Cover Image for Mansik Paradhinata (मानसिक पराधीनता) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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निबंध•1931•18 मिनट

मानसिक पराधीनता

Mansik Paradhinata

औपनिवेशिक मानसिकता और मानसिक दासता के खतरों पर प्रेमचंद का विचारोत्तेजक निबंध, जिसमें उन्होंने वास्तविक स्वराज्य हेतु सांस्कृतिक स्वाभिमान पर बल दिया।

Work Details

प्रकार: निबंध
वर्ष: 1931
पठन समय: 18 मिनट (2,552 शब्द)

स्वेच्छा से जकड़ते जा रहे हैं। किसी राष्ट्र या जाति का सबसे बहुमूल्य अंग क्या है? उसकी भाषा, उसको सभ्यता, उसके विचार, उसका कल्चर। यही कल्चर हिन्दू को हिन्दू मुसलमान को मुसलमान और ईसाई को ईसाई बनाए हुए है। मुसलमान इसी कल्चर की रक्षा के लिए हिन्दुओं से अलग रहना चाहता है, उसे भय है, कि सम्मिश्रण से कहीं उसके ऋल्चर का रूप ही विकृत न हो जाय। इसी तरह हिन्दू भी अपने कल्चर की रक्षा करना चाहता है, लेकिन कया हिन्दू और कया मुसलमान, दोनों अपने कल्चर की रक्षा की दुहाई देते हुए भी उसी कल्चर का गला घोंटने पर तुले हुए हैं।

कल्चर (सभ्यता या परिष्कृति) एक व्यापक शब्द है। हमारे धार्मिक विचार, मरी सामाजिक रूढियां, हमारे राजनैतिक सिद्धांत, हमारी भाषा और साहित्य, हमारा गहन-सहन, हमारे आचार -व्यवहार, सब हमारे कल्चर के अंग हैं एः आज हम कितनी बेद्दी से उसी कल्चर की जड़ काट रहे हैं। पश्चिम वालों को शक्तिशाली देखकर हप इस भ्रम पें पड़ गए हैं, कि हममें सिर से पांव तक दोष ही दोष हैं, और उनमें मिए से पांव तक गुण ही गुण। इस अंधभव्कत में हम उनके दोष भी गुण मालूम होते हैं और अपने गुण भो दोष। भाषा को हो ले लीजिए। आज अंग्रेजी हमारे सभ्य- समाज की व्यावहारिक भाषा बनी हुई है। सरकारी भाषा तो वह है हो, दफ्तरों में भी हमें अंग्रेजी में काम करना ही पड़ता है पर उमर भाषा की सत्ता के हम ऐसे ५क्त हो गए हैं, कि निजी विद्वियों में, घर की बातचीत में भी उसी भाषा का आश्रय लेते हैं। स्त्री पुरुष क्रो अंगेजी में पत्र लिखती है, पिता पुत्र को अंग्रेजी में पत्र लिखता है दो मित्र मिलते हैं, तो अंग्रेजी में बातालाप करते हैं, कोई सभा होती है, तो अंग्रेजी में। डायरी अंग्रेजी में लिखी जाती है। वाह ! क्‍या भाषा है, क्‍या लोच है, कितनी शर्मिकता है, विचारों को व्यजित करने को कितनी शाकक्‍्त, शब्द भंडा> 'केतना विशाल, साहित्य कितना बहमूल्य, कितना परिष्कृत रविता क्लतिनी मर्मस्पशिणी, गद्य कितना अर्थवोधक | जिसे देखो अंग्रेजी जबान पर लट्टू, उसके नाम पर कुर्बान है। यहां तेक हमारी योग्यता और विद्वत्ता की यही एक परख हो गई है, कि हम अंग्रेजी बोलने या लिखने में कितने कुशल हैं। आठवें क्लास में अंग्रंजी के मुहाविरों को रटन शुरू ऐे जाती है, पर्यायों के सूक्ष्म अर्थभेद पर विचार होने लगता है, अपनी अंग्रेजी वकनृता में अंग्रेजों का ऐक्सेंट और उच्चारण केसे लाएं, इस प्रयत्न में जान खपा दी जाती है। अगर किसी स्वर का उच्चारण अंग्रेजों से उनके मौखिक गठन के दोषों के कारण नहीं होता, तो हम भी अपने में वही बात पैदा करेंगे। आज तक “9९ जेये साधारण शब्द का भी ठीक उच्चारण-जो अंग्रेजों को भा जंचे-बहुत कम लोग कर सकते हें और हमारी यह मनोवृत्ति राष्ट्रीय भावों के साथ-ही-साथ बढ़ती जाती है। यहां तक कि अंग्रेजी ही पठित समाज की भाषा बन गई है। अपनी भाषा में बात-चौत करते समय कभी - कभी एकाध अंग्रेजी शब्द आ जाने को तो हम मुआफीौ से काबिल समझते हैं लेकिन दुःख तो यह है, कि ऐसे सज्जनों को भी कमी नहीं है, जो बहुत

