वासना की कड़ियां का मूल पाठ
बहादुर, भाग्यशाली कासिम मुलतान की लड़ाई जीतकर घमंड़ के नशे से चूर चला आता था। शाम हो गयी थी, लश्कर के लोग आरामगाह की तलाश मे नजरें दौड़ाते थे, लेकिन कासिम को अपने नामदार मालिक की खिदमत में पहुंचन का शौक उड़ाये लिये आता था। उन तैयारियों का खयाल करके जो उसके स्वागत के लिए दिल्ली में की गयी होंगी, उसका दिल उमंगो से भरपूर हो रहा था। सड़कें बन्दनवारों और झंडियों से सजी होंगी, चौराहों पर नौबतखाने अपना सुहाना राग अलापेंगे, ज्योंहि मैं सारे शहर के अन्दर दाखिल हूँगा। शहर में शोर मच जाएगा, तोपें अगवानी के लिए जोर—शोर से अपनी आवाजें बूलंद करेंगी। हवेलियों के झरोखों पर शहर की चांद जैसी सुन्दर स्त्रियां अॉखें गड़ाकर मुझे देखेंगी और मुझ पर फूलों की बारिश करेंगी। जड़ाऊ हौदों पर दरबार के लोग मेरी अगवानी को आयेंगे। इस शान से दीवाने खास तक जाने के बद जब मैं अपने हुजुर की खिदमत में पहुँचूँगा तो वह बॉँहे खोले हुए मुझे सीने से लगाने के लिए उठेंगे और मैं बड़े आदर से उनके पैरों को चूम लूंगा। आह, वह शुभ घड़ी कब आयेगी? कासिम मतवाला हो गया, उसने अपने चाव की बेसुधी में घोड़े को एड़ लगायी।
कासिम लश्कर के पीछे था। घोड़ा एड़ लगाते ही आगे बढा, कैदियों का झुण्ड पीछे छूट गया। घायल सिपाहियों की डोलियां पीछे छूटीं, सवारों का दस्ता पीछे रहा। सवारों के आगे मुलतान के राजा की बेगमों और मैं उन्हें और शहजादियों की पनसें और सुखपाल थे। इन सवारियों के आगे—पीछे हथियारबन्द ख्वाजासराओं की एक बड़ी जमात थी। कासिम अपने रौ में घोड़ा बढाये चला आता था। यकायक उसे एक सजी हुई पालकी में से दो आंखें झांकती हुई नजर आयीं। क्रासिंग ठिठक गया, उसे मालूम हुआ कि मेरे हाथों के तोते उड़ गये, उसे अपने दिल में एक कंपकंपी, एक कमजोरी और बुद्धि पर एक उन्माद—सा अनुभव हुआ। उसका आसन खुद—ब—खुद ढ़ीला पड़ गया। तनी हुई गर्दन झुक गयी। नजरें नीची हुईं। वह दोनों आंखें दो चमकते और नाचते हुए सितारों की तरह, जिनमें जादू का—सा आकर्षण था, उसके आदिल के गोशे में बैठीं। वह जिधर ताकता था वहीं दोनों उमंग की रोशनी से चमकते हुए तारे नजर आते थे। उसे बर्छी नहीं लगी, कटार नहीं लगी, किसी ने उस पर जादू नहीं किया, मंतर नहीं किया, नहीं उसे अपने दिल में इस वक्त एक मजेदार बेसुधी, दर्द की एक लज्जत, मीठी—मीठी—सी एक कैफ्रियत और एक सुहानी चुभन से भरी हुई रोने की—सी हालत महसूस हो रही थी। उसका रोने को जी चाहता था, किसी दर्द की पुकार सुनकर शायद वह रो पड़ता, बेताब हो जाता। उसका दर्द का एहसास जाग उठा था जो इश्क की पहली मंजिल है।
क्षण—भर बाद उसने हुक्म दिया आज हमारा यहीं कयाम होगा।
आधी रात गुजर चुकी थी, लश्कर के आदमी मीटी नींद सो रहे थे। चारों तरफ मशालें जलती थीं और तिलासे के जवान जगह—जगह बैठे जम्हाइयां लेते थे। लेकिन कासिम की आंखों में नींद न थी। वह अपने लम्बे—चौड़े पुरलुत्फ खेमे में बैठा हुआ सोच रहा था क्या इस जवान औरत को एक नजर देख लेना कोई बड़ा गुनाह है? माना कि वह मुलतान के राजा की शहजादी है और मेरे बादशाह अपने हरम को उससे रोशन करना चाहते हैं लेकिन मेरी आरजू तो सिर्फ इतनी है कि उसे एक निगाह देख लूँ और वह भी इस तरह कि किसी को खबर न हो। बस। और मान लो यह गुनाह भी हो तो मैं इस वक्त वह गुनाह करूँगा। अभी हजारों बेगुनाहों को इन्हीं हाथों से कत्ल कर आया हूँ। क्या खुदा के दरबार में गुनाहों की माफी सिर्फ इस लिए हो जाएगी कि बादशाह के हुक्म से किये गये? कुछ भी हो, किसी नाजनीन को एक नजर देख लेना किसी की जान लेने से बड़ा गुनाह नहीं। कम से कम मैं ऐसा नहीं समझता।
कासिम दीनदार नौजवान था। वह देर तक इस काम के नैतिक पहलू पर गौर करता रहा। मुलतान को फतेह करने वाला हीरो दूसरी बाधाओं को क्यों खयाल में लाता?
