भारत की राष्ट्रीय जागृति का सबसे महत्त्वपूर्ण और शुभ परिणाम वे बैंक और डाकखाने नहीं हैं जो पिछले कुछ सालों में स्थापित हुए और होते जाते हैं, न वे विद्यालय हैं जो देश के हर भाग में खुलते जाते हैं बल्कि वह गौरव जो हमें अपने प्राचीन उद्योग-धंधों और ज्ञान-विज्ञान व साहित्य पर होने लगा है और वह आदर का भाव जिससे हम अपने देश की कारीगरी के प्राचीन स्मारकों को देखने लगे हैं। हम अब होमर और मिल्टन को कविता का सम्राट् नहीं मानते बल्कि सादी और कालिदास को। यही स्वाभिमान हर एक क्षेत्र में दिखाई देता है। हमारी प्राचीन मूर्तिकला और स्थापत्य कभी कद्रदानी का मुहताज नहीं रहा। वह अब भी दुनिया में आश्चर्य की दृष्टि से देखा जाता है और उसके जो कुछ चिह्न वक्त की तबाही से बच रहे हैं वह इस कला में हमको हमेशा बेजोड़ साबित करते रहेंगे। मगर हमारी प्राचीन चित्रकला बहुत जमाने से गुमनामी के गड्ढे में पड़ी रही और न सिर्फ यूरोप के छान-बीन करने तालों ने यह नतीजा निकाल लिया था कि भारत में इस कला का कभी उन्नयन नहीं हुआ बल्कि हिन्दुस्तानी भी इस विचार में उनका साथ देने लगे थे। मगर इस राष्ट्रीय जागृति ने हमारा ध्यान इस कला की और उन्मुख कर दिया है और जहां कुछ साल पहले एक व्यक्ति भो ऐसा न था जो विश्वास के साथ कह सके कि हिन्दुस्तान ने इस कला में भी कमाल हासिल किया था वहां आज हजारों हिन्दुस्तानी ऐसे हैं जो अपनी प्राचीन चित्रकला का महत्त्व समझने लगे हैं, और वह आसानी से इस बात को हरगिज न मानेंगे कि इस ललित कला को कमाल पर पहचाने का सेहरा इटली के सर है। जिस दिमाग ने कविता और स्थापत्य में अपने चमत्कार दिखाए वह चित्रकला में कैसे न दिखाता। यह तीनों कलाएं परस्पर इतनी संबद्ध हैं कि एक का उन्नति करना और दूसरे का जन्म ही न लेना असंभव है यद्यपि यह संभव है कि कविता की तुलना में मूर्तिकला और चित्रकला की उन्नति अधिक दिनों में हो। बढ़े संतोष की बात है कि इतने दिनों की बेखबरी के बाद दिलों में इस कला का सम्मान करने का भाव उत्पन्न हुआ और इसके लिए हमको कलकत्ते के महान् चित्रकार बाबू अवनीन्द्रनाथ ठाकुर का कृतज्ञ होना चाहिए। उन्होंने प्राचीन पद्धति पर नये रंग का रोगन देकर भारत की नई चित्रकला की नींव डाल दी है और योरोपियन चित्रकारों को नककाली के कलंक से इस कला को बचा लिया है। उनके कई शिष्य जिनमें से कुछ के चित्र यूरोप और हिन्दुस्तान में बड़े सम्मान की दृष्टि से देखे गए हैं, उन्हीं
पद चिह्नों पर चल रहे हैं। इस स्कूल का नैतिक मानदण्ड बहुत ऊंचा है, और वह अपने चित्रों पर राष्ट्र के सर्वोत्तम विचारों और भावों का प्रतिबिम्ब उत्पन्न कर देता है जो हर देश की चित्रकला की जान है। बाबू अवनीन्द्रनाथ के चित्र अधिकतर ऐतिहासिक और धार्मिक होते हैं। कालिदास के ऋतुसंहार के भी कई दुश्य आपने अपने जोरदार कलम से खींचे हैं। मगर यह चित्र चाहे साहित्यिक हों, चाहे ऐतिहासिक उनका सबसे बड़ा गुण यह है कि वे जातीयता की भावना से भरपूर होते हैं। सीलोन के प्रसिद्ध कला-मर्मज्ञ डा० आनन्दकुमार स्वामी ने भी हमारी चित्रकला को अंधेरे और गुमनामी के कोने से निकालने में जबर्दस्त कोशिश की है।
