रूहे-सियह का मूल पाठ
आलमगीर कहत (अकाल) का सामना था। साल भर से पानी की एक बूंद न गिरी थी। खेतों में खाक उड़ती थी। घास तक जल गयी थी, न कहीं दाना था, न पानी। लोग दरख्तों की छालें कूट-कूटकर खाते थे। आधी रात को लू चलती थी और दोपहर को तो जमीन से आग के शोले निकलते थे। मालूम होता था कोहे-आतशी है। लोगों के दिल तक खुश्क हो गये थे। कोई किसी की बात न पूछता था। सब अपनी-अपनी मुसीबतों में गिरफ़्तार थे। रोज़ाना मंदिरों और मस्जिदों में खलकत जमा होती थी। लोग रोते, हाय-हाय करते, मगर इस नालॉ-शेवन (विलाप) का कुछ असर न होता था, शायद अबबि-कजा (यमराज) के दिलों में भी रतूबत (दया) बाक़ी न रही थी। ज्योतिषियों और नुजूमियों के दरवाजे पर शबो-रोज नियाजमन्दों का हुजूम रहता था। बाजारों में लड़के बरहना-तन (नंगे बदन) लौटते-फिरते थे और गाते थे- काल-कलूटी उजली धोती मेघा दादा पानी दो।
एक आलिमे-तिब्बियात ने शगूफ़ा छोड़ा कि मैं कीमियाबी तरक़ीब से पानी वरसा सकता> हूँ। रिआया ने लाखों रुपये चन्दे दिये, डॉक्टर साहब ने बादलों पर मकनातीसी असर डालने की खूब कोशिशें कीं, लेकिन कुछ नतीजा न निकला। न इन्दर पसीजे, न पानी बरसा और रैयत की हालत रोज-ब-रोज़ जबून (बदतर) होती गई।
लाचार एक दिन लोगों ने फ़ैसला किया कि इस मुसीबत में औलिया और महात्माओं के दरबार में फ़रियाद करनी चाहिए। आख़िर वे किस दिन काम आयेंगे ! लाखों हिन्दू जमा होकर बाबा दुर्लभदास की खिदमत में हाजिर हुए और उनकी कुटी के सामने धरना देकर बैठे। मुस्लिम रिआया ख्वाजा रशीद जलाली के रिफत निशान आस्ताने पर रगड़ने लगी। दोनों बुजुर्गों को रिआया के हाले-जार (दुर्दशशा) पर तरस आया। बाबाजी ने सारे मुल्क के साधु-सन्तों को मद्ऊ (आमंत्रित) किया। ख्वाजा साहब ने अतराफ ब अक्नाफ (चारों दिशाओं) के बरगुजीदगाने-खुदा (चुने हुए ईश्वर भक्तों) से इमदाद तलब की। एक हफ्ते में चारों तरफ़ से साधुओं और फ़कीरों के गोल-के-गोल और जत्थे-के-जत्थे आने लगे। दारुलखिलाफ़े (राजधानी) में कभी अहले-तकददुस (पुनीत व्यक्तियों) का ऐसा नूरानी मजमा नजर न आया। ये हजरात मोजिजात आ-ख़वारिक (आश्चर्यजनक आचार-व्यवहार) के लिए मशहूर थे। लोगों को कामिल एतमाद था कि अगर ये लोग अबरूओं (भौहों) का इशारा भी कर देंगे तो इन्दर की मजाल नहीं कि वह नाफ़रमानी कर सके। बिला आख़िर एक रोज दुर्लभदास इन तमाम कमालों के साथ शहर से बाहर निकले। जुलूस शानदार था। आगे-आगे ऊँटों पर नक्कारे थे। इसके बाद मुखतलिफ़ किस्म के अलम और निशान, पीछे शंख और घंटे बज रहे थे। सब साधुओं के दल थे, कोई सुनहरी झूल से आरास्ता हाथी पर सवार था, कोई सजे हुए घोड़े पर, कोई मुगरक पालकियों पर। चेले छतर लगाये चंवर हिलाते जाते थे। इस जुलूस से कई कदम पर औलिया की क़तार थी। यहाँ वह शहाना-करोफर (शहरी तड़क-भड़क) तो न था। हाँ, उनकी बजा व कता (सजधज) से एक फ़कीराना जलाल (तेज) टपक रहा था। सारे शहर का चक्कर लगाने के बाद यह जुलूस ऊँचे टीले पर जा