Cover Image for Moteram Jee Shastri Ka Nairashya (मोटेराम जी शास्त्री का नैराश्य) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1928•18 मिनट

मोटेराम जी शास्त्री का नैराश्य

Moteram Jee Shastri Ka Nairashya

प्रेमचंद की कहानी 'मोटेराम जी शास्त्री का नैराश्य' पंडित मोटेराम की दावत की लालसा और अंततः घसीटे बनिये के घर ताला लगा मिलने पर हुई उनकी हास्यास्पद निराशा की कथा है।

पात्र:पंडित मोटेराम शास्त्री, पंडित चिंतामणि, घसीटे बनिया
स्थान:घसीटे की दुकान और पाठशाला

मोटेराम जी शास्त्री का नैराश्य का मूल पाठ

जिस तरह लोग नाई को ठाकुर, चमार को चौधरी और मेहतर को जमादार कहते हैं, उसी तरह घसीटे परचून वाले को लोग सेठ कहा करते थे। घसीटे खुद तो करिया अक्षर भैंस बराबर था, पर अन्य निरक्षर पिताओं की भाँति उसे भी अपने-लड़के को विद्या से अलंकृत करने की धुन लगी हुई थी। कई महीनों के कठिन परिश्रम के बाद उसने सौ तक गिनती सिखा दी थी, पर वर्णमाला सिखाने के लिए तो किसी गुरुजी का होना ज़रूरी था। कृपणता के कारण वह कई महीनों से इस समस्या को टालता आता था, पर आज उसने पाटी-पूजा करने का निश्चय कर लिया। साइत पहले ही पूछ रक्‍्खी थी। सेठानी से बोला, “पुजाई तो एक रुपया से कम न लगेगी।”

सेठानी, “एक रुपया क्‍यों लगेगी, कोई लूट पड़ी है ? तीन अच्छर बता देने का एक रुपया। किस पंडित के पास जावगे ?”

सेठ, “मेरे मन में तो मोटेराम जँचे हुए हैं। इस तरह तो और भी कई पण्डित हैं, पर मोटेराम की बात और है।”

सेठानी, “तो उनके लिए रुपए का क्या काम ? भर-पेट लड्डू खिला देना ।”

सेठ, “तो क्‍या लड़डू चार रुपये से कम खायेंगे ? इस तरह तो एक ही रुपया में पिण्ड छूट जायगा ।”

राय पक्की हो गयी। सेठानी ने बालक को नहलाया, कपड़े पहनाये, हाथों में सोने के चूड़े, कानों में बालियाँ, पाँवों में चाँदी के कड़े, माथे पर काजल का टीका लगा दिया। उधर सेठजी ने कुरता डाटा, पगड़ी बाँधी और सूखे हुए जूतों को पानी से नर्म करके उनमें पाँव हूँ? दिया। बालक ने उन्हें जूते पहनते देखा तो मचल पड़ा कि मुझे भी जूते ला दो। एक रुपए का प्रश्न तो सामने था ही, उस पर यह नयी जिद। सेठ जी को क्रोध आ गया। बालक को तमाचे लगाये और घसीटता हुआ गुरु-धाम की ओर ले चला।


2

देवताओं की उपासना कभी निष्फल नहीं जाती, फिर पं. मोटेराम जी की मनोकामना क्‍यों न पूरी होती। उनकी पहुँच तो देवताओं तक ही नहीं, उनकी देवियों तक थी। कभी साइत विचारने, कभी-कभी वर्ष-फल बनाने के लिए, कभी जायचों के मिलाने के लिए, कभी दुर्गा-याठ करने के लिए घरों में उनका बुलावा होता था और यह तो हम नहीं कह सकते कि पं. जी रसिक जीव थे या नहीं, उसकी स्थूलता रसिकता के अनुकूल न थी, पर सोना देवी ऐसे अवसरों पर बहुत प्रसन्‍न न होती थीं और पं. जी को चेतावनी दे दिया करती थीं कि ज़रा हाथ-पाँव सँभालते रहना। पं. जी इतने मधुर भाषी, इतने प्रसन्‍नमुख थे, और रमणियों को प्रसन्‍न करने के लिए इतने मन्त्र जानते थे कि उनके सामने और किसी पण्डित की दाल न गलतीं थी। इन्हीं कारणों से पण्डित जी एक पाठशाला में 30 रु0 मासिक के अध्यापक हो गए थे।

