Cover Image for Gori Jatiyon Ka Prabhav Kyon Kam Ho Raha Hai (गोरी जातियों का प्रभाव क्यों कम हो रहा है) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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सम्पादकीय•1931•6 मिनट

गोरी जातियों का प्रभाव क्यों कम हो रहा है

Gori Jatiyon Ka Prabhav Kyon Kam Ho Raha Hai

लॉर्ड इरविन के कथन के संदर्भ में भारत में गोरी जातियों और पश्चिमी साम्राज्यवाद के नैतिक व सांस्कृतिक पतन के कारणों का प्रेमचंद द्वारा गहरा विश्लेषण।

Work Details

प्रकार: सम्पादकीय
वर्ष: 1931
पठन समय: 6 मिनट (868 शब्द)

लॉर्ड इरविन से किसी ने हाल में एक जलसे में पूछा—'अंग्रेजों के प्रति भारतवासियों को इतना अविश्वास और अप्रतिष्ठा कब से हुई है और इसके क्या कारण हैं?' इसका लॉर्ड इरविन ने जो उत्तर दिया, वह विचार करने योग्य है। आपने फ़रमाया—'गोरी जातियों की प्रतिष्ठा तो उसी वक्त उठ गयी जब जापान ने रूसियों पर विजय पायी। दूसरा कारण है, यूरोपीय महासमर में भारतवासियों का सम्मिलित होना और सिनेमा का भारत में प्रचार।' इसका अर्थ यह है कि भारतवासियों को ज्यों-ज्यों गोरों के आंतरिक जीवन का परिचय मिलता जाता है, गोरों का प्रभाव मिटता जाता है। महासमर ने इतना ही नहीं सिद्ध कर दिया कि पुरुषार्थ और साहस में भारतवाले गोरों से जौ भर भी कम नहीं हैं, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि गोरे न्याय और धर्म और नीति और शिष्टता के पुतले नहीं हैं, जैसे वह भारत में बन जाते हैं। चाहिए तो था कि गोरों का रण-कौशल, उनका महान् संघटन, उनका दैविक धैर्य, उनकी नीति-परायणता और उदारता देखकर भारतवाले दिल में उनके कायल हो जाते, पर ऐसा नहीं हुआ। भारतवालों ने देखा कि यह लोग भी हमारे ही जैसी दुर्बलताओं से भरे हुए मनुष्य हैं, जो संकट पड़ने पर धर्म को ताक पर रख देते हैं, जो विजय पाने के लिए अनीति और अनाचार के पिशाच बन जाते हैं, जो नीच स्वार्थ के प्रवाह में सद्भावों को भूल जाते हैं। सारांश यह कि जिन गुणों के बल पर गोरे दूसरों पर राज करते हैं, उनमें से एक भी मौजूद नहीं और भारत में उनका जो रूप नज़र आता है, वह बना हुआ है।

चरित्र-बल से ही एक जाति दूसरी जाति पर आतंक जमा सकती है। पशुबल से स्थायी प्रभाव नहीं पड़ सकता। भारतवासियों ने देखा कि यह चरित्र-बल गौरांगों में नाम को भी नहीं है। किसी जाति का चरित्र उसके गिने-गिनाये महापुरुषों के आचरण से नहीं सिद्ध होता, बल्कि जन-साधारण के व्यवहार से। जिन देशों की जनता शराब को पानी की भाँति पीती हो, चाय को जीवन का आधार समझती हो, वह बहुत संस्कृत नहीं हो सकती। लड़ाइयों में जब गोरे लोग विजय पा जाते हैं, तो पराजितों के साथ कितना अमानुषीय व्यवहार करते हैं, यह जानी हुई बात है। भारत में तो गोरे सोल्जरों का यह हाल है कि जिस इलाके में इनका पड़ाव पड़ जाता है, वहाँ स्त्रियों का राह चलना बंद हो जाता है। सीधे बोलना तो वह जानते ही नहीं। गोरे ही क्यों, हमारे सिविलियनों का भी यही हाल है। वह इतने मगरूर, इतने विनयशून्य, इतने अक्खड़ होते हैं, कि कोई शरीफ हिन्दुस्तानी गला दबने ही पर उनसे मुलाकात करने जाता है। उनसे मिलने में भारतवालों को ऐसा अनुमान होता है कि वह अपनी आत्मा का खून कर रहे हैं। उनके सत्संग से शुभ प्रभाव लेकर तो शायद ही कोई लौटता हो। जो मिलता है, वह तीसमारखाँ बना हुआ, ऐसा रूप बनाये हुए, मानो वह अभी आकाश से उतरा है। महासमर ने इस भ्रम का निवारण कर दिया। भारतीयों को गोरों के साथ मिलने का, सोने का, बरतने का अवसर मिला और उन्होंने गोरों को जितना ही अंदर से देखा, उतनी उन्हें अश्रद्धा होती गयी।

