Cover Image for Motor Ke Chhinte (मोटर के छींटे) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1936•14 मिनट

मोटर के छींटे

Motor Ke Chhinte

प्रेमचंद की 'मोटर के छींटे' हास्य और व्यंग्य के माध्यम से वर्ग-अहंकार, सामाजिक असमानता और सार्वजनिक जीवन में शक्ति के असमान संबंधों पर चोट करती है। एक ब्राह्मण पंडित को तेज़ी से गुजरती मोटर कीचड़ के छींटों से भिगो देती है। अपमानित पंडित इसका बदला लेने के लिए मोटरवालों को रोकना शुरू कर देता है। धीरे-धीरे उसका निजी क्रोध सामाजिक प्रतिशोध का रूप ले लेता है। वह मोटरवालों को वही असुविधा और अपमान महसूस कराता है जिसे पैदल चलने वाले लोग झेलते हैं। एक अंग्रेज अधिकारी के साथ उसका टकराव कहानी के वर्ग और औपनिवेशिक सत्ता संबंधों को और तीखा कर देता है।

पात्र:पंडित, साहब, मेम साहब, मोटरवाले, पैदल यात्री
स्थान:भारी वर्षा के बाद उत्तर भारत की शहरी सड़क, जहाँ पैदल यात्री और विशेषाधिकार प्राप्त मोटर चालक असमान सार्वजनिक स्थान साझा करते हैं

मोटर के छींटे का मूल पाठ

क्या नाम कि... प्रात:काल स्नान-पूजा से निपट, तिलक लगा, पीताम्बर पहन, खड़ाऊँ पाँव में डाल, बगल में पत्रा दबा, हाथ में मोटा-सा शत्रु-मस्तक-भंजन ले एक जजमान के घर चला। विवाह की साइत विचारनी थी। कम-से-कम एक कलदार का डौल था। जलपान ऊपर से। और मेरा जलपान मामूली जलपान नहीं है। बाबुओं को तो मुझे निमन्त्रित करने की हिम्मत ही नहीं पड़ती। उनका महीने-भर का नाश्ता मेरा एक दिन का जलपान है। इस विषय में तो हम अपने सेठों-साहूकारों के कायल हैं, ऐसा खिलाते हैं, ऐसा खिलाते हैं, और इतने खुले मन से कि चोला आनन्दित हो उठता है। जजमान का दिल देखकर ही मैं उनका निमन्त्रण स्वीकार करता हूँ। खिलाते समय किसी ने रोनी सूरत बनायी और मेरी क्षुधा गायब हुई। रोकर किसी ने खिलाया तो क्या ? ऐसा

भोजन कम-से-कम मुझे नहीं पचता। जजमान ऐसा चाहिए कि ललकारता जाय लो शास्त्रीजी, एक बालूशाही और, मैं कहता जाऊँ ... नहीं जजमान अब नहीं !

रात खूब वर्षा हुई थी, सड़क पर जगह-जगह पानी जमा था। मैं अपने विचारों में मगन चला जाता था कि एक मोटर छप-छप करती हुई निकल गयी। मुँह पर छींटे पड़े। जो देखता हूँ, तो धोती पर मानो किसी ने कीचड़

घोलकर डाल दिया हो। कपड़े भ्रष्ट हुए, वह अलग, देह भ्रष्ट हुई, वह अलग, आर्थिक क्षति जो हुई, वह अलग। अगर मोटरवालों को पकड़ पाता, तो ऐसी मरम्मत करता कि वे भी याद करते। मन मसोसकर रह गया। इस वेश में जजमान के घर तो जा नहीं सकता था, अपना घर भी मील-भर से कम न था। फिर आने-जाने वाले सब मेरी ओर देख-देखकर तालियाँ बजा रहे थे। ऐसी दुर्गति मेरी कभी नहीं हुई थी। अब क्या करोगे मन ? घर जाओगे, तो पण्डिताइन क्या कहेंगी ?

मैंने चटपट अपने कर्तव्य का निश्चय कर लिया। इधर-उधर से दस-बारह पत्थर के टुकड़े बटोर लिये और दूसरी मोटर की राह देखने लगा। ब्रह्मतेज सिर पर चढ़ बैठा ! अभी दस मिनट भी न गुजरे होंगे कि एक मोटर आती

हुई दिखायी दी ! ओहो वही मोटर थी। शायद स्वामी को स्टेशन से लेकर लौट रही थी। ज्यों ही समीप आयी, मैंने एक पत्थर चलाया, भरपूर जोर लगाकर चलाया। साहब की टोपी उड़कर सड़क के उस बाजू पर गिरी। मोटर की चाल धीमी हुई। मैंने दूसरा फैर किया। खिड़की के शीशे चूर-चूर हो गये और एक टुकड़ा साहब बहादुर के गाल में भी लगा। खून बहने लगा। मोटर रुकी और साहब उतरकर मेरी तरफ आये और घूँसा तानकर बोले ‘सूअर, हम तुमको पुलिस में देगा।‘ इतना सुनना था कि मैंने पोथी-पत्रा जमीन पर फेंका और साहब की कमर पकड़कर अडंग़ी लगायी, तो कीचड़ में भद-से गिरे। मैंने चट सवारी गाँठी और गरदन पर एक पचीस रद्दे ताबड़तोड़ जमाये कि साहब चौंधिया