लेकिन अध्यापक हो जाने पर मोटेराम जी को एक नया अनुभव हुआ। अब छोटे-मोटे नेवतों को स्वीकार करते उन्हें संकोच होता था। ज्योंही वह शाला पहुँचते, उन्हें सारे शहर की रिपोर्ट मिलने लगतीं-कहाँ विद्यारम्भ है, कहाँ श्राद्ध है, कहाँ विवाह है। पण्डित जी अपने सुपुत्रों को प्रतनिधि बनाकर मन को समझा लेते थे। यह सम्मान और यह पद उन्हें बड़े महंगे दामों में मिला था। इसलिए वह कभी-कभी स्त्री से झुँअलाकर कहते, “मैं यह नौकरी छोड़ दूँगा। यह नौकरी है या कठोर-दण्ड ? इस तरह रोटी-दाल खाना पड़ा तो दो-चार साल में प्राण-पखेरू ही उड़ जायेंगे। अभी से कुछ झटक चला हूँ।” लेकिन सोना देवी उन्हें ऊँच-नीच सुझाकर शान्त करती रहती थीं। बेचारे मोटेरम अब स्वादिष्ट पदार्थों की चर्चा सुनकर ही मन को सन्तुष्ट कर लेते थे। आँसू कैवल इसलिए पुछ जाते थे कि यहाँ पण्डित जी को कोई काम न करना पड़ता था। ऊँची कक्षा के विद्यार्थी नीची कक्षा वालों को पढ़ा देते थे। पण्डित जी का काम केवल सर्वोच्च श्रेणी के एक विद्यार्थी को पढ़ाना था और वह विद्यार्थी पण्डित जी को बहुत कम कष्ट देता धा।

घसीटे जब पुत्र को कन्धे पर लिए शाला पहुँचे तो पण्डित जी मसनद लगाये, गद्दी पर लेटे हुए शिष्यों से अपनी गुदगुदी देह में मुक्कियाँ लगवा रहे थे। एक युवक उनके तलवे सहला रहा था। दो खड़े पंखा झल रहे थे और एक लड़का उनके सिर में तेल डाल रहा था। पण्डित जी लेटे-लेटे काव्य-साहित्य पर लेक्चर दे रहे थे, “जिस भाँति स्वाद में घट-रस हैं, उसी भाँति काव्य में नवरस हैं। स्वाद के रसों में जैसे मिष्ठ-रस सर्वप्रधान है, उसी भाँति काव्य के नी रसों में श्रृंगार सर्वश्रेष्ठ है। जिस भाँति मिष्ठ-रस के अन्तर्गत अनेकों पदार्थ हैं उसी भाँति श्रृंगार-रस के अन्तर्गत अनेकों नायिकाएँ हैं और जिस भाँति मिष्ठ-पदार्थों में मोतीचूर के लड़डू सर्वोत्तम हैं, उसी भाँति नायिकाओं में मुग्धा सर्वप्रधान है। मैं मुग्धा पर मुग्ध हूँ /” सहसा घसीटे ने भीतर आकर पंडित जी को साष्टांग दण्डवत की।

मोटे., “आशीर्वाद, आशीर्वाद ! कहो कैसे चले सेठ ! यह क्‍या छोटे सेठ हैं ?”

घसीटे, “हाँ महाराज, आपका गुलाम है। इसकी पाटी पुजाना चाहता हूँ।

मोटे., “हॉ-हाँ, अवश्य पुजाओ। विद्या से उत्तम कोई वस्तु नहीं।”

घसीटे, “तभी तो आपकी सरन आया हूँ, महाराज ! ऐसी कृपा कीजिए कि चार अच्छर पढ़ जाय ।”

मोटे.,, “गुरुजनों की दया चाहिए। केवल॑ कुछ खर्च करना पड़ेगा।”

घसीटे, “खरच करने को तो मैं तैयार हूँ महाराज !”

