Cover Image for Ek Aanch Ki Kasar (एक आँच की कसर) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1924•15 मिनट

एक आँच की कसर

Ek Aanch Ki Kasar

प्रेमचंद की 'एक आँच की कसर' सामाजिक और राजनीतिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य है। महाशय यशोदानंद समाज-सेवी, शिक्षित और दहेज-प्रथा के विरोधी नेता के रूप में प्रसिद्ध हैं। अपने बेटे के विवाह में वे सार्वजनिक रूप से दहेज की निंदा करते हैं और अपने छोटे बेटे से भी दहेज-विरोधी भाषण दिलवाते हैं। लेकिन पर्दे के पीछे उन्होंने वधू-पक्ष से भारी दहेज लेने का सौदा कर रखा है। उनकी बनाई हुई प्रतिष्ठा उस समय ध्वस्त हो जाती है जब उनका छोटा बेटा अनजाने में वधू-पक्ष का वह पत्र पढ़ देता है जिसमें पच्चीस हजार रुपये के दहेज को घटाकर बीस हजार करने का अनुरोध किया गया है। कहानी सुधारवादी भाषण और निजी लालच के बीच के अंतर को उजागर करती है और दिखाती है कि सामाजिक प्रतिष्ठा स्वयं छल का साधन बन सकती है।

पात्र:यशोदानंद, परमानंद, वधू-पक्ष, वर, यशोदानंद के मित्र और मेहमान
स्थान:शादी समारोह के दौरान एक समृद्ध शहरी उत्तर भारतीय परिवार, सामाजिक रूप से सम्मानित शिक्षित और सुधारवादी मध्य वर्ग के भीतर

एक आँच की कसर का मूल पाठ

सारे नगर में महाशय यशोदानन्द का बखान हो रहा था। नगर ही में नहीं, समस्त प्रांत में उनकी कीर्ति गायी जाती थी, समाचार-पत्रों में टिप्पणियाँ हो रही थीं, मित्रों से प्रशंसापूर्ण पत्रों का ताँता लगा हुआ था। समाज-सेवा इसको कहते हैं! उन्नत विचार के लोग ऐसा ही करते हैं। महाशयजी ने शिक्षित समुदाय का मुख उज्ज्वल कर दिया। अब कौन यह कहने का साहस कर सकता है कि हमारे नेता केवल बात के धनी हैं, काम के धनी नहीं! महाशयजी चाहते तो अपने पुत्र के लिए उन्हें कम-से-कम 20 हजार रुपये दहेज में मिलते, उस पर खुशामद घाते में! मगर लाला साहब ने सिध्दान्त के सामने धन की रत्ती बराबर परवा न की और अपने पुत्र का विवाह बिना एक पाई दहेज लिये स्वीकार किया। वाह! वाह! हिम्मत हो तो ऐसी हो, सिध्दांत-प्रेम हो तो ऐसा हो, आदर्श-पालन हो तो ऐसा हो। वाह रे सच्चे वीर, अपनी माता के सच्चे सपूत तूने वह कर दिखाया जो कभी किसी ने न किया था। हम बड़े गर्व से तेरे सामने मस्तक नवाते हैं।

महाशय यशोदानन्द के दो पुत्र थे। बड़ा लड़का पढ़-लिखकर फाजिल हो चुका था। उसी का विवाह हो रहा था और जैसा हम देख चुके हैं, बिना कुछ दहेज लिये।

आज वर का तिलक था। शाहजहाँपुर के महाशय स्वामीदयाल तिलक लेकर आने वाले थे। शहर के गण्यमान्य सज्जनों को निमन्त्राण दे दिये थे। वे लोग जमा हो गये थे। महफिल सजी हुई थी। एक प्रवीण सितारिया अपना कौशल दिखाकर लोगों को मुग्धा कर रहा था। दावत का सामान भी तैयार था। मित्रगण यशोदानन्द को बधाइयाँ दे रहे थे।

एक महाशय बोले- तुमने तो यार कमाल कर दिया!

