Cover Image for Dono Taraf Se (दोनों तरफ से) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1911•38 मिनट

दोनों तरफ से

Dono Taraf Se

प्रेमचंद की प्रारंभिक कहानी ‘दोनों तरफ से’ अस्पृश्यता, जातिगत संबंधों और वंचित समुदायों की आर्थिक स्थिति के प्रश्न को उठाती है। पंडित श्यामस्वरूप और उनकी पत्नी के माध्यम से कहानी सामाजिक सुधार को केवल सहानुभूति तक सीमित न रखकर सामाजिक स्वीकार्यता और आर्थिक सहयोग—दोनों से जोड़ती है।

पात्र:पंडित श्यामस्वरूप, पंडित श्यामस्वरूप की पत्नी
स्थान:गाँव का सामाजिक परिवेश, जहाँ जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता सामाजिक संबंधों को प्रभावित करते हैं

दोनों तरफ से का मूल पाठ

पंडित श्यामसरूप पटना के एक नौजवान वकील थे। उन बूढ़े नौजवानों की तरह नहीं जो आजकल मुहज्ज़ब (सभ्य) सोसाइटी में अक्सर नज़र आया करते हैं, जिनकी सारी जिस्मानी-ओ-दिमागी, जहनी-ओ-अकली, वातिनी-ओ-खारजी कुव्वत (आंतरिक एवं बाह्य शक्ति) जबान में मुजतमा (एकत्रित) रहती है। नहीं, हमारे पंडितजी इस जुमरे (वर्ग) के बूढ़े नौजवानों में न थे। वह जिन्दादिल नौजवानों में थे। जबान से कम और दिलो-दिमाग, हाथ और पैर से ज्यादा काम लेते थे। एक बार दिल में जो उसूल कायम कर लेते, उस पर साबित क़दम रहते थे।

उनमें एक बड़ा वस्फ़ (गुण) यह था कि वह बहुत कामों में एक साथ हाथ न डालते | जो लोग चासें तरफ हाथ फैलाते हैं उन्हें कुछ भी नहीं मिलता। जो शख्स एक दर्जन अंजुमनो का सेक्रेटरी और निस्फ़ (आधी) दर्जन सोसाइटियों का प्रेसिडेंट है, उससे अमली काम की उम्मीद अगर सादा लोह (भोले-भाले) करें तो करें। कोई अक्ल सलीम (ठीक) रखने वाला शख्स नहीं कर सकता । उस गरीब की सारी कुव्दत और सरगर्मी जबान के रास्ते उड़ जाती है। पंडितजी शायद इस नुक्ते को खूब समझते थे। उन्होंने अछूत जातों के सुधार की एक छोटी-सी अंजुमन खोल रखी थी और अपने वक्‍्ते फुर्सत और आमदनी का एक कलील हिस्सा (अल्प-भाग) इस कारे खैर (सत्कार्य, पुण्यकार्य) की नजर करते थे। शाम हुई, कचहरी से आये, कुछ नाश्ता किया, बाईसिकिल उठाई और शहर से मुत्तसिल (मिले) देहातों में जा पहुँचे।

वहाँ कहीं चमारों के साथ बैठे बातें कर रहे हैं कहीं डोमों के बीच में बेठे हैं और उनसे उनकी ठेठ बोली में एखलाक के मुतअल्लिक गुफ़्तगू छिड़ी हुई है। उनके बच्चों को गोद में लेते हैं, प्यार करते हैं। इतवार के दिन या अगर कोई दूसरी तातील आ पड़ती तो तिलिस्मी लालटेन के तमाशे दिखाने जाया करते। उनकी सोहबत और हमदर्दी ने साल ही भर में उनके परगने के अछूतों कीं मुआशरत (रहन-सहन) में बहुत कुछ इस्लाह (सुधार) कर दी थी। लाशखोरी बिल्कुल बन्द हो गई शराबखोरी विल्कुल तो बन्द नहीं हुई. मगर इससे आये दिन जो वारदातें होती रहती थीं, उनमें कमी हो जाने से पुलिस इंस्पेक्टर हामिद खाँ अलवत्ता बदजन (नाराज) हो गये। रफ़्ता-पफ़्ता पंडितजी की इस हमदर्दी ने अछूत जातों के साथ बिरादराना ताल्लुक़ात कायम कर दिये। उनके परगने में तीन सौ मौजे थे और नीची जाति की तादाद छः हजार से कम न थी। इन सबों के साथ पंडितजी को दोस्ताना-ओ-विरादराना उन्स (लगाव) था।

उनकी शादियों में शरीक होते और रिवाज के मुताबिक़ व्यवहार ले जाते। अगर उनमें कोई फसाद होता तो अक्सर फरियाद पंडितजी के यहाँ ही आती थी। मुमकिन न था कि पंडितजी उनमें से किसी के बीमार होने की खबर पायें और अयादत (बीमार का हाल-चाल पूछने) के लिए न जायें। उन्होंने वैद्यक में खुद भी थोड़ी-सी मश्क-बहम (उपलब्ध करना) पहुँचाई थी। खुद मरीज की तीमारदारी करते और ज्यादा तकलीफ़ में पाते तो रुपये-पैसे से भी इमदाद करते। मगर बेशतर सूरतों में उनकी हमदर्दी और मुहब्बत काफ़ी होती थी। ऐसे कामों के लिए रुपये की इतनी जरूरत नहीं होती, जितनी बेगरज इंसानियत और कौमी खिदमत के जोश की | उनकी साल भर की मुस्तकिल और सरगर्म हमदर्दाना कोशिशों ने इस फिरके में एक इन्क्रलाब-सा पैदा कर दिया ।

उनके घर और झोंपड़े, उनकी खूराको-लिबास (खानपान) उनके रस्मो-रिवाज सब गोया खराद पर चढ़ गये और सबसे बड़ी बात यह हुई कि ये लोग अपनी इज्जत करना सीख गये। पहले दो-चार जाहिल-जपट जमींदारों ने उन्हें दिक दिया, मगर जब देखा कि इन्हें कुछ और ही धुन सवार है तो खामोश हो रहे । दो-चार कोरबातिन (कलुषित मन, अज्ञानी) आदमियों ने इस मामले में पुलिस से चाराजोई करनी चाही। दारोगा हामिद खाँ साहब आमादा भी थे, मगर चमारों और डोमों के पास क्या रखा था जो किसी की दाल गलती ? पंडितजी के ये ताल्लुक़ात बढ़ते गये। आखिर यहाँ तक नौबत पहुँची कि एक बार चमारों के चीधरी की लड़की की शादी में उन्होंने उनके साथ खाना खा लिया।


