इसमें कोई संदेह नहीं कि ईसाई धर्म और पश्चिमी सभ्यता से जिंदगी की खुशियों और सांसारिक सुख-सुविधाओं में बहुत कुछ वृद्धि हुई है और इन सुख-सुविधाओं का शुक्रिया दुनिया काफी तौर पर जबान से नहीं अदा कर सकती। शिक्षा, शारीरिक रोगों का उपचार, अनाथों की सहायता इत्यादि कामों को पश्चिमी सभ्यता ने जोर पहुंचाया है, इससे कोई सच्चाई पसंद आदमी इंकार नहीं कर सकता। मगर जब यह कहा जाता है कि ईसाई धर्म के अबतरित होने से पहले यह सारी बातें हरेक दूसरे मजहब में गायब थीं या नाममात्र के लिए थीं तो यह जरूरी मालूम होता है कि इस गलत खयाल को उचित और प्रामाणिक वृत्तांतों और युक्तियों से काटा जाए। भौतिक सुख -सुविधाओं और ऐश्वर्य की दृष्टि से हिन्दुओं की प्राचीन सभ्यता का पलड़ा संभव है हलका दिखाई पड़े। मगर आध्यात्मिक और नैतिक संपदाओं और आत्मोत्सर्ग तथा सहानुभूति की प्रेरणाओं की दृष्टि से हिन्दू कौम जिस शिखर पर पहुंच गई थी वहां तक कोई पश्चिमी कौम नहीं पहुंच सकी और न उसके वर्तमान रंग-ढंग से यह आशा की जा सकती है कि वह भविष्य में भी इस शानदार सफलता के नजदीक पहुंच सकेगी। वह ईसाई कौम जो बेजबान और बेकसूर जानवरों के मारने को जिंदगी की जरूरतों में दाखिल समझती है, जिसमें कम-से-कम पंचानबे आदमियों को खुराक गोश्त है, जिस पश्चिमी कौम ने पशुओं की कितनी ही जातियों को दुनिया के पर्दे से मिटा दिया और जो अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अमरीका में हब्शियों के
साथ ऐसी कायरों-जैसी क्रूरता से पेश आ रही है वह अपनी बाजू की क़ूवत, अपनी ताकत और अन्य भौतिक उपलब्धियों पर चाहे जितना घमंड करे, मगर जब वह इतने पर संतोष न करके बुलंद आवाज से पुकारती है कि अस्पताल, मदरसे, जानवरों के अस्पताल वगैरह ईसाई सभ्यता के आने के बाद अस्तित्व में आए तो वह तथ्यों के घेरे से बाहर हो जाती है। भौतिकता पश्चिमी सभ्यता की आत्मा है। अपनी जरूरतों को बढ़ाना और सुख-सुविधाओं के लिए आविष्कार इत्यादि करना, अपने नफे के लिए दूसरों के जान-माल की परवाह न करना-यह पश्चिमी सभ्यता की विशेषताएं हैं। जीवन के हर क्षेत्र में व्यापार के नियम को लागू करना और नफे या नुकसान के खयाल को एक क्षण के लिए भी आंख से ओझल न होने देना यह पश्चिमी सभ्यता के लक्षण हैं। यह सभ्यता स्वार्थ और लाभ को एक क्षण के लिए भी भूल नहीं .'कती। अगर वह कभी उदारता करती है तो उसकी उदारता अलिफ-लैला के उस देव जैसी उदारता होती है जो आदमियों को पकड़कर कैद करता और बादाम खिलाता था ताकि उनके शरीर पर गोश्त चढे और वह गोश्त ज्यादा मजेदार और मात्रा में अधिक हो। मगर हिन्दुओं ने अपने धार्मिक और आध्यात्मिक आदर्शों को सांसारिकता से दुर रखकर केवल नैतिकता और आध्यात्मिकता के आधार पर जन- साधारण की समृद्धि, लोकहित और मानव कष्टों और आपदाओं को दूर करने में जितनी सफलताए