पिछले तीन-चार साल से आपने इसी विषय पर हिन्दुस्तान और यूरोप की नामी पत्रिकाओं में कई जोरदार लेख लिखे हैं और प्राचीन चित्रकला के कितने हो ऐसे नमूने पेश कर दिए हैं जिनसे यह खयाल जम जाता है कि इस कला में कभी हमको भी कमाल था। यह उन्हीं कौ जोरदार आलोचनाओं का प्रभाव है कि यूरोप में हमारी चित्रकला की कुछ-कुछ चर्चा होने लगी है और शायद इस विषय पर आगे चलकर जो किताब लिखी जाएगी उसका लेखक भारतीय चित्रकला को इतनी उपेक्षा की दृष्टि से न देख सकेगा कि उसकी चर्चा ही न करे। इन्हीं महानुभावों की प्रेरणा और प्रभाव से लंदन के कुछ नामी चित्रकारों और आलोचकों ने एक संस्था स्थापित की है जिसका उद्देश्य यह है कि वह भारतीय चित्रकला की छान-बीन करे और यूरोप की कलारुचि में भारतीय चित्रों और भारतीय भावनाओं को समझने की योग्यता पैदा करे और हमारे प्राचीन चित्रों को जमा करने और प्रकाशित करने का प्रबंध करे। अभी हाल ही में मेजर बर्डबुड साहब ने भारतीय चित्रकला को बुरा-भला कहा था और इस धरती को उच्चकोटि की कला के पनपने क लिए हानिकर ठहराया था। यह महाशय बहुत दिनों तक हिन्दुस्तानी उद्योग-धंधों प्रशंसक रहे हैं और कई प्रामाणिक पुस्तकें इस विषय पर लिखी हैं। मगर जब आपकी वाणी से यह विचार निकले तो लोगों की आंखें खुलीं लेकिन उनका व्यावहारिक खंडन इसी संस्था के सदस्यों ने किया। उन्होंने अंग्रेजी पत्रों में एक लेख प्रकाशित किया जिसमें बर्डतुड को रुचि- हीनता की कलई खोली गई थी। खेद है कि यह लेख जितने लोगों के नाम से प्रकाशित हुआ उनम॑ सिर्फ दो हिन्दुस्तानी नाम नज़र आते थे, बाकी सब अंग्रेज थे। ऐसी संस्था का लंदन में स्थापित होना इस बात का प्रबल प्रमाण हे कि भारतोय चित्रकला की खूबियों क पारखी जितने अंग्रेज हैं उतने हिन्दुस्तानी नहीं। हमारे शिक्षित देशवासी अपने निजी व्यस्तताओं में इस हद तक फंसे हुए हैं कि उन्हें इन प्रश्नों की और ध्यान देने की जरा भी फुर्सत नहीं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारा शिक्षा-क्रम कलारुचि के संस्कार की और से बिल्कुल उदासीन है और हमारी चेतनाओं में वह अनुभूति नहीं जो अपने पुरखों के बड़े कामों पर उत्साह और उमंग के साथ गर्व करे। क्या यह दुख को बात नहीं है कि यूरोप और अमरीका के पर्यटक जो कुछ हफ्तों के लिए हिन्दुस्तान आएं वे अजन्ता और सांची का दर्शन करना अपना कर्त्तव्य समझें ० को अपने पुरखों की कारीगरी के इन चमत्कारों को देखने की फुर्सत न |
भारतीय चित्रकला ऐतिहासिक दृष्टि से तीन युगों में विभाजित होती है-प्राचीन, मध्य और आधुनिक। पहला युग ईसा के दो शताब्दी पूर्व से ईसा की सातवीं शताब्दी तक चलता है। यह युग बौद्धों के उदय और विकास का था। बौद्धों ने मूर्तिकला और स्थापत्य को जिस उत्कर्ष तक पहुंचाया उस पर आज सारी दुनिया के लोग अचरज करते हैं मगर जो अधिकार उन्हें चित्रकला पर प्राप्त था उसके बारे में आमतौर पर लोग नहीं जानते और न उस युग के चित्र इतनी संख्या में मिलते हैं जिनसे उनकी महान उपलब्धि का अनुमान सामान्यत: किया जा सके। इस युग के सबसे प्रसिद्ध और प्रशंसनीय स्मारक अजंता की गुफाओं के चित्र हैं। यह गुफायें जो संख्या में उन्नीस हैं शायद दूसरी और सातवीं शताब्दी