थोड़ी-सी अंग्रेजी जानकर भी अंग्रेजी ही में अपनी योग्यता का प्रदर्शन करते हैं। अंग्रेज स्वप्न में भी किसी अंग्रेज से गेर-अंग्रेजी भाषा में न बोलेगा, मगर यहां हम आपस में ही अंग्रेजी बोलकर अपनी मानसिक दासता का ढिंढोरा पीटते हैं। मैं उस मनोवृत्ति की कल्पना भी नहीं कर सकता, जो एक ही भाषा-भाषियों को अंग्रेजी में बातें करने की प्रेरणा करती है। किसी मदरासी, बंगाली या चीनी से तो अंग्रेजी में बातें करने का कोई अर्थ हो सकता है। उनसे बातें करनी जरूरी हैं और इस वक्‍त ओर कोई ऐसी भारतीय भाषा नहीं, जिसका सभी प्रांत वालों का एक-सा ज्ञान हो | मगर एक ही प्रांत के रहने वाले, एक ही भाषा के बोलने वाले, क्‍यों आपस में अंग्रेजी बोलें, क्यों अंग्रेजी में पत्र लिखें, क्‍यों 'प्रणाम' या 'नमस्कार', या 'वंदे' या 'नमस्ते' या 'तस्लीम' करने के बदले 'मार्निंग-मार्निंग' कहें, यह मेरी समझ में नहीं आता। क्‍यों 'हल्लो' ही मुंह से निकले, में इसकी कल्पना नहीं कर सकता। संसार में ऐसे प्राणियों की कमी नहीं है,जो मंगनी की चीजों का व्यवहार करके भी सिर उठाकर चलते हैं। उन्हें यही खुशी है, कि लोग मुझे इन चोजों का स्वामी समझते होंगे। अंग्रेजी का व्यवहार करने वालों की मनोवृत्ति भी कुछ इसी तरह की होती है। या तो उनका अभिप्राय यह होता है, कि देखें हम दोनों में कौन अच्छो अंग्रेजी बोलता है, या यह कि देखो, हम जितनी सफाई से अंग्रेजी बोलते हैं, तुममें वह सफाई नहीं है। और इसका परिणाम यह होता है, कि अच्छी अंग्रेजी लिखनी और बोलनी तो आ जाती है. पर अपनी भाषा भूल जाती है, या हेय और तुच्छ समझकर भुला दी जाती है। यह हमारे शिक्षित-समुदाय कौ लज्जाजनक ही नहीं, शोकजनक मानसिक दासता है। फ्रांसीसी कवि फ्रेंच में कविता करता है, जर्मन जर्मन में, रूसी रशियन में, कम-से-कम जिन रचानाओं पर उसे गर्व होता है, वह अचनी ही भाषा में करता है, लेकिन हमारे यहां के सारे कवि और सारे लेखक अंग्रेजी में लिखने लगें, अगर केवल कोई प्रकाशक उनकी रचनाओं को छापने पर तैयार हो जाय ! जिन्हें प्रकाशक मिल जाते हैं, वह चूकते भी नहीं, चाहे अंग्रेज आलोचक उनका मजाक ही क्‍यों न उड़वें, मगर वह खुश हैं। हम मानते हैं, कि अंग्रेजी भाषा पौढ है, हरके प्रकार के भावों को आसानी से जाहिर कर सकती है और भारतोय भाषाओं में अभी वह बात नहीं आई, लेकिन जब वही लोग, जिन पर भाषा के निर्माण और विकास का दायित्व है, दूसरी भाषा के उपासक हो जावें, तो उनकी अपनी भाषा का भविष्य भी तो शून्य हो जाता है। फिर क्या विदेशी साहित्य की नींव पर आप भारतीय राष्ट्रीयता की दीवार खड़ी करेंगे” यह हिमाकत है। आज हमारा पठित-समाज साधारण जनता से पृथक्‌ हो गया है। उसका रहन-सहन, उसकी बोल- चाल, उसकी वेश-भूषा, सभो उसे साधारण समाज से अलग कर रह हैं। शायद वह अपने दिल में फूला नहीं समाता, क्वि हम कितने विशिष्ट हैं। शायद वह जनता को नीच और गंवार समझता है, लेकिन वह खुद जनता को नजरों से गिर गया है। जनता उससे प्रभावित नहीं होती, उसे 'किरंटा' या 'बिगडैल, या 'साहब बहादुर' कहकर उसका बहिष्कार करती है और आज खुदा न ख्वासती वह किसी अंग्रेज के हाथों पिट रहा हो, तो लोग उसकी दुर्गति का मजा उठावेंगै,

