Cover Image for Swaang (स्वांग) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी••29 मिनट

स्वांग

Swaang

प्रेमचंद की कहानी 'स्वांग' एक कायर और दार्शनिक बातें बनाने वाले शहर के युवक की पोल खुलने का एक बेहद मनोरंजक और व्यंग्यात्मक वृत्तांत है।

पात्र:गजेन्द्र सिंह, श्यामदुलारी, सूबेदार
स्थान:राजपूत परिवार का ससुराल गाँव

स्वांग का मूल पाठ

राजपूत खानदान में पेदा हो जाने ही से कोई सूरमा नहीं हो जाता ओर न नाम के पीछे 'सिंह' की दुम लगा देने ही से बहादुरी आती है। गजेन्द्र सिंह के पुरखे किस जमाने में राजपूत थे इसमें सन्देह की गुंजाइश नहीं। लेकिन इधर तीन पुश्तों से तो नाम के सिवा उनमें राजपूती के कोई लक्षण न थे। गजेन्द्र सिंह के दादा वकील थे ओर जिरह या बहस में कभी-कभी राजपूती का प्रदर्शन कर जाते थे। बाप ने कपड़े की दुकान खोलकर इस प्रदर्शन की भी गुंजाइश न रखी। ओर गजेन्द्र सिंह ने तो लुटिया ही डूबो दी। डील-डोल में भी फर्क आता गया। भूपेन्द्र सिंह का सीना लम्बा- चोड़ा था। नरेन्द्र सिंह का पेट लम्बा-चोड़ा था, लेकिन गजेन्द्र सिंह का कुछ भी लम्बा-चोड़ा न था। वह हलके-फुल्के, गेरे-चिट्टे, ऐनकबाज, नाजुक बदन, फेशनेबुल बाबू थे। उन्हें पढ़ने-लिखने से दिलचस्पी थी।

मगर राजपूत केसा ही हो उसकी शादी तो राजपूत खानदान ही में होगी। गजेन्द्र सिंह की शादी जिस खानदान में हुई थी, उस खानदान में राजपूती जोहर बिलकुल फना न हुआ था। उनके

ससुर पेंशन सूबेदार थे। साले शिकारी ओर कुश्तीबाज। शादी हुए दो साल हो गए थे, लेकिन अभी तक एक बार भी ससुराल न आ सका। इबम्तहानों से फुरसत ही न मिलती थी। लेकिन अब पढ़ाई खतम हो चुकी थी, नोकरी की तलाश थी। इसलिये अबकी होली के मोके पर ससुराल से बुलावा आया तो उसने कोई हील- हुज्जत न की। सूबेदार की बड़े-बड़े अफसरों से जान-पहचान थी, फौजी अफसरों की हुक्क॒म कितनी कद्र और कितनी इज्जत करते हैं, यह उसे खूब मालूम था। समझा मुमकिन हे, सूबेदार साहब की सिफारिश से नायब तहसीलदारी में नामजद हो जाय। इधर श्यामदुलारी से भी साल-भर से मुलाकात नहीं हुई थी। एक निशाने से दो शिकार हो रहे थे। नया रेशमी कोट बनवाया और होली के एक दिन पहले ससुराल जा पहुँचा। अपने गराण्डील सालों के सामने बच्चा-सा मालूम होता था।

तीसरे पहर का वक्त था, गजेन्द्र सिंह अपने सालों से विद्यार्थी काल के कारनामें बयान कर रहा था। फुटबाल में किस तरह एक देव जेसे लम्बे-तड़ंगे गोरे को पटखनी दी, हाकी मेच मे किस तरह अकेले गोल कर लिया,कि इतने में सूबेदार साहब देव की तरह आकर खड़े हो गए ओर बड़े लड़के से बोले -- भरे सुनों, तुम यहाँ बेठे क्या कर रहे हो। बाबू जी शहर से आये हे, इन्हें लजे जाकर जरा जंगल की सैर करा लाओ। कुछ शिकार-विकार

खिलाओ। यहाँ ठंठर-वेठर तो हे नहीं, इनका जी घबराता होगा। वक्त भी अच्छा है,शाम तक लोट आओगे।

शिकार का नाम सुनते ही गजेन्द्र सिंह की नानी मर गई। बेचारे ने उम्र-भर कभी शिकार न खेला था। यह देहाती उजड़ लोडे उसे न जाने कहाँ-कहाँ दोड़ाएँगे, कहीं किसी जानवर का सामन हो गया तो कहीं के न रहे। कोन जाने हिरन ही चोट कर बेठे। हिरन भी तो भागने की रूह न पाकर कभी-कभी पलट पड़ता है। कहीं भेड़िया निकल आये तो काम ही तमाम कर दे। बोले -- मेरा तो इस वक्त शिकार खेलने को जी नहीं चाहता, बहुत थक गया हूँ।