2

पंडित श्यामसरूप की बीवी का नाम कोलेसरीदेवी था! कोलेसरी आम हिन्दुस्तानी औरतों की तरह अपने शौहर को दिलोजान से मुहब्बत करती थी। पढ़ी-लिखी तो कुछ यूँ ही-सी थी, मगर पंडितजी के साथ रहते-रहते मुल्की-व-तमददुनी मसायल (देशी एवं तांस्कृतिक समस्याओं) से कुछ मानूस (परिचित) हो गयी थी, लेकिन इसे चाहे इंसानी कमजोरी कहो, चाहे खलकी हिस (स्वभारएत अनुभव) कि उससे किसी की बात की बरदाश्त न हो सकती थी। वह जबान की तेज न थी, न बात-बात में उलझती थी। मगर कोई चुभती हुई बात, कोई दिल जलाने वाला ताना उसके दिल पर नासूर का-सा जख्म पैदा कर देता था। सुनने को तो वह सुन लेती और जवाब देना तो उसने सीखा ही न था, मगर अन्दर ही अन्दर घुलने की आदी थी। पंडितजी उसके इस ख़ासे (विशेषता) से वाक़िफ़ थे और इसीलिए वह कभी कोई ऐसी बात जबान से न निकालते, जिससे उसे सदमा हो। कई साल हुए जब पंडितजी की वकालत का शुरू जमाना था और आमदांखर्च में रोजाना कशमकश रहती थी। कोलेसरी ने संक्रांत के दिन जरा फैयाजी (दानशीलता) से काम लिया और पाँच रुपये की खिचड़ी गुरबा (गरीबों) को बॉट दी। पंडितजी दिन-भर कचहरी की ख़ाक छानकर खाली हाथ लौटे और यह कैफ़ियत देखी तो झुँझला उठे । तेज होकर बोले, “मैं तो एक-एक पैसे के लिए मारा-मारा फिरूँ और तुम यूँ घर को लुटओ। अगर यही मिजाज था तो बाप से कहा होता किसी राजा-महाराजा से शादी करता।'

कोलेसरी ने चुपचाप सिर नीचा करके सुना, न जवाब दिया, न उज्-माज़िरत (आपत्ति) की, न रोयी, मगर कामिल (पूरे) छः महीने तक बुखार और जोफ़े-जिगर (यकृत की दुर्बलता) में मुब्तला (ग्रस्त) रही। पंडितजी को जिन्दगी-भर के लिए सबक़ मिल गया।

खैर, पंडितजी रामफल चौधरी के यहाँ से खाना खाकर लौटे और दम के दम में सारे शहर में यह खबर मशहूर हो गई। दूसरे दिन कोलेसरी गंगः म्नान को गयी। शायद सोमवारी अमावस थी। शहर के दीगर रऊसा (अन्य धनी परिवारों की) की औरतें भी स्नान के लिए आयी हुई थीं। कोलेसरी को देखकर आपस में काना-फुसकी होने लगी, इशारेबाजियाँ होने लगों। एक औरत ने जो जाहिरा किसी ऊँचे खानदान की मालूम होती थी, अपने क़रीब की औरत से कहा-''जरा इन महारानी को देखो। मर्द तो चमारों के साथ खाना खाता फिरता है और यह गंगा नहाने आयी है।”

कोलेसरी ने सुन लिया। उसे सुनाने के लिए ही यह बात कही गयी थी। जिस तरह कुम्हार का सूत नर्म मिट्टी में धंस जाता है, उसी तरह सख्त बात दिल में चुभ जाती है। कोलेसरी तिलमिला उठी। मालूम हुआ, किसी ने कलेजे में छुरी मार दी। नहाने की सुध न रही, उल्टे क्रम लौटी और घर चली आयी। साँप का जहर रग-रग में समा गया। खाना पकाकर पंडितजी को खिलाया। वह कचहरी चले गये। आज कोई मालदार मुवक्किल जाल में फँसा था। इस खुशी में बीवी के बदले हुए तेवर उन्हें नजर न आये। शाम को खुश-खुश लौटे तो देखा, वह मुँह ढाँपे पड़ी हुई है। माथा ठनका, बोले-“कोला, आज मामूल (नित्य नियम) के ख़िलाफ़ लेटी क्यों हो ? तबीयत तो अच्छी है न ?”

कोलेसरी उठ बैठी और बोली-“हाँ, तबीयत अच्छी है, यूँ ही लेट गयी थी |”

मगर यह जवाब पंडितजी को इत्मीनान दिलाने के लिए काफ़ी न हो सकता था। तबीयत अच्छी है तो होंठों पर पान की सुर्खी क्‍यों नहीं, बाल क्‍यों बिखरे हैं, चेहरा क्यों उदास है, मेरे लिए बर्फ़ क्‍यों नहीं मँगायी गयी। यह ख़यालात माअन (एकदम) पंडितजी के दिल में आये। कपड़े उतारे, कुछ नाश्ता किया, इधर-उधर की बातें कीं, दो-चार लतीफ़े भी सुनाये। मगर इन मन्त्रों से सॉप का जहर न उतरा। कोलेसरी यूँ ही हूँ-हाँ करती रही। जहर ने उसके कान बन्द कर दिए थे। शाम हो गयी, पंडितजी के सैर का वक्‍त आया, बाइसिकल उठायी और चल खड़े हुए; मगर कोलेसरी की अफ्सुर्दगी (उदासीनता, खिन्‍्नता) का ख़याल दिल में खटकता रहा। आज माँझ गाँव के पासियों के यहाँ शादी थी। वहाँ जा पहुँचे। बारात दूर से आयी हुई थी। बाराती लोग शराब के लिए जिद कर रहे थे और घरातियों की तरफ से सोलह आना इनकार था। बारातियों का तकाजा था कि औरतें हस्बे रिवाज (रीति एवं प्रथा के अनुरूप) दरवाजे पर नाचें, नगाड़ा बजे । घराती कहते थे, अब यह रिवाज हमारे यहाँ नहीं है। माँझ गॉय में पंडितजी की कोशिशें सरसब्ज (सफल) हो गयी थीं। बाराती उनके हल्क़ए-असर (प्रभाव-क्षेत्र) से बाहर थे। तरफैन (दोनों तरफ से) में यही रहोकद (वाद-विवाद, कहा-सुनी) हो रही थी कि पंडितजी जा पहुँचे और बारातियों को समझा-बुझाकर ठंडा किया। ऐसे मौक़ों पर वह नौ-दस बजे रात तक न लौटते थे, क्योंकि उपदेश ऐसे मौक़ों पर ज्यादा असर-पजीर (प्रभावोत्पादक) होता है। मगर आज इस काम में उनका दिल न लगा। कोलेसरी की अफ्सुर्दा मुझाई हुई सूरत आँखों के सामने फिरती रही। रह-रहकर ख़याल आता, मेरी जबान से तो कोई सख्त बात नहीं निकली। मुझे तो ख़याल नहीं आता कि मैंने कुछ कहा हो, फिर क्‍या बाइस (कारण) ? यह अफ़्सुर्दगी बेसबब नहीं है, कुछ बात जरूर है इन्हीं तशवीशों (चिंताओं) से बेचेन होकर वह सात ही बजे घर लौट आये।


