देशबन्धु दास उन महान् पुरुषों में थे ,जो राष्ट्रों के इतिहास में अपनी यादगार छोड़ जाते हैं,जो जातियों के भाग्य-विधाता होते हैं। जिनके दिल में मुर्दा हो चुके होते हैं जिनमें दर्द ओर शर्म की झलक तक नहीं रह गई होती, ऐसों ही को दीन दशा स॑ उठाकर वे ऐसे शक्तिमान राष्ट्रों की बुनियाद डालते हैं कि देखने वाले दांतों तले उगली दबाते हैं किसे उम्मीद थी कि कभी पंजाब में नादिर और अब्बाली से टक्कर लेने वाली कोई संस्था बनेगी? कौन कह सकता था कि मुगलों को अखंड राज्य एक पहाड़ी मराठे के हाथों जड़ से हिल जायगा? ऐसे वीरों के सिर पर मुकुट नहीं होता, लेकिन जाति के असली राजा वे ही होते हैं। उन्हें गद्दी पर बैठने की हवस नहीं होती, वह जनता के हृदयों में उन्हें वह स्थान मिल जाता है जो राजों को भी मयस्सर नहीं हो सकता। देशबन्धु दास इसी श्रेणी के मनुष्यों में थे। वह बड़े विद्वान्ू, बड़े वक्ता, बड़े राजनीतिज्ञ न रहे हों, लेकिन उनमें वह प्रतिभा भी, जिसने उन्हें विद्ठानों में विद्वान, वक्ताओं में बक्ता और राजनीतिज्ञों में राजनीतिज्ञ बना दिया।वह स्वतंत्रता के भक्त थे और उसी पर अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया। उनके मन में केवल एक अभिलाष थी, और वह थी स्वर्दश को स्वतंत्र देखने की। पर वह स्वतंत्रता देवी के उन भकनों में न थे, जो मंदिर में गला फाड-फाड़कर गाते हैं, अपने सिजदों से मंदिर की चौखट को रगड़ डालते हैं और उसी भक्ति और उपासना को अवसर पड़ने पर मान और पद का जीना बना लेते हैं। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति, यहां तक कि अपने प्राण भी उस देवी के चरणों पर चढ़ा दिए। यही कारण था कि भारतवर्ष का बच्चा -बच्चा उन पर प्राण देता था। वह जाति के सच्चे सेवक थे और जाति भी उन पर सच्च दिल से प्रेम करती थी। उन्होंने बहुत थोड़े दिनों से राजनीतिक क्षेत्र में पग रखा था, लेकिन अपने अनवरत उद्योग, अदम्य उत्साह, असीम उदारता और अनुपम त्याग के कारण इस थोड़े समय में उन्होंने भारतवर्ष में एक युगांतर -सा डपस्थित कर दिया। भारत में प्रजा पक्ष को शायद हो कभी सफलता मिलती है। प्रजा की इच्छाएं और आशाएं तो कुचली जाने ही के लिए होती हैं। कितु यह गौरव देशबन्धु ही को प्राप्त हुआ कि उन्होंने स्वराज्य दल को जिस उद्देश्य से स्थापित किया था, वह पूरा हों गया। उन्होंने द्वैत शासन का अंत करने की ठानी थी। उनकी विजय से भारत को अपना अंतिम लक्ष्य प्राप्त करने में कोई सहायता मिलेगी या नहीं, इसके विषय म॑
कुछ नहीं कहा जा सकता। किंतु देशबन्धु ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत अब पश्चिमी राजनीति समझने लगा है और उसे भड़कौले खिलौने से नहीं फुसलाया जा सकता।
चितरंजन के पिता बाबू भुवनमोहन दास कलकत्ता हाईकोर्ट में वकालत करते थे। वह बहुत ही उदार हृदय पुरुष थे। जो कमाते थे उससे ज्यादा खर्च करते थे। नतीजा यह हुआ कि ऋण का भार बढ़ने लगा, और अंत में दिवालिया बनना पडा। चितरंजन उन दिनों विलायत में थे। वहां से वापस आकर उन्होंने स्थिति बहुत खराब देखी। पिता को बदनामी के कारण पहले उनसे लोगों ने रुखाई की, कोई सहारा देने को तैयार न हुआ। पर नौजवान बैरिस्टर को इसकी बहुत जरूरत