Cover Image for Munshi Gorakhprasad Ibrat (मुंशी गोरखप्रसाद 'इबरत') by Munshi Premchand - Non-Fiction
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संस्मरण•1919•9 मिनट

मुंशी गोरखप्रसाद 'इबरत'

Munshi Gorakhprasad Ibrat

गोरखपुर के विख्यात वकील, निस्पृह सिद्धहस्त शायर मुंशी गोरखप्रसाद 'इबरत' (फ़िराक़ गोरखपुरी के पिता) के व्यक्तित्व, दीवान और उनकी सादगीपूर्ण मसनवियों व ग़ज़लों पर मुंशी प्रेमचंद का संस्मरणात्मक लेख।

Work Details

प्रकार: संस्मरण
वर्ष: 1919
पठन समय: 9 मिनट (1,276 शब्द)

मुंशी गारखप्रसाद ' इबरत'

स्वर्गीय मुंशी गौरखप्रसाद 'इबग्त' सिद्धहस्त कवि थे। यद्यपि उनका पेशा वकाल। था और बह गोरखपुर बार के खास वक्ोलों म॑ थे लेकिन कानूनी व्यस्तताओं के बाच भी अपनी कविता के अभ्यास के लिए कुछ-न कुछ समय निकाल लिया करत थे ख्याति की लालसा न थी, इसलिए बगबर अपनी कविता के प्रकाशन से बचते रह। उनकी कविता का रंग मौलाना आजाद और हाली से मिलता हुआ है। शैली सहज और सुलझी हुई, भाव सरल और बनावट से खाली। शुरू में उनकी कुछ कबिताए ' तूतिए हिन्द! और ' अवध पंच' में प्रकाशित हुई थीं और बहुत पसंद की गयी थी, लेकिन जवानी के साथ आत्म प्रदर्शन को कामना भी जाती रही। जो कुछ लिखत थे वह सिफ अपने दिलबहलाव और मानसिक तृप्ति के लिए लिखते थे। किसी उस्ताद के शागिद न थे, इसी वजह से कविता में कहीं कहीं जुटियां दिखायी पढ़ती हैं। उनके दौवान में कुछ मुसदस, एक मसनवी, कुछ फ्टकर नज्में और गजलें हैं। उनके साहबनादे बाबू रघुपति सहाय बी० ए०, जिनका एक लेख जमाना में छप चुका है, एक झिन्दा दिल और रुचि संपन्न नवयुवक हैं। वह अपने स्वर्गीय पिता को रचनाओं का संपादन कर रहे हैं और जल्दी ही दीवान प्रकाशित होगा। नौचे हम उनके दौवान से कुछ

शेर नकल करते हैं। उनसे दिवंगत के अभ्यास की प्रौदता और काव्य-प्रतिभा का सुंदर परिचय मिल जायेगा-

कहीं है वो बेहतर नमूदे सूर से जो आलम यहां आशकारा नहीं है मं यंध्ऋ कहती है रूहे पाक खुदा से में कम नहीं मजबूर हूं मगर कि उसे इख्तियार है जप मर मर में बर्ग हूं न बार हूं न गुल हूं न खार हूं लूटे खिज़ां जिसे न कभी वह बहार हूं. के कं के में दौरे जुनें में न हुआ अक्ल से बाहर, आप अपने गरेबां को फाड़ा भी सिया भा कक के के क्या तुमको खबर तुमन तो करवट भी न बदली , मैं दर्द से सौ मर्तबा बैठा भी उटा भी

हंगामा ए हसरत

हूं पूर बहुत घर से साथी है न हमदम है नातजर्बाकारी है कुछ खौफ है कुछ गम है कुछ घर का मुहब्बत है कुछ याद है यारा को जाती हो नहीं दिल से बू पिछली बहारों को कुछ यारों की मोहबत का लुत्फ आंखा में छाया हैं कुछ जोशे मुहब्बत से दिल अपना भर आया है वह वक्त भी क्या खुरश हैं मब दोस्त जब आपस में बासिद्कों सफा बेठे इक दूसरे के बस में अखलाक बरतते हों आपस मंवह मिल-जुलकर और लुत्फ उठाता हो हर एक का दिल खुलकर कक फऊृं लेकिन नहीं केफोयत यह अपने मुकर्ूृर मे सोदा तो समाया है कुछ और भी इस सर में कुछ और ही मकसद है इस उम्ने तबीई का हमदर्द जो हाथ आये कुछ हाल कहूं जी का उम्मीद झलक अपनी है दूर से दिखलाती जब उसपे लपकता हूं वह हाथ नहीं आती गो पेशे नजर मेरे दुनिया का समेला हे पर बख्त मेरा मुझको लिये जाता अकेला है ककं्क हां देख तअम्मुल से क्या रूए जमोीं पर है जंगल हैं जजीरा है सहरा है समंदर हे

