Cover Image for Pariksha (परीक्षा) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1926•16 मिनट

परीक्षा

Pariksha

प्रेमचंद की कहानी 'परीक्षा' देवगढ़ रियासत के दीवान पद के लिए सरदार सुजानसिंह द्वारा ली गई अनोखी परीक्षा की कथा है, जिसमें केवल सच्चा दयालु और आत्मबली उम्मीदवार ही सफल होता है।

पात्र:सरदार सुजानसिंह, पंडित जानकीनाथ
स्थान:देवगढ़ रियासत

परीक्षा का मूल पाठ

जब रियासत देवगढ़ के दीवान सरदार सुजानसिंह बूढ़े हुए त्मे परमात्मा की याद आयी। जा कर महाराज से विनय की कि दीनबंधु ! दास ने श्रीमान्‌ की सेवा चालीस साल तक को अब मेरी अवस्था भी ढल गयी, राज-काज सँभालने की शक्ति नहीं रही। कहीं भूल-चूक हो जाय तो बुढ़ापे में दाग लगे। सारी जिंदगी की नेकनामी मिट्टी में मिल जाय ।

राजा साहब अपने अनुभवशील नीतिकुशल दीवान का बड़ा आदर करते थे। वहुत समझाया, लेकिन जब दीवान साहब ने न माना, तो हार कर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली, पर शर्त यह लगा दी कि रियासत के लिए नया दीवान आप ही को खोजना पड़ेगा।

दूसरे दिन देश के प्रसिद्ध पत्रों में यह विज्ञापन निकला कि देवगढ़ के लिए एक सुयोग्य दीवान की जरूरत है। जो सज्जन अपने को इस पद के योग्य समझें वे वर्तमान सरकार सुजानसिंह की सेवा में उपस्थित हों। यह जरूरी नहीं है कि वे ग्रेजुएट हों, मगः हष्ट-पुष्ट होना आवश्यक है, मंदाग्नि के मरीज को यहाँ तक कष्ट उठाने की कोई जरूरत नहीं। एक महीने तक उम्मीदवारों के रहन-सहन, आचार-विचार की देखभाल की जाथगी। विद्या का कम, परन्तु कर्त्तत्य का अधिक विचार किया जायगा। जो महाशय इस परीक्षा मे पूरे उतरेंगे, वे इस उच्च पद पर सुशोभित होंगे।


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इस विज्ञापन ने सारे मुल्क पें तहलका मचा दी। ऐसा ऊँचा पद और किसी प्रकार की के नहीं ? केवल नसीब का खेल है। सैकड़ों आदमी अपना-अपना भाग्य लिए खड़े हुए। देवगढ़ में नये-नये और रंग-बिरंगे मनुष्य दिखायी देने लगे हज 5 उम्मीदवारों का एक मेला-सा उतरता। कोई पंजाब से चला आता था, कोई मद्रास से, कोई नई फैशन का प्रेमी, कोई पुरानी सादगी पर मिटा हुआ। पंडितों और मौलवियों को भी अपने-अपने भाग्य की परीक्षा करने का अवसर मिला। बेचारे सनद के नाम रोया करते थे यहॉ उसकी कोई जरूरत नहीं थी। रंगीन एमामे, चोगे और नाना प्रकार के अंगरखे और कंटोप देवगढ़ में अपनी सज-धज दिखाने लगे। लेकिन सबसे विशेष संख्या ग्रेजुएटों की थी, क्योंकि सनद की कैद न होने पर भी सनद से परदा तो ढँका रहता है।