सूबेदार साहब ने फरमाया -- तुम घोड़े पर सवार हो लेना। यही तो देहात की बहार है। चुन्नू,जाकर बन्दूक ला, में भी चलूँगा। कई दिन से बाहर नहीं निकला। मेरा राइफल भी लेते आना।

चुन्नू ओर मुन्नू खुश-खुश बन्दूक लेने दोड़े, इधर गजेन्द्र की जान सूखने लगी। पछता रहा था कि नाहक इन लोडों के साथ गप- शप करने लगा। जानता कि यह बला सिर पर आने वाली हे, तो आते ही फौरन बीमार बनकर चारपाई पर पड़ रहता। अब तो कोई हीला भी नहीं कर सकता।

सबसे बड़ी मुसीबत घोड़े की सवारी। देहाती घोड़े यो ही थान पर बंधे-बंधे टर्रें हो जाते हैं ओर आसन का कच्चा सवार देखकर तो वह और भी शेखियाँ करने लगते हैं। कहीं अलफ हो गया मुझे लेकर किसी नाले की तरफ बेतहाशा भागा तो खेरियत नहीं।

दोनों सालें बन्दूकें लेकर आ पहुँचे। घोड़ा भी खिंचकर आ गया। सूबेदार साहब शिकारी कपड़े पहन कर तैयार हो गए। अब गजेन्द्र के लिए कोई हीला न रहा। उसने घोड़े की तरफ नाखियों से देखा -- बार-बार जमीन पर पेर पटकता था, हिनहिनाता था, उठी हुई गर्दन, लाला आँखें, कनोतियाँ खड़ी, बोटी- बोटी फड़क रही थी। उसकी तरफ देखते हुए डर लगता था। गजेन्द्र दिल में सहम उठा। मगर बहादुरी दिखाने के लिए घोड़े के पास जाकर उसके गर्दन पर इस तरह थपकियाँ दीं कि जैसे पक्का शहसवार हैं, ओर बोला -- जानवर तो जानदार हे मगर मुनासिब नहीं मालूम होता कि आप लोगो तो पेदल चले ओरे में घोड़े पर बेहूँ। ऐसा कुछ थका नहीं। में भी पेदल ही चलूगा, इसका मुझे अभ्यास हे।

सूबेदार ने कहा -- बेटा, जंगल दूर है, थक जाओगे। बड़ा सीधा जानवर हें, बच्चा भी सवार हो सकता हेै।

गजेन्द्र ने कहा -- जी नहीं, मुझे भी यो ही चलने दीजिए। गप- शप करते हुए चलेंगे। सवारी में वह लुफ्त कहाँ आप बुज़ुर्ग हें, सवार हो जाय॑ँ।

चारों आदमी पेदल चले। लोगों पर गजेन्द्र की इस नम्रता का बहुत अच्छा असर हुआ। सभ्यता और सदाचार तो शहरवाले ही जानते हैं। तिस पर इल्म की बरक। थोड़ी दूर के बाद पथरीला रास्ता मिला। एक तरफ हरा-भरा मैदान दूसरी तरफ पहाड़ का सिलसिला। दोनों ही तरफ बबूल, करील, करोंद ओर ढाक के जंगल थे। सूबेदार साहब अपनी फोजी जिन्दगी के पिटे हुए किस्से कहते चले आते थे। गजेन्द्र तेज चलने की कोशिश कर रहा था। लेकिन बार-बार पिछड़ जाता था। ओर उसे दो-चार कदम दोड़कर उनके बराबर होना पड़ता था। पसीने से तर हाँफता हुआ, अपनी बेवकूफ पर पछताता चला जाता था। यहाँ आने की जरूरत ही क्या थी, श्यामदुलारी महीने-दो-महीने में जाती ही। मुझे इस वक्त कुत्तें की तरह दोड़ते आने की क्‍या जरूरत थी। अभी से यह हाल है। शिकार नजर आ गया तो मालूम नहीं क्या आफत आएगी। मील-दो-मील की दोड़ तो उनके लिए मामूली बात है मगर यहाँ तो कचूमर ही निकल जायगा। शायद बेहोश होकर गिर पड़७ँ। पेर अभी से मन-मन-भर के हो रहे थे। यकायक रास्ते में सेमल का एक पेड़ नजर आया। नीचे लाल-

लाल फूल बिछे हुए थे, ऊपर सारा पेड़ गुलनार हो रूह था। गजेन्द्र वहीं खड़ा हो गया ओर उस पेड़ को मस्ताना निगाहों से देखने लगा।

चुन्नू ने पूछा -- क्या है जीजा जी, रुक केसे गये?