दूसरे- कमाल! यह कहिए कि झण्डे गाड़ दिये। अब तक जिसे देखा मंच पर व्याख्यान झाड़ते ही देखा। जब काम करने का अवसर आता था तो लोग दुम दबा लेते थे।

तीसरे- कैसे-कैसे बहाने गढ़े जाते हैं- साहब हमें तो दहेज से सख्त नफरत है। यह मेरे सिध्दांत के विरुध्द है, पर करूँ क्या, बच्चे की अम्मीजान नहीं मानतीं। कोई अपने बाप पर फेंकता है, कोई और किसी खुर्राट पर।

चौथे- अजी, कितने तो ऐसे बेहया हैं जो साफ-साफ कह देते हैं कि हमने लड़के की शिक्षा-दीक्षा में जितना खर्च किया है, वह हमें मिलना चाहिए। मानो उन्होंने यह रुपये किसी बैंक में जमा किये थे!

पाँचवें- खूब समझ रहा हूँ, आप लोग मुझ पर छींटे उड़ा रहे हैं। इसमें लड़केवालों का ही सारा दोष है या लड़कीवाले का भी कुछ है?

पहले- लड़कीवाले का क्या दोष है सिवा इसके कि वह लड़की का बाप है।

दूसरे- सारा दोष ईश्वर का जिसने लड़कियाँ पैदा कीं। क्यों?

पाँचवें- मैं यह नहीं कहता। न सारा दोष लड़कीवाले का है, न सारा दोष लड़केवाले का। दोनों ही दोषी हैं। अगर लड़कीवाला कुछ न देता तो उसे यह शिकायत करने का तो कोई अधिकार नहीं है कि डाल क्यों नहीं लाये, सुंदर जोड़े क्यों नहीं लाये, बाजे-गाजे और धूमधाम के साथ क्यों नहीं आये? बताइए!

चौथे- हाँ, आपका यह प्रश्न गौर करने के लायक है। मेरी समझ में तो ऐसी दशा में लड़के के पिता से यह शिकायत न होनी चाहिए।

पाँचवें- तो यों कहिए कि दहेज की प्रथा के साथ ही डाल, गहने और जोड़ों की प्रथा भी त्याज्य है। केवल दहेज को मिटाने का प्रयत्न करना व्यर्थ है।

यशोदानन्द- यह भी lame excuse1 है। मैंने दहेज नहीं लिया है, लेकिन क्या डाल-गहने न ले जाऊँगा।

पहले- महाशय, आपकी बात निराली है। आप अपनी गिनती हम दुनियावालों के साथ क्यों करते हैं? आपका स्थान तो देवताओं के साथ है।

दूसरे- 20 हजार की रकम छोड़ दी? क्या बात है!

यशोदानन्द- मेरा तो यह निश्चय है कि हमें सदैव principles2 पर स्थिर रहना चाहिए। principles3 के सामने money4 की कोई value5 नहीं है। दहेज की कुप्रथा पर मैंने खुद कोई व्याख्यान नहीं दिया, शायद कोई नोट तक नहीं लिखा। हाँ, conference6 में इस प्रस्ताव को second7 कर चुका हूँ और इसलिए मैं अपने को उस प्रस्ताव से बँध हुआ पाता हूँ। मैं उसे तोड़ना भी चाहूँ तो आत्मा न तोड़ने देगी। मैं सत्य कहता हूँ, यह रुपये ले लूँ तो मुझे इतनी मानसिक वेदना होगी कि शायद मैं इस आघात से बच ही न सकूँ।

पाँचवें- अब की conference आपको सभापति न बनाये तो उसका घोर अन्याय है।

यशोदानंद- मैंने अपनी duty8 कर दी, उसका recognition9 हो या न हो, मुझे इसकी परवा नहीं।

