड़के नहीं हैं तो यह फ्रिक मारे डालती है कि लड़के कब होंगे4 लड़के हैं तो रो रहे हैं कि ये क्‍यों हुए, ये कच्चे-बच्चे न होते तो कितना आराम से जिंदगी कटती। कितने ही ऐसे हैं जो अपने वैवाहिक जीवन से असंतुष्ट हैं। कोई मां-बाप को कोसता है जिन्होंने उसके गले में जबरदस्ती जुआ डाल दिया-कोई मामा या फूफा को जिन्होंने विवाह पक्का किया। अब उनको सूरत भी ठसे पसंद नहों। बीवी से आये दिन ठनी रहती है-वह सलीका नहीं रखती

मैली है, फूहड़ है, मुर्दा है, या मुहर्रमी है। जब देखो मुंह लटकाये बैठी रहती है। यह नहीं कि पति महोदय दिन भर के बाद घर में आये हैं, तो लपककर उनके गले से लिपट जाये। इस श्रेणी में अधिकतर लेखक-समाज और नवरशिक्षित युवक हैं। वे दूसरों को बीबियों को देखकर अपनी किस्मत ठोंकते हैं-वह कितनी सुघड़ है, कितनी हंसमुख, कितनी सुरुचि रखने वाली। दिन-रात बेचारे इसी डाह में जला करते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो चाते हैं कि सारी दुनिया उनकी प्रशंसा करती रहे। खुद जब मौका पाते हैं, अपनी तारीफ शुरू कर देते हैं। वह खुद किसी के प्रशंसक नहीं बनते, किसी से प्रेम नहीं करते। लेकिन इच्छुक हैं कि दुनिया उनके आगे नतमस्तक खड़ी रहे, उनका गुणगान करती हरे। दुनिया उनकी कद्र नहीं करती, इस फिक्र में घुले जाते हैं, इससे उनके स्वभाव और व्यवहार में कटुता आ जाती है। और ऐसे लोग तो घर-घर मिलेंगे तो निन्‍्यानबे के फेर में पढ़कर जीवन को भार बना लेते है। संचय, संचय लगातार संचय। इसी में उनके प्राण बसते हैं, ऐसा आदमी केवल उन्हीं से प्रसन्‍न रहता है, जो संचय में उसके सहायक होते हं। ५ किसी से उसे सरोकार नहों। बीवी से हंसने-बोलने का उसके पास समय नहीं, लड़कों को प्यार करने और दुलराने का उसे बिल्कुल अवकाश नहीं। घर में किसी से धेली का नुकसान भी हो गया तो उसके सिर हो जाता है। बीवी ने अगर एक आने की जगह पांच पैसे की तरकारी मंगवा ली तो पति को रात-भर झींकने का मसाला मिल गया-तुम घर लुगा दोगी, तुम्हें क्या खबर पैसे केसे आते हैं, आज मर जाऊं तो भीख मांगती फिरो। ऐसी ऐसी दिल जलाने वाली बातें करके आप रोता है और दूसरों को रुलाता है। लड़के से कोई चिमनी टूट गई, तो कुछ न पूछो, बेचारे निरपराध बालक की शामत आ गई। मारते-मारते उसको खाल उधेड़ डाली। माना लड़के से नुकसान हुआ, तुम गरीब हो और तुम्हारे लिए दो-चार आने का नुकसान भी कठिन है। लेकिन लड़के को पीटकर तुमने क्या पाया? चिमनी तो जुड़ नहीं गई। हां | स्नेह का बंधन जरूर टुटने को हो गया। यह सब अपने आप में डूबे रहने वालों का हाल 4' उनके लिए केवल यही औषध कि अपने विषय में इतनी चिंता न करें, दूसरों में भी दिलचस्पी लेना सीखें-चिड़िया पालना, फूल-पौधे लगाना, गान-बजाना, गपशप करना, किसी आंदोलन में भाग लेना। गरज मन को अपनी ओर से हटाकर बाहर की ओर ले जाना ही ऐसे चिंताशील प्रकृति वालों के लिए दुः:ख-निवारक हो सकता है।

