Cover Image for Sampadak Moteram Jee Shastri (सम्पादक मोटेराम जी शास्त्री) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1928•21 मिनट

सम्पादक मोटेराम जी शास्त्री

Sampadak Moteram Jee Shastri

प्रेमचंद की कहानी 'सम्पादक मोटेराम जी शास्त्री' पंडित मोटेराम शास्त्री द्वारा 'सोना' नामक पत्रिका के सम्पादन और उसके पीछे के ढोंग व हास्यप्रद कारनामों पर एक तीखा व्यंग्य है।

पात्र:पंडित मोटेराम शास्त्री, पंडित चिंतामणि, सोना देवी
स्थान:सोना पत्रिका कार्यालय और मोटेराम का घर

सम्पादक मोटेराम जी शास्त्री का मूल पाठ

पंडित चिन्तामणि जब कई महीनों के बाद तीर्थ-यात्रा करके लौटे, तो अपने परम मित्र पंडित मोटेरामजी शास्त्री से मिलने चले। इस लम्बी यात्रा में उन्हें कितने ही विचित्र अनुभव हुए थे, कितनी ही नयी-नयी बातें देखी और सुनी थीं। इस सबों को वह नमक-मिर्च लगाकर पंडितजी से बयान करने के लिए आतुर हो रहे थे। लपके हुए पंडित मोटेरामजी के घर पहुँचे और अन्दर क़दम रखना चाहते थे कि एक चपरासी ने ललकारा-“कौन अन्दर जा रहा है ? बाहर खड़े रहो। अन्दर क्‍या काम है ?”

चिन्तामणि ने विस्मित होकर पूछा-मोटेराम का घर यही है न ?

सिपाही-हम यह कुछ नहीं जानते, व्यवस्थापकजी की आज्ञा है कि काई अन्दर न जाने पाए।

चिन्तामणि-व्यवस्थापकजी कौन हैं ? है तो यह मोटेराम ही का घर ?

सिपाही-यह सब हम कुछ नहीं जानते। व्यवस्थापकजी की यही आज्ञा है।

चिंतामणि-कुछ मालूम तो हो, व्यवस्थापकजी कौन हैं ?

सिपाही-व्यवस्थापकजी व्यवस्थापकजी हैं, और कौन हैं।

चिंतामणि ने चकित होकर मकान को ऊपर से नीचे तक देखा कि कहीं उनसे कोई भूल तो नहीं हुई, तो उन्हें द्वार के सामने एक बड़ा-सा साइनबोर्ड नजर आया। उस पर लिखा धा-'सोना कार्यालय मित्र से मिलने की उत्सुकता में उनकी निगाह पहले उस बोर्ड पर न पड़ी थी। पूछा-यह कोई कायलिय है क्‍या ?

सिपाही-तुम्हारे आँखें नहीं हैं क्या ?

चिंतामणि-तुम इतना रोब क्‍यों जमाते हो ! क्‍या हमें कोई भिक्षुक समझा है ? अगर मोटेरामजी का यही घर हो, तो जाकर कहो-पंडित चिन्तामणिजी उनसे मिलने आए हैं। धौंस दूसरों पर जमाना ।

सिपाही-कार्ड लाओ।

चिंतामणि-कैसा कार्ड ?

सिपाही-व्यवस्थापकजी बिना कार्ड देखे किसी से नहीं मिलते ।

चिंतामणि-तुम हमारा नाम तो बताओ जाकर।

सिपाही-ऐसे क्या नाम बताऊँ। मुझ पर बिगड़ने लगें तब ?

चिंतामणि ने जब देखा कि सिपाही की खुशामद से काम नहीं चलेगा, तो द्वार पर खड़े होकर जोर-जोर से पुकारने लगे-मोटेराम ! ओ मोटेराम '

सिपाही ने चिंतामणि का हाथ पकड़कर हटाते हुए कहा-यहाँ चिल्लाने का हुक्म नहीं है।

चिंतामणि की क्रोधाग्नि भड़क उठी। वह उस सिपाही को अपने ब्रह्मतेज का स्वरूप दिखाना ही चाहते थे कि पंडित मोटेरामजी अन्दर से निकल आये और चिंतामणि को देखकर बोले-“अरे ! तुम हो चिंतामणि ! कार्ड क्‍यों न भिजवा दिया? तुमने साइनबोर्ड तो देखा होगा-मैं 'सोना' नामी पत्रिका का सम्पादक हूं। आओ, अन्दर आओ। मैं बिना कार्ड देखे किसी से नहीं मिलता, लेकिन तुम अपने पुराने मित्र हो, तुम्हारे लिए कोई रोक-टोक नहीं।