इतने में खबर हुई कि महाशय स्वामीदयाल आ पहुँचे। लोग उनका अभिवादन करने को तैयार हुए, उन्हें मनसद पर ला बिठाया और तिलक का संस्कार आरम्भ हो गया। स्वामीदयाल ने एक ढाक के पत्ताल पर नारियल, सुपारी, चावल, पान आदि वस्तुएँ वर के सामने रखीं। ब्राह्मणों ने मंत्र पढ़े, हवन हुआ और वर के माथे पर तिलक लगा दिया गया। तुरंत घर की स्त्रियों ने मंगलाचरण गाना शुरू किया। यहाँ महफिल में महाशय यशोदानंद ने एक चौकी पर खड़े होकर दहेज की कुप्रथा पर व्याख्यान देना शुरू किया। व्याख्यान पहले से लिखकर तैयार कर लिया गया था। उन्होंने दहेज की ऐतिहासिक व्याख्या की थी। पूर्वकाल में दहेज का नाम भी न था। महाशयो! कोई जानता ही न था कि दहेज या ठहरौनी किस चिड़िया का नाम है। सत्य मानिए, कोई जानता ही न था कि ठहरौनी है क्या चीज, पशु या पक्षी, आसमान में या जमीन में, खाने में या पीने में। बादशाही जमाने में इस प्रथा की बुनियाद पड़ी। हमारे युवक सेनाओं में सम्मिलित होने लगे, यह वीर लोग थे, सेनाओं में जाना गर्व की बात समझते थे। माताएँ अपने दुलारों को अपने हाथ से शस्त्रो से सजाकर रणक्षेत्र में भेजती थीं। इस भाँति युवकों की संख्या कम होने लगी और लड़कों का मोल-तोल शुरू हुआ। आज यह नौबत आ गयी है कि मेरी इस तुच्छ-महातुच्छ सेवा पर पत्रों में टिप्प्णियाँ हो रही हैं मानो मैंने कोई असाधारण काम किया है। मैं कहता हूँ; अगर आप संसार में जीवित रहना चाहते हैं तो इस प्रथा का तुरंत अंत कीजिए।

एक महाशय ने शंका की- क्या इसका अंत किये बिना हम सब मर जायेंगे?

यशोदानंद- अगर ऐसा होता तो क्या पूछना था, लोगों को दंड मिल जाता और वास्तव में ऐसा होना चाहिए। यह ईश्वर का अत्याचार है कि ऐसे लोभी, धन पर गिरनेवाले, बुर्दा-फ़रोश, अपनी संतान का विक्रय करनेवाले नराधम जीवित हैं और सुखी हैं। समाज उनका तिरस्कार नहीं करता। मगर वह सब बुर्दा-फ़रोश हैं- इत्यादि।

व्याख्यान बहुत लम्बा और हास्य से भरा हुआ था। लोगों ने खूब वाह-वाह की। अपना वक्तव्य समाप्त करने के बाद उन्होंने अपने छोटे लड़के परमानंद को, जिसकी अवस्था कोई 7 वर्ष की थी, मंच पर खड़ा किया। उसे उन्होंने एक छोटा-सा व्याख्यान लिखकर दे रखा था। दिखाना चाहते थे कि इस कुल के छोटे बालक भी कितने कुषाग्र-बुध्दि हैं। सभा-समाजों में बालकों से व्याख्यान दिलाने की प्रथा है ही, किसी को कुतूहल न हुआ। बालक बड़ा सुंदर, होनहार, हँसमुख था। मुस्कराता हुआ मंच पर आया और जेब से एक कागज निकालकर बड़े गर्व के साथ उच्च स्वर में पढ़ने लगा-

'प्रिय बंधुवर,

नमस्कार।

आपके पत्र से विदित होता है कि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है। मैं ईश्वर को साक्षी करके निवेदन करता हूँ कि निर्दिष्ट धन आपकी सेवा में इतनी गुप्त रीति से पहुँचेगा कि किसी को लेशमात्र भी संदेह न होगा। हाँ, केवल एक जिज्ञासा करने की धृष्ट ता करता हूँ। इस व्यापार को गुप्त रखने से आपको जो सम्मान और प्रतिष्ठा-लाभ होगा और मेरे निकटवर्ती में मेरी जो निंदा की जायगी, उसके उपलक्ष्य में मेरे साथ क्या रिआयत होगी? मेरा विनीत अनुरोध है कि 25 में से 5 निकालकर मेरे साथ न्याय किया जाय...।'

महाशय यशोदानंद घर में मेहमानों के लिए भोजन परसने का आदेश करने गये थे। निकले तो यह वाक्य उनके कान में पड़ा- ‘25 में से 5 निकाल कर मेरे साथ न्याय कीजिए।’ चेहरा फ़क हो गया, झपटकर लड़के के पास गये, कागज उसके हाथ से छीन लिया और बोले- नालायक, यह क्या पढ़ रहा है, यह तो किसी मुवक्किल का खत है जो उसने अपने मुकदमे के बारे में लिखा था। यह तू कहाँ से उठा लाया, शैतान, जा वह कागज ला, जो तुझे लिखकर दिया गया था।

एक महाशय- पढ़ने दीजिए, इस तहरीर में जो लुत्फ़ है, वह किसी दूसरी तक़रीर में न होगा।

दूसरे- जादू वह जो सिर पर चढ़ के बोले !