गजेन्द्र सिंह ने मुग्ध भाव से कहा -- कुछ नहीं, इस पेड़ का आर्कषक सोन्दर्य देखकर दिल बाग-बाग हुआ जा रहा है। अहा, क्या बहार हे, क्या रौनक हे, क्या शान है कि जैसे जंगल की देवी ने गोधूलि के आकाश को लज्जित करने के लिए केसरिया जोड़ा पहन लिया हो या ऋषियों की पवित्र आत्माएँ अपनी शाश्वत यात्रा में यहाँ आराम कर रही हों, या प्रकृति का मधुर संगीत मूर्तिमान होकर दुनिया पर मोहिनी मन्त्र डाल रहा हो आप लोग शिकार खेलने जाइए, मुझे इस अमृत से तृप्त होने दीजिए।

दोनों नौजवान आश्चर्य से गजेन्द्र का मुँह ताकने लगे। उनकी समझ ही में न आया कि यह महाशय कह क्‍या रहे हैं। देहात के रहनेवाले जंगलों में घूमनेवाले, सेमल उनके लिए कोई अनोखी चीज न थी। उसे रोज देखते थे, कितनी ही बार उस पर चढ़े, थे उसके नीचे दोड़े थे, उसके फूलों की गेंद बनाकर खेले थे,उन पर यह मस्ती कभी न छाई थी, सोंदर्य का उपभोग करना बेचारे क्‍या जाने।

सूबेदार साहब आगे बढ़ गये थे। इन लोगों को ठहरा हुआ देखकर लोट आये ओर बोले -- क्‍यों बेटा ठहर क्‍यों गये?

गजेन्द्र ने हाथ जोड़कर कहा -- आप लोग मुझे माफ कीजिए, में शिकार खेलने न जा सकूँगा। फूलों की यह बहार देखकर मुझ पर मस्ती-सी छा गई हें, मेरी आत्मा स्वर्ग के संगीत का मजा ले रही है। अहा, यह मेरा ही दिल जो फूल बनकर चमक रहा हे। मुझ में भी वही लाली हे, वहीं सोंदर्य हे,

वही रस हे। मेरे हृदय पर केवल अज्ञानता का पर्दा पड़ा हुआ है। किसका शिकार करें? जंगल के मासूम जानवरों का? हमीं तो जानवर हें, हमीं तो चिड़ियाँ हें, यह हमारी ही कल्पनाओं का दर्पण है जिसमें भोतिक संसार की झलक दिखाई पड़ रही है। क्‍या अपना ही खून करें? नहीं, आप लोग शिकार करन जाय॑ँ, मुझे इस मस्ती ओर बहार में डूबकर इसका आज्नद उठाने दें। बल्कि में तो प्रार्थना करूँगा कि आप भी शिकार से दूर रहें। जिन्दगी खुशियों का खजाना हैं उसका खून न कीजिए। प्रकृति के दृश्यों से अपने मानस-चक्षुओं को तृप्त कीजिए। प्रकृति के एक-एक कण में, एक-एक फूल में, एक-एक पत्ती में इसी आनन्द की किरणों चमका रही हैं। खून करके आजन्नद के इस अक्षय स्रोत को अपवित्र न कीजिए।

इस दार्शनिक भाषण ने सभी को प्रभावित कर दिया। सूबेदार ने चुन्नू से धीमे से कहा -- उम्र तो कुछ नहीं है लेकिन कितना ज्ञान भरा हुआ है। चुन्नू ने भी अपनी श्रद्धा को व्यक्त किया -- विद्या से ही आत्मा जाग जाती हे, शिकार खेलना हे बुरा।

सूबेदार साहब ने ज्ञानियों की तरह कहा - हाँ, बुरा तो है, चलो लोट चलें। जब हरेक चीज में उसी का प्रकाश है, तो शिकार कोन और शिकार कोन अब कभी शिकार न खेलूँगा।

फिर वह गजेन्द्र से बोले -- भइया, तुम्हारे उपदेश ने हमारी आँखें खोल दीं। कसम खाते हैं, अब कभी शिकार न खेलेंगे।

गजेन्द्र पर मस्ती छाई हुई थी, उसी नशे की हालत में बोला -- ईश्वर को लाख-लाख धन्यवाद है कि उसने आप लोगों को यह सदबुद्धि दी। मुझे खुद शिकार का कितना शौक था, बतला नहीं सकता। अनगिनत जंगली सूअर, हिरन, तुंदुए, नीलगायें, मगर मारे

होंगे, एक बार चीते को मार डाला। मगर आज ज्ञान की मदिरा का वह नशा हुआ कि दुनिया का कहीं अस्तित्त्व ही नहीं रहा।

होली जलाने का मुहूर्त नो बजे रात को था। आठ ही बजे से गाँव के ओरत-मर्द, बूढ़े-बच्चे गाते-बजाते कर्बीरे उड़ाते होली की तरफ चले। सूबेदार साहब भी बाल-बच्चों को लिए मेहमान के साथ होली जलाने चले।