पहुँचा। यहाँ लोग अपने-अपने आसन जमाकर बैठे और खुदा से इल्तिजा करने लगे। किसी ने समाधि ली कोई जोग के आसन दिखाने लगा, किसी ने रामायण पढ़ना शुरू किया। कृष्ण के भक्तों ने कीर्तन करना ही काफी समझा। करा (साधु) तस्बीह ख्वानी (ईश्वर की आराधना) करने लगे, कोई दर्द न मन हुआ, कोई हाल में-और यह कैफो-नईम का दौर तीन घंटे तक जारी रहा। लाखों आदमी पीछे खड़े यह नजारा देख रहे थे और वो रह-रहकर आसमान की तरफ़ ताकते थे कि बादल उठा या नहीं। जब दो पहर हुआ, आफ़ताब सिर पर जा पहुँचा। तमाजत (सूर्य की गर्मी) से चेहरा सुर्ख होने लगा और अब्र (बादल) का एक टुकड़ा भी नज़र न आया तो लोग मायूस होकर नीचे उतर आये। ख्वाजा रशीद' जलाली ने बाआवाज बुलन्द कहा-मुल्क की यह हालत तुम्हारे राजा की बेईसाफी का नतीजा है। जब तक राजा साहिब खुदा के दरबार में आह ओ-जारी ने करेंगे, यह खुदा का कहर दूर न होगा। तुम लोग जाकर उन्हीं के क़दमों पर गिरो। उन्हीं की शफ़ाअत (शुभकामना) से तुम्हारी नजात हो सकती है।
राजा पृथ्वीपतिसिंह एक नफ्सपरस्त आदमी थे। अपने ऐश व निशात के सिवा उन्हें और कोई काम न था। महीनों महलों से बाहर न आते थे। हमेशा रागो व रंग का चर्चा रहता था। तमाम शहर के भॉड़-भड़वे, लुच्चे और शोहदे उनके मुकरबीन (घनिष्ठ मित्रों) में थे। रोजाना नयी-नयी शराबें खिंचती थीं। अनवा-ओ-इकसाम (तरह-तरह के, विभिन्न किस्मों के) के लजीज खाने तैयार होते थे। उन्हें सिर्फ शायरी से उनस था और वह भी उसी शायरी से ज़िससे आतशे-इश्क तेज होती है। वह खुद ठुमरियाँ और दादरे बनाते थे और अक्सर नशे में मस्त होकर हसीनों के साथ नाचते-यथे। उन्हें अब तक इस आलमगीर कहत की ख़बर न थी। उनके वजरा भी खुदगर्ज थे। मुल्क की असली हालत का इखफा (छिपाना) उनके मुफीद मतलब था। मुल्क पर ख्वाह कैसी ही मुसीबत क्यों ना नाजिल हो, शाही दरबार के खर्च के लिए रुपये कहीं-न-कहीं से निकल ही आते थे। रिआया की यह मजाल कहाँ थी कि वह मामलात-ए-शाही में दखल-दर-माकलात (उचित हस्तक्षेप) कर सके। वह राजा से मायूस हो रही थी। जो मुसीबत आ पड़ती थी उसे बर्दाश्त करती थी, पर राजा के ऐश व इशरत में मुखिल होने की जुरत न कर सकती थी।
मगर जब ख्वाजा रशीद जलाली ने साफ़-साफ़ कर दिया कि इस आफते-समावी (दैवी प्रकोप) का इलाज बगैर राजा साहब के और किसी से न होगा, तब लोग मजबूरन शाही-महल के सामने आकर मैदान में जमा हो गये और जान पर खेलकर बआवाज बुलन्द आहो-जारी करनी शुरू की। दरबानों और सिपाहियों ने उन्हें वहाँ से बजोर हटाना चाहा, डराया-डॉटा, मारने की धमकी दी, पर लोग उस वक्त जान देने पर आमदा थे । किसी तरह वहाँ से न टले। उनकी सदायें-बेदाद हो गयीं। यहाँ तक कि राजा के ऐश में खलल पड़ गया। उन्होंने गुस्से में आकर दरबान से पूछा, “यह कौन लोग शोर मचा रहे हैं ?” एक दरबान ने मखूफ होकर अर्ज की, “गरीबपरवर, अहल-ए-शहर का एक कसीर मजमा शाही महल के सामने खड़ा है और किसी तरह नहीं टलता ।”
राजा-“वे लोग क्या चाहते हैं ?”
