ने जहां दीगर ( अन्य) सियासी (राजनीतिक), तमदुदुनी (सभ्यता) और मज़हबी मसाइल (समस्याओं ) पर अपने इन्किलाब-अंगेज़ञ (क्रांतिकारी ) खयालात (विचार) जाहिर किए हैं, वहां फनूने-लतीफा (सत्कला) के मुताल्लिक भी इनके खयालात जिद्दत (नवीनता) से खाली नहीं। उनके मुबाहिसे (वाद-विवाद) में एक खास वस्फ (विशेषता) यह है कि चाहे अमलन ( अमल के तौर पर) उनसे मुआफिक (अनुकूल) न हो, पर असूलन आप उनके ज़रूर कायल हो जाते हैं। दुनिया आज भी मुसावात (समानता) और अखुव्वत ( भाईचारे) के मुदृइयों (दावेदारों) से खाली नहीं है। मगर वो आलीशान होटलों में बैठे हुए हर एक तकल्लुफ और आसाइश ( आराम) का लुत्फ उठाया करते हैं-टॉल्स्टॉय ने मुसावात ( समानता) पर अपनी सारी मरब॒त (घन) और सारा विकार (इज्जत) कुरबान कर दिया। वो महज़ तबाहकुन (नष्ट करने वाले) नुक्ताचां ' आलोचक?) नहीं हैं। उनमें सालिकाना (ईश्वरीय) सदाकत / अत्यता) और जाश मौजुद है। उनके दिल में शहोदों की धुन है, पयम्बरों ( अवतारों) का एतिकाद / आस्था, लिश्वास) है। वो उसूलों के मुकाबिले में शख्सों की परवाह नहीं करते (७ खण्ड) और जाहिर परस्ती (दिरखावे) से उन्हैं नफरत है। रिवाज्ञ मी गुलामी को नो बदतरीन गुलामी (सबसे बुरी दासता) खयाल करते हैं। दुनिया सी नुणःदा परस्त हो गई है कि आज सच्ची और बेलाग बात कहने वाला आदमी ये र्फफ्स समझा जाता है। गाल्म्टॉय ने मज़हबी तसर्ुफात (शोषण, परिवर्तनों) और नहिरापात ६ अजलनाओं) का पर्दाफाश किया, इसके लिए दुनिया ने उन पर ईजाद
५ रे
सविष्कार) का फार्ता सादिर किया (लगाया)। वो सच्चे ईसाई उसूलों के मोईद एगआए) थे। दुनिया ने उन बंदौन ' नास्तिक) खयाल किया। वो मुसावात ( समानता) का अगली गैग अनुयागी / थे! दुनिया ने उन्हैं फातिर्रूत अक्ल ' भ्रष्ट बुद्धि वाला) बतानाया। यरां टड जि अक्सर अदीबों ने उन्हैं अपने जिंदादिलाना ( विनौदपूर्ण ) किनायात इसे का निशाना बनाया है, मगर इन फतावा (व्यवस्थाओं, धर्मादशों ) के बादजूद वपस कई एंकर नहीं झर सकता कि वो एक पाक- बातिन (साफदिल) और रौशनदिल अनर्यामरी ) बुन॒ग थ। जहाने फनूने लतीफा का निहायत मोहविक्ककाना मुतायला ( शोधपरक समीक्षा! कया है और नगाम मुहज्जब (शष्ट, सभ्य) मुमालिक (देशों) के नककादां ने | आलोचक ' फले लतोफ (सत्मला) के उसूल और आग (मतों) का गायर (गहरा) प ब्नि्डस्तयाब आलोचना) मुबाज़ना (तुलना) करके साबित किया है कि इसमें सस मराले पर कितना बाहमी इख्तिलाफ (आपसी मतभेद) है। यहां तक कि आर्ट को तारीफ (व्याख्या) भी बेइतिहा इख्तिलाफात (7तभेद) के मआरिज़ञ (झगड़े) में पी हुई है। ये एक आम खयाल है कि आर्ट को समझने और उसकी कैफियत ( आनंद) | मुतास्सिर | प्रभावित) होने के लिए खास तरबीयत (शिक्षा) की ज़रूरत होती है। जो टुस रास तरबीयत से महरूम (चित) है वो आर्ट से लुत्फ-अंदोज़ ( आनंदपूर्ण द ह सकता। काउण्ट टॉलस्टोय इस आम खयाल के बिलकुल बरअक्स ( प्रतिकूल?