कोई उसके पास भी न फटकेगा। जरा इस गुलामी को देखिए, कि हमारे विद्यालयों में हिन्दी या उर्दू भी अंग्रेजी द्वारा पढ़ाई जाती है। अगर बेचाराः हिन्दी-प्रोफेसर अंग्रेजी में लेक्चर न दे, तो छात्र उसे नालायक समझते हैं। आदमी के मुख से कलंक लग जाय तो वह शरमाता है, उस कलंक को छिपाता है, कम-से-कम उस पर गर्व नहीं करता; पर हम अपनी दासता के कलंक को दिखाते फिरते हैं, उसकी नुमाइश करते हैं, उस पर अभिमान करते हैं, मानो वह नेकनामी का तमाशा हो, या हमारी कीर्ति की ध्वजा। वाह री भारतीय दासता, तेरी बलिहारी है ।

भाषा को छोड़िए, वेश-भूषा पर आइए। आप उन साहब बहादुर को देख रहे हैं, जो हैट-कैट लगाए, गरूर से इधर-उधर देखते चले जा रहे हैं। यह हमारे हिन्दुस्तानी योरोपियन हैं। रास्ते से हट जाओ, साहब बहादुर आते हैं। साहब को सलाम करो, आप पूरे साहब बहादुर हैं ! मुझे तो आप सिर से पांव तक गुलाम नजर आते हैं, जो अपनी गुलामी का उसी बेशर्मी से प्रदर्शन कर रहे हैं, जैसे कोई वेश्या अपने हाव- भाव का। आपमें आत्मबल अवश्य है, बड़े ऊंचे दरजे का आत्मगौरब, आप लोकमत को युकरा देते हैं, किसी के नाक-भौं सिकोड़ने की परवाह नहीं करते, जो अपने स्वार्थ के लिए उपयोगी या अपनी मनोतुष्टि के लिए वांछनीय समझते हैं, वह अवाध्य रूप से करते हैं। क्यों लोकमत का आदर करें | लोकमत के गुलाम नहीं, लेकिन उसी आत्मगौरव के पुतले से कहिए, कि जरा शाम को बिना फेल्टकैप लगाए किसी अंग्रेजी- क्लब में चला जाय, तो उसके हाथ-पांव फूल जाएंगे, खुन ठंडा हो जायगा, चेहरा फक हो जायगा। क्यों? इसलिए कि उसका आत्मगौरत केवल अपने भाइयों पर रोब जमाने के लिए. है, उसमें सार का नाम नहीं। वह जिस समाज में मिलना चाहता है, उसकी छोटी-से-छोटी रूढियों की भी अवहेलना नहीं कर सकता। जनता को वह समझता है, हमारा कर ही क्‍या लेगी, यह खुश रहे तो क्या, और नाराज रहे तो क्या, यह हमारा कुछ बना-बिगाड़ नहीं सकती। जिनसे कुछ बनने-बिगड़ने का भय है उनके सामने वह भीगी बिल्ली बना जाता है। अपने एक मित्र साहब बहादुर मे मैंने पूछा-तुम इस ठाठ से क्‍यों रहते हो, तो बड़े दार्शनिक भाव से बोले-इसलिए कि अंग्रेजों से मिलने जाता हूं, तो जूते बाहर नहीं उतारने पड़ते। जो लोग अचकन और टोपी पहनकर जाते हैं, उन्हें जुते उतार देने पड़ते हैं। मैं कहता हूं, जो स्वार्थ लेकर अंग्रेजों से मिलने नहीं जाते, वह अचकन नहीं, मिर्जई भो पहने हो, तो उन्हें जूते उतारने को जरूरत नहीं और जो स्वार्थ लेकर जाते हैं, वह किसी वेश में हों, उनकी आत्मा दबी रहती है। ऐसी प्राणियों की दशा उस आदमी की-सी है, जो अपने कपड़े पर एक दाग को छिपाने के लिए सारा कपड़ा ही काला रंग ले। अगर स्वार्थ मजबूर कर रहा हो, तो मेरे विचार में तो जूते उतार देना इससे कहीं अच्छा है, कि हम उरा अपमान से बचने के लिए बेहयाई का एक अपराध और »;ने सिर पर लें। यह मत समझो, कि अंग्रेज तुम्हारा कोट-पैंट देखकर तुम्हारा ज्यादा आदर करता है। और अगर ऐसी हो, भी तो अपना बेष छोड़कर उस आदर को लेना, एक प्याले शोरबे के लिए अपने जन्म-सिद्ध गौरव को बेचना है। एक दूसरे मित्र से यही प्रश्न किया, तो बोले-इससे सफर करने में बड़ा सुभोता होता है, जनता समझती है यह कोई साहब हें, मेरे डब्बे