मगर सिनेमा ने तो परदा और भी फ़ाश कर दिया। जो ढका हुआ था, वह भी खुल गया। महासमर में तो पन्द्रह लाख से ज्यादा आदमी नहीं गये, सिनेमा तो इससे कहीं ज़्यादा आदमी नित्य देखते हैं। हालाँकि कोशिश की जाती है कि यूरोप और अमेरिका के अच्छे ही फिल्म भारत में आयें। फिल्मों का नियमित रूप से सेंसर होता है, एक बाकायदा महकमा ही इस काम के लिए खुला हुआ है। अभी हाल में सिनेमा इन्क्वायरी कमेटी तहकीकात कर चुकी है, लेकिन फिर भी जो फिल्म आते हैं, उनका असर यह होता है कि भारतीयों को गोरे जीवन के कुछ ऐसे दृश्य देखने में आते हैं कि उनके दिल में उस जाति के प्रति घृणा-भाव उत्पन्न होते हैं। और यह उस जाति का हाल है, जो दुनिया को तहज़ीब सिखाने का दावा करती है। उसी जाति की एक मिस मेयो आकर भारतीय जीवन के कुछ कलुषित अंगों की तस्वीर खींचती है तो गोरी जातियों को रोमांच होने लगता है। अगर गोरों का जीवन आदर्श होता, उसमें ऐसी खूबियाँ होतीं कि दूसरों के दिल में उससे भक्ति और सम्मान का संचार होता; तो उसका यह उल्टा असर क्यों होता?

पर बात यह नहीं है। गोरों ने आदि से ही प्रेम के बल पर नहीं, आतंक के बल पर संसार पर प्रभुत्व जमाया है। वह कालों की नज़रों से अपने ऐबों को छिपाकर अपनी नीतिमत्ता की साख बिठाये हुए थे और अब आधुनिक आविष्कारों ने उस परदे का ढका रहना मुश्किल कर दिया है। एक दिन था, जब भारतवाले गोरों को देवता समझते थे। तब आमद-ओ-रफ़्त की इतनी सुविधाएं न थीं और गौरांगों को अपने काले दागों का छिपाना आसान था, पर अब वह दाग छिपाये नहीं छिपते, बल्कि उल्टे और स्पष्ट हो रहे हैं। गोरी जातियों को अब अगर कालों की प्रतिष्ठा का पात्र बनना है तो परदे में छिपकर नहीं, स्वामी बनकर नहीं, भाई बनकर ही सम्भव है। पश्चिमी सभ्यता का दिवाला हो रहा है। एक दूसरे महासमर के बादल मंडला रहे हैं। अगर भविष्यवाणी सत्य निकली तो संसार में उस सभ्यता की यादगार केवल मिलों के टूटे-फूटे चिह्न और संसार के कोष में संघर्ष का सिद्धांत मात्र रह जायेंगे।


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', जून, 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "गोरी जातियों का प्रभाव क्यों कम हो रहा है." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/gori-jatiyon-ka-prabhav-kyon-kam-ho-raha-hai. Accessed 22 Sep. 2026.