प्राप्त की थीं उन्हें आज की परिचमी सभ्यता ईर्ष्या की दृष्टि से देख सकती है। इन कोशिशों में हम जरूरत से ज्यादा लग गये। नेतिक बंधनों की पाबंदियों में अपने व्यक्ति और स्वार्थ की परवाह न की और इन्हीं कारणों ने हमको दुर्बल और दरिद्र बना दिया। वहां हम जहां कहीं चूके हैं, सच्चाई कौ दिशा में चूके हैं। हम आज उस दरिद्र व्यक्ति के समान हैं जिसने अपनी सारी सम्पदा अच्छे कामों में खर्च कर दी हो। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि पर हम आपत्ति कर सक्कते हैं मगर उसके ऊंचे आदर्श, उसकी दानशीलता, उसके आत्मोत्सर्ग और उसके चारित्रिक साहस से इंकार नहीं कर सकते। लेकिन पश्चिम के विद्वानों और इतिहासकारों की दृष्टि की संकीर्णता और अनुचित राष्ट्र-गौरव उन्हें यह नहीं स्वीकार करने देता कि प्राचीन काल में हिन्दुओं ने मनुष्य और पशु दोनों ही के शारीरिक कष्टों को दूर करने और उनके साथ सहानुभूति का बर्ताव करने में दुनिया के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। हाल की एक अंग्रेजी पुस्तक में जो यूरोप में बहुत पसंद की गयी है विद्वान लेखक लिखता है, 'यह खयाल रखना चाहिए कि हिन्दोस्तान के शानदार धार्मिक संप्रदाय, चाहे वह हिन्दू हों या बौद्ध या मुसलमान, उन्हें इन परोपकारी, उदार और सहानुभूतिशील कार्यों का बिल्कुल पता न था जो ईसाइयत की अपनी विशेषता हैं। उनके चिकित्सालय, अनाथालय और औषधालय कहां हैं? कोढ़ के मरीजों, अंधों, गूंगों और बहरों के लिए घर कहां हैं? इन धर्मों की समाज-व्यवस्था में इन चीजों की दखल नही है।' इसी तरह एनसाइक्लोपीडिया ब्रिर्टानका में जो एक जानी मानी प्रामाणिक पुस्तक है और जो इस बात का दावा करती है कि वह योरोपियनों की जानकारी का भंडार है, उसमें भी इन्हीं विचारों को व्यक्त किया गया है--'संभव है कि प्राचीनकाल में यात्रियों और पर्यटकों कौ सुविधा के लिए सराएं बनाई जाती हों लेकिन इस बात में संदेह है कि
उस जमाने में रोगियों के कष्ट दूर करने के लिए ऐसे खैराती अस्पताल भी थे जो ईसाई मजहब के साथ-साथ दिखाई दिए।' इन दो उद्धरणों से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई कि इस बारे में योरोपियन विद्वानों के क्या विचार हैं। यह एक स्वाभाविक बात है कि धन-संपदा के अंतिम शिखर तक पहुंची हुई योरोपियन कौमें किसी दूसरी कौम की, जिसे अब वह नीची दृष्टि से देख रही हैं, प्राचीन महत्ता को स्वीकार न करें और इस खयाल में डूबे रहें कि दुनिया में जो कुछ शिक्षा और संस्कृति, रोशनी और तरक्की है वह सब उन्हीं के प्रयत्नों का फल है। इसलिए उनसे इस बारे में निष्पक्ष होकर न्याय कर सकने की आशा करना व्यर्थ है। मगर ऐसा होता है कि हम भी योरोपियन दावों को अपने अज्ञान के कारण आंख बंद करके स्वीकार कर लेते हैं और इस तरह अपनी कौम के पुराने कारनामों और