के बीच बनाई गईं और इन्हें बौद्धों की मूर्तिकला, स्थापत्य और चित्रकला को प्रौढ़ता के आंरभ और उत्कर्ष का इतिहास समझना चाहिए। आमतौर पर लोग यह जानते हैं कि यह गुफा निजाम की सल्तनत के दक्षिणी भाग में स्थित है। उस युग के चित्रकारों और मूर्तिकारों ने इस गुफा की छतों और दीवारों को अपनी उत्कृष्ट कला के नमूनों से सजाया था। मूर्तियां और बेल-बूटे अब तक अच्छी हालत में हैं कितु अधिकांश चित्र जमाने की उदासीनता के कारण मिट गए फिर भी उनमें से कुछ अब तक कायम हैं। ये चित्र उस युग के सामाजिक रहन- सहन, आचार- विचार, अं. रीति-रिवाज के विशद इतिहाप्त हैं। इन चित्रों में शरीर के अंगों का अनुपात, शिल्प की सहजता और भावनाओं की वास्तविकता अपने चरम शिखर पर पहुंची हुई है। यूरोप के कला-पारखियों ने दिल खोलकर इन चित्रों कौ प्रशंसा की है और उन्हें इटली के चौदहवीं सदी के चित्रों का समकक्ष ठहराया है। इन चित्रों का विषय अधिकतर बौद्ध धर्म से संबंध रखता है मगर कहीं-कहों महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थितियां भी बड़ी खूबी से दिखाई गईं हैं। उस युग की एक आश्चर्यजनक विशेषता यह है कि जहां कहीं उस युग के चित्र मिलते हैं उन सब में एक विशेष प्रकार का साम्य और सादुश्य मिलता है कि जैसे सब एक ही स्कूल के कारीगरों का काम हो। और यह साम्य केवल भारतवर्ष तक सीमित नहीं। सिगरिया नामक स्थान में जो सीलोन में स्थित है, छठी और सातवों शताब्दी क॑ चित्र पाए गए हैं, वे अजंता के चित्रों से बहुत मिलते-जुलते हैं। जावा द्वीप में उस युग के चित्रों का पता चला है और उनमें भी वही सादृश्य और विशेषता पाई गई है। अधिकांश कमालर्मज्ञों का विचार है कि यह साम्य उससे जरा भी कम नहीं है जो आधुनिक यूरोपीय चित्रकला में पाई जाती है। यूरोप के रुचि- साम्य का रहस्य समझ में आ जाता है क्योंकि उसे अनगिनत साधन उपस्थित हैँ& मगर उस पुराने युग में इस प्रकार का रुचि- साम्य जिन बातों पर आधारित था उनका अंदाजा लगाना कठिन है। चूंकि बौद्ध स्थापत्य और चित्रकला का जन्म-स्थान बिहार था इसलिए आवश्यक है कि बिहार के कारीगर हिन्दुस्तान के हर हिस्से में गए होंगे और सारे देश में एक ही रंग का रिवाज पैदा हुआ होगा जो सदियों तक क्रमिक विकास के साथ जारी रहा। मगर यह केवल साधारण अनुमान हैं जिसकी पुष्टि का कोई साधन उपस्थित नहीं है। सातवीं शताब्दी के बाद भारतीय चित्रकला के सुंदर मुखड़े पर एक अंधेरा पर्दा- सा पड़ जाता है और मुगल बादशाहों के जमाने तक उसका कुछ हाल नहीं मालूम
होता, न इस बीच के दौर की तस्वीरें मिलती हैं जो अपनी खामोश जबान से अपना कुछ किस्सा सुनाएं। इस बीच में देश की बिल्कुल कायापलट हो गई। बौद्ध धर्म जड़ से उखड़ गया है और उसके साथ उसका स्थापत्य, उसकी मूर्तिकला और चित्रकला ने भी भारतवर्ष को अंतिम नमस्कार कर लिया है। देश के उत्तरी भाग में इस्लामी आक्रमणकारियों ने पैर जमा लिए हैं और आखिरकार मुल्क का बड़ा हिस्सा उनके अधिकार में आ गया है। इन बड़े-बड़े उलटफेरों के साथ-साथ तुर्रा यह कि हिन्दुस्तान के इन नये बादशाहों को चित्रकला से घृणा थी जिसे मौलवी लोग कुफ्र (पाप) खयाल करते थे। ऐसी हालत में चित्रकला का विकास करना तो दूर की बात है जिंदा रहना मुहाल था। कुछ तो उनके अत्याचारों और कुछ उस अशांति और हलचल से जो ऐसे सार्वदेशिक उलटफेरों का जरूरी नतीजा हुआ करती है, भारतीय चित्रकला अगर एक सिरे से मिट नहीं गई तो मिटने के करीब जरूर हो गई।