एक वजीर ने जवाब दिया-“हुजूर, कुछ मालूम नहीं कि उनकी क्या ख़्वाहिशें हैं। वह कह रहे हैं कि हम हुजूर की जियारत (दर्शन) के मुश्ताक हैं।”
राजा-“आज उन्हें मेरी जियारत का शौक क्यों हुआ है ?”
वजीर-“हुजूर, मैंने उन्हें बहुत समझाया मगर वे कहते हैं कि हम बगैर शरफ़याबी (सफलता) हासिल किये हरगिज न वापस होंगे।”
राजा-“तो उन्हें गोली मारकर भगा दो। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि मैं उनका राजा हूँ, वे मेरे राजा नहीं। वह मेरे महकूम प्रजा हैं, मैं उनका महकूम नहीं ।”
वजीर-“आलीजाह ! मैं सब कुछ करके मजबूर हो गया। मुझे ऐसा मालूम होता है कि अगर गोली भी चलाई गई तो सब के सब जान दे देंगे, मगर अपने इरादे से बाज न आएँगे।”
राजा ने कुछ सोचकर कहा, “तो जरूर उनको कोई तकलीफ़ है। लाओ, सवारी हाजिर करो ।”
एक लमहे में तामजां (रथ) हाजिर हुआ। राजा साहब बगैर सवारी के एक कदम भी न चल सकते थे, शायद उनके पैरों का मकसूद सिर्फ आजा (शरीर के अंग व जोड़) की तकमील था। सवारी पर बैठकर वह रिआया के सामने मौजूद हुए। उन्हें देखते ही जै-जै का नारा बुलन्द हुआ, गो तमाम रिआया राजा की शाकी (शिकायत करने वाली) थी, पर उनकी इस निगाह-ए-तरहुकम (दया-दृष्टि) से उनके दिल शाद हो गये। अलावा बरी वह साहबे-गर्ज थे, उस वक्त तुर्शी बेमोका थी, लेकिन दरअसल उनके जोश का सबब यह था कि राजा को देखते ही उनके दिलों में इरादत (संकल्प) की एक लहर-सी दौड़ गई जिसने बेदिली और शिकवापरवरी, खसो-खाशाक (कूड़ा-करकट) को बहा दिया।
जै-जै की आवाज बुलन्द हुई। लोगों ने अर्ज की, “महाराज, हम सख्त मुसीबत में गिरफ्तार हैं। आप हमारे बादशाह हैं। अगर हमें आप न बचायेंगे तो हम सब दाना-पानी बगैर तड़प-तड़पकर मर जायेंगे।”
राजा ने मुताज्जब (आश्चर्यचकित) होकर पूछा, “तुम पर कौन-सी मुसीबत है?”
रिआया-“गरीबपरवर ! साल भर से एक दूँद पानी नहीं बरसा। तमाम मुल्क में कोहराम मचा हुआ है। तालाबों में पानी नहीं, कुएँ सूख गये, दरिया का पानी भी जवाब दे चुका। आप हमारे मालिक हैं। आप ही की नज़रे-रहम से अब हमारी मुसीबत दूर होगी।”
राजा-“मुझे तो आज यह कैफियत मालूम हुई। क्या दरअसल पानी नहीं बरसा ?”
रिआया-“गरीबपरवर, आप खुंद चलकर हमारी हालत मुलाहिजा फरमा लें। दाना-पानी बगैर हमारी हालत बहुत नाजुक हो रही है।”
राजा-“क्या तुम लोगों ने देवताओं की परस्तिश नहीं की और जग नहीं किये ?”