3

पंडित श्यामसरूप खा-पीकर लेटे। कोलेसरी से इस वक्‍त भी कुछ न खाया गया। उसका चेहरा अब भी उतरा हुआ था। आखिर पंडितजी ने पूछा-““कोला, तुम उदास क्‍यों हो ?” कोलेसरी-“उदास तो नहीं हूँ।'

श्यामसरूप--“'तुम्हारी तबीयत कैसी है ?””

कोलेसरी-“तबीयत में क्या हुआ है। देखते तो हो, भली-खासी बैठी हूँ।”

श्यामसरूप-“'मैं यह न मानूँगा। तुम्हारे उदास होने की जरूर कोई-न-कोई वजह है। कया मुझे तुमसे यह पूछने का हक़ नहीं है ?”

कोलेसरी-““आप मेरे दिल और जान के मालिक हैं। आपको हक़ न होगा तो किसको होगा ।”

श्यामसरूप-““तो मुझसे यह पर्दा कैसा है। मैं तो अपने दिल की कोई बात तुमसे नहीं छिपाता हूँ।

कोलेसरी ने आँखें नीचे करके कहा-“क्या मैं कुछ छिपाती हूँ ?”

श्यामसरूप- ''अब तक तो नहीं छिपाती थी मगर आज जरूर छिपा रही हो । अंखें मिलाओ, मेरी तरफ़ देखो। लोग कहते हैं, औरतें एक निगाह में मरदों की मुहब्बत का अन्दाज कर लिया करती हैं। मगर शायद तुमने अब तक मेरी मुहब्बत की थाह नहीं पायी। यक़ीन मानो तुम्हारी इस अफ़्सुर्दगी (खिन्‍नता) ने आज मुझे बहुत बेचेन रखा। अगर इस वक्त भी न बताओगी तो मैं समझूँगा तुम्हें मुझ पर एतबार नहीं है।'

कोलेसरी की आँखें नाबगूँ (अश्रुपूरित) हो गयीं। पंडितनी की तरफ़ देखकर बोली-“'मेरें दिल में जो काँठ खटक रहा है, उसे आप निकालेंगे २”

श्यामसरूप के रोंगटे खड़े हो गये। घबराकर उठ बैठे और काँपती हुई आवाज से कहा-''कोला ! तुम यह सवाल पूछकर मुझ पर जुल्म कर रही हो। मैं और मेरा सब कुछ तुम पर से निसार (न्यौछावर) है। तुम्हें मेरी तरफ़ से ऐसा ख़याल नहीं रखना चाहिए |”

कोसेसरी समझ गई कि जबान से कुछ का कुछ निकल गया, बोली-“मेरा ईश्वर जानता है कि मैंने कभी तुम्हारी मुहब्बत पर शक नहीं किया। मैंने यह सवाल सिर्फ़ इसलिए पूछा था कि शायद तुम मेरे उदास होने का सबब सुनकर हँसी में उड़ा दो। मैं यह जानती हूं कि मैं जो कुछ कहूँगी, वह मुझे न कहना चाहिए। यह भी जानती हूँ कि आपको इस बात के मानने में बहुत दिली सदमा होगा। इसीलिए मैं आपसे छिपाना चाहती थी। बात ही तो थी, दो-चार महीने में भूल जाती। मगर आपकी इस धमकी ने मुझे मनबूर कर दिया। जिस दिन आप यह ख़याल करेंगे कि मुझे आप पर एतबार नहीं है, तो जानते हो मेरी क्‍या गत होगी....यही धमकी मुझे मजबूर कर रही है।'

श्यामसरूप-“हाँ-हाँ, बेख़ौफ़ कहो, मुझे अब सब्र नहीं है।''

कोलेसरी-'“आप अछूतों के साथ मिलना-जुलना, खाना-पीना छोड़ दें।'

जैसे बेगुनाह कैदी मुंसिफ की जबान से सजा का हुक्म सुनकर लम्बी साँस खींचता है, उसी तरह पंडितजी ने एक आह-सर्द भरी और जरा देर के लिए दम बखूद (मौन) हीकर लेट गये। फिर उठकर बोले-““बहुत अच्छा, तुम्हारे हम्म की तामील होगी। दिल को सदमा बेशक होगा, लेकिन कोई मुजायक (आपत्ति) नहीं। सिर्फ़ इतना और बतला दो कि यह हुक्म किसकी ईमा (संकेत) से दिया गया है या दिल में खुद-ब-खुद पैदा हुआ है ?

कोलेसरी-“'मुझे औरतें ताना देती हैं और मुझसे इसकी बर्दाश्त नहीं होती । उनकी जबान पर मेरा कोई दावा नहीं, वे जो चाहें कहें। आप पर मेरा दावा है, इसलिए आपसे कहती हूँ।”

श्यामसरूप-“बहुत अच्छी बात है, यही होगा ।”

कोलेसरी-““अब आपसे मेरी एक और विनती है। मैंने अपने दिल की कैफ़ियत आपसे साफ़े-साफ़ बयान कर दी। मरदों को तानों की परवाह नहीं होती, हम औरतें कमजोर होती हैं, हमारा दिल कमजोर होता है, उसमें तेज धार वाला ताना आसानी से चुभ जाता है। मगर आप इसका बिल्क॒ल खयाल न करें। मुझे तानों से बचाने के लिए आप अपने ऊपर जब्र न कीजिएगा। मैं ताने सुन लूँगी, ज्यादा जी जलेगा तो बाहर आना-जाना, औरतों से मिलना-जुलना छोड़ दूँगी।