शहंशाह अकबर के जमाने तक हमको इस कला के फलने-फूलने की तनिक भी सूचना नहों मिलती। मगर अकबर का जमाना हर तरफ तरक्कियों का जमाना था। चित्रकला ने भी इसमें अपना हिस्सा पाया। अकबर खुद पढा-लिखा न था मगर उसको प्रकृति ने वे योग्यताएं प्रदान की थीं जिनमें पुस्तकीय ज्ञान कोई वृद्धि नहीं कर सकता। उसको संगीत और मूर्तिकला, इतिहास और साहित्य, चित्रकला और स्थापत्य से समान अनुराग था। फतेहपुर सीकरी में उसने जो इमारतें बनवाई उनमें हिन्दू और मुसलमान स्थापत्य को इस खूबी से मिलाया है कि उसकी निगाह पर हैरत होती है। हिन्दू चित्रकारों की उसने बड़ी कद्र की। एक मौके पर उसने उनके बारे में कहा धा-'' उनके चित्र हमारी कल्पना से परे होते हैं।'' इससे पता चलता है कि जब तक हिन्दू चित्रकारों की कला में कुछ विशेष गुण न होते अकबर जैसा सूक्ष्मदर्शी व्यक्ति, जो फारस की चित्रकला की महान उप्रलब्धियों से परिचित था, हरगिज ऐसा न कहता। चित्रकारों को उसकी सच्ची कद्रदानी का सुबूत इन शब्दों में मिलता है-
"ऐसे बहुत से लोग हैं जो चित्रकला से घृणा करते हैं। मेरी दृष्टि में ऐसे लोगों का कुछ मूल्य नहीं। मुझे ऐसा लगता है कि चित्रकार को परमात्मा के ज्ञान के ब्रिशेष अवसर प्राप्त हैं क्योंकि जब चित्रकार जीवित प्राणियों की तस्वीरें उतारता और उनकी अंग-रचना को रेखाओं में बांधता है तो उसके दिल में यह खयाल जरूर आता है कि मैं काया में प्राण नहीं डाल सकता और इस तरह रब्ुदा का बड़प्पन और उसकी जबर्दस्त ताकत तस्वीर बनाने वाले के दिल में घर कर लेती है और वह योगी के पद पर पहुंच जाता है।''
फतेहपुर सीकरी के कुछ महलां की दीवारों पर, खासतौर पर अकथभर के शयनकक्ष में, उस युग क णश्गिक कुछ मिटे हुए चिह्न बाकी हैं मगर उनकी संख्या बहुत कम है। उस जमाने की सबसे अनमोल यादगार किताबी तस्वीरें हैं' पढ़ने वालों को ऊपर मालूम होगा कि बौद्धों के युग में चित्र दीवारों पर बनाए जाते थे। कागज पर तसवारें खींचकर, चौखटों पर सजाकर उन्हें दीवारों पर लटकाने का रिवाज उस ब्रक्त क्या अकबर क जमाने तक नहीं था। यह रिवाज यूरोप से आया है। मुगलों के जमाने तक दीवारों पर तस्वीर बनाने का रिवाज कमोबेश बाकी
था मगर उसका पतन उसी जमाने में शुरू हो गया। लिहाजा उस जमाने की सब तस्वीरें किताबों की शक्ल में हैं। मगर उस पुराने रिवाज का हिन्दुस्तान में अब तक कुछ कुछ निशान बाकी है और अब भी पुराने ढंग के कुछ मकानों की दीवारों पर हाथी, घोड़े, ऊंट, मछली, सिपाही, प्यादे वगैरह की रंगीन तस्वीरें नजर आ जाती हैं। हां, अब यह कला बहुत भोंडे हाथों में आ गई है और इसके कद्रदां अब बहुत थोड़े से लोग रह गए हैं। मुगल जमाने की तस्वीरों का जिक्र करते हुए यूरोप का एक जाना-माना आलोचक लिखता है- '