रिआया-“हुजूर ! हम सब कुछ करके थक गये ।”
राजा-“तुमने महात्माओं और फकीरा (भिक्षुओं, साधुओं) के आस्तीनों पर जिबह साई (बलि) की होती। महात्मा दुर्लभदास को घेरा होता, ख्वाजा रशीद साहब जलाली से क्यों नहीं कहा | वह खुदा रसीदा बुजुर्ग हैं, चाहे तो अभी चश्मजदन (आंख झपकके में) में जल-थल एक कर दें ।”
रिआया-“ुजूर ! बुजुर्गान-खुदा ने बड़ी कोशिश की, हजारों बाखुदाओं को लेकर आहो-जारी में मसरूफ़ हुए, पर किसी से कुछ न हो सका ।”
राजा-“सच ?”
रिआया--“हुजूर, बिल्कुल सच |”
राजा-“मैंने तो उनके मोजिजात (चमत्कारिक कार्यों) की अजीब-अजीब दास्तानों सुनी हैं।” |
रिआया-“गरीबपरवर ! इन लोगों ने तो यह कहकर टाल दिया कि तुम लोग अपने राजा की पनाह में जाओ। वही तुम्हारी इस मुसीबत को रफा करेंगे। यह आबता-इलाही (प्रकोप) बगैर राजा की आहो-जारी के दूर न होगा ।”
राजा ने हँसकर कहा-“जब ऐसे-ऐसे अहल-ए-कमाल कुछ न कर सके तो मेरी क्या हस्ती |”
रिआया-“हुजूर ! आप इस मुल्क के मालिक हैं, बादशाह हैं। आप हमारी अर्जदाश्त को अगर दरबार-ए-इजदी (ईश्वर की न्यायालय) तक पहुँचा दें तो हमें यक्रीन है कि हमारी तक़लीफ़ दूर हो जायेगी ।”
राजा ने लजज कर कहा, “मुझे उम्मीद नहीं। आप मुसीबत में गिरफ्तार हैं, मुझे सख्त रंज है। मगर जो राजा हविसरानियों में इस क़दर महव (अनुरक्त) हो कि उसे अपनी रिआया की हालत की जर्रा बराबर भी ख़बर न हो, जो हमेशा शराब के नशे में चूर पड़ा रहता हो, जो हमेशा ख़्वाहिश-ए-अफ़सानी (कामेच्छा) का शिकार रहा हो, उसकी जात से तुम्हारी क्या भलाई हो सकती है ? मगर मैं तुम लोगों को मायूस नहीं करना चाहता। तुम्हारी मुसीबत को अपनी बेनयाजी (लापरवाही) से बढ़ाना नहीं चाहता। मैं ईश्वर से कोई इल्तिजा करने के नाकाबिल हूँ। मुझे उनसे इल्तिज़ा करते हुए शर्म आती है। पर मैं तुम्हारे नफे के लिए बेहया बनकर उनके सामने जाऊँगा, इत्मीनान रखो ।”
दोपहर का वक्त था। आफताब की तेज शोआयें (किरणें) तीरे आतिशी (अग्निबाण) बनकर जमीन पर गिर रही थीं और जमीन खौफ़ से लरजा थी। झुलसती हुई रेत से भाप निकलती थी, गोया बेकस ज़मीन की आह का धुआँ था। उसी वक्त राजा पृथ्वीसिंह महल से बरामद हुए। उनके जिस्म पर एक पतली-सी लँगोटी के अलावा और कोई लिबास या जेवर नहीं था। खूबसूरत बाल मुंड़े हुए थे और मुँह में कालिख लगी हुई थी। इस