श्यामसरूप ने कोलेसरी को गले से लगा लिया और बोले-“कोला, मुझसे यह गवारा न होगा कि मेरी ख़ातिर तुम ताने सहो। तुम्हारे नाजुक दिल पर ताने का जख्म न लगने दूँगा। तुम्हारे दिल में रंज का वास हुआ तो मेरी मुहब्बत कहाँ रहेगी । बेआव खुश हो जाओ अपना प्यारा गीत सुना दो।”

कोलेसरी खुश हो गयी। उसका चेहरा रौशन हो गया । उसने पियानो उठा लिया और मीठे मद्धम सुरों में गाने लगी-

“पिया मिलन है कठिन बावरी.... ।”


4

एक हफ़्ता गुजर गया और पंडितजी देहातों की तरफ़ न गये। अछूत भाइयों के साथ विरादराना रिश्ता कायम करना, उनको अपने तई इन्सान समझने के क़ाबिल-बनाना, उन्हें जहालत और बातिल-परस्ती (अज्ञानता और असत्यता) की गार से निकालना, यह पंडितजी ने अपनी जिंदगी का मिशन समझ रखा था और इस काम के रास्ते में एक दीवार हायल (बाधक) पाकर कोई ताज्जुब नहीं कि वह मुतफक्किर (चिंतित) और मग्मूम (दु:खित) रहते थे। इन्सान को ज़िन्दगी का लुत्फ़ उसी हालत में हासिल होता है, जब तक उसे इस बात का यक़ीन रहता है कि मैं अपने फराइज (कर्त्तव्य) अंजाम दे रहा हूँ दुनिया में ऐसे भी बेशुमार बंदगाने खुदा (ईश्वर के प्राणी) हैं जो यही नहीं जानते कि उनके शख्सी और क़ौमी फ़राइज (व्यक्तिगत और सामाजिक कर्त्तव्य) क्‍या हैं। मगर ऐसे आदमियों को इंसान कहना भूल है। जिन लोगों को बुरे कामों की चाट पड़ जाती है, वे यह जानते हुए कि हम जो कुछ करते हैं, बुरा करते हैं, अपने को उस काम से बाज नही रख सकते और जायज मौक़ा न पाकर नाजायज मौक़ो से फ़ायदा उठाते हैं। जुआरी को कितना ही समझाओ, कितना ही धमकाओ, मगर वह जुआ खेलने से बाज नहीं आता। शराबी को चाहे पिंजड़े में बन्द कर दो, मगर वह आज़ाद होते ही सीधे शराब-ख़ाने की राह लेता है। यह बुरे कामों का नशा है। नेक कामों का नशा इससे बदर्जहा (कई गुना) ज़्यादा बेचैन करने वाला होता है।

दिन भर तो पंडितजी काम-धन्धे में लगे रहते मगर शाम को जो उनके दिलचस्प मशगिल (दिल-बहलाव) का ख़ास वक्‍त था, वह बहुत बेकरार हो जाते थे और अपने क्रौमी फ़र्ज को शख्सी फ़र्ज पर कुर्बन करने के लिए उन्हें अपने दिल पर बड़ा जब्र करना पड़ता था। जब अपने बागीचे में तनहा बैठे हुए वह अपने दिल से इस मसले पर बहस करने लगते तो बाज औक़ात अपनी कमजोरी पर झुँझला जाते और जी में आता कि चलकर कोलेसरी से साफ़-साफ़ कह दूँ कि मैं क्ौम को जात पर कुर्बान नहीं कर सकता। मगर हाय! इन बातों का असर कोला पर क्‍या होगा ! मेरी मुहब्बत में मतवाली, नेक, शरीफ़, गरीब कोला पर क्या कुछ न बीत जायेगी। नहीं, मेरी जान से प्यारी कोला; तुम जैसी अनमोल चीज पाकर मेरी हिमाक़त है, अगर मैं अपने तई बदनसीब खयाल करूँ। तुम्हारी खुशी के लिए मैं सब कुछ सह लूँगा। अगर तुझे आज मालूम हो जाये कि मैं इस क़दर बेचैन हो रहा हूं तो मुझे यक्तीन है कि तू आज ही मेरे लिए ताने सहने क्या चीज हैं सारी दुनिया में अंगुश्तनुमा (बदनाम, निन्दित) बनना पसन्द कर लेगी। तेरे इस हमागीर मुहब्बत (अनन्य प्रेम) के बदले में मेरे पास क्‍या है ? क़ौमी फ़र्ज बेशक इंसान के सब फराइज में बालातर (बहुत ऊँचा) है। मगर कभी-कभी और ख़ास-ख़ास हालतों में क़ौम को जात के लिए छोड़ना पड़ता है। राजा रामचन्द्र का क़ौमी फ़र्ज था कि वह अवध में रहकर अपनी रिआया पर इंसाफो-आसाइश (न्याय और समृद्धि) की बरकतें फैलाते, मगर इस क्ोमी फर्ज को उन्होंने बाप की इताअत (आज्ञा-पालन) क॑ मुकाबले में कुछ न समझा, जो उनका खास जाती फ़र्न *४, राजा दशरथ का क़ौमी फर्ज था कि वह अपना राज-पाट रामचन्द्र को सौंपते, क्योंकि वह जानते थे कि रामचन्द्र अवधवासियों की आँखों की पुतली हैं। मगर उन्होंने इस क़ौमी की अहद-परवरी (प्रतिज्ञा पालन) पर निसार कर दिया, जो उनका ख़ास जाती फ़र्ज था।

लेकिन पंडित श्यामसरूप की गलती थी जो वह समझते थे कि कोलेसरी उनके दिल की कशमकश से वाक्रिफ़ नहीं है। जिस राम को ये बातें हुई उस दिन से आज तक एक लम्हा भी ऐसा न गुजरा होगा, जिसमें यह ख़याल उसके दिल में चुटकियाँ न लेता रहा हो कि मैंने इन पर बड़ा जुल्म किया है। उसे उनके चेहरे पर वह मसर्रत (प्रसन्नता) की झलक न नजर आती थी जो इत्मीनाने क़ल्ब (सन्तुष्ट हृदय) की बरकत है। खाने-पीने में अगली-सी रगबत (रुचि) न थी। बात से अपनी दिली कैफ़ियत के छिपाने की कोशिश मुतरश्शेह (प्रकट) होती थी। कोलेसरी को यह सब कंफ़ियत आईने की तरह दिखाई देती थी। वही बार-बार अपने तई कासती थी-मैं कैसी खुदगर्ज हूँ। कैसी कमीनी, कैसी ओछी एक बदजबान सिफ़्लामिजाज (क्षुद्र प्रकृति) औरत के ताने से मग्लूर (पराजित) होकर मैंने उन पर इतना जुल्म किया है। यह मेरे लिए अपने ऊपर इतना जब्र करते हैं और मैं एक ताने का सदमा न सह सकी। यह सोच-सोचकर वह चाहती कि मैं उन्हें इस क्रैद से आजाद कर दूँ। मगर पंडितजी कभी उसे इन बातों का मौक़ा ही देते ।