होती है। आखिर कलककत्ते से निराश होकर चितरंजन को मुफस्सिल में वकालत करनी पड़ी और थोड़े ही दिनों में उन्होंने फौजदारी के सीगे में अच्छा नाम पैदा कर लिया। तब वह कलककत्ते फिर लौट आए और हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। यद्यपि आगदनी अभी खर्च के लिए काफी न होती थी, पर आपको कर्ज अदा करने की फिक्र हमेशा लगी रहती थी। दस्तावेजों की मियाद गुजर चुकी थी। कानूनन महाजन भी उनका कुछ न कर सकता था। पर ।चतरजन अनीति की आड़ में छिपने वाल आदमी न थे। मियाद गुजर जाने से कर्ज नहीं मिट सकता। कर्ज तो अदा करने ही से मिट सकता है। ज्योंही हाथ फैला, चितरंजन ने अपने पिता का देना पाई पाई चुका दिया। महाजन निराश हो चुका था। उसका कथन है कि जब मेरे पास चेक पहुंचा, तो में चकित हो गया। पौका पाकर भी जो लोग धर्म या कर्त्तव्य से विवलित नहीं होते, बहे ही सच्चे धर्मात्मा हैं, इसी एक काम से चितरंजन की विवेकशीलता का पता लग जाता है।
मि> दास को अब अपने पेशे में ख्याति प्राप्त होने लगी। उनकी जिरह-शेली और बहस को देखकर उस विद्या के विशारदो को अनुमान होने लगा कि किसी दिन यह युवक ख्याति के शिखर पर पहुंचेगा। सन् 00४ के पूव॑ '# मि० दास को कोई ऐसा माके का मुकदमा न मिला था जिसरा उन्को ब्रद्धि को कुशलता का परिचय मिलता। इतने में अलीपुर के बम का अभियोग चला। बाबू अर्गराद घोष और उनके कई सहकारियों पर मुकटमा चला। इस मुकदम ने सारे भारतवर्ष में हलचल पैदा कर दी। सारे देश की आंखें उसकी ओर लगी ₹६ थो। सग्कार की ओर से प्रसिद्ध वरिस्टर मि+ नार्टन पैरतों कर रह थे। मिल दाग ने जो तोडऋर इस मकदमे को पेरती की। इन दिनों उन्हें कभी दो बजे से पहले रात का सोना नसीब न होता था। मि० दास केवल अरविंद बाब के तकील ही ने थे उन# भक्त भी थ। आखिर आपको मेहनत ठिकाने लगी और अरिंद बाबू को पान अभियुक्त थे, बरी कर दिए गए।
इस सफलता ने मि> दास हो सकॉलों भी प्रथम श्रेणी में ला बिठाया, उनकी गणना प्रधान बकीलों में होने लगी। शनै: शने: आपको इतनी ख्याति हुई कि आपकी
जीना आमदनी तीन लाख तक पहच ग रे | बंगाल में ला्ड सिन्हा के सिवा आपके
जोद का दूसरा कानूनदा न था। लार्ड सिनशा ओर बहस म॑ ज्यादा कराल थे. तो जिरह मे मिन् दास को कोई सानो ने था। विशेषता यह थी कि उकूदमा जितना हो कमजोर
और सारहीन होता था, उतनी ही उनकी बुद्धि उसमें लड़ती थी। बेजान मुकदमे उनके हाथ में आकर पनप जाते थे। राजनीतिक अभियोगों पर तो मानो उनका इजारा ही था।
जिन दिनों बाबू अरविंद घोष पर मुकदमा चल रहा था, बाबू विपिन चन्द्रपाल भी उस मुकदमे में गवाही देने के लिए तलब किए गए। बाबू साहब ने गवाही देने से इनकार किया। सबको विश्वास हो गया कि अब हजरत पर आफत आई। कानून की धारा इस विषय में साफ थी। जरा भी संदेह या भ्रम न था। बचने का कोई उपाय न था। मि० दास ने आखिर यह युक्ति निकाली कि यह धारा अंग्रेजी नीति-विधान पर अवलंबित है, भारतवर्ष की नैतिक और सामाजिक अवस्था इस धारा के विरुद्ध है। इंग्लैंड की नीति में जो बात उचित हो वह भारत में अनुचित हो सकती है और उस धारा का यह प्रयोग करना स्वार्थ न्याय-विरुद्ध होगा। आपने इस युक््ति को ऐसे प्रबल प्रमाणों से सिद्ध किया कि विपिन बाबू को केवल छह मास की सादी केद को सजा मिली।