उसने अपने खेमे से बाहर निकलकर देखा, बेगमों के खेमे थोड़ी ही दूर पर गड़े हुए थे। कासिम ने तजान—बूझकर अपना खेमा उसके पास लगाया था। इन खेमों के चारों तरफ कई मशालें जल रही थीं और पांच हब्शी ख्वाजासरा रंगी तलवारें लिये टहल रहे थे। कासिम आकर मसनद पर लेट गया और सोचने लगा इन कम्बख्तों को क्या नींद न आयेगी? और चारों तरफ इतनी मशाले क्यों जला रक्खी हैं? इनका गुल होना जरूरी है। इसलिए पुकारा मसरूर।
—हुजुर, फरमाइए?
—मशालें बुझा दो, मुझे नींद नहीं आती।
—हुजूर, रात अंधेरी है।
—हां।
—जैसी हुजूर की मर्जी।
ख्वाजासरा चला गया और एक पल में सब की सब मशालें गुल हो गयीं, अंधेरा छा गया। थोड़ी देर में एक औरत शहजादी के खेमे से निकलकर पूछा—मसरूम, सरकमार पूछती हैं, यह मशालें क्यों बुझा दी गयीं?
मशरूम बोला—सिपहदार साहब की मर्जी। तुम लोग होशियार रहना, मुझे उनकी नियत साफ नहीं मालूम होती।
कासिम उत्सुकता से व्यग्र होकर कभी लेटता था, कभी उठ बैठता था, कभी टहलने लगता था। बार—बार दरवाजे पर आकर देखता, लेकिन पांचों ख्वाजासरा देंवों की तरह खडें नजर आते थे। कासिम को इस वक्त यही धुन थी कि शाहजादी का दर्शन क्योंकर हो। अंजाम की फिक्र, बदनामी का डर और शाही गुस्से का खतरा उस पुरजोर ख्वाहिश के नीचे दब गया था।
घडियाल ने एक बजाया। कासिम यों चौकं पड़ा गोया कोई अनहोनी बात हो गयी। जैसे कचहरी में बैठा हुआ कोई फरियाद अपने नाम की पुकार सुनकर चौंक पड़ता है। ओ हो, तीन घंटों से सुबह हो जाएगी। खेमे उखड़ जाएगें। लश्कर कूच कर देगा। वक्त तंग है, अब देर करने की, हिचकचाने की गुंजाइश नहीं। कल दिल्ली पहुँच जायेंगे। आरमान दिल में क्यों रह जाये, किसी तरह इन हरामखोर ख्वाजासराओं को चकमा देना चाहिए। उसने बाहर निकल आवाज दी—मसरूर।
——हुजूर, फरमाइए।
——होशियार हो न?