एक हफ़्ते तक पंडित श्यामसरूप के अछूत भाइयों ने सब्र किया। मुमकिन है तबीयत न अच्छी हो या किसी मुक़दमे की पैरवी में मसरूफ़ हों, या कहीं सैर करने चले गये हों । इन ख़यालात से उन्होंने अपने तई .तस्कीन दी। मगर एक हफ़्ते वाद उनसे न रहा गया। जूक़ के जूक़ (भीड़ की भीड़) आदमी, बदन पर गाढ़े की मिरजई, सिर पर सफ़ेद पगड़ी, पाँव में चमरौधा जूता, कन्धे पर लटूठ, उनके मकान पर इस्तफ़सारे हाल (राजी-खुशी पूछने) के लिए आने लगे। पंडितजी के लिए अब बजाय इसके और कोई चारा न था कि अपनी फ़र्जशिकनी (कर्त्तव्य-भंग) के लिए कोई हीला करें और वह हीला यह था कि घर में तबीयत नासाज (अस्वस्थ) है। शाम से सबेरे तक आदमियों का तार न टूटता। एक गाँव के लोग जाते तो दूसरे गाँव के आ पहुँचते और सबसे पंडितजी को यही बहाना करना पड़ता। उनसे और क्या कहते !!

दूसरा हफ़्ता गुज़रा मगर पंडितजी के घर में अब तक तबीयत नासाज़ थी। एक रोज शाम के वक्‍त वह दरवाजे पर बैठ हुए थे कि रामदीन पासी, हल्लू चौधरी और गोबरी, बंसफोड़ हकीम नादिरअली खाँ साहब को लिये हुए आये। हकीम साहब अपने जमाने के बुअली सेना (ईरान की प्रसिद्ध हकीम, दार्शनिक एवं ज्योतिषी) थे। जिस तरह इस्मे-आजम (महामंत्र) से शैतान भागता है, उसी तरह हकीमजी को देखते ही मर्जखाह (चाहे) कैसा ही कोहना (पुराना) और मुजमिन (जड़ पकड़ना) हो, राहे-फ़रार (भागने का मार्ग) इख््तियार करता था और बसा-औक़ात (प्रायः) मरज के साथ मरीज भी चल बसता था। पंडितजी हकीम साहब को देखते ही सिटपिटा गये। अब कौन-सी चाल चलूँ, भाँडा फूटा जाता है। इन कमबछ्तों को यह क्या सूझी कि इन जाते-शरीफ़- (महाशय) को लाकर खड़ा कर दिया और इन मर्दे-खुदा (महापुरुष) ने भी आव देखा न ताव देखा, सीधे मौत की तरह सिर पर आ खड़े हुए। मगर वक्त तंग था, ज़्यादा सोच-विचार की फ़ुर्सत न थी। उस वक्त पंडितजी के दिल में बावजूद कोलेसरी को हज़ार जान से चाहने के यह ख़याल आया कि काश, जरा देर के लिए उसे कुछ हरारत हो जाती। किसी तरह बात तो बनती। मगर बुलाने से कहीं मौत आती है ?


5

हकीम साहब ने फर्माया-“मुझे यह सुनकर कमाल (अत्यन्त) अफ़सोस हुआ कि जनाब की अहलिया मुकर्रमा (प्यारी पत्नी) अर्से दो हफ़्ता से अलील (बीमार) हैं और अफ़सोस से ज़्यादा इस अम्र (बात) की शिकायत है कि जनाब ने मुझे जरा भी इत्तिला न दी वरना मर्ज इस कदर तूल न खींचता। क्‍या शिकायत है ?” पंडितजी ने कुछ सिर खुजलाकर, खाँसकर, पहलू बदलकर और सिर झुकाकर फ़र्माया-“जी, यही कुछ निस्वानी (स्त्रियों की) शिकायतें लाहक हो गयी थीं, मगर अब तो आपके फैजो-करम से तबीयत रूह बराह (ठीक रास्ते पर) है। फिलहाल लेडी डॉक्टर का इलाज हो रहा है। आप जानते हैं यह अंग्रेजी तहजीब का दौर है, अंग्रेजी इलाज से लोगों को ज़्यादा अक्रीदत होती जाती है और मरीज को उस हकीम या डॉक्टर से सेहत होती है, जिस पर उसे अक़ीदा हो। इसी वजह से जनाब को तकलीफ़ नहीं दी।”

हक़ीम साहब-“जी हाँ, आप बजा फ़मति हैं। कौन-सी लेडी डॉक्टर का इलाज हो रहा है ?”

पंडितजी ने फिर सिर खुजलाकर और इधर-उधर ताककर कहा-“उन्हीं मिस बोगन का।”!

श्यामसरूप को इस मौक़े पर सारी क़ानूनी काबलियत सर्फ़ करनी पड़ी। मगर आज वह किसी मनहूस आदमी का मुँह देखकर उठे थे। सूरत हाल बजाय मुआफ़िक होने के और भी मुखालिफ़ होती जाती थी क्योंकि दौराने तक़रीर ही में कल्लू चौधरी, हरदास भर और जुग्गा धोबी आते हुए दिखायी दिए और उनके साथ मिस बोगन घोड़े पर सवार तशरीफ़ ला रही थीं। अब तो पंडितजी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं, रंग फक हो गया। मिस बोगन को दिल में हज़ारों सलावातें (दुर्वचन) सुनायीं कि यह शैतान की खाला इस वक्‍त कहाँ से फट पड़ी। मगर झल्लाने का मौक़ा न था। फ़ौरन कुर्सी से उठ खड़े हुए। मिस बोगन से हाथ मिलाया और उसे बिला कुछ पूछने का मौक़ा दिए हुए हाथ पकड़कर जनाना निशस्तगार (बैठक) में ले गये और कुर्सी बैठा दिया। बाद अजाँ (तत्पश्चात) कोलेसरी से जाकर कहा-“इस वक्‍त अजीब हालत में जान मुब्तला (फँसी) है। मैंने तो तुम्हारी बीमारी का बहाना किया कि किसी तरह इन आदमियों से पीछा छूटे । मगर उन्होंने आज हकीम नादिरअली खाँ और मिस बोगन को लाकर सिर पर सवार कर दिया। मिस साहेवा को बैठक में छोड़ आया हूँ। बताओ, क्या करूँ ?”