सरदार सुजानसिंह ने इन महानुभावों के आदर-सत्कार का बड़ा अच्छा प्रबंध कर दिया था। लोग अपने-अपने कमरों में बैठे हुए रोजेदार मुसलमानों की तरह महीने कि दिन गिना करते थे। हर एक मनुष्य अपने जीवन को अपनी बुद्धि के अनुसार अच्छे रूप में दिखाने की कोशिश करता था। मिस्टर अ नौ बजे दिन तक सोया करते थे, आजकल वे बगीचे में टहलते हुए ऊषा का दर्शन करते थे। मि. ब को हुक्का पीरे की लत थी, आजकल बहुत रात गये किवाड़ बन्द करके अँधेरे में सिगार पीते थे। मि. द, स और ज से उनके घरों पर नौकरों के नाक में दम था, लेकिन ये सज्जन आजकल 'आप' और 'जनाब' के वगैर नौकरों से बातचीत नहीं करते थे। महाशय क नास्तिक थे, हक्‍्सले के उपासक, मगर आजकल उनकी धर्मनिष्ठा देख कर मन्दिर के पुजारी को पदच्युत हो जाने की शंका लगी रहती थी ! मि. ल को किताब से घृणा थी, परन्तु आजकल वे बड़े-बड़े ग्रन्थ देखने-पढ़ने में डूबे रहते थे। जिससे बात कीजिए, वह नम्रता और सदाचार का देवता बना मालूम देता था। शर्मा जी घड़ी रात से ही वेद-मंत्र पढ़ने में लगते थे और मौलवी साहब को नमाज और तलावत के सिवा और कोई काम न था। लोग समझते थे कि एक महीने का झंझट है, किसी तरह काट लें, कहीं कार्य सिद्ध हो गया तो कौन पूछता है।

लेकिन मनुष्यों का वह बूढ़ा जीहरी आड़ में बैठा हुआ देख रहा था कि इन बबगुलों में हंस कहाँ छिपा हुआ है।


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एक दिन नये फैशनवालों को सूझी कि आपस में हाकी का खेल हो जाय। यह प्रस्ताव

हाकी के मँजे हुए खिलाड़ियों ने पेश किया। यह भी तो आखिर एक विद्या है। इसे क्यों

छिपा रखें। संभव है, कुछ हाथों की सफाई ही काम कर जाय। चलिए तय हो गया, फील्ड

बन गयी, खेल शुरू हो गया और गेंद किसी दफ्तर के अप्रेंटिस की तरह ठोकरें खाने लगा।

रियासत देवगढ़ में यह खेल बिलकुल निराली बात थी। पढ़े-लिखे भलेमानुस लोग

बी और ताश जैसे गंभीर खेल खेलते थे। दौड़-कूद के खेल बच्चों के खेल समझे जाते।

खेल बड़े उत्साह से जारी था। धावे के लोग जब गेंद को ले कर तेजी से उड़ते तो ऐसा जान पड़ता था कि कोई लहर बढ़ती चली आती है। लेकिन दूसरी ओर से खिलाड़ी रस बढ़ती हुई लहर को इस तरह रोक लेते थे कि मानो लोहे की दीवार है।

संध्या तक यही धूमधाम रही । लोग पसीने से तर हो गये। खून की गर्मी आँख और चेहरे से झलक रही थी। हॉफते-हॉफते बेदम हो गये, लेकिन हार-जीत का निर्णय न हो सका।

अँधेरा हो गया था। इस मैदान से जरा दूर हट कर एक नाला था। उस पए कोई पुन न था। पथिकों को नाले में से चल कर आना पड़तां था। खेल अभी बन्द ही हुआ था आए खिलाड़ी लोग बैठे दम ले रहे थे कि एक किसान अनाज से भरी हुई गाड़ी लिये हुए उम्र नाले में आया। लेकिन कुछ तो नाले में कीचड़ था और कुछ उसकी चढ़ाई इतनी ऊँची थी कि गाड़ी ऊपर न चढ़ सकती थी। वह कभी बैलों को ललकारता, कभी पहियों को हाथ में ढकेलता लेकिन बोझ अधिक था और बैल कमजोर । गाड़ी ऊपर को न चढ़ती और चदनी भी तो कुछ दूर चढ़कर फिर खिसक कर नीचे पहुँच जाती। किसान बार-बार जोर नगाता और बार-बार झुँझला कर बैलों को मारता, लेकिन गाड़ी उभरने का नाम न लेती। वेचाग इधर-उधर निराश हो कर ताकता मगर वहाँ कोई सहायक नजर न आता। गाड़ी को अकंने छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकता। बड़ी आपत्ति में फँसा हुआ था। इसी बीच में ख़िलाडों हाथों में डंडे लिये घृमते-घामते उधर से निकले। किसान ने उनकी तरफ सहमी हई आँखों से देखा; परंतु किसी से मदद माँगने का साहस न हुआ। खिलाड़ियों ने भी उसको देखा मगर वन्द आँखों से, जिनमें सहानुभूति न थी। उनमें स्वार्थ था, मद था, मगर उदारता ऑए वात्सल्य का नाम भी न था।