तीसरे- अब जलसा बरखास्त कीजिए। मैं तो चला।

चौथे- यहाँ भी चलतू हुए।

यशोदानंद- बैठिए-बैठिए, पत्तल लगाये जा रहे हैं।

पहले- बेटा परमानंद, जरा यहाँ तो आना, तुमने वह कागज कहाँ पाया ?

परमानंद- बाबूजी ही ने तो लिखकर अपनी मेज के अंदर रख दिया था। मुझसे कहा था कि इसे पढ़ना। अब नाहक मुझसे खफा हो रहे हैं।

यशोदानंद- वह यह कागज था सुअर ! मैंने तो मेज के ऊपर ही रख दिया था। तूने ड्राअर में से क्यों यह कागज निकाला ?

परमानंद- मुझे मेज पर नहीं मिला।

यशोदानंद- तो मुझसे क्यों नहीं कहा, ड्राअर क्यों खोला ? देखो, आज ऐसी खबर लेता हूँ कि तुम भी याद करोगे।

पहले- यह आकाशवाणी है।

दूसरे- इसको लीडरी कहते हैं कि अपना उल्लू भी सीधा करो और नेकनाम भी बनो।

तीसरे- शरम आनी चाहिए। यह त्याग से मिलता है, धोखेधड़ी से नहीं।

चौथे- मिल तो गया था पर एक आँच की कसर रह गयी।

पाँचवें- ईश्वर पाखंडियों को यों ही दंड देता है।

यह कहते हुए लोग उठ खड़े हुए। यशोदानंद समझ गये कि भंडा फूट गया, अब रंग न जमेगा, बार-बार परमानन्द को कुपित नेत्रों से देखते थे और डंडा तौलकर रह जाते थे। इस शैतान ने आज जीती-जितायी बाजी खो दी, मुँह में कालिख लग गयी, सिर नीचा हो गया। गोली मार देने का काम किया है।

उधर रास्ते में मित्र-वर्ग यों टिप्पणियाँ करते जा रहे थे-

एक- ईश्वर ने मुँह में कैसी कालिमा लगायी कि हयादार होगा तो अब सूरत न दिखाएगा।

दूसरा- ऐसे-ऐसे धनी, मानी, विद्वान लोग ऐसे पतित हो सकते हैं, मुझे तो यही आश्चर्य है। लेना है तो खुले खजाने लो, कौन तुम्हारा हाथ पकड़ता है; यह क्या कि माल भी चुपके-चुपके उड़ाओ और यश भी कमाओ !

तीसरा- मक्कार का मुँह काला !

चौथा- यशोदानन्द पर दया आ रही है। बेचारे ने इतनी धूर्तता की, उस पर भी कलई खुल ही गयी। बस एक आँच की कसर रह गयी।


  1. थोथी दलील 2. सिध्दान्तों 3. सिध्दान्त 4. धन 5. मूल्य 6. सभा 7. अनुमोदन 8. कर्त्तव्य 9. कदर।

एक आँच की कसर का सारांश

'एक आँच की कसर' कहानी शिक्षित मध्यवर्ग के सामाजिक पाखंड, दहेज-प्रथा की आड़ में स्वार्थसिद्धि और झूठी प्रतिष्ठा-कामी प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य करती है। महाशय यशोदानंद नगर के एक सम्मानित, शिक्षित और सुधारवादी नेता के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनके बड़े बेटे का विवाह तय हुआ है और पूरे प्रांत में यह खबर फैली हुई है कि यशोदानंद ने बिना एक भी पैसा दहेज लिए अपने बेटे का ब्याह करने का महान आदर्श प्रस्तुत किया है। अखबारों में उनकी तारीफें छप रही हैं और मित्रगण उन्हें सच्चा समाज-सुधारक बता रहे हैं।