मौजूदा खूबियों पर ठीक से कोई राय कायम नहीं करते बल्कि खुद अपने आपको धिकक्कारने लगते हैं। नीचे की पंक्तियों में पाठकों के सामने वह प्रमाण प्रस्तुत किए जाएंगे जिनसे इस योरोपियन दावे का खंडन होता है और जिनसे यह बात प्रमाणित हो जाती है कि वह तमाम साधन और योजनाएं जो कि ईसाइयों की उदरता के कारण यूरोप में दिखाई दे रही हैं वह ईसाई धर्म के जन्म से हजारों वर्ष पहले हिन्दोस्तान में भी किसी न किसी सूरत में मौजूद थीं और हिन्दू संस्कृति का एक आवश्यक अंग समझी जाती थीं। यह प्रमाण हम ज्यादातर सोलोन के इतिहास से लेंगे जिसने न सिर्फ सभ्यता को ग्रहण कर लिया था बल्कि उसको खूब उजागर भी किया था। यह बात आंख के सामने रखनी चाहिए कि यूरोप में लोकहित की ये योजनाएं, बावजूद इसके कि बाइबिल में गरीबों की मदद और अनाथों की सहायता पर विशेष रूप से जोर दिया गया है, दसवीं सदी के पहले बिलकुल गायब थीं। सोलहवीं सदी तक यह काम धार्मिक संस्थाओं के हाथ में रहा और इस वक्त तक उसमें कुछ ज्यादा तरक्की न हुई। अठारहवीं और उनन्नीसवीं सदी में यूरोप ने इन साधनों को इकट्ठा करने में जो आरचर्यजनक और प्रशंसनीय प्रयत्न किए हैं वह धार्मिकता के प्रभाव से नहीं बल्कि साधारण सभ्यता के प्रभाव से और यह वजह है कि पादरियों और वेैरागियों के हाथ में इस काम को उन्नति नहीं प्राप्त हुई।
सीलोन का इतिहास प्रमाण देता है कि अकाल और सूखे से पैदा करने वाली तकलीफों को दूर करने के लिए वहां पुराने जमाने में बहुत बड़े पैमाने पर इंतजाम किए गए थे। इसके बार में अभी स्पष्ट और सबल ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं और इस बात को स्वीकार करने में कुछ कहने-सुनने के लिए स्थान नहीं है कि इस अच्छे काम में हिन्दुओं ने जो व्यवस्थाएं को थों वह पश्चिमी उदारता की कल्पना से भो बाहर हैं। हजारों झीलें, हजारों तालाब बीस से पचास मील तक के घेरे में बनाए गए थे जिनमें इतना पानी भरा रहता था कि अगर लगातार कई साल तक बारिश ने हो तब भी मुसीबत का सामना न करना पड़े। यह कोशिश की जाती थी कि आसमान से जितना पानी जमीन पर आए उसकी एक बूंद भी बेकार समुद्र में न जाने पाए। सब पानी जमीन पर कृत्रिम साधनों से रोक लिया जाता था, और यह सारी कोशिशें धर्म के लोकहितक्लारी पक्ष का परिणाम थीं। आजकल की पश्चिमी कौमों की तरह
वह लोग इन नेक कामों को इजाफा लगान या किसी और व्यावसायिक विचार के साथ लपेटते न थे। सीलोन का प्रसिद्ध इतिहासकार मिस्टर टेंट सीलोन के अपने इतिहास में लिखता है कि 'सीलोन के अगले बादशाहों ने सिंचाई के लिए ऐसे बड़े और इतने ज्यादा तालाब बनवाए थे कि आज उन पर विश्वास करना कठिन है।' आनरेबुल जार्ज टर्नर ने जो सीलोन सिविल सर्विस में एक ऊंचे ओहदे पर थे, सीलोन का एक बहुमूल्य इतिहास लिखा है। वह कहते हैं, 'सीलोन के बादशाहों ने पानी के ऐसे