चिंतामणि अन्दर दाखिल हुए तो कुछ और ही छटा देखी। जिस कोठरी में सोना बैठती थी, वहाँ अब मेज और कुर्सियाँ थीं। रसोई के कमरे में पत्रों का ढेर लगा हुआ था। बरामदों में कर्मचारी लोग बैठे हुए बड़े-बड़े रजिस्टर लिख रहे थे।

जब दोनों आदमी कुर्सियों पर बैठ गये तो मोटेरामजी ने कहा-“'तुम जब तीर्थयात्रा करने चले गए तो मैंने एक पत्रिका निकाल ली ।”

चिंतामणि-अच्छा तो “सोना? पत्रिका का नाम है। तुम्हीं इसका सम्पादन करते हो।

मोटेराम-जब से मैंने यह पत्रिका निकाली है, हिन्दी संसार में हलचल पड़ गई है। अभी इसे निकाले तीन महीने भी पूरे नहीं हुए, लेकिन ग्राहक-संख्या पच्चीस हज़ार से कक हो गई। घड़ाधड़ आर्डर चले आ रहे हैं। डाकखाने वाले ने कर्मचारियों की संख्या बढ़ा दी है।

चिंतामणि-झूठ बोलते हो, सरासर झूठ। सोलहों आने झूठ। पच्चीस हज़ार ! ईश्वर से भी नहीं डरते। भला पच्चीस-सी कहते तो एक बात भी थी। झूठ भी बोलने बैठे, तो बोलना न आया।

मोटेराम ने हँसकर कहा-“यही और लोग भी कहते हैं। जो सुनता है, दंग रह जाता है। पर यहाँ तो सच्चा काम करते हैं। जिसका जी चाहे रजिस्टर देख ले। अगर पच्चीस हज़ार ग्राहक न निकलें, तो चोर की सजा वह मेरी। और अभी तो आरम्भ है। अगर साल भर में एक लाख तक संख्या न पहुँचा दूँ, तो मोटेराम नहीं। ग्राहकों की यहाँ कमी नहीं है, कमी है काम करने वालों की। सच्चे ढंग से काम करने वाला चाहिए, फिर देखो कैसे ग्राहक नहीं आते। यह सब कुछ विज्ञापन का खेल है। दिखाऊँ रजिस्टर ?'”

चिंतामणि--रजिस्टर में कोई कार्रवाई कर ली होगी, फ़र्जी नाम लिख लिये होंगे, बीच में कई-कई नम्बर छोड़ गए होंगे। मैं इतना मान सकता हूं कि तुम बड़े कार्य-कुशल हो। मैं तो इसका चौथाई भी न कर सकता। लेकिन पच्चीस हजार की संख्या नहीं मिल सकती। तुम्हें इतने रुपये कहाँ से मिल गए ?

मोटेराम-रुपये की न कहो, सब ईश्वर की दया है। यही तो एक ऐसा साधन है, जिसमें बिना एक कोड़ी घर की लगाये, तुम एक बहुत बड़ा व्यवसाय खड़ा कर सकते हो। बस जरा ढंग चाहिए। कोड़ी घर से लगाने की कोई जरूरत नहीं। कागज वाले से उधार कागज ले लिया, प्रेसवालों से उधार छपाई करा ली, बस बेड़ा पार। रुपये मिले, तो प्रेस और कागज दो, नहीं तो कानों में तेल डालकर बैठ रहो। कोई तुमसे कया ले लेगा।

चिंतामणि-कागज वाले और प्रेस वाले उधार कैसे देते हैं ?