गजेन्द्र ने अभी तक किसी बड़े गाँव की होली न देखी थी। उसके शहर में तो हर मुहल्ले में लकड़ी के मोटे-मोटे दो चार कुन्दे जला दिये जाते थे,जो कई-कई दिन तक जलते रहते थे। यहाँ की होली एक लम्बे-चोंड़े मेदान में किसी पहाड़ की ऊँची चोटी की तरह आसमान से बातें कर रही थी।

ज्यों ही पंडित जी ने मंत्र पढ़कर नये साल का स्वागत किया, आतिशबाजी छूटने लगी। छोटे-बड़े सभी पटाखे, छछूंदरे, हवाइयाँ छोड़ने लगे। गजेन्द्र के सिर पर से कई छछूंदर सनसनाती हुई निकल गईं। हरेक पटाखे पर बेचार दो-दो चार-चार कदम पीछे हट जाता था ओर दिल में इस उजड़ देहातियों को कोसता था। यह क्या बेहूदगी है, बारूद कहीं कपड़े में लग जाय, कोई ओर दुर्घटना हो जाय तो सारी शरारत निकल जाए। रोज ही तो ऐसी वारदातों होती रहती है, मगर इन गाँवारों क्या खबर। यहाँ दादा न जो कुछ किया वही करेंगे। चाहे उसमें कुछ तुक हो या न हो अचानक नजदीक से एक बमगोल के छूटने की गगनभेदी आवाज हुई कि जेसे बिजली कड़की हो।

गजेन्द्र सिंह चॉंककर कोई दो फीट ऊँचे उछल गए। अपनी जिन्दगी में वह शायद कभी इतना न कूदे थे। दिल धक-धक

करने लगा, गोया तोप के निशाने के सामने खड़े हों। फोरन दोनों

कान उंगलियों से बन्द कर लिए और दस कदम ओर पीछे हट

गए।

चुन्रू ने कहा -- जीजाजी, आप क्‍या छोड़ेंगे, क्या लाऊँ?

मुन्नू बाला -- हवाइयाँ छोड़िए जीजाजी, बहुत अच्छी है। आसमान

में निकल जाती हें।

चुन्नू -- हवाइयाँ बच्चे छोड़ते हें कि यह छोड़ेगे? आप बमगोला

छोड़िए भाई साहब।

गजेन्द्र -- भाई, मुझे इन चीजों का शोक नहीं। मुझे तो ताज्जुब

हो रहा है बढ़े भी कितनी दिलचस्पी से आतिशबाजी छुड़ा रहे हें।

मुन्नू -- दो-चार महाताबियाँ तो जरूर छोड़िए।

गजेन्द्र को महताबियाँ निरापद जान पड़ी। उनकी लाल, हरी

सुनहरी चमक के सामने उनके गोरे चेहरे ओर खूबसूरत बालों

ओर रेशमी कुर्ते की मोहकता कितनी बढ़ जायगी। कोई खतरे

की बात भी नहीं। मजे से हाथ में लिए खड़े हैं, गुल टप-टप नीचे

गिर रहा है ओर सबकी निगाहें उनकी तरफ लगी हुई हैं उनकी

दार्शनिक बुद्धि भी आत्मप्रदर्शन की लालसा से मुक्त न थी। फौरन महताबी ले ली, उदासीनता की एक अजब शान के साथ। मगर पहली ही महताबी छोड़ना शुरु की थी कि दूसरा बमगोला छूटा। आसमान काँप उठा। गजेन्द्र को ऐसा मालूम हुआ कि जैसे कान के पर्दे फट गये या सिर पर कोई हथोड़ा गिर पड़ा। महताबी हाथ से छूटकर गिर पड़ी ओर छाती धड़कने लगी। अभी इस धमाके से सम्हलने ने पाये थे कि दूसरा धमाका हुआ। जेसे आसमान फट पड़ा। सारे वायुमण्डल में कम्पन-सा आ गया, चिड़िया घोंसलों से निकल निकल शोर मचाती हुई भागी, जानवर रस्सियाँ तुड़ा-तुड़ाकर भागे ओर गजेन्द्र भी सिर पर पाँव रखकर भागे, सरपट, और सीधे घर पर आकर दम लिया।

चुन्नू ओर मुन्नू दोनों घबड़ा गए। सूबेदार साहब के होश उड़ गए। तीनों आदमी बगटुट दोड़े हुए गजेन्द्र के पीछे चले। दूसरों ने जो उन्हें भागते देखा तो समझे शायद कोई वारदात हो गई। सबके सब उनके पीछे हो लिए। गाँव में एक प्रतिष्ठित अतिथि का आना मामूली बात न थी। सब एक-दूसरे से पूछ रहे थे -- मेहमान को हो क्‍या गया? माजरा कया हें? क्‍यों यह लोग दोड़े जा रहे हैं। एक पल में सेकड़ों आदमी सूबेदार साहब के दरवाजे पर हाल-चाल पूछने लिए जमा हो गए।

