अंग्रेजी भाषा का रोग
Angrezi Bhasha Ka Rog
प्रेमचंद की तीखी टिप्पणी जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं और शिक्षित वर्ग में अंग्रेजी के बढ़ते रोग और मानसिक दासता की आलोचना करते हुए राष्ट्रभाषा हिन्दी को अपनाने पर बल दिया है।
Editorials
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रेमचंद द्वारा लिखित सामयिक, सामाजिक और राजनीतिक सम्पादकीय।
37 रचनाएँ
Angrezi Bhasha Ka Rog
प्रेमचंद की तीखी टिप्पणी जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं और शिक्षित वर्ग में अंग्रेजी के बढ़ते रोग और मानसिक दासता की आलोचना करते हुए राष्ट्रभाषा हिन्दी को अपनाने पर बल दिया है।
Bombay Ke Ek Magistrate Ka Bhram
शोलापुर दिवस मनाने पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं को दंड देने वाले बम्बई के मजिस्ट्रेट के तर्क का खंडन करते हुए प्रेमचंद अन्याय के विरुद्ध रोने और विरोध करने के स्वाभाविक अधिकार का समर्थन करते हैं।
Congress Zindabad
दांडी मार्च के एक वर्ष पूरे होने और गांधी-इरविन समझौते पर प्रेमचंद कांग्रेस की नैतिक व राजनीतिक विजय का अभिनंदन करते हैं और सत्याग्रह में महिलाओं की ऐतिहासिक भूमिका की सराहना करते हैं।
Congress
गांधी-इरविन समझौते के समर्थन और मजदूरों-किसानों के हितों को समर्पित स्वराज्य की नई व्याख्या पर प्रेमचंद का सम्पादकीय विचार।
Desh Ki Vartaman Paristhiti
आर्थिक संकट के समय किसानों को भड़काऊ राजनीति और हिंसा से बचाकर महात्मा गांधी के अहिंसक व सत्य के मार्ग पर अडिग रहने का आह्वान करता सम्पादकीय।
Fauji College Ki Aayojana
प्रेमचंद की टिप्पणी जिसमें उन्होंने भारतीय सेना के सैन्यीकरण और फौजी कालेज की ब्रिटिश योजना की धीमी गति तथा औपनिवेशिक नीयत की आलोचना की है।
Golmez Parishad Mein Golmal
प्रेमचंद का सम्पादकीय जिसमें गोलमेज परिषद् के साम्प्रदायिक गतिरोध, ब्रिटिश चालों और शिक्षित वर्ग की स्वार्थपरता की तीखी भर्त्सना करते हुए राष्ट्रीय एकता का आह्वान किया गया है।
Gori Jatiyon Ka Prabhav Kyon Kam Ho Raha Hai
लॉर्ड इरविन के कथन के संदर्भ में भारत में गोरी जातियों और पश्चिमी साम्राज्यवाद के नैतिक व सांस्कृतिक पतन के कारणों का प्रेमचंद द्वारा गहरा विश्लेषण।
Hamare Netaon Ki Bahki Batein
मौलाना शौकत अली और सरदार पटेल जैसे शीर्ष नेताओं के उत्तेजक व गैर-जिम्मेदाराना बयानों की आलोचना करते हुए संयम व विनम्रता का आह्वान करता प्रेमचंद का सम्पादकीय।
Karmveer Vidyarthi Ji
मार्च 1931 के कानपुर दंगों में पीड़ितों की रक्षा करते हुए शहीद हुए गणेश शंकर विद्यार्थी को मुंशी प्रेमचंद की भावभीनी श्रद्धांजलि।
Kuchh Apne Vishay Mein
'हंस' के प्रथम वर्ष की पूर्णता पर प्रेमचंद का आत्मचिंतन, जिसमें उन्होंने पत्रिका के साहित्यिक आदर्शों और व्यवसायिकता से परे जनसेवा के संकल्प को दोहराया है।
Mahatma Ji Ki Vijay Yatra
प्रेमचंद का सम्पादकीय जिसमें महात्मा गांधी की लंदन गोलमेज यात्रा के संदर्भ में ब्रिटिश कूटनीति और साम्प्रदायिक एकता की अनिवार्य आवश्यकता का विश्लेषण किया गया है।