—हुजूर पलक तक नहीं झपकी।
—नींद तो आती ही होगी, कैसी ठंड़ी हवा चल रही है।
—जब हुजूर ही ने अभी तक आराम नहीं फरमाया तो गुलामों को क्योंकर नींद आती।
—मै तुम्हें कुछ तकलीफ देना चाहता हूँ।
—कहिए।
—तुम्हारे साथ पांच आदमी है, उन्हें लेकर जरा एक बार लश्कर का चक्कर लगा आओ। देखो, लोग क्या कर रहे हैं। अक्सर सिपाही रात को जुआ खेलते हैं। बाज आस—पास के इलाकों में जाकर खरमस्ती किया करते हैं। जरा होशियारी से काम करना।
मसरूर— मगर यहां मैदान खाली हो जाएगा।
कासिम— मे तुम्हारे आने तक खबरदार रहूँगा।
मसरूर— जो मर्जी हुजूर।
कासिम— मैने तुम्हें मोतबर समझकर यह खिदमत सुपुर्द की है, इसका मुआवजा इंशाअल्ला तुम्हें साकर से अता होगा।
मसरूम ने दबी जबान से कहा—बन्दा आपकी यह चालें सब समझता है। इंशाअल्ला सरकार से आपको भी इसका इनाम मिलेगा। और तब जोर बोला—आपकी बड़ी मेहरबानी है।
एक लम्हें में पॉँचों ख्वाजासरा लश्कर की तरफ चले। कासिम ने उन्हें जाते देखा। मैदान साफ हो गया। अब वह बेधड़क खेमें में जा सकता था। लेकिन अब कासिम को मालूम हुआ कि अन्दर जाना इतना आसान नहीं है जितना वह समझा था। गुनाह का पहलू उसकी नजर से ओझल हो गया था। अब सिर्फ जाहिरी मुश्किलों पर निगाह थी।
कासिम दबे पांव शहजादी के खेमे के पास आया, हालांकि दबे पांव आने की जरूरत न थी। उस सन्नाटे में वह दौड़ता हुआ चलता तो भी किसी को खबर न होती। उसने खेमे से कान लगाकर सुना, किसी की आहट न मिली। इत्मीनान हो गया। तब उसने कमर से चाकू निकाला और कांपते हुए हाथों से खेमे की दो—तीन रस्सियां काट डालीं। अन्दर जाने का रास्ता निकल आया। उसने अन्दर की तरफ झांका। एक दीपक जल रहा था। दो बांदियां फर्श पर लेटी हुई थीं और शहजादी एक मखमली गद्दे पर सो रही थी। कासिम की हिम्मत बढ़ी। वह सरककर अन्दर चला गया, और दबे पांव शहजादी के करीब जाकर उसके दिल—फरेब हुस्न का अमृत पीने लगा। उसे अब वह भय न था जो खेमे में आते वक्त हुआ था। उसने जरूरत पड़ने पर अपनी भागने की राह सोच ली थी।
कासिम एक मिनट तक मूरत की तरह खड़ा शहजादी को देखता रहा। काली—काली लटें खुलकर उसके गालों को छिपाये हुए थी। गोया काले—काले अक्षरों में एक चमकता हुआ शायराना खयाल छिपा हुआ था। मिट्टी की अस दुनिया में यह मजा, यह घुलावट, वह दीप्ति कहां? कासिम की आंखें इस दृश्य के नशे में चूर हो गयीं। उसके दिल पर एक उमंग बढाने वाला उन्माद सा छा गया, जो नतीजों से नहीं डरता था। उत्कण्ठा ने इच्छा का रूप धारण किया। उत्कण्ठा में अधिरता थी और आवेश, इच्छा में एक उन्माद और पीड़ा का आनन्द। उसके दिल में इस सुन्दरी के पैरों पर सर मलने की, उसके सामने रोने की, उसके कदमों पर जान दे देने की, प्रेम का निवेदन करने की , अपने गम का बयान करने की एक लहर—सी उठने लगी वह वासना के भवंर मे पड़ गया।
कासिम आध घंटे तक उस रूप की रानी के पैरो के पास सर झुकाये सोचता रहा कि उसे कैसे जगाऊँ। ज्यों ही वह करवट बदलती वह ड़र के मारे थरथरा जाता। वह बहादुरी जिसने मुलतान को जीता था, उसका साथ छोड़े देती थी।
एकाएक कसिम की निगाह एक सुनहरे गुलाबपोश पर पड़ी जो करीब ही एक चौकी पर रखा हुआ था। उसने गुलाबपोश उठा लिया और खड़ा सोचता रहा कि शहजादी को जगाऊँ या न जगाऊँ या न जगाउँ? सेने की डली पड़ी हुई देखकर हमं उसके उठाने में आगा—पीछा होता है, वही इस वक्त उसे हो रहा था। आखिरकार उसने कलेजा मजबूत करके शहजादी के कान्तिमान मुखमंण्डल पर गुलाब के कई छींटे दिये। दीपक मोतियों की लड़ी से सज उठा।