कोलेसरी-“'तो मैं बीमार हो जाऊँ, क्यों ?”

पंडितजी (हँसकर)-“तुम्हारे दुश्मन बीमार हों।”

कोलेसरी-“दुश्मनों के बीमार होने से इस वक्‍त काम न चलेगा। तुम जाकर मिस बोगन को लाओ। मैं ।[लेहाफ ओढ़कर लेटी जाती हूँ।'

पंडितजी तो मिस बोगन को लाने के लिए बाहर निकले। कोलेसरी ने सिर से पैर तक लिहाफ ओढ़ लिया और झूठ-मूठ कराहने लगी। मिस बोगन ने धर्मामीटर लगाया, जबान देखी और मुँह बनाकर बोली-“'बीमारी जड़ पकड़ गयी है। हिस्टीरिया है बुखार बाहर नहीं है, मगर कलेजे पर है क्यूँ, तुम्हारे सर में दर्द है ना ?”

कोलेसरी-''सर तो फटा जाता है। फोड़ा हो रहा है।

मिस बोगन-“'भूख नहीं लगती न »”

कोलेसरी-''दाने की तरफ़ देखने को जी नहीं चाहता ।”'

मिस बोगन मरज की तश्ख़ीस (निदान) कर ही चुकी थी। नुस्खा लिखा और रुख्सत हो गयी। हकीम नादिरअली खाँ ने ज़्यादा बैठना फिजूल समझा। नजराना पेशगी ले चुके थे। पंडितजी बाहर आकर अपने मोहसिनों (उपकारकों) से बोले-“तुम लोगों ने नाहक़ तकलीफ़ की। उनकी तबीयत तो अब अच्छी हो चली है। खैर, मैं तुम्हारा बहुत मशकूर (आभारी) हूँ।'

जब मेहमान रुखसत हुए पंडितजी अन्दर आकर खूब हँसे और जब हँसी खत्म हो गयी तो सोचने लगे, जो कुछ न करना चाहिए वह आज सब करना पड़ा क्‍या अब भी देवी न पसीजेगी, मगर कोलेसरी को हँसी नहीं आयी।


6

पंडित श्यामसरूप खाना खाकर लेटे और सो गये मगर कोलेसरी को नींद नहीं आयी। वह करवटें बदलती रही | कभी उठ बैठती और कमरे में इधर-उधर टहलती, कभी कोई किताब खोलकर लैम्प के सामने जा बैठती, मगर तबीयत किसी काम में न लगती थी। हवा से हिलते हुए दरख्त के नीचे जिस तरह चाँद की किरणें नाचती हैं, उसी तरह उसके ख़यालात परेशान हो रहे थे। वह सोचती थी कि मैंने इनके ऊपर कितना जुल्म किया है। हाय ! इनके दिल पर आज क्या गुज़री होगी। जिसने जिन्दगी भर झूठ बात मुँह से न निकली, उसे आज मेरी बदौलत झूठ को ओढ़ना-बिछौना बनाना पड़ा। अगर उन्होंने झूठ बोलना गवारा किया होता, तो आज दीदारगंज की अजीमुश्शान (विशाल) रियासत हमारे कब्जे में होती। ऐसी सच्चाई के नाम पर मरने वाले आदमी की मैंने यह दुर्गति की है ! क्या इसीलिए मैं उनकी किस्मतों की शरीक हूँ ? मेरा काम है उनसे हमदर्दी करना, नेक कामों में उनकी मदद करना, नेक सलाह देना, तस्कीन देना। इन सब फरायज के बदले में उन्हें झूठ के जाल में फँसा रही हूँ। ईश्वर मेरा गुनाह माफ़ करे।

मेरा फर्ज था कि इस कारे-खैर (परोपकार के कार्य) में उनका हाथ बंटाती। यह देहती कैसे सच्चे, कैसे बेरिया, (निश्छल) कैसे मुहसिन-परस्त (उपकारी की पूजा करने वाले) हैं, कैसे दिल के फैय्याज (उदार)। ऐसे शरीफ आदमियों की खिदमत करने से मैंने अपने पति को रोक दिया है, सिर्फ इसलिए कि एक बदजबान औरत ने मुझे ताना दिया था और इतने पर आसूदा (सन्तुष्ट) न होकर अब मैं उन्हें जबर्दस्ती झूठ बोलने के लिए मजबूर करती हूँ। बावजूद मेरी इन कमीनी ज़्यादतियों के इस नेकी से भी ज़्यादा नेक, शराफ़त से भी ज्यादा शरीफ़, मेरे रहमदिल, मेरे पाकनफ्स (पवित्र आत्मा) पति का दिल ज्यों-का-त्यों है। यह समझता है कि मैं बेवकूफ़ हूँ, जाहिल हूँ, कमजोर हूँ, जिद्दी हूँ और इन कमजोरियों को अपनी वसी मुहब्बत (विस्तृत प्रेम) की गोद में छिपा लेता है। मैं कैसी तंगदिल हूँ ! इस क़ाबिल भी नहीं कि उनका पैर धोऊँ। आज जब मिस बोगन को रुखृसत करके आये तो कैसे हँस रहे थे। कैसी पाक हँसी थी! और यह सिर्फ़ मेरा दिल रखने के लिए, सिर्फ़ मेश गम गलत करने के लिए। प्यारे ! मैं सिर से पैर तक बुराइयं से भरी हूँ। में ओछी हूँ। तुम मुझे अपने प्रेम में मतवाली दासी समझते रहना।