यद्यपि अब तक मि० दास राजनीति के क्षेत्र में न आए थे, लेकिन राजनीतिक संग्राम में उनका काम किसी बड़े-से-बड़े नेता से कम न था। आपकी अभिरुचि का परिचय उसी समय मिलने लगा था। आपकी बार-बार इच्छा होती थी कि वकालत को तिलांजलि देकर रण-द्षेत्र में कूद पड़े, किंतु उन दिनों अरविद घोष और विपिनचन्द्र पाल, दोनों, ही राष्ट्रीय झंडा संभाले हुए थे। इसलिए मि० दास ने अपने को रोका।
मि० दास का सार्वजनिक जीवन !97 में शुरू हुआ, जब इंग्लैंड की लिबरल गवर्नमेंट ने बहुत दिनों के बाद अपनी हस्ती का सबूत दिय्य और घोषणा करके यह स्वीकार किया कि भारतवर्ष का राजनीतिक लक्ष्य स्वराज्य है। दो साल तक मि० दाम बंगाल के राजनीतिक जीवन में नए विचारों का संचार करते रहे। अलीपुर में अभियाग के बाद बंगाल में नरम विचार वालों की विजय-सी हो गईं थी। राजनीतिज्ञों को इम घोषणा में गुण-ही-गुण नजर आते थे। वे खुशी से फूले न समाते थे। उन दिनों नरम और गरम दलों में नए सुधारों पर जो वाद-विवाद हुए, और आंदोलन ने अंत में जा रूप धारण किया, वह अभी कल की बात है। उसका उल्लेख करने की यहां जरूरत नहीं। केवल इतना कहना काफी हैं कि मि० दास पर भी पंजाब के अत्याचारों का वही असर हुआ जो अन्य कितनी ही सहृदय प्राणियों पर। आप भी असहयोग दल में शामिल हो गए। कांग्रेस की ओर से उन अत्याचारों की तहकीकात करने के लिए जा कमेटी कायम की गई, उसमें मि> दास भी शमिल थे।
इसमें संदेह नहीं कि असहयोग का मार्ग कांटों से भरा हुआ था, और महात्मा गांधी के जेल जाने के बाद कोई ऐसा न रह गया था, जो उस भार को सभालता। अकर्मण्यता की कुछ ऐसी प्रतिक्रिया शुरू हुई कि आंदोलन बिल्कुल बेजान सा हां गया। देहातों में जाते हुए लोगों के रोएं खड़े होने लगे। उस अकर्मण्यता को दूर करन और जातीय उत्साह को किसी ढर्रे पर लगाने के लिए मि० दास को काउंसिल म जाकर गवर्नमेंट का विरोध करने की सूझ गयी। यही ऐसा मार्ग था जिसका हमारे
नेताओं को कुछ अनुभव था। अन्य कोई मार्ग उन्हें सूस ही न सकता था। आखिर स्वराज पार्टी का जन्म हुआ और महात्मा गांधी के छूट कर आते-आते इस पार्टी ने देश की बहुत कुछ सहानुभूति प्राप्त कर ली। मि० दास यर्द्याप पहली बार यह प्रस्ताव स्वीकार न करा सके, पर उन्होंने हिम्मत न हारी और कांग्रेस को उनका प्रस्ताव मानना ही पड़ा। यह सबसे बड़ी विजय थी, जो मि* दास को अपने जीवन में प्राप्त हुई, और इसमें संदेह नहीं कि जिस दशा में सारा देश उत्साह-शून्य हो रहा था, उसी में आपने उत्साही पुरुषों को काम करने का एक रास्ता दिखा दिया। पर असहयोग आंदोलन को उसी दिन पूर्णाहुति भी हो गई। भारी पत्थर था, सबने चुमकर छोड़ दिया। काउंसिल को मेंबरी और असहयोग, दोनों में नै्मा्गक विरोध था। काउंसिल में जाना सहयोग के मुंह में जाना था, और आज वे शंकाएं पूरी हो रही हैं, जो उन दिनों कुछ लोगों के मन में उठी थीं। मि> दास ने अपनी ऑतम वकक््तृता में सहयोग का रांकेत भी किया था. और पं» मोतीलाल नेहरू ने सेण्डहर्स्ट कमेटी में सम्मिलित हाकर बतला दिया था अब उन्हें वजारत स्वीकार करने में कोई आपत्ति न होगी। यह ॒मारी राजनीतिक पराधीनता और असमर्थत। का करणाजनक दृश्य है।