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लेकिन उसी समूह में एक ऐसा मनुष्य था जिसके हृदय में दया थी और साहस था। आज हाकी खेलते हुए उसके पैरों में चोट लग गयी थी। लँगड़ाता-हुआ धीरे-धीरे चला आता था अकस्मात्‌ उसकी निगाह गाड़ी पर पड़ी। ठिठक गया। उसे किसान की सूरत देखते ही मब बातें ज्ञात हो गर्यी । डंडा एक किनारे रख दिया । कोट उतार डाला और किसान के पाम जा कर बोला-मैं तुम्हारी गाड़ी निकाल दूँ ?

किसान ने देखा एक गठे हुए बदन का लम्बा आदमी सामने खड़ा है। झुक कर वोला-हुजूर मैं आपसे कैसे कहूँ ? युवक ने कहा-मालूम होता है, तुम यहाँ वड़ी दर मं फँसे हो। अच्छा, तुम गाड़ी पर जा कर बैलों को साधो, मैं पहियों को ढकेलता हूँ अभी गा ऊपर चढ़ जाती है। |

किसान गाडी पर जा बैठा। युवक ने पहिये को जोर लगा कर उकसाया। कांचर बहुत ज्यादा था। वह घुटने तक जमीन में गड़ गया, लेकिन हिम्मत न हारी। उसने फिः जोर किया, उधर किसान ने बैलों को ललकारा। बैल को सहारा मिला, हिम्मत वैध गया, उन्होंने कंधे झुका कर एक बार जोर किया तो गाड़ी नाले के ऊपर थी। ु

किसान युवक के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। बोला-महाराज, आपन आई मुझे उवार लिया, नहीं तो सारी रात मुझे यहाँ बैठना पड़ता । ह

युवक ने हँस कर कहा-अब मुझे कुछ इनाम देते हो ? किसान ने गम्भीर भाव हैं कहा-नारायण चाहेंगे तो दीवानी आपको ही मिलेगी।

युवक ने किसान की तरफ गौर से देखा। उसके मन में एक सदिह हुआ, क्या 4 सुजानसिंह तो नहीं हैं ? आवाज मिलती है, चेहरा-मोहरा भी वही। किसान ने भी उसकी ओर तीव्र दृष्टि से देखा। शायद उसके दिल के संदेह को माँ न बोला-गहरे पानी में बैठने से ही मोती मिलता है। ह को भाप गया। मुस्करा कर निदान महीना रस हुआ। चुनाव का दिन आ पहुँचा। उम्मीदवार लोग प्रातःकाल ही से अपनी किस्मतों का फैसला सुनने के लिए उत्सुक थे। दिन काटना पहाड़ हो गया। प्रत्येक के चेहरे पर आशा और निराशा के रंग आते थे। नहीं मालूम, आज किसके नसीब जागेंगे ! न जाने किस पर लक्ष्मी की कृपादृष्टि होगी।


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संध्या समय राजा साहब का दरबार सजाया गया | शहर के रईस और धनाढय लोग राज्य के कर्मचारी और दरवारी तथा दीवानी के उम्मीदवारों का समूह, सब रंग-बिरंगी सज-धज बनाये दरबार में आ विराजे ! उम्मीदवारों के कनेजे धड़क रहे थे।