गये। इतने में उनकी पत्नीजी उतर आयीं। ऊँची एड़ी का जूता, रेशमी साड़ी, गालों पर पाउडर, ओठों पर रंग, भॅवों पर स्याही, मुझे छाते से गोदने लगीं। मैंने साहब को छोड़ दिया और डंडा सम्भालता हुआ बोला, ‘देवीजी, आप मरदों के बीच में न पड़ें, कहीं चोट-चपेट आ जाय, तो मुझे दु:ख होगा।‘

साहब ने अवसर पाया, तो सम्हलकर उठे और अपने बूटदार पैरों से मुझे एक ठोकर जमायी। मेरे घुटने में बड़ी चोट लगी। मैंने बौखलाकर डंडा उठा लिया। और साहब के पाँव में जमा दिया। वह कटे पेड़ की तरह गिरे।

मेम साहब छतरी तानकर दौड़ीं। मैंने धीरे से उनकी छतरी छीनकर फेंक दी। ड्राइवर अभी तक बैठा था। अब वह भी उतरा और छड़ी लेकर मुझ पर पिल पड़ा। मैंने एक डंडा उसके भी जमाया, लोट गया। पचासों आदमी तमाशा देखने जमा हो गए। साहब भूमि पर पड़े-पड़े बोले, ‘रैस्केल, हम तुमको पुलिस में देगा।‘ मैंने फिर डंडा सँभाला और चाहता था कि खोपड़ी पर जमाऊँ कि साहब ने हाथ जोड़कर कहा, ‘नहीं-नहीं, बाबा, हम पुलिस में नहीं जायगा, माफी दो।‘

मैंने कहा, ‘हाँ, पुलिस का नाम न लेना, नहीं तो यहीं खोपड़ी रंग दूंगा। बहुत होगा छ: महीने की सजा हो जायगी, मगर तुम्हारी आदत छुड़ा दूंगा। मोटर चलाते हो, तो छींटे उड़ाते चलते हो, मारे घमण्ड के अन्धे हो जाते हो। सामने या बगल में कौन जा रहा है, इसका कुछ ध्यान ही नहीं रखते। एक दर्शक ने आलोचना की ‘अरे महाराज, मोटरवाले जान-बूझकर छींटे उड़ाते हैं और जब आदमी लथपथ हो जाता है, तो सब उसका तमाशा देखते हैं। और खूब हँसते हैं। आपने बड़ा अच्छा किया, कि एक को ठीक कर दिया।‘

मैंने साहब को ललकारकर कहा, ‘सुनता है कुछ, जनता क्या कहती है। साहब ने उस आदमी की ओर लाल-लाल आँखों से देखकर कहा, ‘तुम झूठ बोलता है, बिलकुल झूठ बोलता है।‘

मैंने डाँटा –‘अभी तुम्हारी हेकड़ी कम नहीं हुई, आऊँ फिर और दूं एक सोंटा कसके ?’

साहब ने घिघियाकर कहा, ‘अरे नहीं बाबा, सच बोलता है, सच बोलता है। अब तो खुश हुआ।‘

दूसरा दर्शक बोला, ‘अभी जो चाहें कह दें, लेकिन ज्यों ही गाड़ी पर बैठे, फिर वही हरकत शुरू कर देंगे। गाड़ी पर बैठते ही सब अपने को नवाब का नाती समझने लगते हैं।‘

दूसरे महाशय बोले, ‘इससे कहिए थूककर चाटे।‘

तीसरे सज्जन ने कहा, ‘नहीं, कान पकड़कर उठाइए-बैठाइए।‘

चौथा बोला, ‘अरे ड्राइवर को भी। ये सब और बदमाश होते हैं। मालदार आदमी घमण्ड करे, तो एक बात है, तुम किस बात पर अकड़ते हो। चक्कर हाथ में लिया और आँखों पर परदा पड़ा।‘

