जीवन में घृणा का स्थान
निंदा, क्रोध और घृणा यह सभी दुर्गुण हैं, लेकिन मानव जीवन में से अगर इस दुर्गुणों को निकाल दीजिए, तो संसार नरक हो जायगा। यह निंदा ही का भय है, जो दुराचारियों पर अंकुश का काम करता है, यह क्रोध ही है, जो न्याय और सत्य की रक्षा करता है और यह घृणा ही है जो पांग्ब्रड और धूर्तता का दमन करती है। निंदा का भय न हो, क्रोध का आतंक न हो, घृणा की थाक न हो तो जीवन विश्वृंखल हो जाये और समाज नष्ट हो जाय। इनका जब हम दुरुपयोग करते हैं, तभी ये दुर्गुण हो जाते हैं, लेकिन दुरुपयोग तो अगर दया, करुणा, प्रशसा और भक्ति का भी किया जाय, तो वह दुर्गुण हो जायेंगे। अंधी दया अपने पात्र को पुरुषार्थहीन बना देती है, अंधी करुणा कायर, अंधी प्रशंसा घमंडी और अंधी भक्ति धूर्त। प्रकृति जो कुछ करी है, जीवन की रक्षा ही के लिए करती है। आत्म रक्षा प्राणी का सब) बड़ा धर्म है और हमारी सभी भावनाएं और मनोवृत्तियां इसी उद्देश्य की पृति करती हैं। कौन नहीं जानता कि वही लिए जो प्राणों का नाश कर सकता है प्राणों का सकट भी दुर कर सकता है। अवसर और अवस्था का भेद है। मनुष्य को गंदगी स, दुर्गध से, जघन्य वस्तुओं से क्यों स्वाभाविक घृणा हांती है? केवल इसीलिए कि गंदगों और दुर्गंध से बचे रहना उसकी आत्म -रक्षा के लिए प्रकृति ने उसमें दुबकने, दम साध लेने या छिप जाने की शक्ति डाल दी है। मनुष्य विकास-द्षेत्र गें उन्नति करते -करते इस पद को पहुंच गया है कि उसे हानिकर वस्तुओं से आप-ही-आप घृणा हो जाती है। घृणा का ही उग्र रूप भय है और परिष्कृत रूप विवेक। यह तीन एक ही वस्तु के नाम हैं, उसमें केवल मात्रा का अंतर है।
तो घृणा स्वाभाविक मनोवृत्ति है और प्रकृति द्वाए आत्म-रशा के लिए सिरजी गई है। या यों कहो कि वह आत्म-रक्षा का ही एक रूप है। अगर ःम उससे वंचित हो जाय, तो हमारा अस्तित्व बहुत दिन न रहे। जिस वस्तु का जीवन में इतना मूल्य है, उसे शिथिल होने देना, अपने पांव में कुल्हाड़ी मारना है। हवमे अगर भय न हो तो साहस का उदय कहां से हो। बल्कि जिस तरह घृणा का उग्र रूप भय है, उसी तरह भय का प्रचंड रूप ही साहस है। जरूरत केवल इस बात की है कि घृणा का परित्याग करके उसे विवेक बना दें। इसका अर्थ यही है कि हम व्यक्तियों से घृणा न करके उनके बुरे आचरण से घृणा करें। धूर्त से हमें क्यों घृणा होती है? इसीलिए कि उसमें धूर्तता है। अगर आज वह धूर्तता का परित्याग कर दें, तो हमारी घृणा भो जाती रहेगी। एक शराबी के मुंह से शराब की दर्गध आने के कारण हमें उससे घृणा होती है, लेकिन थोड़ी देर के बाद जब उसका >शा उतर जाता है और उसके मुंह से दुगंध आना बंद हो जाती है, तो हमारी घृणा भी गायब हो जातो है। एक पाखंडी पुजारी को सरल ग्रामीणों को ठगते देखकर हमें उससे घृणा होती है, लेकिन कल उसी पुजारी को हम ग्रामीणों की सेवा करते देखें, तो हमें उससे भक्ति होगी। घृणा