सियाही में उनकी सुर्ख़ आँखें ऐसी मालूम होती थीं, गोया सियाहबानात (काले वृक्ष) पर सुर्ख रेशम के फूल बने हैं। उनका चेहरा उदास और अफफसूुर्दा (मुरझाया हुआ, खिन्न) था, आँखों से आँसू जारी थे। इस तरह वह नंगे सिर, नंगे पैर दर्द मायूसी गैरत की तस्वीर बने हुए आकर महल के सामने जलती हुई जमीन पर खड़े हो गये। वजीरों और मुसाहिबों ने हक को रोकने की बहुतेरी फ़िक्रें की, मगर उन्होंने कोई मजबूत अहद किया था। उससे न डिगे।
अहले शहर ने जब यह कैफ़ियत सुनी तो दौड़े हुए इस मुकाम पर जमा हो गये। ऐसा कोई दिल न था जो राजा की उस सूरते-दर्द व यास। से तड़प न गया हो। उन्होंने निहायत आजजी से कहा, “ख़ुदाविन्द, आप इस स्याही को धो डालिये। इससे हमारे दिलों पर चोट लगती है।”
राजा ने निहायत इस्तकलाल (दृढ़ता) से जवाब दिया, “भाईयो! यह सियाही अब ईश्वर के बारान-ए-रहमत (दया-दृष्टि) से धुलेगी, यूँ नहीं ।””
एक घंटा गुजर गया। राजा का चेहरा तो सियाह तवे की तरह तप रहा था। आँखों से आग के शोले निकलने लगे, चोटी का पसीना एड़ी तक पहुँच गया, पैरों के नीचे की जमीन तर हो गई, दिमाग गर्म पानी की तरह खौलने लगा। लोगों को हर लम्हा अन्देशा होता था कि कहीं गश खाकर गिर न पड़े । लोग आजिजाना तरीक (विनम्र विधि) से अर्ज करते थे-“गरीबपरवर, आप अपने जिस्मे-नाजुक को इस तरह तकलीफ़ न दें। हमें दाना-पानी बगैर मर जाना कबूल, पर आपकी यह तकलीफ़ देखना क़बूल नहीं ।” पर राजा का चेहरा इल्तिजा सादिक (सत्यनिष्ठ) और इस्तक़लाल (दृढ़ निश्चय) के नूर से मामूर था। हवासे-जाहिरा (बाह्य इन्द्रियां) तो साकिन थे, मगर मुएबदन हमातन जबान (अशरीर वाणी) बनकर >ऊद रहा था कि ऐ माबूद (ईश्वर), मेरी रिआया मर्दआलम (निष्प्राण) है, उसे पनाह दे। मैं गुनाहगार हूँ, नाफ़र्मादार हूँ, सियाहकार हूँ। मुझे आपसे इल्तिजा करते हुए शर्म आती है, मेरी खताओं की सजा मुझे मिलनी चाहिए। मेरी रिआया बेक़सूर है, उस पर रहम कर। मैं सख्त से सख्त अजाब के लिए तेरे दरबार में सरे तस्लीम-ए-ख़म किये हूँ। अगर मेरी दुआ मुस्तजाब (कष्ट) न होगी तो मैं यहीं खड़े-खड़े जान दे दूँगा, पर रिआया को अपना मुँह न दिखाऊँगा। मैं तेरा बन्दा हूँ, तुझसे अपनी मुसीबत कहने में कोई बेइज्जती नहीं, लेकिन जो रिआया मुझे अपना मालिक तसव्वुर करती है, उसके सामने मैं कौन-सा मुँह लेकर जाऊँ ?