शहजादी ने चौंकर आंखें खोलीं और कासिम को सामने खड़ा देखकर फौरन मुंह पर नकाब खींच लिया और धीरे से बोली—मसरूर।
कासिम ने कहा—मसरूर तो यहां नही है, लेकिन मुझे अपना एक अदना जांबाज खादिम समझिए। जो हुक्त होगा उसकी तामील में बाल बराबर उज्र न होगा।
शहजादी ने नकाब और खींच लिया और खेमे के एक कोने में जाकर खड़ी हो गयी।
कासिम को अपनी वाक् शक्ति का आज पहली बार अनुभव हुआ। वह बहुत कम बोलनेवाला और गम्भीर आदमी था। अपने हृउय के भावों को प्रकट करने में उसे हमेशा झिझक होती थी लेकिन इस वक्त शब्द बारिश की बूंदो की तरह उसकी जबान पर आने लगे। गहरे पानी के बहाव में एक दर्द का स्वर पैदा हो जाता है। बोला—मैं जानता हूँ कि मेरी यह गुस्ताखी आपकी नाजुक तबियत पर नागवार गुजरी है। हुजूर, इसकी जो सजा मुनाशिब समझें उसके लिए यह सर झुका हुआ है। आह, मै ही वह बदनसीब, काले दिल का इंसान हूँ जिसने आपके बुजुर्ग बाप और प्यारे भाईंयों के खून से अपना दामन नापाक किया है। मेरे ही हाथों मुलतान के हजारो जवान मारे गये, सल्तनत तबाह हो गयी, शाही खानदान पर मुसीबत आयी और आपको यह स्याह दिन देखना पडा। लेकिन इस वक्त आपका यह मुजरिम आपके सामने हाथ बांधे हाजिर है। आपके एक इशारे पर वह आपके कदमों पर न्योठावर हो जायेगा और उसकी नापाक जिन्दगी से दुनिया पाक हो जायेगी। मुझे आज मालूम हुआ कि बहादुरी के परदे में वासना आदमी से कैसे—कैसे पाप करवाती है। यह महज लालच की आग है, राख में छिपी हुईं सिर्फ एक कातिल जहर है, खुशनुमा शीशे में बन्द! काश मेरी आंखें पहले खुली होतीं तो एक नामवर शाही खानदान यों खाक में न मिल जाता। पर इस मुहब्बत की शमा ने, जो कल शाम को मेरे सीने में रोशन हुई, इस अंधेरे कोने को रोशनी से भर दिया। यह उन रूहानी जज्बात का फैज है, जो कल मेरे दिल में जाग उठे, जिन्होंने मुझे लाजच की कैद से आजाद कर दिया।
इसके बाद कासिम ने अपनी बेकरारी और दर्दे दिल और वियोग की पीड़ा का बहुत ही करूण शदों में वर्णन किया, यहां तक कि उसके शब्दों का भण्डार खत्म हो गया। अपना हाल कह सुनाने की लालसा पूरी हो गयी।
लेकिन वह वासना बन्दी वहां से हिला नहीं। उसकी आरजुओं ने एक कदम और आगे बढाया। मेरी इस रामकहानी का हासिल क्या? अगर सिर्फ दर्दे दिल ही सुनाना था, तो किसी तसवीर को, सुना सकता था। वह तसवीर इससे ज्यादा ध्यान से और खामाशी से मेरे गम की दास्तान सुनती। काश, मैं भी इस रूप की रानी की मिठी आवाज सुनता, वह भी मुझसे कुछ अपने दिल का हाल कहती, मुझे मालूम होता कि मेरे इस दर्द के किस्से का उसके दिल पर क्या असर हुआ। काश, मुझे मालूत होता कि जिस आग में मैं फुंका जा रहा हूँ, कुछ उसकी आंच उधर भी पहुँचती है या नहीं। कौन जाने यह सच हो कि मुहब्बत पहले माशूक के दिल में पैदा होती है। ऐसा न होता तो वह सब्र को तोड़ने वाली निगाह मुझ पर पड़ती ही क्यों? आह, इस हुस्न की देवी की बातों में कितना लुत्फ आयेगा। बुलबुल का गाना सुन सकता, उसकी आवाज कितनी दिलकश होगी, कितनी पाकीजा, कितनी नूरानी, अमृत में डूबीं हुई और जो कहीं वह भी मुझसे प्यार करती हो तो फिर मुझसे ज्यादा खुशनसीब दुनिया में और कौन होगा?
इस खयाल से कासिम का दिल उछलने लगा। रगों में एक हरकत—सी महसूस हुई। इसके बावजूद कि बांदियों के जग जाने और मसरूर की वापसी का धड़का लगा हुआ था, आपसी बातचीत की इच्छा ने उसे अधीर कर दिया, बोला—हुस्न की मलका, यह जख्मी दिल आपकी इनायत की नजर की मुस्तहक है। कुड़ उसके हाल पर रहम न कीजिएगा?