फरमाते हैं कि आर्ट की बेहतरीन सिफ्त (विशेषता) उसकी अमूमियत (सामान्यता) है। जिस हद तक आर्ट इस मेयार आमफहमी (आम-समझ) से गिर जाता है, उस हद तक वो नाकिस (अपूर्ण) है। उनके खयाल में शेर ऐसा होना चाहिए जिसकी अवाम भी बेसाख्ता (तुरंत) दाद दे सके। तस्वीर ऐसी होनी चाहिए, जिसकी नज़ाकतें हर शख्स की समझ में आ जाएं। उनकी मंशा हर्गिज्ञ ये नहीं है कि आर्ट में लताफत (कोमलता) न हो, तासीर न हो, तनासुब ( अनुपात) न हो, लेकिन चूंकि तबए-इंसानी (मनुष्य की प्रकृति) इन्हीं जज़्बात के मजमूए (योग) का नाम है। इसलिए कोई वजह नहीं कि आर्ट की लताफत या तासीर से आवाम मुतास्सिर ( प्रभावित) न हो। बशतें कि उसे तसन्नो (बनावट) और मूशिगाफी (छिद्रांवेषण) ने बिल्कुल मस्ख (विकृत) न कर दिया हो। आर्ट फितरी (प्राकृतिक) जज़्बात ( भाव) को इज़हार (व्यक्त रूप) है ओर फितरी जज़्बात से मुतास्सिर होने के लिए किसी खास ज़ेहनी तैयारी या तरबीयत की ज़रूरत न होनी चाहिए। दिल खुश करने वाली बातों से खासो आम यक्सा (एक से) महजूज़ (आनंदित) होते हैं। अला हाज़ा (इस पर) गमनाक वाकियात (दुः:खद घटनाएं) और दर्दनाक हादिसात खासो-आम दोनों पर यक््सां असर पैदा करते हैं। जब बुनियादी जज़्बात मुस्तरक (मिश्रित) हैं तो आर्ट से हज (आनंद) उठाने के लिए खास तरबीयत की ज़रूरत ही क्यों हो? वो आर्ट नाकिस (दोषपूर्ण) है जो इस इम्दाद (सहायता) का मुहताज है, वो फितरी (प्राकृतिक) नहीं, मसनूई (बनाती ) है। इस कसौटी पर कसने से दुनिया के कितने ही बुजुर्ग तरीन (सबसे बड़े) मुसब्विर ( चित्रकार ) और नकक््काश ओर शुअरा (कवि) अपने रुतबे से गिरते हुए नज़र आते हैं। यहां तक कि शेक्सपीयर भी इस इल्ज़ाम से बरी नहों हो सक्रता। अलिफ लैला कामिल (पूर्ण
आर्ट है, इसलिए कि वो झोंपड़ों और महलों में यकक््सां (एक -सा) मकबूल ( प्रिय, रुचिकर) है। अला हाज़्ा (इस पर) 'बैताल-पचीसी' और *“कथा-सरित सागर' 'रामायण' और ' महाभारत' अदबियात ए-उला (प्राचीन साहित्य) की बहनतरीन मिसालें हैं, चरवाहे और हलवाहे भी उनका लुत्फ उठा सकते हैं। बाइबिल' की रिवायतें किस कदर मतबुए-अवाम (जनप्रिय) हैं। काउण्ट टॉल्स्टॉय की दलील है कि फने लतीफा ( सत्कला) की इस खास परसंदी और अजनबियत (अपरिचय) क्री इब्तिदा उस ज़माने से होती है, जब मुहज़्ज़ब (सभ्य) और बरसरे-इक्तिदार ( प्रभुत्वशाली ) जमाअत (वर्ग! ने मसनूई ज़िंदगी (कृत्रिम जीवन) बसर करनी शुरू की। अपनी तफरीह (मनोरंजन) ओर मअय्युश ( भोग-विलास) के लिए नई -नई शान, नई-नई दिलचस्पियां तलाश ऋरने लगे। इसी मुनास्बत से हमारे जज़्बात पेचीदा, दकोक (बारीक, गृढ) और बंगाना ( अपरिचित) होते