Cover Image for Pandit Moteram Ji Shastri (पण्डित मोटेराम जी शास्त्री) by Munshi Premchand - Short Story
Cover Image for Pandit Moteram Ji Shastri (पण्डित मोटेराम जी शास्त्री) by Munshi Premchand - Short Story
कहानी••18 मिनट

पण्डित मोटेराम जी शास्त्री

Pandit Moteram Ji Shastri

प्रेमचंद की कहानी 'पण्डित मोटेराम जी शास्त्री' एक ढोंगी शिक्षक के वैद्य बनकर लोगों को ठगने और अंततः पिटकर भागने का मनोरंजक व्यंग्य है।

पात्र:पण्डित मोटेराम शास्त्री, मोटेराम की पत्नी, बिड़हल की रानी
स्थान:लखनऊ

पण्डित मोटेराम जी शास्त्री का मूल पाठ

पण्डित मोटेराम जी शास्त्री को कोन नही जानता! आप अधिकारियों का रूख देखकर काम करते है। स्वदेशी आन्दोलनों के दिनों मे अपने उस आन्दोलन का खूब विरोध किया था। स्वराज्य आन्दोलन के दिनों मे भी अपने अधिकारियों से राजभक्ति की सनद हासिल की थी। मगर जब इतनी उछल-कूद पर उनकी तकदीर की मीठी नींद न टूटी, ओर अध्यापन कार्य से पिण्ड न छूटा, तो अन्त मे अपनी एक नई तदबीर सोची। घर जाकर धर्मपत्नी जी से बोले -- इन बूढ़े तोतों को रटाते-रटातें मेरी खोपड़ी पच्ची हुई जाती है। इतने दिनों विद्या-दान देने का क्‍या फल मिला जो ओर आगे कुछ मिलने की आशा करूँ।

धर्मपत्ली ने चिन्तित होकर कहा -- भोजन का भी तो कोई सहारा चाहिए।

मोटेराम -- तुम्हें जब देखो, पेट ही की फ्रिक पड़ी रहती हे। कोई ऐसा विरला ही दिन जाता होगा कि निमन्त्रण न मिलते हो, ओर चाहे कोई निन्दा करें, पर मै परोसा लिये बिना नहीं आता हूँ। आज ही सब यजमान मेरे जाते हे? मगर जन्म-भर पेट ही

जिलाया तो कया किया। संसार का कुछ सुख भी तो भोगन चाहिए। मेने वेद्य बनने का निश्चय किया हे।

स्त्री ने आश्चर्य से कहा - वेद्य बनोगे, कुछ वेद्यकी पढ़ी भी हे?

मोटे-वेद्यक पढने से कुछ नही होता, संसार मे विद्या का इतना महत्व नही जितना बुद्धि क। दो-चार सीधे-सादे लटके है, बस ओर कुछ नही। आज ही अपने नाम के आगे भिषगाचार्य बढ़ा लूँगा, कौन पूछने आता हे, तुम भिषगाचार्य हो या नही। किसी को क्या गरज पड़ी हे जो मेरी परीक्षा लेता फिरे। एक मोटा-सा साइनबोर्ड बनवा लूँगा। उस पर शब्द लिखें होगे -- यहाँ स्त्री पुरुषों के गुप्त रोगों की चिकित्सा विशेष रूप से की जाती हे। दो-चार पेसे का हउ़-बहेड़ा-आवँला कुट छानकर रख लूँगा। बस, इस काम के लिए इतना सामान पर्याप्त है। हाँ,समाचारपत्रों मे विज्ञापन दूँगा ओर नोटिस बँटवाऊँगा। उसमें लंका, मद्रास, रंगून, कराची आदि दूरस्थ स्थानों के सज्जनों की चिट्टियाँ दर्ज की जाएँगी। ये मेरे चिकित्सा-कोशल के साक्षी होगें जनता को क्‍या पड़ी है कि वह इस बात का पता लगाती फिरे कि उन स्थानों मे इन नामों के मनुष्य रहते भी हे, या नहीं फिर देखों वेद्य की केसी चलती हे।

स्त्री -- लेकिन बिना जाने-बुझ दवा दोगे, तो फायदा क्‍या करेगी?