गाँव का दामाद कुरूप होने पर भी दर्शनीय और बदहाल होते हुए भी सबका प्रिय होता है। सूबेदार ने सहमी हुई आवाज में पूछा -- तुम वहाँ से क्‍यों भाग आए, भट्या।

गजेन्द्र को क्या मालूम था कि उसके चले आने से यह तहलका मच जाएगा। मगर उसके हाजिर दिमाग ने जवाब सोच लिया था ओर जवाब भी ऐसा कि गाँव वालों पर उसकी अलोकिक दृष्टि की धाक जमा दे।

बोला -- कोई खास बात न थी, दिल में कुछ ऐसा ही आया कि यहाँ से भाग जाना चाहिए।

“नहीं, कोई बात जरूर थी।!'

“आप पूछकर क्‍या करेंगे? में उसे जाहिर करके आपके आन्नद में विध्न 'नहीं डालना चाहता।'

“जब तक बतला न दोगे बेटा, हमें तसलल्‍ली नहीं होगी। सारा गाँव घबराया हुआ हे।'

गजेन्द्र ने फिर सूफियों का-सा चेहरा बनाया, आँखें बन्द कर लीं, जम्हाइयाँ लीं ओर आसमान की तरफ देखकर बोले --बात यह है कि ज्यों ही मैंने महताबी हाथ में ली, मुझे मालूम हुआ जैसे किसी ने उसे मेरे हाथ से छीनकर फेंक दिया। मैंने कभी

आतिशबाजियाँ नहीं छोड़ी, हमेशा उनको बुरा-भला कहता रहा हूँ। आज मैंने वह काम किया जो मेरी अन्तरात्मा के खिलाफ था। बस गजब ही तो हो गया। मुझे ऐसा मालूम हुआ जैसे मेरी आत्मा मुझे धिक्कार रही है। शर्म से मेरी गर्दन झुक गई ओर में इसी हालत में वहाँ से भागा। अब आप लोग मुझे माफ करें में आपको जशन में शरीक न हो सकूँगा।

सूबेदार साहब ने इस तरह गर्दन हिलाई कि जेसे उनके सिवा वहाँ कोई इस अध्यात्म का रहस्य नहीं समझ सकता। उनकी आँखें कह रही थीं -- आती हैं तुम लोगों की समझ में यह बातें? तुम भला क्‍या समझोगे, हम भी कुछ-कुछ ही समझते हें।

होली तो नियत समय जलाई गई थी मगर आतिशबाजियाँ नदी में डाल दी गईं। शरीर लड़को ने कुछ इसलिए छिपाकर रख लीं कि गजेन्द्र चले जाएँगे तो मजे से छुड़ाएँगे।

श्यामदुलारी ने एकान्त में कहा -- तुम तो वहाँ से खूब भागे। गजेन्द्र अकड़ कर बोले -- भागता क्‍यों, भागने की तो कोई बात नथी।

'मेरी तो जान निकल गई कि न मालूम कया हो गया। तुम्हारे ही साथ में भी दोड़ी आई। टोकरी-भर आतिशबाजी पानी में फेंक दी गई। '

“यह तो रुपये को आग में फूँकना हे।'

“होली में भी न छोड़े तो कब छोड़े। त्योहार इसीलिए तो आते हे

“त्यौहार में गाओ-बजाओ, अच्छी-अच्छी चीजें पकाओ-खाओ, खेरात करो, या दोस्तों से मिलों, सबसे मुहब्बत से पेश आओ, बारुद उड़ने का नाम त्योहार नहीं है।'

रात के बारह बज गये थे। किसी ने दरवाजे पर धक्का मारा, गजेन्द्र ने चॉककर पूछा -- यह धक्का किसने मारा?

श्यामा ने लापरवाही से कहा -- बिल्ली-बिल्ली होगी।

कई आदमियों के फट-फट करने की आवाजें आईं, फिर किवाड़ पर धक्का पड़ा। गजेन्द्र को कंपकंपी छूट गई, लालटेन लेकर दराज से झाँक तो चेहरे का रंग उड़ गया, चार-पाँच आदमी कुर्ते पहने, पगड़ियाँ बाँधे, दाढ़ियाँ लगाये, कंधे पर बन्दूकें रखे, किवाड़ को तोड़ डालने की जबर्दस्त कोशिश में लगे हुए थे। गजेन्द्र कान लगाकर बातें सुनने लगा --

दोनों सो गये हैं, किवाड़ तोड़ डालो, माल अलमारी में है।'

“ओर अगर दोनों जाग गए?