का उद्देश्य ही यह है कि उससे बुराइयों का परिष्कार हो। पाखंड, धूर्तता, अन्याय, बलात्कार और ऐसी ही अन्य दुष्प्रवृत्तियों के प्रति हमारे अंदर जितनी ही प्रचंड घृणा हो उतनी ही कल्याणकारी होगी। घृणा के शिथिल होने से ही हम बहुधा स्वयं उन्हीं बुराइयों में पड़ जाते हैं और स्वयं वैसा ही घृणित व्यवहार करने लगते हैं। जिसमे प्रचंड घृणा है, वह जान पर खेलकर भी उनसे अपनी रक्षा करेगा और तभी उनका जड़ खोदकर फेंक देने से वह अपने प्राणों की बाजी लगा देगा। महात्मा गांधी इसीलिए अछूतपन को मिटाने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर रहे हैं कि उन्हें अछतपन से प्रचंड घृणा हे।
साहित्य और कला में घृणा की उपयोगिता
जीवन में जब घृणा का इतना महत्त्व है, तो साहित्य कैसे उसकी उपेक्षा कर सकन है, जो जीवन का ही प्रतिबिंब है। मानव-हृदय आदि से ही सु और कु का रास्थ-' रहा है ओर साहित्य की सृष्टि इसलिए हुई कि संसार म॑ जो सु या सुंदर हैं और इसलिए कल्याणकर हैं उसके प्रति मनुष्य में प्रेम उत्पनन हो और क या अमंदर और इसलिए असत्य वस्तुओं से घृणा। साहित्य और कला का यही मुख्य उद्देश्य है, +# और सु का संग्राम ही साहित्य का इतिहास है। प्राचीन साहित्य, धर्म और ह5 के
द्रोहियों के प्रति घृणा और उनके अनुयायियों के प्रति श्रद्धा और भक्तित के भावा +* सृष्टि करता रहा। नवीन साहित्य समाज का खून चूसने वालों, रंगे सियागें, हथक 'थ ० और जनता के अज्ञान से अपना स्वार्थ सिद्ध ऋरत बालों के विरद्ध उतने दी जप से आवाज उठा रहा है और दोनों, दलितों, अन्याय के हाथ सताये हओं के ए* उतने ही जोर से सहानुभृति उत्पन्न करने का प्रयत्न कर रहा है। संभव हे, बह भार+ थ को तरंए में और कठोर सत्य क्री आर से आंखें बंद करके संसार मं क्राति मय देने का स्वप्न देख रहा हो, जिन्हें वह दरिद्रता के कारण सहानुभूति का पात्र समझ रहा है, उनकी म्गगी बुगइयों को दुस्वस्था और दरिद्रता के सिर मढ़ रहा है। थे इतने भोले- भाले प्राणी न हों, पर ब्रह नवयुग का स्वर्ग स्वप्न देखने में इतना मग्न है ति इस समय उसे किसी बाघा- विध्त की आर ध्यान देने का अवकाश नहीं है। लेकिन उन कलाकार्सें का उद्देश्य क्या यह था, कि ले किसी व्यक्ति या समाज क प्रति घृ् फैलायें/ वे व्यक्तियों के शत्रु नहीं है, न वे द्वेध या ईर्ष्या के कारण साहित्य को रचना करते हैं। वे उन परिम्धितियों ३गैर प्रवृत्तियों के शत्रु हैं, जिनके हाथों ऐसे व्यक्त उत्पन्न होते हैं। व्यक्तियों से उन्हें उतना ही प्रेम है, जितना अपने किसी भाई से हो सकता है। जिन सूदखोर महाजनों या मजदूगें के पसीने की कमाई पर मोट हात बाले मिल-मालिकों के प्रति वह अपनी कृतियों में जहर उगलता है, उन्हीं को संकट में देखकर वह उनकी सेवा करना अपना अहोभाग्य समझेगा। बह जानता है कि यह गरीब खुद अपनी स्वार्थान्धता के हाथों दुखी है और अपनी धनलिप्सा के शिकार होकर गरीबों को सता रहे हैं। उसे उनसे सहानुभूति होती है, पर उन परिस्थितियों क साथ वे बिल्कुल समझौता नहीं कर सकते, हो सकता है, उनमें कुछ ऐसे भी हों, जिन्हें सूदखारों के हाथों कष्ट उठाने पढ़े हों, संभव है, उन्हीं के हाथों उनका सर्वनारा हैं