मोटे-फायदा न करेगी, मेरी बला से। वेद्य का काम दवा देना हे, वह मृत्यु को परस्त करने का ठेका नही लेता, ओर फिर जितने आदमी बीमार पड़ते हे, सभी तो नही मर जाते। मेरा यह कहना है कि जिन्हें कोई ओषधि नही दी जाती, वे विकार शान्त हो जाने पर ही अच्छे हो जाते है। वेद्यों को बिना माँगे यश मिलता है। पाच रोगियों मे एक भी अच्छा हो गया, तो उसका यश मुझे अवश्य ही मिलेगा। शेष चार जो मर गये, वे मेरी निन्‍दा करने थोडे ही आवेगें। मैने बहुत विचार करके देख लिया, इससे अच्छा कोई काम नही है। लेख लिखना मुझे आता ही हे, कवित्त बना ही लेता हूँ, पत्रों मे आयुर्वेद-महत्व पर दो-चार लेख लिख दूँगा, उनमें जहां-तहां दो-चार कवित्त भी जोड़ दूँगा और लिखूँगा भी जरा चटपटी भाषा मे। फिर देखों कितने उल्लू फँसते है यह न समझो कि मे इतने दिनो केवल बूढ़े तोते ही रटाता रहा हूँ। मे नगर के सफल वेद्यों की चालों का अवलोकन करता रहा हू और इतने दिनों के बाद मुझे उनकी सफलता के मूल-मंत्र का ज्ञान हुआ

है। ईश्वर ने चाहा तो एक दिन तुम सिर से पाँव तक सोने से लदी होगी।

स्त्री ने अपने मनोल्लास को दबाते हुए कहा -- मै इस उम्र मे भला क्‍या गहने पहनूगी,न अब वह अभिलाषा ही है, पर यह तो

बताओं कि तुम्हें दवाएँ बनानी भी तो नही आती, केसे बनाओगे, रस केसे बनेंगे, दवाओं को पहचानते भी तो नही हो।

मोटे -- प्रिये! तुम वास्तव मे बड़ी मूर्ख हो। अरे वेद्यों के लिए इन बातों मे से एक भी आवश्यकता नही, वेद्च की चुटकी की राख ही रस हे, भस्म है, रसायन है, बस आवश्यकता है कुछ ठाट- बाट की। एक बड़ा-सा कमरा चाहिए उसमें एक दरी हो, ताखों पर दस-पाँच शीशियाँ बोतल हो। इसके सिवा और कोई चीज दरकार नही, ओर सब कुछ बुद्धि आप ही आप कर लेती है। मेरे साहित्य-मिश्रित लेखों का बड़ा प्रभाव पड़ेगा, तुम देख लेना। अलंकारो का मुझे कितना ज्ञान है, यह तो तुम जानती ही हो। आज इस भूमण्डल पर मुझे ऐसा कोई नहीं दिखता जो अलंकारो के विषय मे मुझसे पेश पा सके। आखिर इतने दिनों घास तो नही खोदी हे! दस-पाँच आदमी तो कवि-चर्चा के नाते ही मेरे यहाँ आया जाया करेंगे। बस, वही मेरे दल्लाह होगें। उन्ही की मार्फत मेरे पास रोगी आवेंगे। मे आयुर्वेद-ज्ञान के बल पर नही नायिका- ज्ञान के बल पर धड़ल्ले से वेद्यक करूँगा, तुम देखती तो जाओ। स्त्री ने अविश्वास के भाव से कहा -- मुझे तो डर लगता है कि कही यह विद्यार्थी भी तुम्हीिरे हाथ से न जाए। न इधर के रहो ने उधर के। तुम्हारे भाग्य मे तो लड़के पढ़ाना लिखा हे, ओर चारों ओर से ठोकर खाकर फिर तुम्हें वी तोते रटाने पड़ेंगे।

मोटे -- तुम्हें मेरी योग्यता पर विश्वास क्‍यों नही आता?