“ओरत क्‍या कर सकती हें, मर्द का चारपाई से बांध देंगे।'

सुनते है गजेन्द्र सिंह कोई बड़ा पहलवान हें।'

"कैसा ही पहलवान हो, चार हथियारबन्द आदमियों के सामने कया कर सकता है।'

गजेन्द्र के काटो तो बदन में खून नहीं श्यामदुलारी से बोले -- यह डाकू मालूम होते हैं। अब क्‍या होगा, मेरे तो हाथ-पाँव काँप रहे हे चोर-चोर पुकारो, जाग हो जाएगी, आप भाग जाएँगे। नहीं में चिल्लाती हूँ। चोर का दिल आधा।'

'ना-ना, कहीं ऐसा गजब न करना। इन सबों के पास बन्दूकें हें। गाँव में इतना सन्नाटा क्‍यों हें?घर के आदमी क्‍या हुए?

'भइया ओर मुन्नू दादा खलिहान में सोने गए हें, काक दरवाजें पर पड़े होंगे, उनके कानों पर तोप छूटे तब भी न जागेंगे।'

“इस कमरे में कोई दूसरी खिड़की भी तो नहीं है कि बाहर आवाज पहुंचे। मकान है या केदखाने'

में तो चिललाती हूँ।'

“अरे नहीं भाई, क्‍यों जान देने पर तुली हो। में तो सोचता हूँ, हम दोनों चुपचाप लेट जाएँ ओर आँखें बन्द कर लें। बदमाशों को जो कुछ ले जाना हो ले जाए, जान तो बचे। देखों किवाड़ हिल रहे हैं। कहीं टूट न जाएँ। हे ईश्वर, कहाँ जाएँ, इस मुसीबत में

तुम्हारा ही भरोसा है। क्या जानता था कि यह आफत आने वाली हैं, नही आता ही क्‍यों? बसा चुप्पी ही साध लो। अगर हिलाएँ- विलाएँ तो भी सांस मत लेना।'

'मुझसे तो चुप्पी साधकर पड़ा न रहा जाएगा।'

जेवर उतारकर रख क्‍यों नहीं देती, शैतान जेवर ही तो लेंगे।' जेवर तो न उतारूँगी चाहे कुछ ही क्‍यों न हो जाय।'

क्यों जान देने पर तुली हुई हो?

खुशी से तो जेवर न उतारूँगी, जबर्दस्त ओर बात हें!

खामोशी, सुनो सब कया बातें कर रहे हें।'

बाहर से आवाज आई - किवाड़ खोल दो नहीं तो हम किवाड़ तोड़ कर अन्दर आ जाएँगे।

गजेन्द्र श्यामदुलारी की मिन्नत की -- मेरी मानो श्यामा, जेवर उतारकर रख दो, में वादा करता हूँ बहुत जल्दी नये जेबर बनवा दूँगा।

बाहर से आवाज आई - क्यों, आई! बस एक मिनट की मुहलत ओर देते हैं, अगर किवाड़ न खोले तो खेरियत नहीं।

गजेन्द्र ने श्यामदुलारी से पूछा -- खोल दूँ?

हा, बुला लो तुम्हारे भाई -- बन्द हैं? वह दरवाजे को बाहर से ढकेलते हें, तुम अन्दर से बाहर को ठेली।'

“और जो दरवाजा मेरे ऊपर गिर पड़े? पाँच-पाँच जवान हें!

“वह कोने में लाठी रखी है, लेकर खड़े हो जाओ। '

“तुम पागल हो गई हो।'

“चुन्नी दादा होते तो पाँचों का गिरते। '

में लट्टबाज नहीं हूँ।'

“तो आओ मुँह ढाँपकर लेट जाओं, में उन सबों से समझ लूँगी।' तुम्हें तो ओर समझकर छोड़ देंगे, माथे मेरे जाएगी।'

में तो चिललाती हूँ।'

“तुम मेरी जान लेकर छोड़ोगी!

'मुझसे तो अब सत्र नहीं होता, में किवाड़ खोल देती हूँ।'

उसने दरवाजा खोल दिया। पाँचों चोर में भड़भड़ाकर घुस आए। एक ने अपने साथी से कहा -- में इस लॉडे को पकड़े हुए हूँ तुम ओरत के सारे गहने उतार लो।

दूसरा बोला -- इसने तो आँखों बन्द कर लीं। अरे, तुम आँखें क्यों नहीं खोलती जी?