उदासीन प्रकृति वाले भी अक्सर दुखी रहते हैं। संसार में उनके लिए कोई सारवस्तु नहीं। यह मरज अधिकतर उच्चकोटि के विद्वानों को होता है। उन्होंने संसार के तत्त्व को पहचान लिया है और जीवन में अब ऐसी कोई वस्तु नहीं मिलती जिसके लिए वे जिए। संसार रसातल की ओर जा रहा है, लोगों से प्रेम उठ गया, सहानुभूति का कहीं रा नहीं, साहित्य का डोंगा डूब गया, जिससे प्रेम करो वही बे१काई करता है, संसार में विश्वास किस पर किया जाय? यह चौज तो उठ गई | अब लखन से भाई और हनुमान से सेवक कहां? यह उदासीनता अधिकतर उन्हीं लोगों में होती है जो संपन्न हैं, जिन्हें जीविका के लिए कोई काम नहीं करना पड़ता। मजे से खाते हैं और सोते हैं। क्रियाशीलता का उनमें भावा होता है। बे दुनिया में केवल रोने के लिए आए हैं, किसी का उनको जात से उपकार

नहीं होता। हर एक चीज में ऐब निकालना, हर चीज से असंतुष्ट रहना, यही उनका उद्यम है। ऐसे लोगों का इलाज यही है कि तुरंत किसी काम में लग जाएं। और कुछ न हो सके तो ताश खेलना ही शुरू कर दें। कोई भी व्यसन उनके रोने से अच्छा है। संसार कब रसातल की ओर नहीं जा रहा था? जब कोरवों ने द्रोपदी को भरी सभा में नंगी करना चाहा और पांडव बैठे हुए टुकर-टुकर देखते रहे, क्या तब संसार रसातल को नहीं जा रहा था? किस युग में भाई ने भाई का गला नहीं काटा, मित्रों ने विश्वासघात नहीं किया, व्यभिचार नहीं हुआ, शराब के दौर नहीं चले, लड़ाईयां नहीं हुईं, अधर्म नहीं हुआ ? मगर पृथ्वी आज भी वहीं है जहां दस हजार बरस पहले थी। न रसातल गई न पाताल। और इसी तरह अनंत काल तक रहेगी। संदेह जीवन का तत्त्व है। स्वस्थ मन में सदैव संदेह उठते हैं और मगर में जो कुछ उन्नति है उसमें संदेह का बहुत हाथ है। लेकिन संदेह क्रियाशील होना चाहिए, जो नित्य नये आविष्कार करता है, जो साहित्य और दर्शन की दृष्टि करता है। संसार अनित्य है तो आपको इसकी क्‍या चिंता है? विश्वास मानिए, आपके जीवन में प्रलय न होगा। और अगर प्रलय भी ,हो जाय तो आपके चिंता करने की वजह? जो सबकी गति होगी वही आपको भो होगी। घर से बाहर निकलकर देखिए-मैदान में कितनी मनोहर हरियाली है, वृक्षों पर पक्षियों का कितना मीठा गाना हो रहा है, नदी में चांद केसा थिरक रहा है। क्या इन दृश्यों से आपको जरा भी आनंद नहीं आता? किसी झोपड़ी में जाकर देखिए। माता फाके कर रही है पर कितने प्रेम से बालक को अपने सूखे स्तन से चिमटाए हए है। पत्नी अपने बीमार पति को सिरहाने बैठी मोती बरसा रहो है और ईइवर से मी है कि पति की जगह वह खुद बीमार हो जाय। विश्वास कौजिए आप सेवा और त्याग तथा विश्वास के ऐसे-ऐसे कृत्य देखेंगे कि आपकी आंखें खुल जायेंगी। हो सक तो उन कुछ मदद कीजिए प्रेम करना सीखिए। उस उदासीनता की, उस मानसिक व्यभिचार वी, यही दवा है। ु आजकल दु:ख की एक नयी टकसाल खुल गई है और वह है जीवन समाम। जीवन-संग्राम। जिधर, देखिए, यही आवाज सुनाई देतो है। इस संग्राम में आप कियगी की सहानुभूति की, क्षमा की, प्रोत्साहन की, आशा नहीं कर सकते। सभी अपा अपने नख और दंत निकाले शिकार की ताक में बैठे हैं। उनकी क्षुघ्रा प्रभात महासागर से भी गहरी है, किसी तरह शांत नहीं होतो। काश, यह दिन चोबीस घंटो को वण! अड़तालीस घंटों का होता | इधर सूर्य निकला और उधर मशीन घली। फिर उह ! बजे गन से पहले नहीं बंद हो सकती -एक मिनट के लिए भी नहीं। नाश्ता खा: खड़े कीजिए, स्थ्राना दौटते -दौड़ते खाइए, मित्रों से मिलने का समय नहीं, फालव बात सुनने को फुरसत नहीं। मतलब को बात कहिए साहब, चटपट। समय का एक एक मिनट अशर्फी है मोती है, उसे व्यर्थ नहीं खो सकते। यह संग्राम क्री मनोवति परिचम से आई है, और ज़ड़े वेग से भारत मे फैल रही है। बड़े बड़े शहरों पर तो उसके अधिकार हो चुका है अब छोट छोटे शहगें और कस्बों में भी उसकी अमलदारी हा जाती हैं। मंदी, तेजी, बानार के उतार चढ़ाव, हिस्सों का घटना बढ़ना यटी जीव है। नींद में भी यही मंदी तेजी का स्वप्न देखते है। पुस्तक पढ़ने की किस साहा

