Cover Image for Aatm-Katha Kya Sahitya Ka Ang Nahin Hai? (आत्मकथा क्या साहित्य का अंग नहीं है?) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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निबंध•1932•5 मिनट

आत्मकथा क्या साहित्य का अंग नहीं है?

Aatm-Katha Kya Sahitya Ka Ang Nahin Hai?

प्रेमचंद आत्मकथा को साहित्य का अत्यंत उपयोगी व प्रेरक अंग सिद्ध करते हुए 'हंस' के आत्मकथांक की सार्थकता और महत्ता को रेखांकित करते हैं।

Work Details

प्रकार: निबंध
वर्ष: 1932
पठन समय: 5 मिनट (617 शब्द)

प्रयाग क ' मारत' के कभी-कभी साहित्यिक आलोचनाएं भी छपती हैं। लेखक का नाम नहीं दिया जाता, इससे अनुमान होता है कि संपादकीय विभाग द्वारा ही उनकी रचना होती हो। इन आलोचनाओं में हमेशा कोईइं-न-कोई नई चौंकाने वाली बात कही जाती है, जिससे यह सिद्ध हो कि लेखक कितने मौलिक विचारों और गहरी सूझ का स्वामी है। हम उसकी यह प्रवृत्ति कई महीनों से देखते चले आते हैं। इन लेखों की खास खूबी यह है कि आदि से अंत तक पढ़ जाइए, आपको यह न मालूम होगा कि लेखक क्या कहता है। समाचार-पत्रों के संपादक कुछ डिप्लोमेटिक भाषा तो लिखते ही हैं, और डिप्लोमेटिक भाषा का मुख्य गोरव यही है कि उसके मनमाने अर्थ लगाए जा सकें। फिर भाषा का उद्ृश्य यह भो तो है कि वह :नोभाव को छिपाये। शायद इन आलोचनाओं के लेखक महोदय इसी स्कूल के उपसक हें।

7 दिसंबर के ' भारत' में ' हिन्दी के विकास में बाधा नाप से एक लेख प्रकाशित हुआ है, जिसके पूर्वार्द्ध में तो लेखक ने माहित्य- सम्मेलन की खबर ली है। उससे हमारा प्रयोजन नहीं। साहित्य -सम्मेलन वाले देखें कि उसका क्या अर्थ है-सम्मेलन को प्रशंसा या निंदा।

उत्तार्ट् में आप सम्मेलन को छोडकर साहित्य की प्रोप॑गैडिस्ट वृत्ति पर आ गए हैं और पं5 बनारसीदास जी चतुर्वेदी को फटकार बताई है -पंडित बनारसीदास को इस तरह के साहित्य का आचार्य कहा है। किसी का जीवन -चिरत्र लिखना, किसी का संस्मरण लिखना उनके खयाल में प्रोपेगं है, क्योंकि उक्त पोडत जी न इसके सिवा तो कोई अपराध नहीं किया। इससे भो हमे प्रयोजन नहीं। पंडित जो अपनी सफाई दे देंगे। पा

हमें तो उसे लेख के केबल उस अंश के विषय में दो शब्द कहने हैं, ज आलोचक महोदय ने 'हंस' के आने वाले 'आत्म-क्थांक' के विषय में लिखा है।

हमने तो कभी प्रोपेगेंडा नहीं किया, हमारा बड़े-से-बड़ा दुश्मन भी हमारे ऊपर यह आक्षेप नहीं कर सकता।

आप फरमाते हैं, '*पत्र-पत्रिकाओं में दो अक्षर लिख लेने वाले लेखकों के चित्रों की वृद्धि, संपादकौय विभाग के व्यक्तियों की अपने पद को बढ़ाकर मान करने की मिथ्या लिप्सा आदि इसी के भावांतर रूप हैं, ओर इस संबंध की अंतिम प्रगति यह है कि सहयोगी 'हंस' आत्मकथांक नाम का विशेषांक निकाल रहा है, जिसमें सब लोग अपनी-अपनी गाथाएं गायेंगे। यदि 'हंस' ने नीर- क्षीर-विवेक न रक्‍्खा तो कुल मिलाझर हिन्दी की शक्ति क्षीण ही होगी और कोई लाभ न होगा।"'

हम पूछते हैं, आपने यह केसे समझ लिया कि 'हंस' नीर- क्षीर-विवेक न करेगा और हर ऐरे-गैरे नत्थू-खेरे की आत्मकथा छापेगा? उसने अपनी गझती चिद्ठ्री में, जो उसने लेखक महानुभावों की सेवा में भेजी है, लिखा है, “आत्मकथा साहित्य का कितना उपयोगी अंग है, यह आप जानते ही हैं। शिष्ट पुरुषों की आत्मकथा से ही आने वाली संतान उपदेश ग्रहण करती है और उस समय जब वह पथश्रष्ट-सी होकर भटकने लगती है, तब यह महान पुरुषों के अपने लिखे अनुभव ही हैं, जो उसके लिए पथ-प्रदर्शक बन जाते हैं।''

हम समझते हैं कि चिट्ठी ' भारत' कार्यालय अवश्य पहुंची होगी और उसे पढ़ ऋर भी उसने अनायास ही गेहूं के साथ घुन को पीस डाला। हम अपने आलोचक प्रिय से निवेदन करते हैं कि 'हंस' को आपसे सलाह लेने की मुतलक जरूरत नहीं 3 वह अपना कर्त्तव्य खूब समझता है।

महान पुरुषों की आत्मकथा साहित्य की सर्वोत्तम वस्तु है, और जिन विशिण पुरुषों ने संसार में कीर्ति, धन, पद और ख्याति प्राप्त कर ली है, वह ही संसार के, इन पदार्थों के इच्छुक्रों के लिए सच्चे रहनुमा हो सकते हैं। महात्मा गांधी, स्व, लाला लाजपतराय, स्वामी श्रद्धानन्द जी, श्री सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी आदि महानुभावों # आत्मकथाओं ने देश का कितना उपकार किया है, इसे लिखने की आवश्यकता नहीं,


प्रकाशन इतिहास

[लेख। हिन्दी साप्ताहिक 'जागरण', वर्ष 1, अंक 1, संपादक-शिवपूजन सहाय, 11 फ़रवरी, 1932 में प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "आत्मकथा क्या साहित्य का अंग नहीं है?." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1932, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/aatm-katha-kya-sahitya-ka-ang-nahin-hai. Accessed 22 Sep. 2026.