दो घंटे गुजर गये। आफताब की शोआयें और भी तेज हो गईं । जमीन पहले से कहीं ज्यादा जलने लगी। तमाम रिआया आसमान की तरफ टिकटिकी लगाये ताक रही थी, मगर बादल का नाम न था।
माम शहर यह अजीबोगरीब नजारा देखने के लिए उमड़ा चला आता था। हर एक सीने में हक़ीक़त और वफ़ा की मौजें उठ रही थीं। हजारों आँखों से आँसू जारी थे। औरतें बेचैन होकर नाला व फरियाद करती थीं। राजमहल से दर्द-अंगेज सदायें बुलन्द होकर दिलों को और पाश-पाश करती थीं।
तीन बज गये थे, मगर सूरज की तपिश में जरा भर भी कमी न थी। राजा पृथ्वीसिंह की आँखें फैल गई थीं, माया सिकुड़ गया था, जिस्म को सँभालने और हवास को और काबू में रखने को मुस्तकिल कोशिश के बाइस लव-हाये (कोमल होंठ) नाजुक फूल की कलियों की मानिन्द बन्द हो गये थे। मालूम होता था कि उनके बदन में खून की हरकत नहीं है, जान नहीं है, सिर्फ़ एक मायूसाना इस्तक़लाल है जो उनको पैरों तक खड़ा किये हुए है। लोगों को हर वक्त यही गुमान था कि राजा अब गिरे, अब गिरे। कितने ही आदमियों को यकीन था कि गो राजा खड़े हैं, मगर यह सिर्फ उनकी लाश-ए-बेजान है। जिस तपिश और गर्मी को घर में बैठकर बर्दाश्त करना मुश्किल था, जिस धूप में चील अण्डे छोड़ती थी और इशरात (कीड़े-मकोड़े) जमीन से निकल-निकलकर मर जाते थे, जिस कुर्रए-नार (भूखंड) में किसी जीरूह का एक लम्हा खड़ा रहना ना-मुमकिन था, उस दहकती हुई आग में राजा जैसा नाजुक बदन और नाजपरवर (सुकुमार) शख्स इतनी देर तक कैसे खड़ा रह सकता है।
यकायक जै-जै का नारा बुलन्द हुआ। जमीन थर्राई, आसमान हिला गोया कोई जलजल-ए-अजीम (महाभूकम्प) आ गया हो, दो पहाड़ों ने टक्कर खाया हो। लाखों आदमी खुशी से दीवाने होकर उछलने-कूदने लगे। सारी खल्कत में हलचल-सी मच गई, बेशुमार अँगुलियाँ पूरब की जानिब उठ गईं। एक छोटा-सा बादल का टुकड़ा उफक (क्षितिज) पर इस तरह नजर आ रहा था जैसे फिजा-ए-तारीम (अन्धकारपूर्ण) में कोई चिराग टिमटिमा रहा हो। किले से तोपें छूटने लगीं, औरतों ने मंगल गाना शुरू किया। दरवाजे-शाही पर गुरबा व मसाकीन (दरिद्वों) को रानियों की तरफ से खैरात दी जाने लगी, मगर रिआया उस वक्त एक सुकून की हालत में थी। मसर्रत ओ-शादमानी (आनन्द) की पहली लहर ने उन्हें बेखबर बना दिया था। अब वह अपने जज्बात को रोके हुए उम्मीद व बीम (आशा और भय) की निगाह से बादल के टुकड़े को देखने लगी। देखते-ही-देखते उस टुकड़े ने फ़ैलना शुरू किया और बारूद के धुएँ की तरह आने-वाहिद (एक क्षण) में तमाम आसमान पर छा गया। बिजली चमकने लगीं, हवाएँ चलने लगीं, गरजने की करख्त-आवाज सुनाई दी, मगर यह करख्त आवाज लोगों को बहिश्ती नगमें से भी कहीं ज्यादा प्यारी मालूम हुई। इस आवाज के सुनने के लिए आदमी बहुत दिनों से बेचेन थे। आफताब निहायत तेजी से मगरिब की जानिब भाग रहा था, गोया वह बादल की फौज से ख़ायफ होकर अपनी जान छुपाना चाहता था, मगर उसका भागना बेकार हो गया। चश्मे-जुदुन में वह बादलों के दिल में छुप गया। दुनिया में अंधेरा छा गया। यह अंधेरा मखलूके-खुदा की उम्मीदों का आफताब था।