बड़े-बड़े खजाने और सिंचाई के ऐसे विस्तृत साधन एकत्रित किए थे कि यद्यपि अब वह बहुत बुरी हालत में पड़े हुए हैं, मगर उनकी लंबाई-चौड़ाई और घेरा देखकर योरोपियन पर्यटक आरचर्य के दांतों तले उंगली दबाते हैं। और इतना ही नहीं, परती जमीन को खेती के काबिल बनाने और कृषि को उन्नत करने में भी उन्होंने आइचर्यजनक प्रयत्त किए थे और यह समस्त पवित्र कार्य धर्म की प्रेरणा पर आधारित था। हिन्दू धर्म ने लोकमंगल और आचार की संस्कृति, स्वार्थ और परमार्थ दोनों का ऐसा समन्वय कर दिया हे कि एक कदम आगे बढ़ाना और दुसरे पहलू को नजर से ओझल कर देना नामुमकिन है। मिस्टर टेंट कहते हैं, 'कालावापी तालाब के खंडहर साबित करते हैं कि उसका घेरा चालीस मील से किसी तरह कम न होगा। बारह मील लंबा तो सिर्फ बांध था। यह झील राजा धातुसेन ने चौथी सदी में बनवाई थी।' सिंहली इतिहास 'राज-रत्नाकर' में इतिहासकार लिखता है कि राजा महासेन ने 'मनहरी ' नाम की झील बनवाई। उसके पानी से बीस हजार धान के खेतों की सिंचाई होती थी। सीलोन में चावल को पैदावार बढाने के लिए इस राजा ने गुलगामी, सालूरा, काला, महामन्या, सोक्रम, रतमल, कादू और इनके अलावा पच्चीस और बड़े-बड़े तालाब बनवाए।' गरज यह है कि सिंचाई के साधन जुटाने में हिन्दुओं की उदारता ने जो प्रयत्न किए और जो नतीजे हासिल किए उनकी मिसाल दुनिया के किसो दूसरे हिस्खे में मिलनी कठिन है। मिस्टर टेंट कहते हैं, राजा पराक्रमबाहु ने खेती को बहुत लाभ पहुंचाया। उसने एक हजार चार सो सत्तर तालाब सीलोन के विभिन्न भागों में बनवाए जिनमे से तोन इतने बड़े थे कि उन्हें पराक्रम-सागर के नाम से याद करते थे। उसने तीन सो तालाब सिर्फ साधू-संतों के लिए बनवाए। इनके अलावा नदियों को बांधकर उसने छोटी-बड़ी पांच सौ चौंतीस नहरें निकालीं और तीन हजार चार सौ इक्कीस पुरान तालाबों की मरम्मत करवाई।' ऐसे निर्माणों की यह संख्या वास्तव में आश्चर्यजनक है। इससे उन सुंदर प्रयत्नों का अंदाजा किया जा सकता है जो सीलोन के हिन्दू राजाआ ने बारहवीं सदो में खेती को उन्नत करने के लिए किये थे। कितनी आबादी को इन साधनों से लाभ पहुंचता था और कितनी जमीन की सिंचाई इससे होती थी, इसका अंदाजा करना मुश्किल है। हजारों झोलें अब भी इस्तेमाल में आ रही हैं हालांकि वह टूट-फूट गई हैं और ब्रेमरम्मत हैं। टूटी-फूटी झीलों की संख्या कहीं ज्यादा हें। जहां किसी जमाने में सुनहरी खेती लहराती थी वहां अब घना जंगल है और पाच हजार से ज्यादा तालाब सूखे पड़े हें।
आनरेबुल एलफ्रेड डीकन जो आस्ट्रेलियन कामनवेल्थ के प्रधानमंत्री थे, और हिन्दोस्तान में सिंचाई के साधनों की जांच-पड़ताल के लिए तशरीफ लाए थे, अपनी