गए, और जुं-जूं खास और आम के दरमियान म॒गायरत ( पराएपन) को खलीज़ (खाड़ी) बसी (चोड़ी) होती गई , मुहज्जब (सभ्य, शिष्ट) मज़ाक ( रसिकता, सुरुचि, मनोविनोद) पर तसन्नो (बनावट) का रंग चढ्ता गया और इस दर्जा नौबत पहुंच गई कि आज दौरे-जदीद (आधुनिक समय) के फनूने लतीफा (सत्कला) का दिलदादा (इच्छुक, आसक्त) और कदीम (पुगातन) के सादा और फितरी ( प्राकृतिक ) जज़्बात से केफियत -पज़ीर (आनंद लेने बानना) नहीं हो सकता बेजिंसे ही (उस वस्तु की तरह) उसी तरह जैसे तेज़ मसालाजात (मसालों) की
आदी जुबान को सादा गिज्ञा (भोजन) फीकी और बेमज़ा मालूम होती है। मुहज़्ज़ब जमात (सभ्य वर्ग) इस तसन्नो (बनावट) को अपनी अभीक (गहरी, सूक्ष्म) जज़्बातियत ( भावों) और नाजुक हिस्सियात (कोमल इंद्रियानुभूतियों) का मज़हर (प्रकट करने वाला) खयाल करती है। उसने इसी तकल्लुफ (दिखावे, बनावट, पराएपन) को अपने और अवाम के दरमियान एक वसील-ए-इम्तियाज़ ( श्रेष्ठ मानने वाले भेद का माध्यम) बना लिया है। यही उसका तब्अज़ाद (कल्पित इम्तियाज़ (विशेषता) है। उस निख्वत (अहंकार) को इस खयाल से मुसर्रत (प्रसन्नता) होती है कि हम मुद्रिकात (विवेक की शक्तियां, ज्ञानेंद्रियां) और जज़्बात की नफासत (उत्तमता) और गराबत ( अनोखेपन) में अवाम से किस हद तक बढ़े हुए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया के बेशतर ( अधिकतर) साहिब-उल-राय (सही राय वाले) मुसन्निफन (लेखक-गण) आर्ट की इस नफासत (सूक्ष्मता, गूढ़ता) को उसके दौरे-कमाल (कला-युग) का एक लाज़िमी जुज्ञ (तत्त्व) खयाल करते हैं। मगर इसमें भी शक की गुंजाइश नहीं है यह नफासत आर्ट को बसा औकात (प्राय:) मुगलक (मुश्किल) और बईद-उल-फहम (समझ से दूर) बना देती है। काउण्ट टॉल्स्टॉय की उन तसानीफ (कृतियों) में जो खयाल की तदूवीन (रचना करने) से पहले लिखी गई हैं, वही रंग मौजूद है, जिसकी उन्होंने बाद को तारीज़ (विरोध) की है और हालांकि “अन्ना कैरेनिना', 'सेबास्टोपोल ' वगैर किसस (कहानियां) रूसी अदबियात (साहित्य? में ही नहीं, दुनिया की अदबियात में मुम्ताज़् (विशिष्ट) दर्जा रखते और फने-नाविलनवीसी ( उपन्यास-कला ) कला का एजाज़ (चमत्कार) कहलाने के मुस्ततक (हकदार) है, पर यह खयाल ऐदा होने के बाद टॉल्स्टॉय ने इस रंग में लिखना तर्क (त्याग) कर दिया। उनके दौरे-आखिर (अंतिम काल) की तसानीफ (रचनाएं) निहायत सादा, आमफहम, रूहानी और अखलाकी सदाकतों (नैतिकतापूर्ण सच्चाइयों) से लबरेज़ ( पूर्ण) कहानियां हैं जो 'बाईंबिल' या दीगर कदीम ( पुरातन) मज़हबी तम्सीलों ( धार्मिक दृष्टातों) से मुशाबो (सदृश) हैं और इसमें शक नहीं कि वो अपने रंग में फर्द (अद्वितीय ) हैं। इनमें अमृमियत + सर्वसाधारण) को सिफत (गुण) बदर्जाए अतम ( संपूर्ण रूप में) मौजूद है। हां, मुमकिन है कि वो राश:अंगेज सनसनीखेज़ नाविलों के शैदाइयों (चाहने वालों) को फीकी और खुश्क मालूम हों। यह फैसला करना बहुत मुश्किल है कि टॉल्स्टॉय का यह मेयारे-तामीम (साधारण बनाने का स्तर) खालिस जेहनी और तबई ( प्राकृतिक ) उसूलों पर मबनी (निर्भर) था या मुल्की और तमदुदुनी हालात ( आचार- व्यवहार को स्थिति) पर लेकिन कराइन (लक्षणों) से बालूम होता है कि तमददुनी हालात ही उनके इस कुल्लिये (व्यापक नियम) के बानी (कारण) थे। उनकी इंसाफ- पसंद तबीयत को यह अप्न बगायत (बहुत अधिक) शाक ( असह्दया, नागवार) गुज़रता था कि मुहज़्जब (सभ्य) तबका (वर्ग), जो अपनो बका व हयात (जीवन) के लिए अवाम का दस्तनिगर (आश्रित) है, उनकी ज़रूरत और मज़ाक (सुरुचि, मनोविनोद) और कोताहियों (कमियों ) को ज़रा भी खयाल में न लाकर महज अपनी महदूद (सीमित) जमात (वर्ग), के तरफ्फो (अहंकार) या तफरीह (मनोरंजन) के लिए कोशां ( प्रयत्नशील) हो, बेजिंसे ही (इसी तरह) जैसे कोई रागिया अहीरों की बारात में
गाने जाए और ध्रुपद या हक्कानी (ईश्वर की प्रशंसा में) गज़ल गाना शुरू करे। जब हलवाहे और चरवाहे मुहज़्ज़ब तबके (सभ्य वर्ग) के अन्नदाता और पालने वाले हैं तो यह उनकी सख्त अहसान-फरामोशी और नाशुक्री (अकृतज्ञता) है अगर वो अपने कमाल से इन्हैं बहरावर (परिचित) होने का मौका न दें। शायर, मुसव्विर (चित्रकार), नक्काश, बुततराश (मूर्तिकार), एक्टर, गायक ये सब के सब सोसाइटी के जुज़्ने - ज़ाइद (अतिरिक्त अंश) हैं और इनकी ज्ञात से अवाम को कोई फेज्ञ (लाभ) न पहुंचे तो इन्हैं ज़िंदा रहने का कोई हक नहीं है। इस उक्दे (समस्या, गुत्थी) को हल करने की बज़ाहिर (स्पष्टत:) दो हो सूरतें हैं कि या तो अवाम में तालीम (शिक्षा) की इतनी तरक्की हो कि उनमें और खास में कोई खते-इम्तियाज़ (अंतर करने बाली रेखा) न रहे, या खास अपनी बुलंद परवाज़ियों (ऊंची उड़ानों) को आम मज़ाक (रसिकता, मनोविनोद) और इस्तेदाद (योग्यता) के मुतीअ (अधीन) रखें। इन दोनों सूरतों में कौन काबिले-तरजीह ( प्रधानता देने योग्य) है, इसका फैसला करना मुश्कित नहीं। काउण्ट टॉल्स्टॉय के उसूल की कोराना पैरवी (अंधा अनुकरण) इस ज़माने में न मुमकिन है और न ज़रूरी। हमारे खयाल में वो एक इंतिहाई हद पर हैं और चूंकि सदाकत (सत्यता) बैनुल-हदूद (सीमाओं के बीच) होती है, इसलिए मुनासिब है और ज़रूरत इसकी मुक्तज़ी (इच्छुक), है कि हम अपने आर्ट को हत्तुल इम्कान (यथासंभव) तसन्नो (कृतिमता ), तकल्लुफ (टीम-टाम, परायापन) , मुबहम इस्तिआरात ( अस्पष्ट