मोटेराम-(हँसकर) यह दूसरी विद्या है, जो ईश्वर की देन है। यह पढ़ने से नहीं आती, न रटने से कंठ होती है। उसे पूर्व-जन्म का संस्कार ही कह सकते हो। कागज वाले सेठ सुद्धीलाल को जानते ही हो, कई बार उसके यहाँ हम-तुम इच्छापूर्ण भोजन कर चुके हैं। भक्त जीव है। उससे कागज लिया। माँगने की देर थी। पाँच सी का कागत्र ठेलों पर लद॒वा दिया। छापाख़ाना अभी अपना नहीं है। एक दूसरे छापे खाने में छपवा लेता हूँ। पूरे दो दर्जन एजेण्ट रख छोडे हैं। वे नगरों और ग्रामों में जा-जाकर मेरी पत्रिका का प्रचार करते हैं। कर्मचारियों के साथ मेरा नियम बड़ा कठोर है। उन्हें टालबाजी अथवा कामचोरी करते देखकर मैं आपे से बाहर हो जाता हूँ। मेरी देह में आग-सी लग जाती है। यही जी चाहता है कि इन्हें कच्चा ही चबा जाऊँ, नमक भी न माँगू। कितने ही तो छोड़कर भाग खड़े हुए। इसमें भी मेरा ही लाभ रहा। उनका वेतन न देना पड़ा। कितनों ही को पीट चुका हूँ। मुझे देखकर सब थर-थर काँपते हैं। अभी दस-पाँच एजेण्टों की और आवश्यकता है। अगर तुम चाहो तो अपने दो-चार मित्रों को रखा दो। अच्छा फ़ायदा है।

चिंतामणि-मेरे मित्रों में ऐसे बहुत कम हैं जो तुम्हारी इस अनीति को सहन कर सकें। इधर तुमने घूँसा ताना और उधर वे तुम्हें ले पड़ेंगे। मगर यह तो बताओ, तुम पत्रिका का सम्पादन कैसे कर लेते हो ?

मोटेराम-सम्पादन कैसे कर लेता हूँ ! बुद्धि से, और कैसे ?

चिंतामणि-तुम्हारी बुद्धि तो बहुत तीव्र कभी न थी।

मोटेराम-तुम मेरी बुद्धि की तीव्रता का अनुमान क्या खाके करोगे। जो आदमी बिना गाँठ की संझी कोड़ी खर्च किए इतना बड़ा कार्यालय खोल दे, इतनी बड़ी पत्रिका का सम्पादक हो जाये, जिसका नाम समस्त देश में फैल जाये, उसके बुद्धिमान होने में तुम जैसे गधों के सिवा और किसे सन्देह हो सकता है।

चिंतामणि-यह तो काइयाँपन है। मैं इसे बुद्धि नहीं कहता।

मोटेराम-ओह ! तुम चाहे काइयाँपन कहो, चाहे झाँसेबाजी कहो, चाहे धूर्तता कहो; पर मेरे कोष में उसका नाम बुद्धि है। कोई कितना ही धुरंधर विद्वान अपना लेख भेजे, मैं उसमें कुछ-न-कुछ संशोधन अवश्य करूँगा। दो-चार जगह लाल-क़लम फेर ही देता हूँ। इससे विद्वानों पप आतंक जम जाता है। दो-तीन अनुवादक रख छोड़े हैं। वे बंगला, गुजराती आदि भाषाओं के लेख और टिप्पणियाँ अनुवाद कर लेते हैं। उन्हें मैं अपने सम्पादकीय विचारों में देता हूँ। उन पर लेखक का नाम तो पता होता नहीं, लोग समझते हैं कि शास्त्रीजी ही ने लिखा है। किसे इतना अवकाश है कि मेरे लेखों की छान-बीन करता फिरे। मैंने बहुत दिनों के बाद सांसारिक सफलता का मूलमंत्र खोज पाया है, मगर तुमसे न बताऊँगा।

चिंतामणि-क्यों मित्र, हमीं से यह परदा ! मैंने तुम्हें सदैव अपना गुरु माना है और अब भी अपना बड़ा भाई समझता हूँ, और तुम मुझी से ऐसी कृपणता करते हो ।

मोटेराम-अच्छा वचन दो कि तुम पत्रिका के सौ ग्राहक बना लाओगे।

चिंतामणि तुम्हारी आज्ञा मैंने कभी टाली है ?