किताब 'हिन्दोस्तान की आबपाशी ' में जो सन् 893 में प्रकाशित हुई थी कहते हैं कि 'सीलोन में सिंचाई का रिवाज हजारों वर्ष से है और ऐसे लंबे-चौडे पैमाने पर कि इस द्वीप को लंबाई-चोौड़ाई और पानी इकट्ठा करने की दिक्कत के लिहाज से सचमुच उस पर अचंभा होता है। इन झीलों को बनाने में जिस मौलिक सूझ-बूझ का परिचय दिया गया है और इन झीलों की कल्पनातीत लंबाई-चौड़ाई आज के इंजीनियरों के लिए एक न सुलझने वाली गुत्थी है। जब यह कोशिशें सीलोन में इस दर्जे पर पहुंची हुई थीं तो कोई अजब नहीं कि बकौल मिस्टर डीकन, 'मद्रास के सूबे में कुओं के अलावा साठ हजार से ज्यादा तालाब और पानी के खजाने हैं, जहां बारिश का पानी गर्मी के मौसम की जरूरतों के लिए जमा किया जाता था। उनकी लंबाई-चौड़ाई अलग-अलग है और अंदाजा किया गया है कि अगर सूबे भर के तालाबों के बांध एक कतार में खड़े कर दिए जाएं तो वह धरती के घेरे के चारों तरफ छ: फट ऊंची दीवार बनाने के बाद आधे बाकी रह जाएंगे। इन आश्चर्यों के स्रोत हिन्दुओं के धार्मिक विश्वास थे। इन विश्वसनीय प्रमाणों से पाठकों के समक्ष यह बात अच्छी तरह स्पष्ट हो गई होगी कि सिंचाई के लिए नहरें बनाने और तालाब बनथाने में हिन्दुओं ने कैसी शानदार व्यवस्था से काम लिया था। मगर हमारा अभिप्राय इन निर्माणों की विशालता और संख्या पर जोर देना या हिन्दुओं की इंजीनियरों या निर्माण कला की प्रशंसा करना नहीं है। हमारा अभिप्राय केवल ये दिखलाना है कि हिन्दू धर्म ने सिंचाई और कृषि को भी, पश्चिमी सभ्यता के विपरीत, अपने लोक-हितकारी कार्यक्रम का एक जरूरी अंग समझ लिया था। और है भी ऐसा ही क्योंकि फाकाकशी और भूख के मर्ज से ज्यादा तकलीफदेह और कोई मर्ज नहीं योता।
हिन्दुओं की उदारता केवल सिंचाई तक सीमित न थी। शारीरिक रोगों के उपचार क॑ लिए भी, चाहे वह मनुष्य हो या पशु, हिन्दुओं ने उसी व्यापक सहानुभूति और असीम प्रेम से काम लिया था। राजा चन्द्रगुप्त के जमाने में जब कि बोद्ध धर्म अपने शेशव में था और हिन्दोस्तान व सीलोन दोनों ही में ब्राह्मण धर्म का जोर था, चिकित्स'लयों के स्थापित होने का प्रमाण मिलता है। राजा चन्द्रगुप्त का मंत्री चाणक्य एक चढ़ा विलक्षण पोडित था। उसने एक मोटो पोथी “अर्थशास्त्र' के नाम से लिखी है, जिसमें उसने राजा चन्द्रगुप्त के राज्यकाल की व्यवस्थाओं और प्रबंध, कायदे और कानून, सस्कृति और जीवन प्रणाली और देश की सामान्य अवस्था का विस्तार के साथ विवेचन किया है। इस पुस्तक से उस युग के घटाटोप अंधेरे पर कुछ प्रकाश पड़ता है। वह शहरों की आबादी के बारे में निर्देश करते हुए लिखता है-
'उत्तर की तरफ लुहार, बढई, संगतराश और ब्राह्मणों को आबाद करना चाहिए। पश्चिम की तरफ जुलाहे, सूत कातने वाले, बांस कौ चटाइयां बनाने वाले, चमड़ा बचने वाले, हथियार बनाने वाले और शूद्र आबाद किए जाएं। दक्षिण की तरफ शहर के प्रबंधकर्ता, कारबार और व्यापार करने वाले, शराब और गो२५ का रोजगार करने वाले, नाच- गाने वाले और वैश्यओं के मकान बनाए जाएं। पूरब की तरफ इत्रफरोश, गल्ला बेचने वाले और क्षत्रिय वर्ण के लोग आबाद हों। दक्षिण-पूर्व की तरफ खजाना, हिसाब-किताब के दफ्तर और कारखाने बनाए जाएं। उत्तर-पश्चिम कौ तरफ दुकानें