यह सोचते-सोचते एक बार उसने पंडित श्यामसरूप के चेहरे की तरफ़ देखा, राहतबछ्श ख़्वाब ने चेहरे को बहुत शगुफ़्ता (प्रफुल्लित) बना दिया था, होंठों पर हल्की-हल्की मुस्कगहट झलक रही थी। इसे देखकर कोलेसरी के दिल में प्रेम की एक लहर-सी उठी। जिस तरह समन्दरों में ज्वार उठता है, इसी तरह कभी-कभी इंसान के दिल में भी प्रेम का ज्वार उठता है। कोलेसरी की आँखों में इस वक्‍त मुहब्बत का एक दरिया समाया हुआ था। वह मुहब्बत से बेताव होकर अपने पति के सीने से लिपट गयी! उस सीने से जो उसकी मुहब्बत का आरामगाह धा। जिस तरह एक चोर सोये हुए साहिबे-खाना (गृहस्वामी) के खजाने को आजादी से लूटता है, उसी तरह कोलेसरी अपनी नींद में मतवाले शौहर के प्रेम के खजाने को जी खोलकर लूट रही थी और जिस तरह चोर डरता है कि साहिबे-खाना जाग न जाये, उसी तरह कोलेसरी को भी धड़का लगा हुआ था कि कहीं यह जाग न रहे हों। औरत की मुहब्बत दू-बदू (प्रत्यक्ष) आजादी से आँखें नहीं मिला सकती। शर्म और हिजाब उसे आँखें ऊपर नहीं उठने देते। यह ख़ौफ कि मेरी यह गर्मजोशी जाहिरदारी या तसन्‍नो (दिखावा या कपट-व्यवहार) न ख़याल कर ली जाये, उसकी मुहब्बत के पैरों में बेड़ियाँ डाले रहता है। कोलेसरी इस वक्त इन ख़यालों से आजाद थी। जब समन्दर में ज्वार आता है तो शिकस्ता (टूटे-फूटे) जहाजों के टुकड़े ख़सो-खाशाक (कूड़ा करकट) और सीप और घोंघे साहिल पर आ जाते हैं। कोलेसरी के दिल में से प्रेम के इस ज्वार ने वह फाँस निकाल दी जो अब तक खटक रही थी।


7

दूसरे दिन जब पंडितजी कचहरी से शाम को लौटे तो कोलेसरी से कहा-“मुझे दो-तीन दिन के लिए बाहर जाने का हुक्म मिलेगा |”

कोलेसरी-“'क्यों, कहाँ जाओगे ?”

श्यामसरूप-'““मुफ़स्सिल (शहर के बाहर) का एक मुक़दमा ले लिया है। भागलपुर जा रहा हूँ।!

कोलेसरी-“'क्या अभी ?”

श्यामसरूप-““कल ही तो तारीख है।”

छः बजे शाम की डाक से पंडितजी भागलपुर सिधारे और चार दिन तक मुक़दमे की पैरवी में मसरूफ़ रहे। तीन दिन का वादा करके आये थे, चार दिन लग गये। बारे पाँचवें दिन फुर्सत हुई। तीन बजे पटना पहुचे आ९ घर की तरफ चले। अपने मुहल्ले में दाखिल हुए तो माँझ गाँव का सनपत चौधरी दिखायी दिया। पंडितजी ने कहा-“चौधरी जी, कहाँ के धावे हैं ?”

चौधरी ने चौंककर सिर उठाया और बोला-“पालागन, आपकी तो कल अवाई थी। देर काहे से हुई ?”

पंडितजी-'“कल नहीं आ सका। और तो सब खैरियत है ?”

चौधरी-““सब आपकी कृपा है। आज तो आपके यहाँ बड़ा जलसा है।”

पंडितजी-(ताज्जुब से) “मेरे यहाँ ? कैसा जलसा ?”

चौधरी-“बहूजी ने सभा करी है। हम लोगन के घर की सब औरतें न्योते में आयी हैं।'

पंडितजी खुश-खुश आगे बढ़े तो सदहा आशना (सैकड़ों मित्र) सूरतें इधर-उधर आते-जाते दिखायी दीं, गोया दहक़ानियों (देहातियों! की बारात आ गयी हो! सबको सलाम-बन्दगी करते हुए अपने दरवाजे पर पहुँचे तो मेला-सा लगा हुआ था। फ़र्श पर सैकड़ों आदमी बैठे हक्का-तम्बाकू कर रहे थे। कोलेसरी ने औरतों को नवेद (निमंत्रण) दिया था। ये आदमी औरतों के साथ आये थे।

पंडितजी सीधे दीवानख़ाने में गये। कपड़े उतारे, नौकरों से कह दिया-अन्दर ख़बर मत करना और खुद दीवानख़ाने की खिड़की से अन्दर का तमाशा देखने लगे।

आँगन में सफ़ेद फ़र्श बिछा हुआ था और उस पर तीन-चार सौ औरतें दहक़ानी अन्दाज से बनी-सँवरी हुई बैठी हुई थीं। कोई हँसती थी, कोई बातें करती थी और कोलेसरी हाथ में तश्त (थाल) लिये सबको पान और इलायची तकसीम कर रही थी। बच्चों को खिलौने और मिठाइयाँ देती और प्यार करती थी। पान तकसीम हो चुका तो गाना होने लगा। कोलेसरी ने भी आज मोटी साड़ी पहनी थी और गहने उतार दिए थे। वह ढोल लेकर बैठ गयी और औरतों के साथ गाने लगी। पंडितजी बैठे ये सब कैफ़ियत देख रहे थे। फ़र्ते मसर्रत (हर्षातिरेक) से दिल में गुदगुदी हो रही थी। जी यही चाहता था कि चलकर कोला को गले से लगा लूँ।

गाना खत्म होने के बाद कोलेसरी ने पन्द्रह मिनट तक ठेठ बोली में औरतों को उपदेश दिया और तब मजलिस बरखास्त हुई। कोलेसरी औरतों को गले लगा-लगाकर रुखसत करती थी। इनमें एक औरत बहुत मुसीन (वृद्धा) थी। जब वह गले मिलने को बढ़ी तो कोलेसरी ने झुककर उसके पैरों को अपने आँचल से छुआ और आँचल को माथे से लगा लियां। उसका यह इन्किसार (विनग्रता) और यह अखलाक़ (शिष्टाचार) देखकर पंडितजी मारे खुशी के उछल पड़े और तीन-चार छलॉँगें भरीं। उनसे अब जब्त न हो सका। दीवानख़ाने से निकलकर आँगन में चले गये। कोलेसरी को इशारे से कमरे में बुलाया और गले से लगा लिया। वह खैरो-आफ़ियत (कुशलमंगल) पूछने लगी, “देर क्यूँ की ?” कहने लगी, “आज तुम न आते तो मैं खुद आती ।” मगर पंडितजी को इन बातों के सुनने की कहाँ फुर्सत ! फिर गले लगा लिया और फिर लगाया। तबीयत आसूदा न हुई, फिर प्यार।

कोलेसरी ने शर्माकर कहा-“हुआ तो, अब कया सब मोहब्बत आज ही खर्च कर डालोगे ?”