जे

सितमा देगा लगे। उपन्यास कौन पढ़े, छोटो कहानियों से मनोरंजन बर लेत हैं। एक

यह खब्त भी है कि हम किसी क्षेत्र में किसो से पीछे न रहें। साहित्य और दर्शन और राजनीति, हर विषय में नयी बातें भी हमसे बचने न पायें। सुरुचि और सर्वज्ञता के प्रदर्शन के लिए नयी से नयी पुस्तकें तो मेज पर होनी ही चाहिए। किसी तरह उनका खुलासा मिल जाय तो क्या कहना, दस मिनट में किताब का लुब्धे -लुबाब मालूम हो जाय। आलोचना पढ़कर भी तो काम चल सकता है। इसीलिए लोग आलोचनाएं बड़े शौक से पढ़ते हैं। अब हम उन ग्रंथें पर अपनी राय देने के अधिकारी हैं। सभ्य समाज में कोई हमें मूर्ख नहीं कह सकता। इस भाग-दौड़ के जीवन में आनंद के लिए कहां स्थान हो सकता है? जीवन में सफलता अवश्य आनंद का एक अंग है। और बहुत ही महत्त्वपूर्ण अंग, लेकिन हमें उस तेज घोड़े को अपनी रानों के नीचे रखना चाहिए। यह नहीं कि वह हमें जिधर चाहे, लिए दौड़ता फिरे। जीवन को संग्राम समझना- यह समझना कि यह कंवल पहलवानों का अखाड़ा है और हम केवल अपने प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने के लिए ही संसार में आये हैं, उन्‍्माद है। इसका परिणाम यह होता है कि हमारी इच्छा तो बलवान हो जाती है लेकिन विचार और विवेक का सर्वनाश हो जाता है। इसका इलाज यह है कि हम संतोष औः, शांति का मूल्य समझें। जीवन का आनंद खोकर जो सफलता मिले वह वैसी ही है जेसे अपनी आंखों के सामने कोई ठ्माशा। सफलता का उद्श्य है आनंद। अगर सफलता से दुःख बढ़े, अशांति बढ़े, तो तह वास्तविक सफलता नहीं।

भविष्य को चिंता दुःरत्र का कारण ही नहीं, प्रधान कारण है। कल कहीं चल बसे तो क्‍या होगा? घर का कुछ भी इंतजाम न कर सके। मकान न बनवा सक। पोते का बिवाह भी न दस्खा। इधर हमने आंखें एंद कीं और उधर सारी गृहस्थी तीन तेरह हुई। लड़का उड़ाऊ है पैसे की कद्र नहीं करता, न जमाने का रुख देखता है। इस चिंता में अक्सर राता को नींद नहीं आती, जिसका स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़त है। ऐसी मनोवृत्ति नयी नयी शंकाओं की सृष्टि करने में निपुण होती है। दो- चार दिन खांसी आई तो तुरंत तपेदिक की शंका होने लगी दो-चार दिन का हल्का ज्वर आ गया तो शंका हुई जीर्ण ज्वर है। अगर जवानी में आंखें #'क गई हैं तो अब पाप की भावना हृदय जो दबाए हुए है। यही शंका लगी हुई है कि उस अपराध के दंडस्वरूप न जाने क्या क्या आफत आने वाली है। लड़का बीमार हुआ और मान- मनौती होने लगी। बस, वर्री दंड है। कसी बड़े मुकदमे में हारे और वहीं शक्का सिर पर सवार हुई। बस, यह सब उसी का फल हैं। इतना बाझ लकर बैतरणी केसे पार होगी। नरक को भीषण कल्पना खाना- पीना हराम किये देती है | इसका इलाज यहीं है कि आदमी हर विषय पर ठंडे मन से विचार करे, यहां तक कि उस पर उसके सारे पहलू रोशन हों जाएं। तुम क्यों समझते हो कि तुम्हार लड़के तुमसे ज्यादा नालायक होंगे? इसी तरह तुम्हारे बाप ने भो तो तुम्हे तालायक समझा था। पर तुम तो लायक हो गये और आज गृहस्थो को देखभाल मज से +7 रह हो। तुम्हारे बाद इसी तरह तुम्हारा लड़का भी घर बार संभाल लेगा। मुमकिन 2 तुममे ज्यादा चतुर निझऋल। और पाप ती केवल पंथों का ठकासला है। हमार