विवाह के अवसर पर वर के तिलक का जलसा आयोजित होता है। यशोदानंद अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करते हुए अपने सिद्धांतों और आदर्शों का बखान करते हैं। वे मंच पर खड़े होकर दहेज-प्रथा के खिलाफ एक लंबा, प्रभावशाली व्याख्यान देते हैं और इसे सामाजिक कलंक बताते हैं। अपनी प्रतिष्ठा और सिद्धांतों का सिक्का जमाने के लिए वे अपने 7 वर्षीय छोटे बेटे परमानंद को भी मंच पर दहेज-विरोधी भाषण पढ़ने के लिए खड़ा करते हैं।

परंतु, एक हास्यास्पद घटना घटती है। मासूम बालक परमानंद अपनी मेज के दराज में रखा वह गुप्त पत्र निकालकर जोर-जोर से पढ़ने लगता है जो यशोदानंद ने वधू-पक्ष के स्वामीदयाल को भेजा था। उस पत्र में यशोदानंद ने ईश्वर की कसम खाकर दहेज की 25 हजार की रकम को अत्यंत गुप्त तरीके से पहुँचाने की बात लिखी थी और वधू-पक्ष से रिआयत के तौर पर 5 हजार रुपये कम (अर्थात बीस हजार) करने का विनीत अनुरोध किया था।

बालक द्वारा इस गुप्त पत्र के पढ़ते ही महफिल में सन्नाटा छा जाता है और यशोदानंद की सारी चालाकी तथा पाखंड का भंडाफोड़ हो जाता है। यशोदानंद लज्जित और क्रोधित होकर बच्चे पर बरस पड़ते हैं, पर मेहमान और मित्र समझ जाते हैं कि यशोदानंद मंच से दहेज-विरोधी भाषण केवल समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए दे रहे थे, जबकि पर्दे के पीछे वे भारी दहेज ऐंठने का सौदा कर चुके थे। 'एक आँच की कसर' रह जाने के व्यंग्यात्मक ताने के साथ मेहमान वहाँ से उठकर चले जाते हैं और यशोदानंद का सार्वजनिक सम्मान मिट्टी में मिल जाता है।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • सामाजिक पाखंड और दोहरे मापदंड: कहानी समाज के उन शिक्षित और प्रभावशाली नेताओं के पाखंड को उघाड़ती है जो सार्वजनिक जीवन में त्याग और सुधार का नाटक करते हैं, परंतु निजी जीवन में अत्यंत लालची और स्वार्थी होते हैं।
  • दहेज-प्रथा की गुप्त विकृति: प्रेमचंद यह दिखाते हैं कि दहेज-प्रथा केवल प्रत्यक्ष रूप से ही नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष और गुप्त सौदेबाजी के रूप में भी शिक्षित समाज में गहरी जड़ें जमाए हुए है।
  • बाल-सुलभ निश्छलता बनाम व्यस्क धूर्तता: सात साल के बालक परमानंद का अनजाने में सत्य को सबके सामने उजागर कर देना यह दर्शाता है कि एक बच्चे की निश्छल सच्चाई बड़े से बड़े चतुर व्यक्ति के रचे हुए झूठ के ताश के महल को ढहा सकती है।
  • दिखावे की प्रतिष्ठा का खोखलापन: यशोदानंद का चरित्र यह सिद्ध करता है कि धन भी कमाना और सुधारक की कीर्ति भी पाना—यह दोहरा स्वार्थ टिकाऊ नहीं होता और अंततः सत्य के सामने झूठी प्रतिष्ठा ध्वस्त हो जाती है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'एक आँच की कसर' शीर्षक स्वयं में एक मुहावरेदार रूपक है जो यह संदेश देता है कि पाखंड और छल की कलई अंततः सत्य की एक ज़रा-सी आँच से भी खुल जाती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "एक आँच की कसर." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1924, https://munshipremchand.com/works/short-stories/ek-aanch-ki-kasar. Accessed 22 Sep. 2026.