'बादल फिर गरजने लगा और बूँदें पड़नी शुरू हुईं। लोग एतकाद और मुहब्बत के साथ राजा की तरफ दौड़े और उनके कदमों पर गिर पड़े। राजा अभी तक हमातन तस्वीर खड़े थे। उनके मुंह की सियाही धुल-धुलकर छूटती जाती थी और उनका रोशन-चेहरा इस तारीकी में बादल के चाँद की मानिन्द रोशन होता जाता था। उनके चेहरे पर एक रूहानी जलाल-जलवा अफ़रोज था और आँखों से नूरानी शोआयें निकल रही थीं। उन्होंने अहद किया था कि मुंह की यह सियाही बाराने-रहमद (ईश्वरीय वर्षा) ही से धुलेगी और वह वैसा ही हुआ, क्योंकि इस्तकबाल था, रूहानी ताकत थी और ईश्वर की दस्तगीरी (सहायक) का यकीन था। मुल्क को इससे पहले कभी इतनी खुशी, इतना इत्मीनान और इतनी फ़रागत (चैन) नसीब न हुई थी।
रूहे-सियह का सारांश
‘रूहे-सियह’ (काली आत्मा / कलंकित रूह) राज्य में पड़े भयानक और सर्वव्यापी अकाल तथा राजा के आत्म-प्रायश्चित की एक गहन आध्यात्मिक व नैतिक कहानी है। राज्य में साल भर से पानी की एक बूँद भी नहीं गिरी थी। चारों ओर त्राहि-त्राहि मची थी; खेत और हरियाली जलकर राख हो चुके थे, कुएँ-तालाब सूख गए थे और भूख से बेहाल लोग वृक्षों की छालें कूटकर खाने को विवश थे। भौतिक विज्ञान के कृत्रिम उपाय और वर्षा कराने के वैज्ञानिक प्रयास पूरी तरह निष्फल साबित हुए। तब हिंदू और मुस्लिम प्रजा निराश होकर क्रमशः बाबा दुर्लभदास और ख्वाजा रशीद जलाली की शरण में पहुँची। देश भर के नामी साधु-संतों, योगियों और फकीरों ने हाथी-घोड़ों और नगाड़ों के साथ भव्य जुलूस निकाला और टीले पर बैठकर जप, समाधि, कीर्तन और इबादत की। किंतु तीन घंटे के इस भारी तामझाम के बाद भी आकाश में बादल का एक टुकड़ा तक दिखाई नहीं दिया। तब ख्वाजा रशीद जलाली ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि यह दैवी प्रकोप वास्तव में राज्य के विलासी राजा की बेइंसाफी और घोर लापरवाही का परिणाम है; जब तक राजा स्वयं ईश्वर के दरबार में अपने अपराधों का प्रायश्चित नहीं करेगा, यह कहर समाप्त नहीं होगा।
राजा पृथ्वीपतिसिंह अब तक अपनी प्रजा की इस दारुण दशा से सर्वथा अनभिज्ञ थे। वे रंग-महल में भोग-विलास, नर्तकियों, सुरापान और शायरी में डूबे रहते थे और उनके स्वार्थी मंत्रियों ने कभी राज्य का सच उन तक पहुँचने नहीं दिया था। ख्वाजा साहब की बात सुनकर व्यथित प्रजा जान हथेली पर रखकर राजमहल के सम्मुख पहुँची और रो-रोकर राजा से रक्षा की गुहार लगाने लगी। जब राजा बाहर आए और उन्हें प्रजा के मुँह से इस विनाशकारी अकाल का भान हुआ, तो उनकी अंतरात्मा गहरे पश्चाताप से काँप उठी। उन्होंने स्वीकार किया कि वासनाओं और भोगों में लिप्त रहकर उन्होंने घोर पाप (रूहे-सियह) किया है, किंतु प्रजा निरपराध है और उसके कष्टों का निवारण करना उनका परम कर्तव्य है।
राजा ने इस महापाप के प्रायश्चित के लिए कठोर आत्म-दंड का मार्ग चुना। भरी दोपहरी में, जब चिलचिलाती धूप अग्निबाण की तरह बरस रही थी और तपती रेत से धुआँ निकल रहा था, राजा पृथ्वीपतिसिंह सिर मुँड़ाकर, केवल एक लंगोटी पहनकर और अपने चेहरे पर कालिख पोतकर नंगे पाँव महल के बाहर दहकती जमीन पर खड़े हो गए। उन्होंने दृढ़ प्रतिज्ञा की कि उनके मुँह की यह कालिख केवल ईश्वर की दया-दृष्टि की वर्षा (बाराने-रहमत) से ही