जब सरदार सुजानसिंह ने खड़े हो कर कहा-मेरे दीवानी के उम्मीदवार महाशयो ! मैंने आप लोगों को जो कष्ट दिया है, उसके लिए मुझे क्षमा कीजिए | इस पद के लिए ऐसे पुरुष की आवश्यकता थी जिसके हृदय में दया हो और साथ-साथ आत्मबल। हृदय वह जो उदार हो, जात्मंबल यह जो आपत्ति का वीरता के साथ सामना करे और इस रियासत के सीभाग्य से हमें ऐसा पुरुष मिल गया। ऐसे गुणवाले संसार में कम हैं और जो हैं, वे कीर्ति और मान के शिखर पर बैठे हुए हैं, उन तक हमागी पहुँच नहीं। मैं रियासत के पंडित जानकीनाथ-सा दीवान पाने पर बधाई देता हूँ।

रियासत के कर्मचारियों और रईसों ने जानकीनाथ की तरफ देखा। उम्मीदवार दल की आँखें उधर उठीं, मगर उन आँखों में सत्कार था, इन आँखों में ईर्ष्या ।

सरदार साहब ने फिर फरमाया, आप लोगों को यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति न होगी कि जो पुरुष स्वयं जख्मी होकर भी एक गरीब किसान की भरी हुई गाड़ी को दलदल से निकाल कर नाले के ऊपर चढ़ा दे उसके हृदय नें साहस, आत्मबल और उदारता का वास है। ऐसा आदमी गरीबों को कभी न सतावेगा। उसका संकल्प दृढ़ 6 जो उसके चित्त को स्थिर रखेगा। वह चाहे धोखा खा जाये। परन्तु दया और धर्म से कभी न हटेगा।

[हिन्दी कहानी। प्रथम प्रकाशन अज्ञात। हिन्दी कहानी सग्रह 'प्रेम-प्रमोद' (प्रथम संस्करण : 1926) में प्रथम बार प्रकाशित-सकलित। 'मानसरोवर' भाग-8 में संकलित। 'इम्तहान' शीर्षक से उर्दू में प्रकाशित। उर्दू कहानी संग्रह 'प्रेम चालीसी' (प्रथम सस्करण : 1930) में संकलित ।]


परीक्षा का सारांश

'परीक्षा' देवगढ़ रियासत के दीवान पद के योग्य उत्तराधिकारी के चयन और मानवीय गुणों की परख पर आधारित एक अत्यंत प्रेरक एवं प्रसिद्ध कहानी है। रियासत देवगढ़ के वयोवृद्ध दीवान सरदार सुजानसिंह चालीस वर्षों की सफल सेवा के बाद सेवानिवृत्त होना चाहते हैं। राजा साहब उनका बहुत आदर करते हैं, इसलिए वे इस शर्त पर उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं कि रियासत के लिए नए दीवान की खोज सरदार सुजानसिंह को स्वयं करनी होगी। देश के प्रमुख समाचार पत्रों में विज्ञापन निकाला जाता है कि दीवान पद के लिए डिग्री या सनद की अनिवार्यता नहीं है, बल्कि उम्मीदवारों के चरित्र, स्वास्थ्य और आचार-विचार की एक महीने तक परख की जाएगी। जो व्यक्ति इस परीक्षा में खरा उतरेगा, वही दीवान चुना जाएगा।

विज्ञापन देखकर पूरे देश से सैकड़ों ग्रेजुएट, मौलवी और पंडित देवगढ़ में जमा हो जाते हैं। सरदार सुजानसिंह ने उम्मीदवारों के ठहरने का उत्तम प्रबंध किया था। एक महीने की अवधि में सभी उम्मीदवार दीवान पद पाने के लिए कृत्रिम सदाचार का ढोंग करने लगते हैं। देर तक सोने वाले सुबह उठकर उषा-दर्शन करने लगते हैं, नास्तिक व्यक्ति धर्मपरायण बन जाते हैं और नौकरों पर रौब झाड़ने वाले अत्यंत शिष्ट और विनम्र व्यवहार करने लगते हैं। सरदार सुजानसिंह चुपचाप इन सभी लोगों के पाखंड और आचरण पर नजर रखे हुए थे।