शहजादी ने नकाब की ओट से उसकी तरफ ताका और बोली जो खुद रहम का मुस्तहक हो, वह दूसरों के साथ क्या रहम कर सकता है? कैद में तड़पते हुए पंछी से, जिसके न बोल हैं न पर, गाने की उम्मीद रखना बेकार है। मैं जानती हूँ कि कल शाम को दिल्ली के जालिम बादशाह के सामने बांदियों की तरह हाथ बांधे खड़ी हूंगी। मेरी इज्जत, मेरे रूतबे और मेरी शान का दारोमदार खानदानी इज्जत पर नहीं बल्कि मेरी सूरत पर होगा। नसीब का हक पूरा हा जायेगा। कौन ऐसा आदमी है जो इस जिन्दगी की आरजू रक्खेगा? आह, मुल्तान की शहजादी आज एक जालिम, चालबाज, पापी आदमी की वासना का शिकार बनने पर मजबूर है। जाइए, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए। मैं बदनसीब हूँ, ऐसा न हो कि मेरे साथ आपको भी शाही गुस्से का शिकार बनना पड़े। दिल मे कितनी ही बातें है मगर क्यों कहूँ, क्या हासिल? इस भेद का भेद बना रहना ही अच्छा है। आपमें सच्ची बहादुरी और खुद्दारी है। आप दुनिया में अपना नाम पैदा करेंगे, बड़े—बड़े काम करेगें, खुदा आपके इरादों में बरकत दे यही इस आफत की मारी हुई औरत की दुआ है। मैं सच्चे दिल से कहती हूँ कि मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है। आज मुझे मालूम हुआ कि मुहब्बत बैर से कितनी पाक होती है। वह उस दामन में मुंह छिपाने से भी परहेज नहीं करती जो उसके अजीजों के खून से लिथड़ा हुआ हो। आह, यह कम्बख्त दिल उबला पड़ता है। अपने काल बन्द कर लीजिए, वह अपने आपे में नहीं है, उसकी बातें न सुनिए। सिर्फ आपसे यही बिनती है कि इस गरीब को भूल न जाइएगा। मेरे दिल में उस मीठे सपने की याद हमेशा ताजा रहेगी, हरम की कैद में यही सपना दिल को तसकीन देता रहेगा, इस सपने को तोडिए मत। अब खुदा के वास्ते यहां से जाइए, ऐसा न हो कि मसरूर आ जाए, वह एक जालिम है। मुझे अंदेशा है कि उसने आपको धोखा दिया, अजब नहीं कि यहीं कहीं छुपा बैठा हो, उससे होथियार रहिएगा। खुदा हाफिज!
कासिम पर एक बेसुधी की सी हालत छा गयी। जैसे आत्मा का गीत सुनने के बाद किसी योगी की होती है। उसे सपने में भी जो उम्मीद न हो सकती थी, वह पूरी हो गयी थी। गर्व से उसकी गर्दन की रगें तन गयीं, उसे मालूम हुआ कि दुनिया में मुझसे ज्यादा भाग्यशाली दूसरा नहीं है। मैं चाहूँ तो इस रूप की वाटिका की बहार लूट सकता हूँ, इस प्याले से मस्त हो सकता हूँ। आह वह कितनी नशीली, कितनी मुबारक जिन्दगी होती! अब तक कासिम की मुहब्बत ग्वाले का दूध थी, पानी से मिली हुईय शहजादी के दिल की तड़प ने पानी को जलाकर सच्चाई का रंग पैदा कर दिया। उसके दिल ने कहा—मैं इस रूप की रानी के लिए क्या कुछ नहीं कर सकता? कोई ऐसी मुसीबत नहीं है जो झेल न सकूँ, कोई आग नहीं, जिसमें कूद न सकूं, मुझे किसका डर है! बादशाह का? मैं बादशाह का गुलाम नहीं, उसके सामने हाथ फैलानेवाला नहीं, उसका मोहताज नहीं। मेरे जौहर की हर एक दरबार में कद्र हो सकती है। मैं आज इस गूलामी की जंजीर को तोड़ डालूँगा और उस देश में जा बसूँगा, जहां बादशाह के फरिश्ते भी पर नहीं मार सकते। हुस्न की नेमत पाकर अब मुझे और किसी चीज की इच्छा नहीं। अब अपनी आरजुओं का क्यों गला घोटूं? कामनाओं को क्यों निराशा का ग्रास बनने दूँ? उसने उन्माद की—सी स्थिति में कमर से तलवार निकाली और जोश के साथ बोलादृजब तक मेरे बाजूओ में दम है, कोई आपकी तरफ आंख उठाकर देख भी नहीं सकता। चाहे वह दिल्ली का बादशाह ही क्यो ने हो! मैं दिल्ली के कूचे और बाजार में खून की नदी बहा दुंगा, सल्तनत की जड़े हिलाउ दुँगा, शाही तख्त को उल्ट—पलट रख दूँगा, और कुछ न कर सकूंगा तो मर मिटूंगा। पर अपनी आंखो से आपकी याह जिल्लत न देखूँगा।