मोटेराम-अच्छा तो सुना, वह मूलमंत्र है डींग मारना। ऐसी डींग मारो कि दूसरे प्रभावित हो जाएँ। कोई कितना ही अविश्वास प्रकट करे, कितनी ही हँसी उड़ाए, कुछ परवा मत करो | तुम्हारे चले जाने के बाद वह अपने मन में सोचेगा कि अगर इसने रुपये में एक आना भी सत्य कहा है तब भी कुछ कम नहीं । बस जमीन और आसमान के कुलाबे मिला दो। ग्राहक-संख्या कभी एक लाख से कम न बतलाओ। खूब जोर-शोर से कहो कि हमने पाश्चात्य विद्वानों से लेख मँगवाने का आयोजन किया है। अपने चित्रों! और लेखों को अद्वितीय सिद्ध करो, फिर देखो ग्राहक कैसे नहीं पंजे में आता। तुम ज़रा भी झिझके और काम बिगड़ा। जरा देर के लिए अपने को भूल जाओ और यह समझो कि मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह अक्षरशः सत्य है। तुमने मेरी पत्रिका देखी नहीं, इसमें समाज-सुधार पर बड़े स्वतन्त्र लेख रहते हैं।

चिंतामणि-समाज-सुधार पर ! तुम समाज-सुधारक कब से हुए ? तुम तो बाजार की पूरियाँ तक नहीं खाते।

मोटेराम-अजी, यह न पूछो मैं क्या खाता हूँ और कैसे रहता हूँ। इस कमरे में आकर मैं समाज का कट्टर सुधारक हो जाता हूँ और घर में जाकर सुधार का कट्टर शत्रु । बिना इस दुरंगी चाल के सफलता कहाँ ! तुमको आश्चर्य होगा मैंने विधवा-विवाह का समर्थन किया है; अछूतोद्धार का बीड़ा उठाया है और शुद्धि का बिगुल बजाया है। दिल में समझता हूँ कि इन सुधारों से हिन्दू-समाज रसातल की ओर जा रहा है, पर करूँ क्‍या, किसी तरह बाल-बच्चों का पालन पोषण तो करना है।

।पमणि-यार, तुम बड़े धूर्त हो, मान गया तुम्हारी खोपड़ी को।

मोटेराम-अजी, अभी देखते तो जाव ! अब की विज्ञापन दूँगा कि हमारी पत्रिका के बारहों अंक विशेषांक होंगे। संसार के बड़े-से-बड़े पुरुषों को उनका सम्पादक लिख दूँगा। किसी अंक का सम्पादन डॉक्टर टैगोर करेंगे, किसी अंक का श्रीमान्‌ डॉक्टर इकबाल तथा किसी अंक का शंकराचार्य, किसी का मुसोलिनी, किसी का कैसर, किसी का लायड जार्ज । फिर देखो इस विज्ञापन की कैसी धूम मचती है।

चिंतामणि--और यदि इन महानुभावों ने अपना नाम देना स्वीका? न किया तो?

मोटेराम-यह तो मानी हुई बात है कि वे स्वीकार न करेंगे, लेकिन इस झाँसे में आकर जो आदमी जीविका का ग्राहक बन जायेगा, वह हमसे अपने रुपये तो न लौटाने आयेगा। दूसरी साल फिर कोई ऐसा ही शिगूफा खिला दूँगा।


2

अभी यही बातें हो रही थीं कि भीतर से सोनादेवी छम-छम करती हुई निकल आयीं। उनके मुख-मंडल पर आज ऐसी लुनाई झलक रही थी कि चिंतामणि चकित हो गये। सोना ने चिंतामणि को देखते ही कहा-अरे लाला, बहुत दिनन माँ सुधि लीन्ह्यो। अस कोऊ भुलाय देत है।

चिंतामणि-क्या करूँ भाभीजी, जरा तीरथ करने चला गया था। कूड परलोक की फिकर भी तो करनी चाहिए।

सोना-अरे, अबै तुम्हार उमिरे का है, जौन लाग्यो परलोक की फिकर करै। अभी तो पचासो के पूर नाहीं भयो। तुम्हारे भैया का आजकल यह नई सनक सवार भई है। कितना समझावा कि ई फरफंद में न परी, भगवान्‌ जीन भाग में लिखे होई तौन आपुई घर बैठे मिल जाई, मुदा ई केह की सुनत हैं। अभूं पाँचो सौ गहकी पतरिका के नाहीं भए, तौन चिल्लाय लागे कि हमरे तो पचीस हज़ार गहकी होय गए।

मोटेराम-तुम्हें यहाँ किसने बुलाया जो डाइन की तरह सिर पर सवार हो गई। जाओ अन्दर।

चिंतामणि-क्या अभी पाँच सौ ग्राहक भी नहीं यह तो मुझसे भी पच्चीस हजार कह रहे थे।

सोना-इनका बके देव। झुठाई माँ तो इनकेर पेरान बसत है।

मोटेराम-तुम यहाँ से जाओगी या नहीं ?