मोटे., “हाँ-हाँ, मैं जानता हूँ। चिन्तामणि जी, यहाँ तक कष्ट कीजिए। यह सेठ घसीटेमल जी हैं। इनके सुपुत्र का विद्यारम्भ होगा। इस शुभ अवसर पर यह गुरुजनों का सत्कार करना चाहते हैं।'

चिन्ता., “अहोभाग्य ! धन्य है, धन्य है ! ऐसे ही पुण्यात्माओं से तो सृष्टि थमी हुई है। नहीं तो यह पृथ्वी कब की रसातल चली गयी होती। तो सेठजी, कितने ब्राह्मणों को जिमाइयेगा ?”

मोटे., “सेठजी से आप व्यर्थ यह प्रश्न करते हैं। मुझसे सम्भाषण कीजिए, द्ादश की संख्या बहुत की मंगलमयी है।”

चिन्ता., “समझ गये सेठ जी ! बारह महात्माओं के जिमाने का प्रबन्ध कीजिए ।”

मोटे., “आप सामग्री का अनुमान कीजिए, सेठजी लक्ष्मी-५# हैं। कोई दस सेर अमिर्ती पर्याप्त होंगी।”

चिन्ता., “दस सेर ! इतनी तो मेरे को अकेले...”

मोटे., “मित्रवर, मिथ्या-भाषण वर्जित है। अच्छा कलाकन्द कितना चाहिए ?”

चिन्ता., “मुझे तो बोलने ही नहीं देते !!”

मोटे., “नहीं-नहीं ! इस विषय में आप अपने विचार सम्पूर्ण स्वाधीनता से प्रकट कर सकते हैं।”

चिन्ता., “मन भर कलाकन्द रखिए।”

मोटे. (हँसकर), “'नहीं-नहीं, हमें अपने यजमान पर इतना गुरुभार न डालना चाहिए। दस सेर कलाकन्द भी रख लीजिए |”

चिन्ता., “तो फिर तुम मेरे से क्यों पूछते हो ? न मालूम तुम्हारा क्या स्वभाव है कि जब कोई आखेट फैँंसता है, तो तुम उसे...”

मोटे., “व्यर्थ प्रजजलित न हो मित्रवर ! ऐसे दुष्कर कार्यों का सम्पादन करने के लिए बड़े अनुभव की आवश्यकता है। मोतीचूर के लट्ढू कितने हों ?”

चिन्ता., “मैं कुछ नहीं जानता ।”

मोटे., “रुष्ट न हो मित्रवर ! शपथ खाकर कहता हूँ, अबकी तुम्हारी प्रस्तावित मात्रा ही स्वीकार करूँगा |”

चिन्ता., “तो सेर भर रख लो।”

मोटे.,, “महान मूर्ख हो मित्रवर, इस देव-दुर्लभ पदार्थ का यह अपमान तुम जैसे सहदय पुरुष को शोभा नहीं देता। इसे बीस सेर रख लो |”

इस तरह आपस में एक तख़मीना बनाकर मोटेराम ने सेठ जी को सब ब्यौरा बता दिया। एक-एक रुपया दक्षिणा का प्रस्ताव भी किया। बेचारे घसीटे ने यह तख़मीना सुना तो चक्कर में आ गया। उसे तो एक ही रुपया अखर रहा था। बोला, “मेरी तो इतनी सामर्थ्य नहीं है ।”

मोटे., “ऐसा न कहो लक्ष्मी-पुत्र, ऐसा न कहो, भगवान ने तुम्हें सब-कुछ दिया है। तुम्हारा बालक बड़ा भागवान है, कुल का नाम करेगा। तो सब मूर्तियाँ आठ बजते-बजते पहुँच जायेंगी ।” ह

घसीटे, “महाराज, मैं तो बहुत...”

मोटे., “हॉँ-हाँ, प्रसन्‍नन होने की तो बात ही है। विप्रों तथा विद्वानों के चरण जहाँ जाते हैं, वह स्थान स्वर्ग-तुल्य हो जाता है।”

घसीटे, “महाराज, मुझसे तो कुछ कहते नहीं बनता। आपने मेरी दुकान तो देखी है, बिक्री-बद्या भी आजकल मन्दा है...”