शहजादी आहिस्ता—आहिस्ता उसके करीब आयी बोली—मुझे आप पर पूरा भरोसा है, लेकिन आपको मेरी खातिर से जब्त और सब्र करना होगा। आपके लिए मैं महलहरा की तकलीफें और जुल्म सब सह लूंगी। आपकी मुहब्बत ही मेरी जिन्दगी का सहारा होगी। यह यकीन कि आप मुझे अपनी लौंडी समझते हैं, मुझे हमेशा सम्हालता रहेगा। कौन जाने तकदीर हमें फिर मिलाये।
कासिम ने अकड़कर कहा—आप दिल्ली जायें ही क्यों! हम सबुह होते—होते भरतपुर पहुँच सकते हैं।
शहजादीदृमगर हिन्दोस्तान के बाहर तो नहीं जा सकते। दिल्ली की आंख का कांटा बनकर मुमकिन है हम जंगलों और वीरानों में जिन्दगी के दिन काटें पर चौन नसीब न होगा। असलियत की तरफ से आंखे न बन्द की जिए, खुदा न आपकी बहादुरी दी है, पर तेगे इस्फहानी भी तो पहाड़ से टकराकर टुट ही जाएगी।
कासिम का जोश कुछ धीमा हुआ। भ्रम का परदा नजरों से हट गया। कल्पना की दुनिया में बढ़—बढ़कर बातें करना बाते करना आदमी का गुण है। कासिम को अपनी बेबसी साफ दिखाई पड़ने लगी। बेशक मेरी यह लनतरानियां मजाक की चीज हैं। दिल्ली के शाह के मुकाबिलें में मेरी क्या हस्ती है? उनका एक इशारा मेरी हस्ती को मिटा सकता है। हसरत—भरे लहजे में बोला—मान लीजिए, हमको जंगलो और बीरानों में ही जिन्दगी के दिन काटने पड़ें तो क्या? मुहब्बत करनेवाले अंधेरे कोने में भी चमन की सैर का लुफ्त उठाते हैं। मुहब्बत में वह फकीरों और दरवेशों जैसा अलगाव है, जो दुनिया की नेमतों की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखता।
शहजादी मगर मुझ से यह कब मुमकिन है कि अपनी भलाई के लिए आपको इन खतरों में डालूँ? मै शाहे दिल्ली के जुल्मों की कहानियां सुन चुकी हूँ, उन्हें याद करके रोंगेटे खड़े हो जाते हैं। खुदा वह दिन न लाये कि मेरी वजह से आपका बाल भी बांका हो। आपकी लड़ाइयों के चर्चे, आपकी खैरियत की खबरे, उस कैद में मुझको तसकीन और ताकत देंगी। मैं मुसीबते झेलूंगी और हंसदृहंसकर आग में जलूँगी और माथे पर बल न आने दूँगी। हॉँ, मै शाहे दिल्ली के दिल को अपना बनाऊँगी, सिर्फ आपकी खातिर से ताकि आपके लिए मौका पड़ने पर दो—चार अच्छी बातें कह सकूँ।
लेकिन कासिम अब भी वहां से न हिला। उसकर आरजूएं उम्मीद से बढ़कर पूरी होती जाती थीं, फिर हवस भी उसी अन्दाज से बढ़ती जाती थी। उसने सोचा अगर हमारी मुहब्बत की बहार सिर्फ कुछ लमहों की मेहमान है, तो फिर उन मुबारकबाद लमहों को आगे की चिन्ता से क्यों बेमजा करें। अगर तकदीर में इस हुस्न की नेमत को पाना नहीं लिखा है, तो इस मौके को हाथ से क्यों जाने दूँ। कौन जाने फिर मुलाकात हो या न हो? यह मुहब्बत रहे या न रहें? बोला—शहजादी, अगर आपका यही आखिरी फैसाल है, तो मेरे लिए सिवाय हसरत और मायूसी के और क्या चारा है? दूख होगा, कुढूंगा, पर सब्र करूंगा। अब एक दम के लिए यहां आकर मेरे पहलू में बैठ जाइए ताकि इस बेकरार दिल को तस्कीन हो। आइए, एक लमहे के लिए भूल जाएं कि जुदाई की घड़ी हमारे सर पर खड़ी है। कौन जाने यह दिन कब आयें? शान—शौकत गरीबों की याद भूला देती है, आइए एक घड़ी मिलकर बैठें। अपनी जल्फो की अम्बरी खुशबू से इस जलती हुई रूह को तरावट पहुँचाइए। यह बांहें, गलो की जंजीरे बने जाएं। अपने बिल्लौर जैसे हाथों से प्रेम के प्याले भर—भरकर पिलाइए। सागर के ऐसे दौर चलें कि हम छक जाएं! दिलो पर सुरूर को ऐसा गाढ़ा रंग चढ़े जिस पर जुदाई की तुर्शियों का असर न हो। वह रंगीन शराब पिलाइए जो इस झुलसी हुई आरजूओं की खेती को सींच दे और यह रूह की प्यास हमेशा के लिए बुझ जाए।