सोना-नाहीं। देखी का कर लेत हौ। हमसे ई जबरजस्ती न चल पाई, समुझि राख्यो। संसार का ठगा करो। ठग कहूँ का ! हमका आँखी दिखावत है। आँखी फोर दैहों । आज किरोध माँ भरी बैठी हों। तुहिका लाज नाहीं आवत कि अपनी पतरिका में रॉडन के बिहाव की बात लिखत है। बैठी तो है एक ठो रॉड़ बहिनिया, काहे नाहीं ओहि का बिहाव कर डारत है। कहाँ हैं तोरे पच्चीस हजार गहकी, देखों। नकली रजट्टर बनात के सबका दिखावत फिरत है। लाला तुमसे एहके गुन काव कही। अब इ दारू पिये लाग।

चिंतामणि-अरे ! सच !! राम-राम !

मोटेराम-मैं तेरा गला घोट दूँगा।

सोना-राम जाने दारू पियत है। बोतलन दारू पी डारत है। चोरवन की तरों अंगरेजी दूकान में जात है और जेब में बोतल रख के भागत है। असल चोर ! कहत है कि एहके पिए से बुद्धि बाढ़त है। भोजन पचत है। मजा आवत है। तोरे मजा माँ लूका लागे। बुद्धि रॉड़ कहाँ लों बाढ़ी, का मजार हो जाई। एहिके मारे नाक माँ दम होई रहा है।

चिंतामणि-यह तुम्हें क्या सूझी, मित्र | भंग तो चढ़ाते ही थे। क्या उतना नशा कम था।

मोटेराम-अजी बकने दो इसको । इसकी बुद्धि तो घास खाने गयी है।

सोना-अब चुप्पे रद्यो, नाहीं तुम्हार सबकी करतूत खोल के धर दैहूँ। लाला, भगवान्‌ के घर एहि की न जाने कौन दुर्गति होई। ई तौन पराई मेहरियन पर डोरा डारत फिरत है। रानी के हुआँ कैस मार परी रही पर एहकी आँखी न खुली, न खुली। ई सम्पादक बना फिरत है, समाज का सुधारत है, सबका राह दिखावत है, उपदेश करत है और आपन इ हवाल ! कागद वाले के पाँच सौ रुपया मूंड पर सवार है, छापाखाना वाला घर खोदे डारत है, पर एहिका अपने राग-रंग सूझी है। फिकरन के मारे मैं मरी जात हीं।

चिंतामणि-यह बात तो नहीं है, भाभीजी। ऐसा नमक तो कभी न देखा था।

सोना-(तिरछी चितवन से देखकर) तीन-तीन ठौर तो घर माँ बैठी हैं, उनकेर नमक देखके जिउ भर गवा का ? कहे देत हों, हमसे न लाग्यो, नाहीं एक के सौ सुनेहों आव तुमका इन मूसरचन्द की झुठाई दिखाई। असली रजट्टर दूसरी कोठरी माँ चोराय के राखे हैं जहिमाँ कोऊ देखिं न ले। आओ।

चिंतामणि तो यह चाहते ही थे। चट उठ खड़े हुए। लेकिन शास्त्रीजी भी गाफ़िल न थे। उन्होंने लपककर चिंतामणि का हाथ पकड़ लिया। बेचारे चिंतामणि आफत में फैंस गये। एक ओर सोना उसका हाथ पूरी शक्ति से अपनी ओर खींच रही है, दूसरी ओर मोटेरामजी पूरा जोर लगा रहे हैं। चिंतामणि को ऐसा जान पड़ा कि दोनों हाथ ही उखड़ जाते हैं। जोर-जोर से चिल्लाने लगा।