गया हो, लेकिन अगर वह कलाकार है, तो उसमें इतनी क्षमता अवश्य होगी कि वह व्यक्ति विशेष पर दिल का गुबार निकालने न बैठेगा। हां, यह हो सकता है कि सूदखोरी क प्रति उसको लेखनी ज्यादा तीत्र और पैनी हो जाये। इन पंक्तियों के लेखक ही के विषय में एक कृपालु आलाचक ने यह आक्षेप किया है कि उसने अपनी रचनाओं में ब्राह्मणों के प्रति घृणा का प्रचार किया है। अव्वल तो उसे किसी ब्राह्मण के हाथों कोई कष्ट नहीं पहुचा और मान लो किसी ब्राह्मण ने उस पर डिगरी करके उसका घर नीलाम करा लिया हो , या उसे सरे बाजार गाली दे दीहोतो इसलिए वह समस्त ब्राह्मण -समुदाय का दुश्मन क््ये हो जायगा? जीवन में आदमी को सभी तरह के अनुभव होते हैं। प्राय: सभी समुदायों में उसके मित्र हो सकते हैं और श्र भी, फिर वह किसी एक समुदाय को क्यों चुनकर उन्हीं के प्रति घृणा फैलायेगा? हां, चूंकि धर्म के नाम पर अपना उल्लू सीधा करन चाले, श्रद्धा की आड में श्रद्धालुओं का नोचने बाले, गया में मुसलमानों और चमागें तक से पिंडदान का संस्कार कराने वाले और नाना प्रकार से धर्म का पामंड रचने वाले उस समुद.८ के लोग हैं, जो दुर्भाग्यवश ब्राह्मण कह जाते हैं, पर जो ब्राह्मण्त्व से उतना ही दूर हैं, जितना नरक से स्वर्ग, इृए ५ 7ए कोई भो लेखक, जी समात्र में सदृव्यवहार और सद्धर्म और राष्ट्रीय ऐक्य का राज देखना चाहता है, उनको उपेक्षा नहीं क र सकता। कौन- सा इतना स्वाभिमानी भारतीय है, जो प्रात:काल एक आदमी को अपने को ब्राह्मण बताकंर भीख मांगते देखकर लज्जा से सिर झुका लगा। यह उस समुदाय को बदनाम करने वाले लोग हैं जिन्होंने सच्चे जीवत और सच्चे विचार को रास्ता बहाई थी, जो हिन्दू समाज के पथ प्रदर्शक थे। उनका यह प्रतन | लेजकिन यह ऋऔतन नहीं जानता कि वह गरीब एसी परिस्थितियों में पला है, जहां भिक्षा मांगना लण्जा नहीं। मेरा खयाल है कि समाज में जितनी अनोति है, उनमें सबसे घृणित धार्मिक पाखंड और धूर्वता है। चोरी, बदमाशी, रिश्वत, दगा, झुठ इन दुर्गुणों का किसो समाज विशेष झे मंबंध नहीं। एक जमाना था, जब अधिकतर कायरथ, पटवारी और कानूनगो होते ” यह भो बिहार और यू. पी० के पूर्वो भाग में, शायद बुंदेलखंड में भी, लेकिन अब वह बात नहीं गही। इसलिए कंवल कानूनगों और पटवारी कह देने से कायस्थ का बोध नहीं होता, न बनिया कह देने से किसी विशेष समुदाय का बोध होता है। अब तो जो दोरी- दुकान करते थे, बह पटवारी हैं, जो पटवारी थे वह दौरी-दुकान करते हैं। केवल पंडित या पुजारी हो ऐसा शब्द है, जिससे दुर्भाग्यत्रश ब्राह्मण का बोध