मैंने यह प्रस्ताव स्वीकार किया। ‘ड्राइवर और मालिक दोनों ही को कान पकड़कर उठाना-बैठाना चाहिए और मेम साहब गिनें। सुनो मेम साहब, तुमको गिनना होगा। पूरी सौ बैठकें। एक भी कम नहीं, ज्यादा जितनी चाहें, हो जायँ। दो आदमियों ने साहब का हाथ पकड़कर उठाया, दो ने ड्राइवर महोदय का। ड्राइवर बेचारे की टाँग में चोट थी, फिर भी वह बैठकें लगाने लगा। साहब की अकड़ अभी काफी थी। आप लेट गये और ऊल-जलूल बकने लगे। मैं उस समय रुद्र बना हुआ था। दिल में ठान लिया था कि इससे बिना सौ बैठकें लगवाये न छोङूँगा। चार आदमियों को हुक्म दिया कि गाड़ी को ढकेलकर सड़क के नीचे गिरा दो।

हुक्म की देर थी। चार की जगह पचास आदमी लिपट गये और गाड़ी को ढकेलने लगे। वह सड़क बहुत ऊँची थी। दोनों तरफ की जमीन नीची। गाड़ी नीचे गिरती और टूट-टाटकर ढेर हो जाती। गाड़ी सड़क के किनारे तक

पहुँच चुकी थी, कि साहब काँखकर उठ खड़े हुए और बोले बाबा, गाड़ी को मत तोड़ो, हम उठे-बैठेगा।

मैंने आदमियों को अलग हट जाने का हुक्म दिया; मगर सबों को एक दिल्लगी मिल गयी थी। किसी ने मेरी ओर ध्यान न दिया। लेकिन जब मैं डंडा लेकर उनकी ओर दौड़ा तब सब गाड़ी छोड़कर भागे और साहब ने आँखें बन्द करके बैठकें लगानी शुरू कीं। मैंने दस बैठकों के बाद मेम साहब से पूछा, ‘क़ितनी बैठकें हुईं ?’

मेम साहब ने रोब से जवाब दिया, ‘हम नहीं गिनता।‘

'तो इस तरह साहब दिन-भर काँखते रहेंगे और मैं न छोङूँगा। अगर उनको कुशल से घर ले जाना चाहती हो, तो बैठकें गिन दो। मैं उनको रिहा कर दूंगा।'

साहब ने देखा कि बिना दंड भोगे जान न बचेगी, तो बैठकें लगाने लगे। एक, दो, तीन, चार, पाँच।

सहसा एक दूसरी मोटर आती दिखायी दी। साहब ने देखा और नाक रगड़कर बोले, ‘पंडितजी, आप मेरा बाप है ! मुझ पर दया करो, अब हम कभी मोटर पर न बैठेगा। मुझे भी दया आ गया। बोला, ‘नहीं, मोटर पर बैठने

से मैं नहीं रोकता, इतना ही कहता हूँ कि मोटर पर बैठकर भी आदमियों को आदमी समझो।‘

दूसरी गाड़ी तेज चली आती थी। मैंने इशारा किया। सब आदमियों ने दो-दो पत्थर उठा लिये। उस गाड़ी का मालिक स्वयं ड्राइव कर रहा था।

गाड़ी धीमी करके धीरे से सरक जाना चाहता था कि मैंने बढ़कर उसके दोनों कान पकड़े और खूब जोर से हिलाकर और दोनों गालों पर एक-एक पड़ाका देकर बोला, ‘ग़ाड़ी से छींटा न उड़ाया करो, समझे। चुपके से चले जाओ।‘

यह महोदय बक-झक तो करते रहे; मगर एक सौ आदमियों को पत्थर लिये खड़ा देखा, तो बिना कान-पूँछ डुलाये चलते हुए। उनके जाने के एक ही मिनट बाद दूसरी गाड़ी आयी। मैंने 50 आदमियों

को राह रोक लेने का हुक्म दिया। गाड़ी रुक गयी। मैंने उन्हें भी चार पड़ाके देकर विदा किया; मगर यह बेचारे भले आदमी थे। मजे से चाँटें खाकर चलते हुए।

सहसा एक आदमी ने कहा, ‘पुलिस आ रही है।‘

और सब-के-सब हुर्र हो गये ! मैं भी सड़क के नीचे उतर गया और एक गली में घुसकर गायब हो गया !


मोटर के छींटे का सारांश

कथावाचक एक कर्मकांडी व ज्योतिषी ब्राह्मण पंडित है, जो स्नान-पूजा करके, पीतांबर पहनकर, तिलक लगाकर और हाथ में मोटा डंडा (शत्रु-मस्तक-भंजन) लेकर एक यजमान के घर विवाह का मुहूर्त निकालने निकलता है। रास्ते में वह मिलने वाली दक्षिणा और स्वादिष्ट जलपान की सुखद कल्पनाओं में मग्न रहता है। रात को भारी बारिश होने के कारण सड़क पर जगह-जगह पानी जमा था। तभी एक तेज रफ्तार मोटर पानी के गड्ढे में से गुजरती है और कीचड़ के छींटे पंडित के शरीर, पीतांबर और चेहरे पर उलीच देती है। पंडित के कपड़े और पूजा का स्वरूप भ्रष्ट हो जाता है तथा राहगीर उसकी दुर्दशा देखकर हँसते-तालियाँ बजाते हैं।

