कांग्रेस का अधिवेशन समाप्त हो गया। हमें कुछ शंका थी, कि शायद गांधी-इरविन समझौते के विरोधी कुछ गुल न खिलाएं, पर वह शंका निर्मूल सिद्ध हुई। विरोधियों ने चेष्टा तो की कि महात्मा गांधी के विरुद्ध प्रदर्शन किया जाय, और काली झंडियां भी निकालीं, लेकिन महात्मा जी के प्रभाव के सामने उनकी कुछ चली नहीं। कांग्रेस ने बहुमत से देहली के समझौते का समर्थन किया और महात्मा जी के नेतृत्व में कांग्रेस प्रतिनिधियों का सम्मिलित होना निश्चित हो गया। सबसे अधिक प्रसन्नता हमें स्वराज्य की उस व्याख्या से हुई, जो कांग्रेस ने एक प्रस्ताव के रूप में मंजूर की है। उसने उन शंकाओं का शमन कर दिया, जो कांग्रेस की नीति के विषय में कुछ लोगों की थीं। अब कांग्रेस का ध्येय राष्ट्र के सामने है। वह गरीबों की संस्था है, गरीबों के हितों की रक्षा उसका प्रधान कर्तव्य है। उसके विधान में मजदूरों, किसानों और गरीबों के लिए वही स्थान है जो अन्य लोगों के लिए। वर्ग, जाति, वर्ण आदि के भेदों को उसने एकदम मिटा दिया है। हम कांग्रेस को इस प्रस्ताव के लिए बधाई देते हैं। स्वराज्य की इस व्याख्या को लाखों की संख्या में बाँटना चाहिए। ऐसा कोई घर न होना चाहिए जिसमें उसकी एक प्रति न हो। अब जनता को इस विषय में कोई संदेह न रहेगा कि वह किन स्वत्वों के लिए लड़ रही है, स्वराज्य से उसे क्या लाभ होगा और उसकी प्राप्ति का क्या मार्ग है!
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', मार्च, 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]