और अस्पताल कायम किए जाएं। उत्तर-पूरब की तरफ गौशाले और अस्तबल वगैरह बनाए जाए।'
इस उद्धरण से सिद्ध हो जाता है कि इस प्राचीनकाल में हिन्दू कौम सामाजिक जीवन के किस ऊंचे शिखर पर पहुंची हुई थी और स्वास्थ्यरक्षा के सिद्धांतों का किस बुद्धिमत्ता से पालन किया जाता था। और चिकित्सालयों के स्थापित होने का एक ऐसा शक्तिशाली प्रमाण मिल जाता है जिसका खंडन नहीं किया जा सकता। मानो चिकित्सालय हर एक आबादी के आवश्यक अंग समझे जाते थे। ऐसे प्रमाणों के होते हुए भी यूरोप में यह खयाल फैला हुआ है कि चिकित्सालय परिचमी सभ्यता के परिणाम हैं और लॉर्ड कर्जन जैसे जानकार व्यक्ति ने अपने एक भाषण में जो उन्होंने ग्लासगो यूनिवर्सिटी के रेक्टर की हैसियत से हाल में दिया है, कहा कि, ' गैर-ईसाई धर्म जनता की भलाई को ऊंची भावनाओ से अपरिचित थे।' इसे देखने वाले की दृष्टि की संकीर्णता और राष्ट्रीय द्वेष के अलावा और क्या कहा जा सकता है।
जैसा हम पहले कह चुके हैं सीलोन अपनी सभ्यता के स्तर के लिए हमेशा हिन्दोस्तान पर आश्रित रहा। चन्द्रगुप्त ईसा से लगभग पांच सौ बरस पहले हुआ और विद्वान् चाणक्य ने साफ बतला दिया है कि उस समय हिन्दोस्तान में चिकित्सालयों का आम रिवाज था। इस जमाने में सीलोन में भी अस्पतालों के कामय होने का सबूत मिलता है। महावंश के दसवें अध्याय में, जो सीलोन के प्राचीन युगों का एक प्रामाणिक इतिहास है, सिंहली इतिहासकार राजा पण्डूक भाई के राज्यकाल का जिक्र करते हुए लिखता है, 'राजा ने पांच सौ चाण्डाल (यानी मेहतर) शहर की सफाई के लिए नियुक्त किए। डेढ़ सौ चाण्डाल लावारिसों की लाश उठाने के लिए और इतने ही आदमी चिताओं की निगरानी और सफाई के लिए नियुक्त किए। विभिन्न धर्मों के मानने वालों की सुविधा के लिए पांच सौ मकान बनवाए और इसी तरह और भी कई जगहों में राजा ने" अनेक धर्मशाले और चिकित्सालय बनवाए।'
यह तो ईसा से पांच सौ बरस पहले की बात हुई और इस वक्त हिन्दू कौम पतन की और बढ़ रही थी। बौद्ध धर्म ने गिरती हुई दीवार को संभाला। महारा* अशोक के जमाने में बोद्ध धर्म ने बडी तेजी से कदम बढ़ाया और धर्म के साथ-साथ जनता की भलाई के साधन भी बढ़ते गए। अशोक के अभिलेख नं* 2 और ॥3 से इस बात का स्पष्ट प्रमाण मिलता है कि, ' महाराज अशोक की निगरानी में और उनकी आज्ञा से हिन्दोस्तान, सीलोन, हिन्दोस्तान के उत्तरी और पश्चिमी सीमाप्रान्त, पूर्वी यूरोप, पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका के देशों में जहां के सम्राटों से महाराज अशोक के मैत्रीपूर्ण संबंध थे, आदमियों और जानवरों दोनों ही की तकलीफें दूर करने के लिए औषधालय और चिकित्सालय बनवाए गए। आदमियों और जानवरों दोनों ही को लाभ पहुंचाने वाली बूटियां दूसरी-दूसरी जगहों से मंगाकर लगाई गईं और सड़को पर मुसाफिरों और जानवरों की सुविधा के लिए कुएं और बारबालयां बनवाई गईं और पेड़ लगा दिए गए।'