ममदाय में कोई शराबी नहीं, तमने पी ली तो पाप किया। क्‍यों पाप किया? करोड़ो

आदमी रोज पीते हैं, खुले खजाने पीते हैं। वे इसे पाप नहीं समझते, बल्कि उनकी निगाह में जो शराब न पीये वही पापी है। हमारे कुल में मांस खाना वर्जित है, हमने खा लिया तो पाप नहीं किया? पाप वही है जिससे अपना और दूसरों का अहित होता है। अगर शराब पीने से तुम्हारे सिर में दर्द होने लगता है या तुम बहककर गालियां बकने लगते हो, तो बेशक शराब पीना तुम्हारे लिए पाप है। अगर तुम शराब के पीछे बाल-बच्चों को खाने-पीने का कष्ट देते हो, बेशक शराब पोौना तुम्हारे लिए पाप है। उसे तुरंत छोड़ दो। इसी तरह मांस खाने से अगर तुम्हारे पेट में दर्द होने लगे तो वह तुम्हारे लिए वर्जित है। मांस ही क्‍यों दूध पीने से तुम्हारी पाचन-क्रिया बिगड़ जाय तो दुध भी तुम्हारे लिए वर्जित है। धर्म-अधर्म के मिथ्या विचारों में पड़कर, दैवी-दंड की कल्पनाएं करके, क्‍यों अपने को दुःखी करते हो? बाबा वाक्य की गुलामी-केवल इसलिए कि बाबा वाक्य है-चाहे कट्टर-पंथियों में तुम्हारा सम्मान बढ़ा दे, पर है मूर्खता। स्वयं विचार करो कि वास्तव में दुष्कर्म क्या है? अपने कारोबार में कांइयांपन, नौकरों से कटु व्यवहार, बाल- बच्चों पर अत्याचार, अपने सहवॉर्गियों से ईर्ष्या और द्वेष, प्रतिद्वन्द्रियों पर मिथ्या आरोप, बुरी नीयत, दगा- फरेब, यह सब वास्तव में दुष्कर्म हैं। जिनकी कानून में भी सजा नहीं, लेकिन जिससे मानव-समाज का सर्वनाश हो रहा है। मन में पाप की कल्पना का बैठ जाना हमारे आत्म-सम्मान को मिटा देता है और जब आत्म-सम्मान चला गया तो समझ लो कि बहुत कुछ चला गया। पापाक्रांत मन सदैव ईर्ष्या से जला करता है, सदैव दूसरों के लिए ऐब देखता रहता है, सदैव धर्म का ढोंग रचा करता है| जब तक वह दुसरों के पाप का पर्दा न खोल दे और अपनी धर्मपरायणता प्रमाणित न कर दे, उसको शांति नहीं।

हमारे दो-एक मित्र ऐसे हैं जिन्हें हमेशा यह फिक्र सताया करती है कि लोग उनसे जलते हैं, उनके लेखों की कोई प्रशंसा नहीं करता, उनकी पुस्तकों को बुरी आलोचनाएं होती हैं। अवश्य ही कुछ लोगों ने एक गुट बनाकर उनका अनादर करना ही अपना ध्येय बना लिया है। ऐसे आदमी सदैव दूसरों से ऐसे सशंक रहते हैं मानो वे खुफिया पुलिस हों। बस, जिसने उनकी प्रशंसा न की उसे अपना दुश्मन समझ लिया। इसका कारण इसके सिवा और क्या है कि वे अपने को उससे बड़ा आदमी समझते हैं जितने वे हैं। संसार को क्या गरज पड़ो है कि उनके पीछे हाथ धोकर पड़ जाय। हम अपनी रचना को अमूल्य समझें, इसका हमें अधिकार है, लेकिन दूध तो उसे तभी अमूल्य समझेंगे जब वह अमूल्य होगी। यह मनोवृत्ति जब बहुत बढ जाती है तब आदमी अपने लड़कों को ही अपना बैरी समझने लगता है। वह कदाचित्‌ आशा करता है कि उसके लड़के अपने लड़कों से ज्यादा उसका ख्याल रखें। यह अस्वाभाविक है किसी को यह अधिकार नहों कि तह किसी दुसरे को, चाह तह उसका लड़का ही क्‍यों न हो, उसे स्वाभाविक मार्ग से हटाकर अपने राह पर लगाए।


प्रकाशन इतिहास

[लेख। 'हंस', वैशाख, 1990 विक्रमी-संवत् (अप्रैल, 1933) में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "दुखी जीवन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1933, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/dukhi-jeevan. Accessed 22 Sep. 2026.