मए अगवानी के दौर चलने लगे। शहजादी की बिल्लौरी हथेली में सुर्ख शराब का प्याला ऐसा मालूम होता था जैसे पानी की बिल्लौरी सतह पर कमल का फूल खिला हो कासिम दीनो दुनिया से बेखबर प्याले पर प्याले चढ़ाता जाता था जैसे कोई डाकू लूट के माल पर टूटा हुआ हो। यहां तक कि उसकी आंखे लाल हो गयीं, गर्दन झुक गयी, पी—पीकर मदहोश हो गया। शहजादी की तरफ वसाना—भरी आंखो से ताकता हुआ। बाहें खोले बढा कि घडियाल ने चार बजाये और कूच के डंके की दिल छेद देनेवाली आवाजें कान में आयीं। बाँहें खुली की खुली रह गयीं। लौडियां उठ बैठी, शहजादी उठ खड़ी हुई और बदनसीब कासिम दिल की आरजुएं लिये खेमे से बाहर निकला, जैसे तकदीर के फैलादी पंजे ने उसे ढकेलकर बाहर निकाल दिया हो। जब अपने खेमे में आया तो दिल आरजूओं से भरा हुआ था। कुछ देर के बाद आरजुओं ने हवस का रूप भरा और अब बाहर निकला तो दिल हरसतों से पामाल था, हवस का मकड़ी—जाल उसकी रूह के लिए लोहे की जंजीरें बना हुआ था।
शाम का सुहाना वक्त था। सुबह की ठण्डी—ठण्डी हवा से सागर में धीरे धीरे लहरें उठ रही थीं। बहादुर, किस्मत का धनी कासिम मुलतान के मोर्चे को सर करके गर्व की मादिरा पिये उसके नशे में चूर चला आता था। दिल्ली की सड़के बन्दनवारों और झंडियों से सजी हुई थीं। गुलाब और केवड़े की खुशब चारों तरफ उड़ रही थी। जगह—जगह नौबतखाने अपना सुहाना राग गया। तोपों ने अगवानी की घनगरज सदांए बुलन्द कीं। ऊपर झरोखों में नगर की सुन्दरियां सितारों की तरह चमकने लगीं। कासिम पर फूलों की बरखा होने लगी। वह शाही महल के करीब पहुँचार तो बड़े—बड़े अमीर—उमरा उसकी अगवानी के लिए कतार बांधे खड़े थे। इस शान से वह दीवाने खास तक पहुँचा। उसका दिमाग इस वक्त सातवें आसमान पर था। चाव—भरी आंखों से ताकता हुआ बादशाह के पास पहुँचा और शाही तख्त को चूम लिया। बादशाह मुस्काराकर तख्त से उतरे और बांहें खोले हुए कासिम को सीने से लगाने के लिए बढ़े। कासिम आदर से उनके पैरों को चूमने के लिए झुका कि यकायक उसके सिर पर एक बिजली—सी गिरी। बादशाह को तेज खंजर उसकी गर्दन पर पड़ा और सर तन से जुदा होकर अलग जा गिरा। खून के फौवारे बादशाह के कदमो की तरफ, तख्त की तरफ और तख्त के पीछे खड़े होने वाले मसरूर की तरफ लपके, गोया कोई झल्लाया हुआ आग का सांप है।
घायल शरीर एक पल में ठंडा हो गया। मगर दोनों आंखे हसरत की मारी हुई दो मूरतों की तरह देर तक दीवारों की तरफ ताकती रहीं। आखिर वह भी बन्द हो गयीं। हवस ने अपना काम पूरा कर दिया। अब सिर्फ हसरत बाकी थी। जो बरसों तक दीवाने खास के दरोदीवार पर छायी रही और जिसकी झलक अभी तक कासिम के मजार पर घास—फूस की सूरत में नजर आती है।
वासना की कड़ियां का सारांश