''उनके प्रकृति-चित्रण में वह उमंग और चाव है जो इस नए जमाने के प्राकृतिक दृश्यों के चित्रों में दिखाई देता है, और धृप-छांव का सुहाना असर दिखाने में वे विशेष रूप से दक्ष थे। जहां चित्रकार ने इंसानों को तस्वीरें उतारीं वहां मानव-अंगों के सूक्ष्म निरीक्षण का प्रमाण मिलता है। उसकी पैनी दृष्टि, उसके निरीक्षण की स्वच्छता, रेखाओं पर उसका अपना अधिकार और उसके चेहरे से मन की भावनाओं को प्रकट करने की योग्यता ने मिल-जुलकर ऐसी तस्वीरें बनाई हैं जो पश्चिम के छोटे पैमाने की बेहतरीन तस्वीरों से आंख मिला सकती हैं।''
मगर अकबर का युग चित्रकला के चरम विकास का युग नहीं था। यह गौरव शाहजहां के युग को प्राप्त है। शाहजहां के साथ साथ चित्रकला का बड़ा उत्साही पारखी था। मुगल खानदान के गव और बिनाश के साथ-साथ चित्रकला का भी पतन और विनाश हो गया। वह लूट पाट जो इस खानदान क पतन के बाद देश में आई, चित्रकला के लिए जानलेवा साबित हुई। अठारहवीं सदी के अंत तक इस कला की दशा रद्दी होती गई। आखिर उनमीसवों सदी में पश्चिमी सभ्यता और कला की अंधी गुलामी ने हमारी इस कला का किस्सा तमाम कर दिया।
मुगल जमाने की ज्यादातर तस्वीरें आमतोर पर गैेर-मजहबी हैं। उनमें संसार के इतिहास के एक महान् युग की समाज- व्यवस्था और आच्यर का प्रतिबिम्ब मिलता है। कहीं चित्रकार इश्क और मुहब्बत की कहानी और लड़ाई के मैदानों और नाच- गाने की महफिलों की दास्तान सुनाता हुआ नजर आता है, करीं दरबार के अमीरों और उनके माशूकों की तस्वीरें और उनकी मजेदार सोहबतों का जलवा दिखाए है। कभी-कभी उसकी दृष्टि एकांत के उन अवसरों पर जा पहुंचती है जहां साधारण आंखों की पहुंच नहीं। कहीं पहलवानों के ताल ठोंकने की आवाज कानों में आती है और कहीं शिकार के मैदान का दृश्य आंखों के सामने आ जाता है। ब्रह्मज्ञान की मुरा पीने वाले और उनके सुराही-प्यालों के दृश्य भी बीच-बीच में दिखाई दे जाते हैं। गरज यह कि उस युग की चित्रकला शुरू से आखिर तक शाही दरबार के रंग में रंगी हुई है जिसका उद्देशय शौकीन अमीरों की नर्म- नाजुक तबीयतों को खुश करना है। इन तस्वीरों में अक्सर यथार्थ-चित्रण अपनी सीमा पर पहुंच गया है। चित्रकार वास्तविकता पर ऐसा असलियत का रंग चढ़ाता हे और ऐसे खास कोमल ढंग से कि कहीं गाने की महफिल की सुहानी पुकार कानों मे आन लगती है, कहीं उन स्वर्ग से स्पर्धा करने वाले बगीचों की ठंडी-ठंडी हवा और फूलों की सुगंध दिलोदिमाग को ताजः कर देती है, जहां परिस्तान की परियां बारोक रेशमी कपडे पहने गाने और
सितार का लुत्फ उठा रही हैं।
इन चित्रों में एक और विशेषता उनके हाशिए की नफौस सजावट है। अक्सर बहुत अच्छे रंगों के खूबसूरत फूल बनाए जाते थे जो उस जमाने की संगमरमर की गुलकारियों से बहुत ही मिलते-जुलते हैें।
रंगों की मिलावट में उस युग के चित्रकारों का कमाल था। वह आमतौर पर पानी के रंग इस्तेमाल करते थे। उस जमाने में कलाकार अपने रंग खुद बना लिया करते थे। बहुत बार वह रंग मिलाने के लिए बुरुश वगैरह यहां तक कि अपने मतलब का कागज भी खुद ही बना लेते थे। जमीन आमतौर पर सफेद चीनी मिट्टी से तैयार की जाती थी। कुछ नमूनों में सिर्फ स्केच या खाका बनाकर संतोष कर लिया गया है।
इस मौके पर मुगल जमाने की सिर्फ तीन तस्वीरें दी जाती हैं।