महीना बीतने के करीब था कि उम्मीदवारों के बीच हॉकी का एक मैच खेला गया। मैच समाप्त होने के बाद शाम को जब सभी खिलाड़ी लौट रहे थे, तो रास्ते के एक नाले में किसान की अनाज से भरी बैलगाड़ी गहरे कीचड़ में फँस गई। कमजोर बैल और भारी बोझ के कारण गाड़ी बाहर नहीं निकल पा रही थी। असहाय किसान मदद की आस में गुजरते खिलाड़ियों की ओर देखता है, किंतु स्वार्थ और अभिमान में डूबे उम्मीदवार उसकी लाचारी देखकर भी अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं। केवल एक उम्मीदवार, पंडित जानकीनाथ, जिसके पैर में हॉकी खेलते समय चोट लग गई थी और वह लँगड़ा रहा था, किसान की दशा देखकर रुक जाता है। वह तुरंत अपना कोट उतारकर दलदल में उतर जाता है। घुटनों तक कीचड़ में धँसने और गहरी चोट के बावजूद वह अपनी पूरी शक्ति से पहिये को धक्का देकर गाड़ी को नाले से बाहर निकाल देता है। किसान के वेश में छिपे व्यक्ति द्वारा आशीर्वाद देने पर जानकीनाथ को आभास होता है कि यह साधारण किसान कोई और नहीं बल्कि स्वयं सरदार सुजानसिंह हैं।

नियत दिन दरबार में सभी उम्मीदवार धड़कते दिलों के साथ निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। सरदार सुजानसिंह घोषणा करते हैं कि दीवान पद के लिए ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जिसमें दया, आत्मबल और साहस हो। वे पंडित जानकीनाथ को देवगढ़ का नया दीवान घोषित करते हैं। सरदार साहब स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति स्वयं घायल होकर भी एक गरीब और बेबस किसान की गाड़ी दलदल से निकाल सकता है, उसके हृदय में वास्तविक उदारता और कर्तव्य-निष्ठा का वास है। ऐसा व्यक्ति कभी प्रजा पर अन्याय नहीं करेगा और धर्म तथा दया के मार्ग से कभी विचलित नहीं होगा।


प्रकाशन इतिहास

यह कहानी सर्वप्रथम 1926 में कहानी-संग्रह प्रेम-प्रमोद में प्रकाशित-संकलित हुई। बाद में यह मानसरोवर (भाग-8) में संकलित की गई। इसका उर्दू रूप इम्तहान शीर्षक से प्रकाशित हुआ और उर्दू कहानी-संग्रह प्रेम चालीसी (1930) में संकलित हुआ।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • किताबी योग्यता बनाम वास्तविक चरित्र: कहानी का केंद्रीय संदेश है कि डिग्रियाँ और उपाधियाँ मनुष्य के वास्तविक चरित्र का प्रमाण नहीं हो सकतीं; मनुष्य की सच्ची परीक्षा संकट की घड़ी में उसके कर्म और व्यवहार से होती है।
  • पाखंड और कृत्रिम सदाचार की निरर्थकता: उम्मीदवार दीवान बनने के लिए एक महीने तक शिष्टाचार और सदाचार का झूठा मुखौटा ओढ़े रहे, किंतु वास्तविक परीक्षा के क्षण में उनकी संवेदनहीनता उजागर हो गई।
  • सच्ची सहानुभूति और आत्मबल: पंडित जानकीनाथ का घायल होने के बावजूद कीचड़ में उतरकर अनजान किसान की सहायता करना यह सिद्ध करता है कि सच्चा आत्मबल और परोपकार किसी दिखावे या लाभ की अपेक्षा नहीं रखता।
  • जनहितैषी प्रशासनिक दृष्टि: प्रेमचंद ने शासन और प्रशासन के लिए ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता बताई है जो गरीबों, किसानों और वंचितों के प्रति संवेदनशील हो। केवल बुद्धिमान होना काफी नहीं, बल्कि हृदयवान होना अनिवार्य है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'परीक्षा' नैतिक मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व और प्रशासनिक ईमानदारी पर केंद्रित एक कालजयी कहानी है। यह व्यावहारिक नैतिकता और मानवीय संवेदना को जीवन की सर्वोच्च कसौटी के रूप में स्थापित करती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "परीक्षा." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1926, https://munshipremchand.com/works/short-stories/pariksha-2. Accessed 22 Sep. 2026.