पंडितजी-“'्या कहूँ, जी नहीं भरता । जितना प्यार करता हूँ, उतना ही प्यार करने को जी चाहता है। तुम सचमुच देवी हो |”

पंडितजी को राज तो नहीं, लेकिन कोई इलाक़ा मिल गया होता तो हर्गिज इतने खुश न होते। जब खूब प्यार कर चुके तो आँगन में खड़े होकर औरतों से बोले-““बहनो, कोला बीमार नहीं थी। इन्होंने मुझे तुमसे मिलने-जुलने की मुमानियत (निषेष, मना करना) की थी, मगर आज इन्होंने तुमको खुद बुलाया और बहनापे का नाता जोड़ा। मुझे इस वक्‍त जितनी खुशी है, इसका अन्दाजा नहीं हो सकता। इस खुशी में मैं एक-एक हज्मर रुपये से दस गाँवों में लेन-देन की कोठियाँ खोलूँगा और वहाँ तुम लोगों को विला सूद के रुपया दिया जायेगा। तुमको महाजनों से रुपया लेने में एक आना और दो आना रुपया सूद देना पड़ता है। इन कोठियों के खुलते ही तुम महाजनों के बन्धन से छूट जाओगे और इन कोठियों का इंतजाम उन्हीं के सिपुर्द रहेगा, जिसने तुम्हें आज न्योता दिया है।”

सब औरतें हाथ उठा-उठाकर पंडितजी की जानोमाल की दुआएँ देने लगीं। कोलेसरी ने कहा-“वाह ! यह जहमत मेरे सिर डाल दी |

पंडितजी (मुस्कराकर)-“'पानी में पेर रखा है तो आप तैरना सीखोगी ।”

कोलेसरी-“मुझे हिसाब-किताब कुछ आता भी है।”

पंडितजी-“'सब खुद-व-खुद आ जायेगा। तुम्हें उपदेश करना कब आता था ? तुम तो औरतों से बोलती लजाती थीं। अभी दो हफ़्ते हुए, तुम्हीं ने इन लोगों से मिलने की 08 की थी। आज तुम उन्हें बहन समझ रही हो। तब तुम्हारा दाँव था, अब मेरा दाँव है।”

कोलेसरी (हँसकर)-“तुमने मुझे फाँसने के लिए जाल फैलाया था।”

पंडितजी-“यह जाल दोनों तरफ़ से फैला हुआ है।”


दोनों तरफ से का सारांश

‘दोनों तरफ से’ में पंडित श्यामस्वरूप नामक एक ब्राह्मण जमींदार के माध्यम से अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव का प्रश्न उठाया गया है। आरंभ में सामाजिक रूढ़ियाँ और पारिवारिक संकोच उनके व्यवहार में दूरी पैदा करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे उनका दृष्टिकोण बदलता है और वे अस्पृश्य माने जाने वाले समुदाय के लोगों के प्रति आत्मीयता और समानता का व्यवहार करने लगते हैं।

पंडित श्यामस्वरूप और उनकी पत्नी स्वयं आगे बढ़कर इन लोगों को अपने घर में स्थान देते हैं और उनकी सेवा करते हैं। इस परिवर्तन के साथ कहानी केवल सामाजिक मेल-जोल तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वंचित वर्ग की आर्थिक स्थिति सुधारने की आवश्यकता पर भी बल देती है। श्यामस्वरूप बिना ब्याज के आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं, जिससे उनके जीवन में आत्मनिर्भरता की संभावना पैदा होती है।

इस प्रकार कहानी अस्पृश्यता के प्रश्न को केवल सामाजिक व्यवहार का विषय नहीं मानती, बल्कि उसके आर्थिक पक्ष को भी सामने लाती है। प्रेमचंद सामाजिक दूरी समाप्त करने और आर्थिक संबल देने—इन दोनों प्रयासों को समाज-सुधार के आवश्यक पक्षों के रूप में प्रस्तुत करते हैं।


प्रकाशन इतिहास

‘दोनों तरफ से’ का प्रथम प्रकाशन उर्दू में मार्च 1911 में ज़माना पत्रिका में हुआ। इसका हिंदी रूप पहली बार अक्टूबर 1976 में नया प्रतीक में प्रकाशित हुआ। बाद में इसे सोलह अप्राप्य कहानियाँ तथा प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य, खंड 1 में संकलित किया गया।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • अस्पृश्यता और सामाजिक समानता: कहानी जातिगत अस्पृश्यता और सामाजिक दूरी को चुनौती देती है। पंडित श्यामस्वरूप का व्यवहार इस बात को रेखांकित करता है कि सामाजिक सुधार की शुरुआत वंचित समुदाय को बराबरी और आत्मीयता के साथ स्वीकार करने से होती है।

  • दलित चेतना और सामाजिक सुधार: प्रेमचंद ने कहानी के माध्यम से दलित और वंचित वर्ग की स्थिति को सामाजिक विमर्श का विषय बनाया है। विशेष महत्त्व यह है कि कहानी का प्रकाशन 1911 में हुआ, अर्थात भारत में गांधी के नेतृत्व में संगठित अछूतोद्धार आंदोलन के व्यापक रूप लेने से पहले।

  • सामाजिक सुधार के साथ आर्थिक सुधार: कहानी केवल छुआछूत समाप्त करने या सामाजिक मेल-जोल की बात नहीं करती। श्यामस्वरूप द्वारा आर्थिक सहायता की व्यवस्था यह संकेत देती है कि सामाजिक समानता के लिए आर्थिक असुरक्षा और निर्भरता को दूर करना भी आवश्यक है।

  • रूढ़ि से मानवीयता की ओर परिवर्तन: श्यामस्वरूप और उनकी पत्नी का व्यवहार सामाजिक रूढ़ियों से ऊपर उठकर मानवीय संबंध स्थापित करने की प्रक्रिया को सामने लाता है। इस परिवर्तन में व्यक्तिगत संवेदना सामाजिक सुधार का आधार बनती है।

  • ‘दोनों तरफ से’ का आशय: कहानी का शीर्षक सामाजिक सुधार की दोहरी आवश्यकता की ओर संकेत करता है—एक ओर उच्च या सवर्ण वर्ग को अपनी संकीर्ण सामाजिक धारणाएँ छोड़नी होंगी और दूसरी ओर वंचित समुदाय को सामाजिक तथा आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के प्रयास करने होंगे। इस दृष्टि से कहानी सामाजिक बराबरी को केवल उपदेश नहीं, बल्कि व्यवहार और आर्थिक सहयोग दोनों से जोड़ती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "दोनों तरफ से." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1911, https://munshipremchand.com/works/short-stories/dono-taraf-se. Accessed 22 Sep. 2026.