में नहीं आती है। एक ओर साहब ने कहा-अंग्रेजी कपड़े पहनने से देह में बड़ी चुस्ती और फुरती आ जाती है। गरज, लोग तरह-तरह की दलीलों से आपका समाधान कर देंगे। में पूछता हूं-क्यों साहब, क्या सारी चुस्ती और फुर्ती अंग्रेजी कपड़ों में ही है? क्या यह कोई तिलिस्माती चीज है, कि बदन पर आई और आपकी देह में स्फर्ति दौड़ी । यह दलीलें लगों और लचर हैं। हां, इस तर्क में अवश्य सार है, कि जब सारा संसार योरोपीय देश के लिए पीछे जा रहा है, तो आप उससे अलग केसे जा रहे हैं। दूसरी दलील यह हो सकती है, कि हमारा कोई जातीय परिधान भी ते नहीं है। भिन्न-भिन्न प्रांतीय परिधानों की अपेक्षा तो एक सार्वदेशिक योरोपीय परिधान का होना कहीं अच्छा है। बेशक यह टेढा प्रश्न है। यह बात भी विचारणीय है, कि अन्य देशों में अमीर-गरीब सबका पहनावा एक ही है, चाहे उसके कपडे में कितना ही अंतर ही हो। आपके यहां किसान मिर्जई या नीम आस्तीन या कुर्ता-धोती पहन है, कहीं शलवार हैं, कहीं पगड़ी, कहीं जांघिया। पहले एक जातीय ठाठ की सृष्टि तो कर लीजिए, फिर विलायती पहनावे पर आक्षेप कीजिएगा। भाषा ही की भार्ति एक जातीय पहनावा' भी बरसों के बाद कहीं जाकर आविर्भूत होता है, किसी संस्था या नीति द्वारा उसकी सृष्टि नहीं की जा सकतो। अभी भारत को एक सार्वदेशिक परिधान के लिए बहुत दिनों तक इंतजार करना पड़ेगा, मगर जब तक वह समय नर आता, तब तक के लिए हमारे विचार में इसी नीति को सामने रखना चाहिए कि यथासाध्य जनरुचि को सम्मान किया जाय। अगर कि प्रांत में जनता कोट पहननों है, तो वहां के लिए कोट-पतलून ही उपयुक्त है। इसी भांति जिन प्रांतों में साधारण

जनता कुरता और घोती पहनती है, वहां कुरता और धोती को ही जातीय परिधान के पद पर सम्मानित करना चाहिए। अभिप्राय केवल यह है, कि शिक्षित समाज कण्ल अपनी विशिष्टता या प्रभुत्व जताने के लिए ऐसे वेष-भूषा का व्यवहार न करे जिसम विदेशीपन की झलक आती हो। हो सकता है, कि कुछ लोगों को अंग्रेजी बश मे रहने पर भी जरा अभिमान या स्वार्थसिद्धि की भावना न हो, पर दुभग्यिवश या विदेशी वेष जनता की आंखों में खटकता है और इसे धारण करने वाले चाहे दवह ही क्‍यों न हों, वे स्वजाति के द्रोही और शासक जाति के अनन्य भक्त के रूप म नजर आते हैं। संभव है, स्वाधीन हो जाने पर यही हमारा स्वजातीय वेष हो जय लेकिन तब इसमें वह कुसंस्कार न रहेंगे, जिन्होंने इस वक्‍त इसे इतना अवहलनीय बना रक्‍खा है। जरा सोचिए, क्‍या यह एक पढे-लिखे व्यक्ति को शोभा देता है. कि वह अपना रहन-सहन ऐसा बना ले, कि जनता उसे श्रद्धा से देखने के बदल॑ घृणा या भय की दृष्टि से देखे। किसी समय जनरुचि को पद -दलित करने का नतीजा बुरा भी हो सकता है, ओर यह तो स्पष्ट ही है, कि अगर ज॑नता के हाथों में प्रभुत्त होता, तो बहुत से अंग्रेजी बेश के प्रेमी यह वेश घारण करने के पहले ज्यादा विचा