मगर कुछ भी हो, मि> दास ने हमारे राजनीतिक जीवन को आदर्श बहुत ऊंचा #7 दिया है। अन्न राजनीति केवल काउंसिल या कंग्रेस के प्लेटफार्म पर नहीं रहो। वह अब आत्म बलिदान का दूसग नाम है। अब वहीं प्राणी हमारा नेता बनने का पता कर सकता है, जो जाति के लिए त्याग कर चुका हो, जिसने अपने को जाति क हाथ में समर्पित कर दिया हो, जिसका! चरित्र 3ज्ज्यल हो, जिसने अपने मन को गीत लिया हो और जो ऊड़ी- से कड़ी आंच सह कर खरा निकल आवे। मि० दास # अजय की: आडॉय भी जह ने था जिसकी आविशणनेत व हपता कि जीती हो पह पश्चिमी नमूने का स्लराज्य ने चाहते थे। वह तो यधाथ में बनियों का राज्य है, भारत के लिए वह एसा स्खगज्य चाहते थे, 'जमसम॑ ए्गीबो के अधिकार प्रधान हों। पहातों को उन्नति और स्वास्थ्य उनके स्वराज्य का अबसे उज्ज्बल “ग था। वह बड़े- बेड शहतोें को सम कक रा न 8 गत 0 इसे तह नतीन सन्यता का कलंक प्रमझत थे। वह देहातों मे ऐसे केद्र टन बनाता चाहते थे, जो २यावलंबी हों, जिनकी सार जरुरत वहीं पूरी डो जाए। इन्हीं कड्ों को वह अपने स्व॒रज्य का प्रवेश-द्वार समझने थे। सागंश यह कि वह भारतीय 'जनता का मस्भुख शिक्षित समाज के पंजे पे छुड़ना चाहत थे। वह इस देझा को योरोप उते लकल से बाज रखकर राष्ट्रीयता को ओर सींचना चाहते थ। उनका जझथन थी जि या देहानों मे सडक बन जाए, सफाई और रोशनी का प्रबंध हो जाय, तो काई कारण नहीं कि बहुत से वे व्यवसाय छातो में न किए जा सके, जो अब शहरों ही में किए जाते हैं। उन्हें भारतवर्ष से असीम प्रेम था। उनकी यह अभिलापा थी कि इसी देश में फिर जन्म लूं ओर फिर इसऊ्ी सेवा में जीवन बिताऊं। उनकी देश भवित में अधिकार-प्रेम नहीं छिपा था। देशभक्ति ने उनकी अंतरात्मा में घः कर लिया था। और उनको भक्ति भारत 6 तक मर्यादित न थी। वह एशियाई संगठन के भी अनुमोदक थे। यदि अकाल मृत्यु ने उन्हें कुछ दिनों का अवकाश दिया होता, तो तह उस बृहद क्षेत्र में भी >'पनो
कीर्ति का चिह्न अवश्य छोड़ जाते।
राजनीति हमेशा से एक बदनाम चोज है। यहां वह सब कुछ उचित और क्षम्य है, जिससे हमारा काम निकले। यहां औचित्य की परख परिणाम से होती है। यदि कुटिलता सफल हो तो श्रेष्ठ है, उदारता हो तो त्याज्य है। भारतवर्ष में भी पहले इसी ढंग की राजनीति चलती थी। यहां सफाई और ईमानदारी की जरूरत न थी। महात्मा गांधी पहले देश-भक्त हैं, जिन्होंने राजनीति के माथे से यह कलंक का दाग मिटाने की चेष्ट की, और राजनीति को 'सत्यवादिता' का समानार्थक बना दिया। मि० दास की राजनीति भी निष्कलंक थी। उन्होंने कभी कुटिल चालों से अपना दामन नहीं मेला किया कभी धांघली नहीं की। जब वार किया, तो ललकार कर, कभो जांघ के नीचे तीर न मारा। उनकी बाणी और व्यावहार में कोई भेद न होता शा, उनके हृदय में गुप्त बातों के लिए कोई अंधेरा स्थान न था। वह उन राजनीतिज्ञा म॑ न थे जो शब्द-जाल ही को राजनीति को प्राण समझते हैं, जिनका सारा जीवन सत्य पर पर्दा डालने और चिकनी-चुपड़ी बातें बनाने में कट जाता है, जो मन में छ/ छिपाकर भो मुंह से मिश्री के डले घोल सकते हैं। यहा तो हृदय आईने की शत निर्मल था। जो मन में था, वही मुख पर, चाहे किसी को चुग लगे या भला। टसी स्वच्छंदता के कारण कई बार गव्नमेंट को उन पर अनुचित