महाराज अशोक के जमाने में सीलोन के राजा ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और तब से तेरहवीं शताब्दी तक चिकित्सालयों का निर्माण, सड़कों की सफाई
और मरम्मत, अपाहिजों की देख-भाल और दूसरे ऐसे ही लोकहितकारी कार्यों की तरफ उत्साह और संकल्प की कमी नहीं रही और मुफ्त और सबको मिलने वाली शिक्षा की ऐसी चर्चा रही कि कोई बौद्ध मंदिर ऐसा न था जहां पाठशाला न हो। आज भी बर्मा और सीलोन में शिक्षित व्यक्तियों की संख्या हिन्दोस्तान के मुकाबिले में बहुत ज्यादा है। इन बातों के बहुत से लिखित और प्रामाणिक साक्ष्य मिलते हैं। हम उनमें से कुछ पाठकों के सामने पेश करते हैं।
. राजा बुद्धदास ने (सन् 34 से लेकर 363 ई०) सिंहल द्वीप के रहने वालों पर कृपा-दृष्टि करके अनेक चिकित्सालय स्थापित किए और हरेक गांव के लिए वेद्य नियुक्त किए।
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राजा दुतगामिनी ने (6। से लेकर 37 ई० पू०) अठारह स्थानों पर चिकित्सालय बनवाए जहां मरीजों के भोजन का प्रबंध भी किया जाता था।
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राजा अपातीसू ने (368 से 40 ई०) गर्भवती स्त्रियों, अंधों और अपाहिजों के लिए अस्पताल बनवाए।
4 राजा धातुसेन ने (459 ई०) अपाहिजों के लिए अस्पताल बनवाए।
< राजा दिकपोला द्वितीय ने (795 ई०) अस्पताल बनवाए और आयुर्वेद के विद्यार्थियों के तिए १» बिद्यालय स्थापित किया।
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राजा दिकपोला तृतीय ने (8४4३ ई०) लंगडे और अंधे आदमियों के लिए विभिन्न स्थानों पर चिकित्सालय बनवाए।
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राजा कस्सप चतुर्थ ने शहर में महामारियों के लिए दवाखाने खुलवाए।
४ राजा महिन्दा चतुर्थ ने (9०] ई०) खेरातखाने और गरीबों क लिए घर बनवाए। उसने कुछ अस्पतालों में दवाओं और पलंग का प्रबंध किया।
9 राजा पराक्रमबाहु ने (64 से 97 ई०) एक स्वास्थ्य-गृह बनवाया जिसमें कई सौ रोगी रह सकते थे। हर एक रोगी की परिचर्या के लिए एक दाई और एक नौकर तैनात किया जो उसे जरूरी खाना दें और दवाएं पिलाएं। वहां उसने एक भंडार घर भी बनवाया जहां गल्ला और तरह-तरह की दवाएं और रोगों की चिकित्सा से संबंध रखने वाली अन्य चीजें इकट्ठा की जातो थीं। उसने उन पण्डितों और विद्वानों के लिए जीविका का प्रबंध किया जो रोगों के कारण और रहस्यों की छानबीन करते थे।