मोटे.,, “इस पुण्य-कार्य से तुम्हारा सब दुख-दारिद्रय दूर हो जायगा। विप्रसेवा ही कल्पवृक्ष है। शीघ्र ही प्रबन्ध करना, हमें विलम्ब न होगा |”

बेचारा घसीटे फिर कुछ न कहने पाया, क्‍योंकि मोटेराम जी अपने विचार में उसे काफी तौर पर तैयार करके फिर काव्य-साहित्य पर वक्‍्तृता देने लगे।


3

नियत समय पर जब सब लोग भोजन करने चले तो मारे आनन्द के फूले न समाते थे। बारह की संख्या पूरी करने के लिए पाँच विद्यार्थियों को पाठशाला से ले लिया। सलाह हुई कि वेद-मन्त्र गाते हुए घसीटे के घर चलें। शास्त्री जी ने विद्यार्थियों को इस विषय में इतना अभ्यस्त कर दिया कि जो लोग शाले आ जाते वे संगीत सुनकर ही मुग्ध हो जाते थे। फिर उन्हें इस शाला से भक्ति हो जाती थी। इसी चाल से शास्त्री जी ने अच्छी ख्याति प्राप्त की थी। इस वक्त भी विद्यार्थियों का संगीत सुनकर खड़े हो-होकर देखने लगे। एक दर्शक ने कहा, “शास्त्री जी के दम का जलूसा है।

दूसरा बोला, “क्या बात है, जब से शास्त्री जी आए, पाठशाला के भाग जाग गए ।”

मकर नुक्कड़ के समीप पहुँचकर मोटेराम ने चिन्तामणि से कहा, “देखो, कुछ प्रकाश है

सामने !”

चिन्ता., “मुझे तो कोई प्रकाश नहीं दीखता ।”

मोटे., “है क्‍यों नहीं, तुम्हें सूझता ही नहीं। गैस का हण्डा जल रहा है। कुछ बोल-चाल सुनाई देती है न ?”

चिन्ता., “क्या जाने, मुझे तो सन्‍नाटा-सा मालूम होता है।”

मोटे., “तुम्हारा सिर ! मुझे तो आदमियों की बोल-चाल साफु सुनाई देती है। लो पहुँच ही गये। जी चाहता है दौड़कर अन्दर चला जाऊँ। जिस तरह विरह-पीड़ित नायक अपनी प्रेमिका के निकट पहुँच अधीर हो जाता है, उसी भाँति मेरा मन भी अधीर हो रहा है। मगर यह बात क्या है ? यहाँ तो सचमुच सन्नाटा है। शायद घर होगा ।”

चिन्ता., “द्वार खटखटाऊँ ? मगर यहाँ तो ताला पड़ा हुआ है।”

मोटेराम ने पड़ोस के दूकानदार से पूछा तो उसने कहा, “साँझ तक तो घर ही में थे । इस बखत की नहीं जानते । देखिए, होंगे घर ही में |”

पं. मोटेराम ने इतने जोर से किवाड़ खटखटाये कि सारा घर हिल उठा, किन्तु भीतर से कोई आवाज न आयी।

अलगू ने कहा, “ताला तोड़ डालूँ ?”

मोटे., “नहीं-नहीं, ताला न तोड़ो। सम्भव है, सामग्री लेने बाजार गया हो |”

दोनों पण्डित द्वार की चौखट पर जा बैठे। अन्य विद्यार्थी इधर-उधर टहलने लगे, मगर इस भाँति राह देखते-देखते पूरा एक घण्टा हो गया तो चिन्तामणि ने झुँझलाकर कहा, “मुझे तो मालूम होता है, दुष्ट ने धोखा दिया।”

मोटे., “हाँ, अब तो मुझे भी सन्देह होता है ।” |

चिन्ता., “इस समय दुष्ट मिल जाता तो गरदन दबा लेता। धूर्त ! अबे ओ घसीटे बनिये ! निकल बाहर ! कहाँ मुँह छिपाए बैठा है ?”

इस पर पाँचों विद्यार्थियों ने चिल्‍्ला-चिल्लाकर घसीटे को दुष्ट, पापी, चाण्डाल कहना शुरु किया।

अलगू, “ससुर के मुँह में कालिख लगी हुई है।””

चिन्ता., “ईश्वर करे, इसका सर्वनाश हो जाय ।”

भवानी, “मरेगा तो इसका जनम छछूँदर का होगा ॥'”

अलगू, “गधा होगा ससुर, रेंकता फिरेगा !!