संदंह हुआ। यहां तक कि आखिर वहीं संदेह स्व॒राज्य-दल पर काले कानून के रूप में वज् था कर हिफा। अभी तक संदेह के बादल फटे नहीं हैं। भि: दास शांति की मूर्ति थे! यह सरेह सूवस कठोर आघात था, जो उन पर किया जा सकता था। यह आधात उनको आत्मा ए था। इस संदेह को मिटाने के लिए मिल दास को बार बार'अपनी रफाई दनी पर" और आखिर उनकी फरीदपुर वाली वक््तृतठा ने किसी अंश तक संदेश को हटाय हालांकि उस अवसर पर भी उनन््हांने साफ साफ कह दिया कि पशु बल का वयाश यदि पञा की ओर से सिद्य है तो सरकार की आर से बह और भी आपतिज-० है। कानून वहीं है जिस समाज अपने सुख और कल्याण के लिए आवश्यक सः + * हो। जे काउन समाज में अद्रनि और उपद्रव पैदा कर, तह कानून सहीं। शास्च। तो यहीं हैं कि ऐस आत्थवादी पुरुष के विषय में एसा संदेह क्योंकि टुआ। अर में खे झखल एक लतहाहे था, स्थगज्य दल को परास्त करने का, रसकों शक्ति 3' हरने का। घिल् दाश नड़वादी ने थे। सह विप्लल और हत्या की ऋलपन भी ते सकते थे। सेवा और भक्नि से हा उनको आत्मा को दाति मिलती थी। जहा त्याग और समर्पण के भाव राय ऋरते हा साहा हत्या और पदयत्र के लिए स्थान उट। उन्हें तो प्रत्येक गेतिहासिक घटना में इंड्वगय प्ेरणा छिपी हुई मोौलूम होती थी। हर के इतिहास में भी वह ईश्वरीय प्रेरणा का स्वरूप देखते थे। आरयो का आगमन और अनार जातियों से उनका मेलजोल, बौद्ध धर्म का प्रचार, लेदिक धर्म का पूनसद्धार मुसलमाना का आक्रमण, अंग्रेजों का प्रशार ये सारी घटनाएं एक उसी प्रेशणा का शूरल की कड़ियां थीं और वह लक्ष्य कया था? बह था भारतवर्ष को संयुक्त और संगठित करके राष्ट्रों के दरबार मे उचित स्थान पर बिठासा, भारत के आध्यात्मिक प्रकाश #
9.4!
संसार को आलाकित करना, रस आदर्शों की सृष्टि करता, जिनका अनुसरण कर
से संसार में शांति और प्रेम का साम्राज्य हो सकता है। जिनके विचार ऐसे उन्नत और परिष्कृत हों, उस पर ऐसे सारहीन संदेह करना घोर अन्याय है।
मि० दास हिन्दू-मुसलिम एकता के परम भक्त थे। शायद सारे देश में महात्मा गांधी के सिवा एकता का महत्त्व किसी ने इतना न समझा था, जितना मि० दास ने। इस विषय में प्राय: हिन्दू नेताओं को आपसे मतभेद था। जब मि० दास ने बंगाल में मुसलमानों से यह समझौता कर लिया, जिसमें मुसलमानों को उनकी संख्या से अधिक स्वत्व दिए, तो हिन्दू समाज में बड़ी खलबली मची। लोगों ने मि० दास पर भांति-भांति के आक्षेप किए। लेकिन मि>* दास अंत तक्र उस समझौते पर डटे रहे।
वह एकता का महत्त्व समझते थे और थोड़ी-सी हानि उठाकर भी उसकी जड़ मजबूत करना चाहते थे।
यों तो बंगाल की भूमि महान् आत्माओं को जन्म देने में बहुत उर्वर है, लेकिन जा सार्वदेशिक ख्याति मि० दास ने प्राप्त की वह कदाचित् पहले और किसी ने न की थी। और यह केवल सात-आठ वर्षो की कमाई थी। इसका कारण उनका वह विनय और सेवाशीलता थी, जो दूसरों को आपका दास बना लेती थी। बंगाल में तो आप देबता ही समझे जाते थे। आप में वे सारे गुण थे, जो जनता देवताओं में रा चाहती हैं। आप बहुत ही सहदय थे, परले सिर के दीन-वत्सल। दानशोलता तो आपमें दुर्गुण को सीमा तक पहुचो हुई थी। आप अपने सिद्धांतों पर अटल, बड़े ही मिलनसार, हंसमुख ओर सरलदहददय पुरुष थे। कांग्रेस में