से काम लेना आषश्यक समझते, मगर हमारी यह मनोत्रत्ति भाषा और वेश तक हैं! रहती, तो अधिक चिंता की बात न थी। इसने हमारे कितने और सामाजिक विषारं पर भी अपना प्रभुत्व जमा लिया है और अभी से रोक-थाम न की गई, ता एक दिन हमारी जातीय संस्कृति का ही लोप हो जायगा। यह एक साधारण सी बाते हैं

कि पराधीन जाति को अपने में सारी बुराइयां और राज्य करने वाली जाति में भलाइयां ही भलाइयां नजर आती हैं। हमारी सभ्यता कहती है--अपनी जरूरतों को मत बढाओ, ताकि तुम्हारी जात से कुटुंब और परिवार का भी कुछ उपकार हो। पश्चिमी सभ्यता का आदर्श है-अपनी जरूरतों को खूब बढ़ाओ, चाहे उसके लिए दूसरों की जेब ही क्यों न काटनी पड़े। अपने ही लिए ही जिओ और अपने ही लिए मरो। हमारी सभ्यता कृषि-प्रधान थी, हम गांवों में रहते थे, जहां अपने आत्मीयजनों का संसर्ग बहुत- सी बुराइयों से हमारी रक्षा करता था। पश्चिमी सभ्यता व्यवसाय-प्रधान है और बड़े- बड़े नगरों का निर्माण करती है, जहां हम मारे बंधनों से मुक्त होकर दुराचरण में पड़ जाते हैं। हमारी सभ्यता में सम्मिलित-कुटुंब एक प्रधान अंग था। पश्चिमी सभ्यता में परिवार का अर्थ है-केवल स्त्री और पुरुष। दोनों में बुराइयां और भलाइयां, दोनों ही हैं, पर जहां पर में सेवा और त्याग प्रधान है, वहां दूसरों में स्वार्थ और संकीर्णता। अपारी सभ्यता में नम्नता का बड़ा महत्त्व था, पश्चिमी सभ्यता में आत्मप्रशंसा को वही स्थान प्राप्त है। अपने को खूब सहारो, अपने मुंह खूब मियां मिट्त्‌ चनो। हमारी सभ्यता में धन का स्थान गौण था, विद्या और आचरण से आदर मिलता था। पश्चिमी सभ्यता में धन ही मर्य वस्तु है। हम भी धन कमाते थे, पर दया के साथ। पश्चिम भी धन कमाता है, पर दया का नाम नहीं। हमारी सभ्यता का आधार धर्म था, एरिचमी सभ्यता का आधार संघर्ष है।

लेकिन यहां हम अपने सदगुणों को प्रशंसा नहीं करने बैठे हैं। हमारे कहने ऊा तात्पर्य केवल यह है, कि हमें हरेक पठिचमी चीज के पीछे आंखें बन्द करके चलने की जो प्रवृत्ति हो रही हैं, वह कवल हमारी मानसिक पराजय के कारण। हमारी प्भ्यता में भी रोग थे, मगर उसका दवा योरोपीय सभ्यता की अंधभक्ति नहीं है।

हट है न मो 9 लि

उसकी दवा हमें अपनी ही संस्कृति से खोजनी थी। योरोपीय सभ्यता को नकल करके हमें अपने यहां भी उन्हों दजाओं का व्यवहार करना पड़ेगा, जो णेरोप कर रहा है। योरोप पथ- भ्रष्ट है, उसे अपने लक्ष्य का ज्ञान नहां और आज य* पथ के विचारवान्‌ लोग कह रहे हैं, कि यह संस्कृति अब विध्वंस के गर्त में जाने वाली है। क्या हम भी उन्हीं बुराइयों की नकल करके अपनो संस्कृति को भी विध्कस के गर्त में ढकेलने की तैयारी करें? यह समझ लीजिए, कि यह गजनीतिक परिस्थिति नहीं रहेगी पर इस परिस्थिति में हमने अयने अस्तित्व को खो दिया, अपने धर्म की सत्ता खो दी, अपनी संस्कृति को खो बैठे, तो हमारा अत हो जायगा।


प्रकाशन इतिहास

[लेख। जनवरी, 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "मानसिक पराधीनता." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/mansik-paradhinata. Accessed 22 Sep. 2026.