धुलेगी, अन्यथा वे वहीं प्राण त्याग देंगे। आग बरसाती धूप में घंटों निष्कंप खड़े रहने से राजा का सुकुमार शरीर झुलसने लगा, सिर खौलने लगा और पैरों से पसीने की धारा बहने लगी। प्रजा राजा के इस असह्य आत्म-दंड को देखकर तड़प उठी और उनसे छाया में जाने की मिन्नतें करने लगी, परंतु राजा अपने पश्चाताप और ईश्वर से प्रजा की प्राण-रक्षा की प्रार्थना में अडिग रहे। अंततः राजा के इस सच्चे, निश्छल और सर्वस्व-त्यागी पश्चाताप ने ईश्वर का हृदय द्रवित कर दिया। आकाश में एकाएक घने मेघ छा गए, घनघोर गर्जना हुई और मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई। इस अमृत-वर्षा से राजा के मुख की कालिख धुल गई और उनका मुखमंडल आत्मिक तेज व रूहानी जलाल से चमक उठा। संपूर्ण प्रजा को नवजीवन और असीम शांति की प्राप्ति हुई।
प्रकाशन इतिहास
इस कहानी का प्रथम प्रकाशन उर्दू में, उर्दू मासिक पत्रिका सुबहे-उम्मीद के नवम्बर 1920 के अंक में हुआ था। इसका हिन्दी रूप सोलह अप्राप्य कहानियाँ तथा प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित है।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- शासक का नैतिक उत्तरदायित्व और राजधर्म: कहानी यह मूलभूत संदेश देती है कि प्रजा का सुख-दुःख और प्राकृतिक आपदाएँ भी राजा के नैतिक आचरण से जुड़ी होती हैं। शासक की भोग-लिप्सा और प्रजा की उपेक्षा राज्य पर संकट लाती है, और जब शासक अपने सुखों का त्याग कर प्रजा के दुःख को अपना दुःख मानता है, तभी व्यवस्था का कल्याण होता है।
- सच्चा पश्चाताप और अहंकार का विसर्जन (रूहे-सियह): राजा पृथ्वीपतिसिंह का अपने मुख पर कालिख लगाना और जलती धूप में खड़े होना आत्म-प्रवंचना और अहंकार के पूर्ण विनाश का प्रतीक है। 'रूहे-सियह' (कलंकित आत्मा) का शुद्धिकरण केवल मौखिक क्षमा या दिखावटी दान से नहीं, बल्कि वास्तविक आत्म-दंड और अहंशून्यता के माध्यम से ही संभव होता है।
- आडंबर बनाम निष्कपट अंतःकरण: कहानी में वैज्ञानिक दावों और साधु-संतों के आडंबरपूर्ण जलूसों, हाथियों, शंखों और दिखावटी समाधियों से बादलों की एक बूँद भी नहीं बरसती। इसके विपरीत, राजा का निश्छल अंतःकरण, अपराध-बोध और प्रजा के लिए प्राणोत्सर्ग का सच्चा संकल्प प्रकृति और ईश्वर दोनों को पिघला देता है।
- प्रजा और राजा के मध्य आत्मीय भावनात्मक सेतु: राजा के कठोर तप को देखकर प्रजा अपनी भूख-प्यास भूल जाती है और राजा की प्राण-रक्षा के लिए विलाप करने लगती है; वहीं राजा प्रजा के लिए मृत्यु का वरण करने को तैयार हो जाते हैं। यह भावनात्मक एकात्मकता प्रेमचंद के आदर्शवादी समाज-दर्शन का सुंदर पक्ष उजागर करती है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'रूहे-सियह' में प्रेमचंद ने सत्ता, अपराध-बोध और आत्म-शुद्धि के दर्शन को लोक-कथात्मक शैली में पिरोया है। यह कहानी रेखांकित करती है कि बाह्य अनुष्ठानों की तुलना में अंतरात्मा का पश्चाताप और लोक-सेवा का संकल्प कहीं अधिक शक्तिशाली होता है; मनुष्य के पुराने पाप चाहे कितने भी घोर हों, सच्चा प्रायश्चित और आत्मोत्सर्ग उसके जीवन को पुनः आलोकित कर देता है।