तीसरा -- यार, औरत तो हसीन हे! चोथा -- सुनती हे ओ मेहरिया, जेवर दे दे नहीं गला घोंट दूँगा।

गजेन्द्र दिल में बिगड़ रहे थे, यह चुड़ेल जेवर क्‍यों नही उतार देती।

श्यामदुलारी ने कहा -- गला घोंट दो, चाहे गोली मार दो जेवर न उतारूँगी।

पहला -- इस उठा ले चलो। यों न मानेगी, मन्दिर खाली हे। दूसरा -- बस, यही मुनासिब हे, क्‍यों रे छोकरी, हमारे साथ चलेगी? श्यामदुलारी -- तुम्हारे मुँह में कालिख लगा दूँगी।

तीसरा -- न चलेगी तो इस लॉंडे को ले जाकर बेच डालेंगे। श्यामा -- एक-एक के हथकड़ी लगवा दूँगा।

चौथा -- क्‍यों इतना बिगड़ती हे महारानी, जरा हमारे साथ चली क्यो नहीं चलती। क्‍या हम इस लोडें से भी गये-गुजरे है। क्‍या रा जाएगा, अगर हम तुझे जबर्दस्ती उठा ले जाएँगे। यों सीधी तरह नहीं मानती हो। तुम जेसी हसीन औरत पर जुल्म करने को जी नहीं चाहता।

पाँचवाँ -- या तो सारे जेवर उतारकर दे दो या हमारे साथ चलो।

श्यामदुलारी -- काका आ आएँगे तो एक-एक की खाल उदेड़ डालेंगे।

पहला -- यह यों न मानेगी, इस लोंडें को उठा ले चलो। तब आप ही पेरों पड़ेगी।

दो आदमियों ने एक चादर से गजेन्द्र के हाथ-पाँव बांधे। गजेन्द्र मुर्दे की तरह पड़े हुए थे,सांस तक न आती थी, दिल में झुँझला रहे थे -- हाय कितनी बेवफा ओरत हे, जेवर न देगी चाहे यह सब मुझे जान से मार डालें। अच्छा, जिन्दा बचुँगा तो देखूँगा। बात तक तो पूछ नहीं।

डाकुओं ने गजेन्द्र को उठा लिया और लेकर आँगन में जा पहुंचे तो श्यामदुलारी दरवाजे पर खड़ी होकर बोली -- इन्हें छोड़ दो तो में तुम्होीरे साथ चलने को तैयार हूँ।

पहला -- पहले ही क्‍यों न राजी हो गई थी। चलेगी न? श्यामदुलारी -- चलूँगी। कहती तो हूँ।

तीसरा -- अच्छा तो चल। हम इसे इसे छोड़ देते हे।

दोनों चोरों पे गजेन्द्र को लाकर चारपाई पर लिटा दिया ओर श्यामदुलारी को लेकर चले दिए। कमरे में सन्नाटा छा गया। गजेन्द्र ने डरते-डरते आँखें खोलीं,कोई नजर ल आया। उठकर दरवाजे से झाँका। सहन में भी कोई न था। तीर की तरह निकलकर सदर दरवाजे पर आए लेकिन बाहर निकलने का होसला न हुआ। चाहा कि सूबेदार साहब को जगाए, मुँह से आवाज न निकली।

उसी वक्त कहकहे की आवाज आई। पाँच ओरतें चुहल करती हुई श्यामदुलारी के कमरे में आईं। गजेन्द्र का वहाँ पता न था।

एक - कहाँ चले गए?

श्यामदुलारी -- बाहर चले गए होगें।

दूसरी -- बहुत शर्मिन्दा होंगे।

तीसरी -- डर के मारे उनकी सांस तक बन्द हो गई थी।

गजेन्द्र ने बोलचाल सुनी तो जान में जान आई। समझे शायद घर में जाग हो गईं। लपककर कमरे के दरवाजें पर आए ओर बोले -- जरा देखिए श्यामा कहाँ हें, मेरी तो नींद ही न खुली। जल्द किसी को दोड़ाइए।

यकायक उन्हीं ओरतों के बीच में श्यामा को खड़े हँसते देखकर हैरत में आ गए।

पाँचों सहेलियों ने हँसना ओर तालियाँ पीटना शुरु कर दिया। एक ने कहा -- वाह जीजा जी, देख ली आपकी बहादुरी। श्यामदुलारी -- तुम सब की सब शैतानी हो।

तीसरी -- बीवी तो चारों के साथ चली गईं और आपने सांस तक नली!

गजेन्द्र समझ गए, बड़ा धोखा खाया। मगर जबान के शेर फौरन बिगड़ी बात बना ली, बोले -- तो क्‍या करता, तुम्हारा स्वांग बिगाड़ देता! में भी इस तमाशे का मजा ले रहा था। अगर सबों को पकड़कर मुँछे उखाड़ लेता तो तुम कितनी शर्मिन्दा होतीं। में इतना बेरहम नहीं हूँ।

सब की गजेन्द्र का मुँह देखती रह गईं।


स्वांग का सारांश

'स्वांग' प्रेमचंद की एक अत्यंत मनोरंजक और तीखे हास्य-व्यंग्य से भरपूर कहानी है। कहानी का नायक गजेन्द्र सिंह नाममात्र का राजपूत है, जो शहर का पढ़ा-लिखा, नाजुक-बदन, चश्मा लगाने वाला और फैशनपरस्त युवक है। उसमें वीरता का दूर-दूर तक कोई लक्षण नहीं है, किंतु वह बड़ी-बड़ी बातें बनाने में माहिर है। होली के अवसर पर वह अपनी ससुराल जाता है, जहाँ उसके ससुर एक सेवामुक्त फौजी सूबेदार हैं और साले पहलवान व शिकारी हैं।