पस्ती है बलंदी है है बस्ती ओ वबोराना दिलबंद नुमाइश है है शौकते शाहाना यह शहर जहां हरदम हंगामा ए हस्ती हे टकसालों में हलचल हे मैखानों में मस्ती है बाजारों में रौनक है दोतर्फा दुकानों से इक लुत्फ टपकता है सब ऊचे मकानों से यह सब्ज जमीं उगता जिसमें गुलो लाला है और जिसका हरम से भी कुछ हुस्न दोबाला है इठलाती हुई जिस पर है बादे सबा जाती सरसर है जहां आकर कुछ गर्द उड़ा जाती ऊपर से बरसता है रहमत का जहां पानी शबनम सरे सब्जा पर करती है दुरअफशानी ये नहर कि जिससे है उन खेतों को शादाबी ये झील कि हैं जिस पर पर मारते मुर्गाबी ये बहर नहीं मिलता कुछ जिसका किनारा है पानी पे रवां कश्ती मौजों का सहारा है अलकिस्सा समां जितना नजरों में समाया है हर एक इशारा है यह मुझको बताता है हां तहते तसर्रुक में सब नेमतें मेरी हैं बाहोशों खिरद में हूं केफीयतें मेरी हैं गो दायराएं खलकत सब तर्ह॑ मुजय्यन है जंगल है शिकारों को और सैर को गुलशन है पर जैसा कि इक मुमसिक दिलदादा खज़ाने का है देखता खुश होकर गंज अपने सिरहाने का सब कौसए ज़र अपना वह खोलके रहता है ले लेकर खरा-खोटा उनमें से परखता है रखता है अगर्चे वो इक गंजे गरांमाया दिल पर नहीं पड़ता है कुछ उसके मगर साया बेसब्रिए खातिर से अहवाल दिगरगू है इक बूंद से कमतर है पर सामने जेहू है हसरत भरी दिल में है कह कहके यही रोता हां कुछ तो है पास अपने पर और भी कुछ होता वैसा ही मेरा दिल भी पाबन्द हवस का है दुनिया के कशाकश में दामन मेरा मसका हे दिल अपना तड़पता है इक ऐसी मसर्रत को दुनिया के बखेड़ों से ज़ाइल जो न होती हो

लेस्ख, भाषण , संस्मरण : 204

जो सूरते तस्कीं हो अपने दिलो दीदा को जमींयते खातिर हो जो होशे रमीदा की कुछ लुत्फ सिवा जिससे हो दिल के तरानों में इक मीठी सदा आती हर वक्त हो कानों में दिल नग्मए दिलकश से मसरूर रहे हरदम दुनिया की बलाओं से दिल दूर रहे हरदम मं जुट कं पर हैफ खुशी ऐसी कब रूए जमीं पर हे अंबोह में हसरत के जिसका नहीं बिस्तर हे वो लोग कि रहते हैं जो सर्द मकामों में कहते हैं खुशी उनकी है मैं-भरे जामों में वह कौम का हमदम जो हमदर्दियां करता हैं कहता है इसी पर कुछ आलम यह गुजरता है और चैसे ही मरता जो हुब्बुलवतनी पर है कहता है निगाहों में उसकी वही मंजर है > कया जो हकौकत में दिल उनका ट्टोलू मैं इतक्त आंख झपकने में कलई अभी स्वोलू में महलों में जलायें ये हरचन्द दिया घो का पर वक्त सहर जब हो अहवाल खुले जी का सब मादरे गेती के आगोश में पलते हैं इक बक्‍ते मुऐेयन तक दुनिया में मचलते हैं इक्त तौर पे नेचर का है दस्त करम सब पर गर्दू में छुपा सबकी किस्मत का नविद्ता है हाथों में फकत बाकी तदबीर का रिश्ता है जो लोग नहाते हैं मेहनत के पसीनों में पाते हैं जरा ठंडक कुल्फतजदा सोनों में जिस तहीं मुसाफिर इक दिल खस्ता थका- मांदा हसरतजदा अफसुर्दा और खाक बसर रांदा उम्मीर्द लिये दिल में तनहा चला जाता हो गर्दिश के जमाने की वो खाक उड़ाता हो और गुल्शने मोॉजिल हो उसका बड़ी दूरी पर इक ओस पड़ी हो जिससे सुबूरी पर मैखाने इसी हालत में हमदमे दैरीना छातो से लगा जिसको ठंडा वो करे सीना पर थोडे हो असे में वह दोनों जुदा होकर बाहम यले मिल- मिलकर हसरतजदा रो-रोकर

जाते रहैं आखिर वो अपनी रहे मंजिल को खुश एक घड़ी करके अरमान भरे दिल को वैसी ही खुशी सबकी इक दम में छलावा है उम्मीद की चालों में अफलाक का कावा है रह जाती फकत हसरत है दिल के दुखाने को उम्मीद अभी आयी और है अभी जाने को कु के कं इक दम के लिए तनहा होने दो जरा मुझको इन्सान की हालत पर रोने दो जरा मुझको ऐ वाये जमाना में जो सबसे निराला है वह कशमकरशे हसरत से यूं तहोबाला है इस उपद्रे तबीई की कमबख्त घड़ी थी वो औकात बनी आदम की सख्त घड़ी थी वो हसरत ने जमाया जब इन्सान पे रंग अपना शैतान ने फाड़ा जब यह सीनए संग अपना के कु कं नैरंग जमाना की सब बूकलमूनी है तस्कीन न हो दिल को किस्मत की जुबूनी हैं बुसअत है कहां इतनी नेचर के खजीने में आसूदगी जो भर दे हसरत भरे सीने म॑ जब तक कि यह दुनिया है जब तक कि यह इसरत है इक खलबलो दिल में है हंगामा ए हसरत है।


प्रकाशन इतिहास

[उर्दू लेख। “जमाना ', नवम्बर , 1909 मे प्रकाशित। हिन्दी रूप विविध प्रसंग” भाग-3 मे संकलित] इस लेख में एक उपणीर्षक 'हगामा ए हसरत' भो है।|]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "मुंशी गोरखप्रसाद 'इबरत'." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1919, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/munshi-gorakhprasad-ibrat. Accessed 22 Sep. 2026.