हो जाता है और यह कहना बड़ी दूर की कौड़ी लाना है कि जो इस पाखंडाचार के प्रति घृणा फेलाता है, बह ब्राह्मण जाति का दोही है। ब्राह्मणत्व की आड़ में णह पाखंडाचार देखकर जितनी ग्लानि इन पंक्तियों के लेखक को हो सकती है, उससे कहीं यादा स्वयं उन्हें होती है, जो वास्तव में ब्राह्मण हैं। लेखक को अपने पचपन साला जीवन में ऐमा कोई ब्राह्मण नहीं मिला, जिसने इस पाखंडाचार को घृणा की दृष्टि से न देखा हो। लेखक को दृष्टि में ब्राह्मण कोई समुदाय नहीं. एक महान् पद है जिस पर आदमी बहुत त्याग, सेवा और सदाचरण से पहुंचता है। हरेक टके-पंथी पुजारी को ब्राह्मण कहकर मैं इस पद का अपमान नहीं कर सकता। इस विकृत धर्मोपजीवी आचरण
के हाथों हमारा सामाजिक अहित ही नहीं, कितना राष्ट्रीय अहित हो रहा हे, यह वर्णाश्रम स्वराज्य-संघ के हथकंडों से जाहिर है। ऐसी असामाजिक, अराष्ट्रीय, अमानुषीय भावनाओं के प्रति जितनी ही घृणा फैलायी जाये, वह थोड़ी है, केवल भावनाओं के प्रति, व्यक्ति के प्रति नहीं, क्योंकि वर्णाश्रम धर्म के संचालक हमारे वैसे ही भाई हैं, जैसे आलोचक महोदय के।
बस, इस विषय में कुछ ओर लिखने की जरूरत मैं नहीं समझता। मैंने अपनी पोजीशन बतला दी, अगर इस पर भी कोई सज्जन मुझे ब्राह्मण-द्रोही कहे जाय, तो मुझे परवाह नहीं है, मैं उसे दोष और दिल का गुबार समझ लूंगा।
इस आलोचना में आलोचक महोदय ने दो-एक और मजेदार बातें कही हैं, मसलन यह कि मैंने जो कुछ लिखा है, उसमें जो कुछ अच्छा है, वह माल मशरूका है जो कुछ बुरा है वह मेरा है, या यह कि मैंने दूसरों की खुशामद की है कि बे मझे उपन्यास या औपन्यासिक-सम्राट कहें ( और संभव है इस तरह की मेरी कोई दरख्वास्न आलोचक महोदय की सेवा में भी पहुंची हो।) या यह कि मैं एक मित्र के आग्रह करने पर भी केवल इसलिए शान्तिनिकेतन नहीं गया कि मुझे स्वयं डा« रवीन्द्रनाथ ने नहीं बुलाया था और यह कि मुझे बंगाल का कोई कुत्ता भी नहीं जानता- यह सब बच्चों की-सी बातें हैं जिनका मेरे पास कोई जवाब नहीं है। हां, इतना निवेदन कर देना चाहता हूं कि आलोचक महोदय, या उनके कोई अन्य मित्र सप्राटई का मुकुट घारण करना चाहें, तो में बड़ो खुशी से उसे उनको भेंट कर दूंगा। इसके लिए उन्हें विशेष आंदोलन और विद्रोह करने की जरूरत नहीं। में दिल से तो नहीं चाहत कि अपना बहुमूल्य मुकुट उन्हें या उनके मित्रों को दे दूं लेकिन यदि मेरे पास इस तरह का कोई डेपुटेशन आवेगा, तो अनिच्छा से ही सही, पर ज्यादा हिचड़ पिचड़ न करूंगा, क्योंकि मैं स्रमय की रफ्तार पहचानता हूं और जानता हूं कि इस डिक्टेटरशिप के जमाने में मुकुट कोई लुभावनी वस्तु नहीं है।
प्रकाशन इतिहास
[लेख। 'हंस', दिसंबर, 1933 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित। इसके दो उपशीर्षक भी हैं: पहला—'जीवन में घृणा का स्थान', दूसरा—'साहित्य और कला में घृणा की उपयोगिता'।]