एसा छोटे-से-छोटा कार्य भी न था, जिससे आपका परिचय न हो। कल कौ चिंता उन्हें कभी न सतातो थी और जमा करना तो उन्होंने सीखा ही न था। आप बडे साहसी थे। कठिनाइयों में आपकी हिम्मत और भी चमक उठती थो। उदार आप इतने थे कि आपके द्वार से कोइ निराश न लौटता था। उनके गुप्त दानों की सूची बहुत लंबी है। उन पर जनता फो निगाह कदाचित् कभो न पड़ेगी। आपके जीवन में कई बार ऐसे मौके आए हैं कि आपके पास उस वक्त जो कुछ था, वह सब आपने दान कर “दया। पर आप दबकर न देते थे, न देकर अहसान जताते थे। जो कुछ देते थे बड़ी खुशी से देकर फिर भूले से भी उसकी चर्चा न करते थे। आप में वह आकर्षण शक्ति थी जो मिलते ही दूसरों पर अपना असर डालती थी। आपकी सुरुचि, सुबुद्धि, रसिकता और विनोद - प्रियता, अखंड उत्साह आदि सभी ऐसे गुण थे, जिनसे आप दूसरों के दिल में घर कर लेते थे। आप में बालकों की-सी सरलता थी, दिखाबे और ठाट से आपको घृणा थी। एक लेखक के शब्दों में- उनमें ऋषियों की सूक्ष्म दृष्टि, कवि की कल्पना, राजनीतित्ञ को दुस्दर्शिता और एक सिद्धहस्त नेता की गंभीर सुदृढ़ और निश्चित शक्ति थी।
._ जब आप जुहू में ठहरे हुए थे, तब एक महाशय खद्दर का एक थैला लाए
और आपको दिखाया। आपने लपककर थैला उनके हाथ से छीन लिया और इतना उछल कूदे मानो कोई पड़ो निधि हाथ आ गई।
सन् 902 में जब महात्मा गांधो दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रहियों के लिए चदा पांगने कलकत्ता गए थे, जब मिस्टर दास के पास बैंक में कुछ सोलह सौ रुपये थे। आपको वकालत उस वक्त बहुत अच्छी न थी, और आर्थिक दशा भी चिंतामय हो
रही थी। पर आपने वह सब रुपया, महात्माजी को भेंट कर दिया। आपकी वार्षिक आमदनी तोन लाख के लगभग थी, लेकिन आपने उसकी अणुमात्र परवाह न की। यह दरियादिली थी, जिसने आपको इतना प्रभावशाली बना दिया था। एक बार एक महाशय को जिनसे उनकी विशेष मित्रता न थी, बिना लिखा-पढ़ी किए अट्ठाइस हजार रुपये दे दिए। उन महाशय ने चकित होकर पूछा-आपको मुझ पर इतना विश्वास क्यों कर हुंआ? आपने कहा-विश्वास की बात तो जब होती है, जब मैं किसी दूसरे को देता। मुझे तो ऐसा मालूम हो रहा है कि मैं अपने ही को दे रहा हूं। अंग्रेजी के ऊंचे विद्वान होने पर भी आपका जीवन भारतीय था। आप अपने कुटुंब के साथ मिलकर प्रेम से रहते थे। आप जो कुछ पैदा करते थे, उसमें घर भर का हिस्सा था। यह नहीं कि अपने बाल-बच्चों के भरण-पोषण की धुन में आप अपने संबंधियों को भूल जाएं। आपको संगीत और कविता से प्रेम था। स्वयं भी बड़ी मनोहर भावपूर्ण कविता करते थे। आपकी रचनाओं में 'सागर-संगीत' बहुत सुंदर है। उसमें दर्शन नहीं, उपदेश नहीं, केवल भक्ति है, एक भक्ति-विहल आत्मा के उदगार हैं और एक सौंदर्योपासक के पवित्र मनोभाव हैं। क्या उनके ये शब्द हम भूल जाएंगे--' मैंने अपने प्यारे देश का बचपन में, जवानी में, बुढ़ापे में, संपत्ति में, विपत्ति में, सदेत ओर सभी दशाओं में प्यार किया है। मैंने अपने हदय और अपनी आत्मा में उसकी मूर्ति को अंकित कर लिया है, और अब अंत समय निकट आने पर वह चिह और भी उज्जवल और प्रकाशमय हो रहा है।'
प्रकाशन इतिहास
[लेख। 'माधुरी', जुलाई, 1925 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]