पहली तस्वीर एक ऐतिहासिक घटना की है। जहांगीर का जमाना है। फारस से राजदूत आए हैं। उस जमाने के रिवाज के मुताबिक राजदूत बादशाह के लिए बेशकीमत घोड़े और अनमोल तोहफे साथ लाए हैं। बादशाह सलामत अभी नहीं आए। दोनों राजदूत उनके इंतजार में सर झुकाए बेठे हैं। उनके चेहरे से सम्मान और संग्रम प्रकट हो रहा है। नौबतखाने में शाही स्वागत का राग अलापा जा रहा है। दरबार क॑ सहन में दरबारी बड़े अदब के साथ खड़े हैं। इस नकल से असल तस्वोर के कमाल का अंदाजा नहीं किया जा सकता मगर तस्वीर के देखने से दिल पर बादशाह के तेज और प्रताप का रोब पड़ता है। नौबतखाने का दृश्य चित्रकार के सूक्ष्म निरीक्षण का सुंदर प्रमाण है।
दूसरी तस्वीर जहांगीर या शाहजहां क॑ जमाने के किसी मुंशों की हे। इस तस्वीर में चित्रकार ने आकृति-चित्रण की कला को कमाल पर पहुंचा दिया हैं धूप और छांव ऐसे उस्तादी ढंग से मिलाए गए है कि तस्वीर में पत्थर की मूर्ति की शान आ गई है। चेहरे की गंभोरता बहुत उपयुक्त है और कंधों का झुकाव कहे देता है कि कागजों के बोझ ने मेरी यह गत बना रज़्खी है। जिन लोगों की यूरोप के मशहूर पोसट्रेट बनाने वालों मम्लन् रेम्ब्रान्ट की तस्वीरों की नकलें देखने का मौका मिला है वह खुद यह फैसला कर सकते हैं कि इस तस्वीर का उनके मुकाबले में क्या स्थान है।
तोसरी तस्वीर हिन्दू धार्मिक रंग में है। यह अकबर के जमाने के हिन्दू चित्रकारों की श्रेष्ठ कला का नमूना है। गत का वक्त है। तस्वीर में बड़ो आकर्षक गंभीरता और सुखदाई शांति मिलती है।
उमा अपनो दा सख्त्रियों के साथ शिव की पूजा के लिए आई हैं। दाहिनी और शिवजी की मूर्ति सुशोभित डै। ऊपर से पानी की एक पतली धार मूर्ति के ऊपर गिरती हुई दिखाई देतो है। यह गंगा हैं जो पहले शिवजी के सिर से होकर जमीन पर आती हैं। उमा के चेहरे से बर्णनातीत भक्ति का भाव प्रकट हो रहा है और चित्र
| इस लेख के साथ 'ज़माना' के उप्त अंक में ये तीन रंगोन चित्र भी प्रकाशित हुए थे। -सं“
समग्र रूप से दर्शक के हृदय पर एक पवित्र शांतिदायक प्रभाव उत्पन्न करता है।
खेद है कि मुगल जमाने और मध्य युग की भारतीय चित्रकला की अब तक यूरोप वालों और उनके साथ ही साथ हिन्दुस्तानियों ने वह कद्र नहीं की जिसकी वह अधिकारी हैं। उनको जमा करने और उनके कमाल को जाहिर करने की अब तक कोई बाकायदा कोशिश नहीं की गई। मगर इसका कारण यह हरगिज नहीं कि उस जमाने के चित्र लुप्त हें बल्कि यह कि जिनके बाप-दादों के विचार कल्पना और सामाजिक जीवन के भंडार वे चित्र हैं वे लोग खुद उनकी खूबियों और उनके महन्च से अपरिचित हैं। भारतीय चित्रकला पर अब तक जितनी पुस्तकें लिखी गई हैं वे सब यूरोप वालों ने लिखी हैं और यह स्वाभाविक बात है कि वे यूरोपीय चित्रकला की तुलना में भारतीयों की कला को नीचा समझें। यह बड़ी लज्जाजनक लेकिन सच बात है कि भारतीय कला के पारखी हिन्दुस्तान में इतने नहीं हैं जितने कि यूरोप में और शायद हिन्द वाले उस पर गौर करना उस वक्त तक न सीखेंगे जब तक फि यूरोप वाले उसकी सिफारिश न करेंगे
प्रकाशन इतिहास
[उर्दू लेख। उर्दू मासिक पत्रिका 'ज़माना', अक्टूबर, 1910 में 'हिन्दुस्तानी मुसव्विरी' शीर्षक से प्रकाशित। 'मज़ामीन-ए-प्रेमचंद' में संकलित। हिन्दी रूप 'विविध प्रसंग' भाग-1 में संकलित।]