ससुराल पहुँचने पर जब सूबेदार साहब उसे शिकार पर चलने का प्रस्ताव देते हैं, तो गजेन्द्र सिंह डर के मारे काँप उठता है। पैदल चलते-चलते थक जाने पर वह रास्ते में सेमल के पेड़ के पास रुक जाता है और शिकार से बचने के लिए अहिंसा, प्रकृति-प्रेम और अध्यात्म पर एक लंबा दार्शनिक भाषण दे डालता है। उसकी इस 'महानता' से प्रभावित होकर सूबेदार साहब जीवन भर शिकार न खेलने की कसम खा लेते हैं, जबकि गजेन्द्र शेखी बघारता है कि उसने अतीत में कई बाघ और तेंदुए मारे हैं।

होली जलने के समय जब जोर-जोर से आतिशबाजी और बमगोले छूटते हैं, तो गजेन्द्र डरकर बेतहाशा घर की ओर भागता है। पूरे गाँव के जमा होने पर वह अपनी कायरता छिपाने के लिए एक और सूफियाना बहाना बना देता है। आधी रात को गजेन्द्र के कमरे का किवाड़ तोड़कर पाँच हथियारबंद डाकू घुस आते हैं। गजेन्द्र डर के मारे थर-थर काँपते हुए अपनी पत्नी श्यामदुलारी को चुपचाप लेटे रहने और सारे जेवर डाकुओं को सौंप देने की सलाह देता है। जब डाकू श्यामदुलारी को साथ ले जाने लगते हैं, तब भी गजेन्द्र अपनी जान बचाने के लिए चुप्पी साधे खाट पर पड़ा रहता है।

डाकुओं के जाने के बाद बाहर हँसी-ठहाकों की आवाज़ आती है। गजेन्द्र को पता चलता है कि डाकू कोई और नहीं, बल्कि श्यामदुलारी की सहेलियाँ थीं जिन्होंने होली के अवसर पर उसकी बहादुरी परखने के लिए 'स्वांग' (प्रहसन) रचा था। पाँचों स्त्रियाँ उसकी कायरता पर तालियाँ बजाकर हँसने लगती हैं। किंतु अपनी पोल पूरी तरह खुल जाने पर भी निर्लज्ज गजेन्द्र बड़ी ढिठाई से बात पलटता है कि वह तो केवल उनके 'स्वांग' का मज़ा ले रहा था और यदि वह चाहता तो एक-एक की मूँछें उखाड़ लेता। उसकी यह बड़बोली ढिठाई देखकर सभी हक्की-बक्की रह जाती हैं।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • शहर बनाम देहात और खोखली वीरता पर व्यंग्य: कहानी में राजपूत कुल का नाम धारण करने वाले शहरी शिक्षित युवा गजेन्द्र सिंह के माध्यम से केवल बड़बोलापन करने और व्यावहारिक जीवन में कायरता दिखाने की प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य किया गया है।
  • छद्म दार्शनिकता और आत्म-रक्षा की धूर्तता: शिकार और आतिशबाजी से डरकर भागने पर गजेन्द्र सिंह द्वारा अचानक प्रकृति-प्रेम, अहिंसा और अध्यात्म का ढोंग रचना उसकी वाक्पटुता और कायरता को छिपाने की कला को उजागर करता है।
  • लोक-परंपरा और होली का स्वांग: होली के त्योहार पर महिलाओं द्वारा पुरुषों की परीक्षा लेने और मनोरंजन के लिए रचे जाने वाले 'स्वांग' (प्रहसन) की देहाती परंपरा का अत्यंत सजीव और मनोरंजक चित्रण किया गया है।
  • पुरुष-दंभ और निर्लज्जता का उद्घाटन: अपनी पोल पूरी तरह खुल जाने और महिलाओं द्वारा मज़ाक उड़ाए जाने के बावजूद गजेन्द्र का यह दावा करना कि वे 'स्वांग' का आनंद ले रहे थे, उसके अदम्य पुरुष-दंभ और ढिठाई को रेखांकित करता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'स्वांग' प्रेमचंद की एक उत्कृष्ट हास्य-व्यंग्य कथा है, जो झूठी शान, खोखले बड़बोलेपन और सामाजिक-पारिवारिक स्तर पर ढोंग के बेनक़ाब होने की प्रक्रिया को अत्यंत हास्यप्रद ढंग से प्रस्तुत करती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "स्वांग." *Munshi Premchand Digital Archive*, https://munshipremchand.com/works/short-stories/swaang. Accessed 22 Sep. 2026.