सोना-अच्छा लाला, तुम इनका खूब कसके पकड़े रही, हम रजट्टर लिहे आइत हैं। छोड़यो ना।

यह कहती हुई वह तो कोठरी में गयीं। उधर दोनों मित्रों में मल्लयुद्ध होने लगा।

मोटेराम-हड्डी तोड़ डालूँगा।

चिंतामणि-खोद के गाड़ दूँगा।

मोटेराम-पीस डालूँगा।

चिंतामणि-चटनी बना दूँगा।

मोटेराम-पेट फाड़ दूँगा।

चिंतामणि-नाक तोड़ दूँगा।

दोनों मित्र जमीन पर पड़े हुए अपनी-अपनी वाणी की वीरता दिखा रहे थे। और सोना ग्राहकों का रजिस्टर लिये चिंतामणि को दिखा रही थी। चिंतामणि ने देखा चार सौ अस्सी अन्तिम संख्या थी। बोले-क्यों मित्र, हमसे उड़ते थे। कहो तो इसी बात पर गर्दन नापूँ।

मोटेराम-यह स्त्री मेरे पूर्वजन्मों का संचित पाप है, बस कुछ नहीं। अब छोड़ दो। तुमने सब कुछ देख लिया। अब हमारी लाज तुम्हारे हाथ है। किसी से कहना मत।

चिंतामणि-नहीं मित्र, क्‍या मैं ऐसा मूर्ख हूँ। लेकिन एक बात अवश्य कहूँगा। पत्रिका पर मेरा नाम भी डालना पड़ेगा। हम और तुम दोनों सम्यादक होंगे। तुम अपना नाम चाहे ऊपर ही रखो, पर मेरा नाम भी नीचे दो। बोलो, स्वीकार है ?

मोटेराम ने गम्भीर भाव से कहा-हाँ, स्वीकार है। (इस कहानी का लक्ष्य किसी व्यक्ति-विशेष से नहीं है। सम्पादक मोटेरामजी कल्पनाजगतु के पुरुष हैं।)

[हिन्दी कहानी। हिन्दी मासिक पत्रिका “माधुरी', अगस्त-सितम्बर, 1928 में प्रकाशित। 'सोलह अप्राप्प कहानियां' तथा “प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य” खण्ड-1 में संकलित |]


सम्पादक मोटेराम जी शास्त्री का सारांश

'सम्पादक मोटेराम जी शास्त्री' पंडित मोटेराम शास्त्री के हास्यप्रद और ढोंगपूर्ण कारनामों पर आधारित एक तीखी व्यंग्य-रचना है। पंडित चिंतामणि जब कई महीनों की तीर्थयात्रा के बाद लौटते हैं, तो अपने पुराने मित्र पंडित मोटेराम शास्त्री से मिलने उनके घर पहुँचते हैं। घर के बाहर 'सोना कार्यालय' का बड़ा साइनबोर्ड लगा देखकर और दरबान द्वारा बिना विजिटिंग कार्ड के अंदर जाने से रोके जाने पर चिंतामणि अवाक रह जाते हैं। जब वे पुकारते हैं, तो मोटेराम बाहर आते हैं और बताते हैं कि वे अब 'सोना' नामक मासिक पत्रिका के संपादक बन चुके हैं। वे अपने घर को ही पत्रिका कार्यालय में बदल चुके हैं और दावा करते हैं कि पत्रिका शुरू हुए महज तीन महीने हुए हैं, लेकिन ग्राहक-संख्या पच्चीस हजार के पार पहुँच चुकी है।

चिंतामणि इस भारी संख्या पर अविश्वास जताते हैं, तो मोटेराम उन्हें अपने नए व्यवसाय के गुर समझाते हैं। वे बताते हैं कि बिना अपनी जेब से एक कौड़ी लगाए उन्होंने कागज व्यापारी सेठ सुद्धीलाल से उधार कागज लिया और दूसरे छापेखाने से उधार छपाई करवाई। मोटेराम अपनी सफलता का मूलमंत्र 'डींग मारना' और अतिशयोक्तिपूर्ण प्रचार बताते हैं। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि वे खुद को पत्र-पत्रिकाओं में विधवा-विवाह, अछूतोद्धार और समाज-सुधार का कट्टर समर्थक बताते हैं, जबकि व्यक्तिगत जीवन में वे इन सुधारों के सख्त विरोधी हैं। उनका तर्क है कि पेट पालने और पत्रिका चलाने के लिए ऐसी दुरंगी चाल आवश्यक है। वे अगले वर्ष पत्रिका के हर अंक का काल्पनिक संपादक रवींद्रनाथ टैगोर, इकबाल, मुसोलिनी और शंकराचार्य जैसी हस्तियों को बनाकर ग्राहकों को लुभाने की योजना भी साझा करते हैं।