मोटेराम चुपचाप बैठे थे। मारे क्रोध, लज्जा और आत्मवेशना के उनका सिर नीचे झुका हुआ था। अन्त में वह धीरे से उठे और बोले, “'तो अब चलना चाहिए ।”

अलगू, “कहिए तो इस घर में आग लगा दूँ ?”

भवानी, “पत्थर फेंका जाय ।"

मोटे., “नहीं बच्चा, यह ब्राह्मणों का कर्त्तव्य नहीं। उसकी नीचता का दण्ड उसे भगवान देंगे। हमने क्षमा किया।

यह कहते-कहते शास्त्री जी की आँखों में आँसू बहने लगे, अपने जीवन में वह कभी इतने लज्जित न हुए थे।

चिन्तामणि ने समझाया, “भैया, आप व्यर्थ दिल छोटा करते हैं। आपको चाहिए कि हम लोगों को समझायें, सो आप ही रोने लगे। ईश्वर ने जो भाग्य में लिखा है, वह तो पूरा होकर ही रहेगा, पर देख लीजिएगा इसकी कसर शीघ्र ही निकल जायगी ।”

मोटेराम ने आँसू पोंछते हुए कहा, “क्या कसर निकल जायगी मित्र ! यह घाव कभी न भरेगा। हम लोग भी कितने अभागे हैं कि भोजन के लिए दूसरों का मुँह ताकते हैं ! इस वक्‍त ऐसा जी चाहता है कि चाहे मर जाऊँ, पर पाठशाले की सूरत न देखूँ। जो प्राणी अपने पुरुषार्थ से इच्छानुसार भोजन भी न प्राप्त कर सके, उसका जीवन निरर्थक है। मैंने हुक्काम की जितनी खुशामद की, रईसों का जितना यश गाया, उसकी आधी लगन से कोई और काम करता तो आज आदमी बन गया होता। आज इस धूर्त घसीटे ने मेरी आँखें खोल दीं।”

चिन्ता., “देखो, आज सोना भाभी क्या कहती हैं !'

मोटे, “मेरे तो अभी से पाँव थरथरा रहे हैं। सच पूछो तो कहीं मुँह दिखाने योग्य नहीं रहा। सोना जीता न छोड़ेगी ।”

[प्रथम प्रकाशन हिन्दी में। 'समालोचक” (हिन्दी पत्रिका), मार्च-अप्रैल, 1928 में प्रकाशित। प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य” खण्ड-1 में संकलित |]


मोटेराम जी शास्त्री का नैराश्य का सारांश

'मोटेराम जी शास्त्री का नैराश्य' पंडित मोटेराम शास्त्री की भोजन-लोलुपता और अंत में मिले अप्रत्याशित धोखे की एक हास्यपूर्ण व विचारोत्तेजक कहानी है। घसीटे परचून वाला, जिसे लोग आदर से 'सेठ' कहते हैं, स्वयं अनपढ़ है लेकिन अपने बेटे को शिक्षित कराने का स्वप्न देखता है। वह अपने बेटे की पाटी-पूजा (विद्यारंभ संस्कार) कराने के लिए पंडित मोटेराम शास्त्री की पाठशाला में पहुँचता है। मोटेराम जी पाठशाला में तीस रुपये महीने के अध्यापक हैं, जहाँ वे शिष्यों से अपनी सेवा-टहल कराते हैं और काव्य-साहित्य के बहानों से दिन बिताते हैं। घसीटे को देखते ही मोटेराम और उनके सहयोगी पंडित चिंतामणि के मन में दावत का लोभ जाग उठता है।

चिंतामणि और मोटेराम मिलकर घसीटे पर भारी-भरकम खर्च लाद देते हैं। वे बारह ब्राह्मणों को जिमाने, दस सेर इमरती, दस सेर कलाकंद, बीस सेर मोतीचूर के लड्डू और एक-एक रुपया दक्षिणा का तखमीना तय कर देते हैं। कंजूस घसीटे अपनी असमर्थता और मंदी का रोना रोता है, किंतु मोटेराम उसे विप्र-सेवा का पुण्य और लक्ष्मी-कृपा का झांसा देकर चुप करा देते हैं और रात आठ बजे मंडली सहित आने का फरमान सुनाते हैं।