मानवीकरण ) और दूरअज़्ञ-फहम (अबोध) किनायात (इशारों) से बचाएं। बदकिस्मती से हिन्दुस्तान में आला (विशिष्ट) और अदना (साधारण) के दरमियान ये खलीज़ (खाड़ी ) कहीं ज़्यादा वसीअतर (चौड़ी) है। यहां वो जज़्बात और बुलंद परवाज़ियों तक महदूद नहीं है। इख्तिलाफे-ज़बान ( भाषा की भिन्नता) ने इस खलीज को कतन (बिल्कुल) नाकाबिले-उबूर (जिसे पार न किया जा सके) बनना दिया है। हमारी कौम के बेहतरीन अफराद (व्यक्तियों) अंग्रेज़ी ज़बान में मशक-व - मुज्ञावलत (निरंतर अभ्यास) बहम पहुंचाने (एक साथ उपलब्ध करने) पर मजबूर हैं। हालाते
रोज़गार ने इन्हैं माजूर (अपंग, मजबूर) बना रखा है, लेकिन काश वो अपने जाही मफाद (निजी लाभों) और शोहरत के साथ-साथ कुछ उन झोपड़ों में बसने वाला का भी ख्याल करते जो उनकी तालीम के कफोल (पोषक) हैं, तो आज हमारे अवाम को हालत इतनी ज़बूं ( खराब) न होती। हमारे मुल्क के बेहतरीन रिसाइल ( पत्रिकाएं। अंग्रेज़ी में निकलते हैं, बेहतरीन अडखास (व्यक्ति) अंग्रेज़ी में लिखते और बोलद हैं, उनके कुतुबखाने (पुस्तकालय) अंग्रेज़ी किताबों से सजे हुए हैं। यह उनको इंतिहा दर्ज को मुहसिनकुशी (कृतघ्नता), हक-फरामोशी और खुद-परवरी (सत्र पोषण हैं। वो अंग्रेज़ी में अपनी इंशापरदाज़ी (निबंध-लेखन) के कमाल दिखाकर अपने दिल में मगन हो लें और मुमकिन है आरज़ी (अस्थाई) शुहरत भी हासिल कर लें, लेकिन अहले-जुबान (अपनी भाषा बोलने वाले) इन्हैं बहुत दिनों तक याद न रखेंगे। आर वो ये गुमान करते हैं कि उनके खयालात इस कदर बुलंद हैं कि यहां के अतव्राम उनकी कदर न करेंगे तो यह उनकी सख्त गलती है। जो लोग कबीर के भजन और सूरदास के पद गाते और समझते हैं, जो 'रामायण' और 'महाभारत' से महजूर
(आनंदित) हो सकते हैं, उनके लिए आपके मज़ामीन (निबंध) और खयालात हर्गिज बईद-अज़-फहम (अबोध) नहीं हो सकते। यह दूसरी बात है कि हम अपनी कौमी जुबानों से नाआश्ना (अपरिचित) हों और खयालात ज़ाहिर करते हुए झिझकें। अपने घर में चिराग न जलाकर मस्जिद में चिराग जलाना पुरानी कहावत है। जो लोग अपने पस्तखयाल ( मंदर्बुद्धि 2 हमवतनों की जानिब से आंखें बंद करके आलमगीर (विश्वव्यापी ) शोहरत हासिल करने के ख्वाब देखते हैं, उनकी निस्ब्रत वजुज़ञ (सिवाय) इसके क्या कहा जाए कि परमात्मा उन्हैं राहे -रास्त (सत्य-मार्ग/ पर लाए और मुहसिनकुशी ( कृतघ्नता) के गुनाहे - कबीरा ( महापातक ) से बचने की तौफ़ीक़ ( सामर्थ्य) अता करें।
प्रकाशन इतिहास
[उर्दू लेख। उर्दू मासिक पत्रिका, 'जमाना', जुन, 1920 म॑ प्रकाशित। हिन्दी रूप 'प्रेमचन्द का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में मंकलित।|]