इसी बीच मोटेराम की पत्नी सोना देवी वहाँ पहुँच जाती हैं और मोटेराम के सारे झूठ और दावों की हवा निकाल देती हैं। वे चिंतामणि के सामने खुलासा करती हैं कि पत्रिका के कुल पाँच सौ ग्राहक भी नहीं हैं, कर्जदारों का तकादा लगातार हो रहा है, और मोटेराम शराब पीने की लत में पड़ गए हैं। जब सोना देवी असली ग्राहक-रजिस्टर लाकर चिंतामणि को दिखाने की बात कहती हैं, तो मोटेराम उन्हें रोकने के लिए झपट पड़ते हैं। इस छीना-झपटी में दोनों मित्रों के बीच जमीन पर हास्यप्रद मल्लयुद्ध और गाली-गलौज शुरू हो जाता है। सोना देवी जब रजिस्टर ले आती हैं, तो उसमें अंतिम ग्राहक संख्या केवल चार सौ अस्सी दर्ज मिलती है। पराजित होकर मोटेराम चिंतामणि से विनती करते हैं कि वे उनकी पोल न खोलें। चिंतामणि इस भेद को गुप्त रखने के बदले यह शर्त रखते हैं कि पत्रिका में मोटेराम के साथ उनका नाम भी सह-संपादक के रूप में प्रकाशित किया जाए, जिसे मोटेराम तत्काल स्वीकार कर लेते हैं।


प्रकाशन इतिहास

यह कहानी सर्वप्रथम हिंदी मासिक पत्रिका माधुरी में अगस्त-सितम्बर 1928 में प्रकाशित हुई थी। बाद में यह सोलह अप्राप्य कहानियाँ तथा प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित हुई।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • पत्रकारिता के व्यवसायीकरण और खोखलेपन पर व्यंग्य: कहानी में बिना किसी साधन या ज्ञान के केवल उधार, चालाकी और अतिरंजित विज्ञापनों के बल पर पत्रिका चलाने की प्रवृत्ति का अत्यंत सजीव और हास्यपूर्ण चित्रण किया गया है।
  • कथनी और करनी का दोहरापन (सामाजिक ढोंग): मोटेराम का घर में रूढ़िवादी बने रहना और बाहर सुधारक बनकर विधवा-विवाह व शुद्धि का बिगुल बजाना तत्कालीन समाज के तथाकथित सुधारकों और बुद्धिजीवियों के पाखंड को उजागर करता है।
  • डींग हांकने की प्रवृत्ति और अंधानुकरण: मोटेराम का यह मानना कि संसार केवल डींग और बड़े दावों से प्रभावित होता है, जनसाधारण की अंधविश्वास और दिखावे में बहने की कमजोरी पर चोट करता है।
  • मित्रता और अवसरवादिता: चिंतामणि पहले तो मोटेराम की धूर्तता का मजाक उड़ाते हैं, लेकिन सच्चाई सामने आते ही वे भी किसी नैतिक कर्तव्य के बजाय खुद का नाम संपादक के रूप में छपवाने का सौदा कर बैठते हैं।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'सम्पादक मोटेराम जी शास्त्री' हास्य और व्यंग्य के माध्यम से प्रचार-प्रसार के पाखंड, साहित्य-जगत में अवसरवादिता और व्यक्तिगत स्वार्थों की कलई खोलती है। प्रेमचंद का यह व्यंग्य आज के दौर के प्रचारतंत्र पर भी सटीक बैठता है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "सम्पादक मोटेराम जी शास्त्री." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1928, https://munshipremchand.com/works/short-stories/sampadak-moteram-jee-shastri. Accessed 22 Sep. 2026.