रात को नियत समय पर मोटेराम शास्त्री, चिंतामणि और पाठशाला के पाँच विद्यार्थियों की टोली बनाकर पूरे ठाठ-बाट और वेद-मंत्रों के गान के साथ घसीटे के घर की ओर प्रस्थान करते हैं। रास्ते भर लोग पंडितजी के जुलूस और प्रभाव की प्रशंसा करते हैं, जबकि मोटेराम के मन में विभिन्न मिठाइयों के स्वाद की कल्पना से उल्लास उमड़ रहा होता है। किंतु घसीटे के दरवाजे पर पहुँचते ही उनका सारा उत्साह ठंडा पड़ जाता है—घर के मुख्य द्वार पर बड़ा सा ताला लटका मिलता है और चारों तरफ सन्नाटा पसरा होता है। एक घंटे तक चौखट पर बैठकर प्रतीक्षा करने के बाद उन्हें यह कड़वा सच समझ में आता है कि घसीटे उन्हें चकमा देकर भाग खड़ा हुआ है।

भूखे और अपमानित विद्यार्थी तथा चिंतामणि घसीटे को गालियाँ और श्राप देने लगते हैं तथा घर में आग लगाने या ताला तोड़ने की बात करते हैं। किंतु इस बार मोटेराम उन्हें रोक देते हैं। सार्वजनिक अपमान और क्षुधा की इस घड़ी में मोटेराम की आँखें भर आती हैं। उन्हें पहली बार अपनी परजीवी प्रवृत्ति, मुफ्तखोरी और भोजन के लिए दूसरों का मुँह ताकने के जीवन पर गहरी आत्मग्लानि होती है। वे स्वीकार करते हैं कि यदि उन्होंने जीवन में रईसों और हुक्कामों की खुशामद करने के स्थान पर ईमानदारी से कोई परिश्रम किया होता, तो आज उनकी ऐसी दुर्दशा न होती। अंत में, घर लौटने पर पत्नी सोना देवी के तानों और उपहास के डर से भयभीत होते हुए वे भारी कदमों से विदा होते हैं।


प्रकाशन इतिहास

यह कहानी सर्वप्रथम हिंदी पत्रिका समालोचक में मार्च-अप्रैल 1928 में प्रकाशित हुई थी। बाद में यह प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित हुई।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • भोजन-लोलुपता और पुरोहित वर्ग पर व्यंग्य: कहानी में पुरोहित वर्ग की मुफ्त के पकवानों और अत्यधिक भोजन के प्रति लालसा को अत्यंत मनोरंजक ढंग से उजागर किया गया है, जहाँ यजमान की आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना उस पर भारी खर्च थोप दिया जाता है।
  • कंजूसी और धूर्तता की अंतःक्रिया: परचूनिया घसीटे अपनी कृपणता के कारण पंडितों के इस अनुचित दबाव का सामना सीधे न करके चालाकी से घर में ताला लगाकर भाग जाता है, जो सामाजिक अंतर्विरोधों का एक यथार्थवादी पहलू है।
  • दिखावे का आडंबर और प्रतिष्ठा का ढोंग: छात्रों के साथ वेद-मंत्रों का गायन करते हुए गाजे-बाजे की तरह दावत खाने जाना तत्कालीन समाज में धार्मिक और शैक्षणिक पदों के नाम पर किए जाने वाले दिखावे पर चोट करता है।
  • नैराश्य से उपजा आत्म-बोध: कहानी का सबसे प्रभावशाली मोड़ वह है जब भारी अपमान के बाद मोटेराम को अपनी परजीविता और कर्महीनता का पश्चाताप होता है। यह नैराश्य उन्हें अपने व्यर्थ जीवन और झूठी खुशामद की व्यर्थता का साक्षात्कार कराता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'मोटेराम जी शास्त्री का नैराश्य' हास्य और करुणा के अनूठे मेल की कहानी है। यह केवल एक पेटू पंडित की फजीहत का किस्सा नहीं है, बल्कि श्रम के महत्व, स्वावलंबन और सामाजिक परजीविता के खोखलेपन का एक गंभीर आईना है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "मोटेराम जी शास्त्री का नैराश्य." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1928, https://munshipremchand.com/works/short-stories/moteram-jee-shastri-ka-nairashya. Accessed 22 Sep. 2026.