'वासना की कड़ियां' मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित एक अत्यंत कारुणिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित कहानी है, जो अनियंत्रित वासना, क्षणिक मोह और कर्तव्यपथ से विचलन के कारण एक पराक्रमी सेनापति के दुखद पतन को रेखांकित करती है।
कहानी का मुख्य पात्र कासिम दिल्ली सल्तनत का एक अत्यंत बहादुर और भाग्यशाली सेनापति है। वह मुल्तान की भीषण लड़ाई जीतकर विजय के गर्व में चूर दिल्ली लौट रहा होता है। रास्ते में वह कल्पना करता है कि दिल्ली में उसका कैसा भव्य स्वागत होगा—नौबतखाने बजेंगे, तोपों की सलामी दी जाएगी, झरोखों से सुंदर स्त्रियां फूल बरसाएंगी और खुद बादशाह उठकर उसे गले लगाएंगे। परंतु लौटते समय उसकी दृष्टि बंदी बनाई गई मुल्तान की खूबसूरत शहजादी की आंखों पर पड़ती है और वह उसके जादू में पूरी तरह सम्मोहित हो जाता है।
शहजादी के प्रति उपजी तीव्र वासना और मोह के कारण कासिम लश्कर को वहीं रुकने का हुक्म देता है। रात के अंधेरे में शाही गुस्से और बदनामी के डर को भुलाकर वह ख्वाजासरा मसरूर और पहरेदारों को धोखे से गश्त पर भेज देता है तथा मशालें बुझाकर चोरी-छिपे शहजादी के खेमे में प्रवेश कर जाता है। वह शहजादी के सामने बैठकर प्रेम का निवेदन करता है, अपने कत्लेआम पर दुख जताता है और बादशाह के खिलाफ बगावत तक की बात सोचता है।
तत्पश्चात्, कासिम शहजादी के हाथों से मदिरा के प्याले पीकर पूरी तरह बेसुध हो जाता है। जैसे ही वह वासना में अंधा होकर शहजादी को बांहों में भरने आगे बढ़ता है, कूच का घड़ियाल (४ बजे) बज उठता है और उसे अतृप्त आकांक्षाओं के साथ बाहर निकलना पड़ता है।
अगले दिन जब कासिम दिल्ली के 'दीवाने खास' पहुँचता है, तो उसकी कल्पना के अनुसार ही भव्य स्वागत होता है। बादशाह मुस्कुराते हुए तख्त से उतरते हैं और कासिम को गले लगाने के लिए बांहें फैलाते हैं। जैसे ही कासिम आदर से बादशाह के कदम चूमने झुकता है, बादशाह अपनी तेज कटार से एक ही वार में कासिम का सिर धड़ से अलग कर देते हैं। ख्वाजासरा मसरूर (जिसने रात की घटना की खबर बादशाह को दे दी थी) तख्त के पीछे खड़ा होता है। इस प्रकार, क्षणिक वासना के जाल ने एक महान सेनापति की संपूर्ण विजय और जीवन का दुखद अंत कर दिया।
प्रकाशन इतिहास
प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- वासना का विनाशकारी प्रभाव: कहानी दर्शाती है कि कैसे क्षणिक कामुकता और वासना व्यक्ति के विवेक, कर्तव्य और सालों के पराक्रम को एक ही पल में नष्ट कर देती है।
- कर्तव्य और वासना के बीच द्वंद्व: कासिम एक वीर सेनापति है, परंतु वासना के वशीभूत होकर वह अपने नैतिक मूल्यों, अनुशासन और स्वामीभक्ति की उपेक्षा कर बैठता है।
- सत्ता और राजनीति की निष्ठुरता: कहानी में दिल्ली के बादशाह और ख्वाजासरा मसरूर का पात्र यह उजागर करता है कि राजसत्ता में लेशमात्र भी अविश्वास या अनुशासनहीनता क्षमा योग्य नहीं होती।
- अतृप्त लालसा की त्रासदी: प्रेमचंद ने कासिम की अतृप्त वासना को 'लोहे की जंजीरों' और 'लोभ के जाल' के रूप में चित्रित किया है, जो मनुष्य को उसकी मृत्यु तक जकड़े रखती है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'वासना की कड़ियां' प्रेमचंद की एक सशक्त ऐतिहासिक-मनोवैज्ञानिक कहानी है जो यह चेतावनी देती है कि विवेक और आत्म-नियंत्रण के बिना प्राप्त की गई बड़ी से बड़ी विजय भी विनाश में बदल सकती है।