इन ऐतिहासिक प्रमाणों के सामने कौन न्याय प्रेमी व्यक्ति कह सकता है कि इसाई धर्म अस्तित्व में आने से पहले हिन्दू और बौद्ध धर्मों में मनुष्यों और मूक पशुओं के कष्टों को दूर करने का एक ऊंचा मानदण्ड नहीं स्थापित हुआ था। इसके विपरीत, कदाचित् यह प्रमाणित हो चुका है कि जिस उत्साह और पवित्र भावना से इस जमाने में यह नेक और अच्छा काम किया जाता था, वह आजकल के ऐसे ही कामों में नहों पाया जाता और इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। हिन्दुओं की उदारता का श्लोत उनका धार्मिक विश्वास था। ईश्वर ने हम सबको पैदा किया, हम सब भाई हैं, हमारा ऊर्त्तव्य है कि अपनी शक्तिभर अपने भाई की सहायता करें-यह भावना और यह विश्वास था जो हिन्दू कौम के दिलों में एक स्पष्ट जीता-जागता रूप लेकर
26 : प्रेमचंद रखनावली-7
उन्हें उदारता के अच्छे से अच्छे और ऊंचे से ऊंचे मानदण्ड की और ले जाता था। पश्चिमी कौमों के उदार प्रयत्नों में यह धार्मिक उत्साह शायद ही कहीं देखने को मिलता है। बह इन कामों में भी कौमी, पोलिटिकल और व्यावसायिक स्वार्थ छिपाए रहते हैं। वह पश्चिमी सभ्यता जो गर्भवती स्त्रियों और छोटी उम्र के लड़कों को जीविका- निर्वाह के लिए विवश करती है, जहां, विधवाओं और अनाथों के लिए अनाथालयों के सिवाय और कोई ठिकाना नहीं, वह पश्चिमी सभ्यता जहां मालिक मजदूर के हक हड़प कर जाने की ताक में बेठा रहता है और मजदूर इस ताक में रहता हे कि मालिक की जेब से रुपया निकाल लूं, वह सभ्यता जो धर्म के प्रचार को राजनीतिक उद्देश्यों का साधन बनाती है और जहां मिशनरी हमेशा विजेता का झण्डाबरदार साबित होता है, वह हिन्दू या बौद्ध धर्म को कभी रास्ता नहीं दिखा सकती। देशों को जीत लेना और चीज है, ऊंची सभ्यता और चीज है। इटली ने निम्न स्तर की सभ्यता रखते हुए यूनान को जीत लिया जो उस जमाने में सभ्यता के उच्चतम शिखर पर पहुंचा हुआ था। सभ्यता और हिंस्र भावनाओं का बैर है। बर्बर कौमें सभ्य कोौमों के मुकाबिले में ज्यादा लड़ाकू और जान पर खेलने वाली होती हैं। पश्चिमी सभ्यता में सबसे बड़ी खूबी यह है कि उसने बर्बर कौमों की विशेषताओं को सभ्यता के गंभीर प्रभावों से बचाए रक्खा ! खुलासा यह कि हिन्दोस्तानी सभ्यता की इमारत धर्म और नेकी की बुनियाद पर थी और पश्चिमी सभ्यता की बुनियाद लाभ, ईर्ष्या और ऐड्वर्य पर है। यह पवित्र दृश्य हिन्दोस्तान के सिवा और कहां दिखाई पड़ता है कि अगर एक घर में दस विधवाएं हैं तो दसों इज़्ज़त के साथ जिंदगी बसर करती हैं। संभव है हिन्दुओं ने सभ्यता का यह मानदण्ड स्थापित करने में बहुत-सी भूलें की हों और जरूर कीं मगर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि उनके पीछे उदास्ता को ऊंची भावना थी और ईसाइयों का उपरोक्त कथन बिल्कुल झूठ है।
प्रकाशन इतिहास
[उर्दू लेख। 'हिन्दू तहज़ीब और रफ़ाहे-आम' शीर्षक से उर्दू मासिक पत्रिका 'ज़माना', मार्च, 1912 में प्रकाशित। हिन्दी रूप 'विविध प्रसंग' भाग-1 में संकलित।]