अपमान और क्रोध से तिलमिलाया पंडित बदला लेने का निश्चय करता है। वह सड़क किनारे से पत्थर के टुकड़े बटोर लेता है। संयोग से वही मोटर लौटती हुई दिखाई देती है। पंडित पूरी ताकत से पत्थर चलाता है, जिससे साहब की टोपी उड़ जाती है और दूसरा पत्थर लगने से मोटर का शीशा टूटकर साहब के गाल पर लगता है, जिससे खून बहने लगता है। साहब गुस्से में उतरकर पंडित को गाली देता है और पुलिस की धमकी देता है। पंडित डंडा सँभालकर साहब को ज़मीन पर पटक देता है और उस पर वार करने लगता है। मेमसाहब अपने पति को बचाने के लिए छाते से पंडित पर हमला करती हैं और ड्राइवर भी छड़ी लेकर आ जाता है, परंतु पंडित डंडे के वार से दोनों को पछाड़ देता है।

तभी पचास से अधिक पैदल राहगीर एकत्र हो जाते हैं और पंडित का समर्थन करते हैं। राहगीर बताते हैं कि मोटरवाले जान-बूझकर गरीबों और पैदल चलने वालों पर कीचड़ उड़ाते हैं। पंडित के रौद्र रूप और जनता के आक्रोश को देखकर साहब और ड्राइवर घबरा जाते हैं और माफी माँगने लगते हैं। भीड़ के कहने पर पंडित साहब और ड्राइवर को सौ-सौ उठक-बैठक (कान पकड़कर) करने की सजा सुनाता है और मेमसाहब से गिनती करने को कहता है। जब साहब हिचकिचाता है, तो पंडित भीड़ को मोटर को खाई में ढकेलने का आदेश देता है। डर के मारे साहब तुरंत उठक-बैठक लगाने लगता है।

इसके बाद पंडित सड़क से गुजरने वाली अगली मोटरों को भी रुकवाता है और उनके ड्राइवरों को कान पकड़कर थप्पड़ मारता है तथा सड़क पर पैदल चलने वालों की गरिमा का ध्यान रखने की चेतावनी देता है। पंडित साहब को समझाता है कि उसे मोटर चलाने से कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन मोटर पर बैठकर इंसानों को इंसान समझना चाहिए। तभी कोई चिल्लाता है कि पुलिस आ रही है। यह सुनते ही भीड़ तितर-बितर हो जाती है और पंडित जी भी सड़क से नीचे उतरकर एक संकरी गली में गायब हो जाते हैं।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • वर्ग-अहंकार और सामाजिक असमानता पर व्यंग्य: कहानी मोटर मालिकों और औपनिवेशिक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के दंभ पर तीखा हास्य-व्यंग्य करती है। यह दिखाती है कि कैसे संपन्न वर्ग पैदल चलने वाले साधारण नागरिकों को तुच्छ और असहाय समझता है।
  • सार्वजनिक स्थान और गरिमा का प्रश्न: कहानी यह सवाल उठाती है कि सार्वजनिक सड़कें सभी नागरिकों की हैं। मोटरगाड़ी या धन का होना किसी व्यक्ति को दूसरों की गरिमा और सुविधा की उपेक्षा करने का अधिकार नहीं देता।
  • औपनिवेशिक सत्ता-संबंधों का हास्यास्पद उलटफेर: एक साधारण भारतीय पंडित द्वारा एक अंग्रेज अधिकारी (साहब) को कान पकड़कर उठक-बैठक कराने का दृश्य औपनिवेशिक शक्ति-संरचना को हास्यास्पद तरीके से उलट देता है, जहाँ शोषित वर्ग थोड़ी देर के लिए शोषक पर हावी हो जाता है।
  • भीड़ की अनौपचारिक शक्ति और उसकी सीमाएँ: पंडित राहगीरों और भीड़ के अनौपचारिक समर्थन से मोटरवालों को सबक सिखाने में सफल होता है, परंतु 'पुलिस' (संस्थागत सत्ता) का नाम सुनते ही भीड़ का बिखर जाना सामूहिक शक्ति की सीमा और व्यवस्था के स्थायी डर को उजागर करता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'मोटर के छींटे' प्रेमचंद की एक अत्यंत रोचक, चुटीली और विचारोत्तेजक रचना है। यह कहानी हास्य और अतिशयोक्ति के माध्यम से आधुनिक तकनीक के साथ आने वाले मानवीय अहंकार को बेनकाब करती है और समाज में आपसी सम्मान व संवेदनशीलता की वकालत करती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "मोटर के छींटे." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1936, https://munshipremchand.com/works/short-stories/motor-ke-chhinte. Accessed 22 Sep. 2026.