स्त्री -- इसलिए कि तुम वहाँ भी धूर्तता करोगे। मे तुम्हारी धूर्तता से चिढ़ती हूँ। तुम जो कुछ नही हो और नही हो सकते,वक क्यो बनना चाहते हो? तुम लीडर न बन सके, न बन सके, सिर पटककर रह गये। तुम्हारी धूर्तता ही फलीभूत होती है ओर इसी से मुझे चिढ़ हे। मैं चाहती हूँ कि तुम भले आदमी बनकर रहो। निष्कपट जीवन व्यतीत करो। मगर तुम मेरी बात कब सुनते हो?

मोटे -- आखिर मेरा नायिका-ज्ञान कब काम आवेगा?

स्त्री -- किसी रईस की मुसाहिबी क्यो नही कर लेते? जहां दो- चार सुन्दर कवित्त सुना दोंगे। वह खुश हो जाएगा ओर कुछ न कुछ दे ही मारेगा। वेद्यक का ढोंग क्‍यों रचते हों!

मोटे -- मुझे ऐसे-ऐसे गुर मालूम है जो वेद्यों के बाप-दादों को भी न मालूम होगे। ओर सभी वेद्य एक-एक, दो-दो रुपये पर मारे-मारे फिरते है, में अपनी फीस पाँच रुपये रक्खूगा, उस पर सवारी का किराया अलग। लोग यही समझेंगे कि यह कोई बडे वेद्य हे नही तो इतनी फीस क्‍यों होती?

स्त्री को अबकी कुछ विश्वास आया बोली -- इतनी देर मे तुमने एक बात मतलब की कही है। मगर यह समझ लो, यहाँ तुम्हारा रंग न जमेगा, किसी दूसरे शहर को चलना पड़ेगा।

मोटे -- (हँसकर) क्‍या मे इतना भी नही जानता। लखनऊ मे अड्डा जमेगा अपना। साल-भर मे वह धाक बाँध दूँ कि सारे वेद्य गर्द हो जाएँ। मुझे और भी कितने ही मन्त्र आते है। मे रोगी को दो-तीन बार देखे बिना उसकी चिकित्सा ही न करूँगा। कहूँगा, मै जब तक रोगी की प्रकृति को भली भांति पहचान न लूँ, उसकी दवा नही कर सकता। बोलो, केसी रहेगी?

स्त्री की बाँलें खिल गई, बोली -- अब मे तुम्हें मान गई, अवश्य चलेगी तुम्हारी वेद्यकी, अब मुझे कोई संदेह नही रहा। मगर गरीबों के साथ यह मंत्र न चलाना नही तो धोखा खाओगे।

साल भर गुजर गया।

भिषगाचार्य पण्डित मोटेराम जी शास्त्री की लखनऊ मे घूम मच गई। अलंकारों का ज्ञान तो उन्हे था ही, कुछ गा-बजा भी लेते

थे। उस पर गुप्त रोगों के विशेषज्ञ, रसिकों के भाग्य जागें। पण्डित जी उन्हें कबित सुनाते, हँसते, और बलकारक ओषधियाँ खिलाते, ओर वह रईसों मे, जिन्हें पुष्टिकारक ओषधियों की विशेष चाह रहती है, उनकी तारीफों के पुल बाँधते। साल ही भर मे वेद्यनी का वह रंग जमा, कि बायद व शायद गुप्त रोगों के चिकित्सक लखनऊ मे एकमात्र वही थे। गुप्त रूप से चिकित्सा भी करते। विलासिनी विधवारानियों ओर शोकीन अदूरदर्शी रईसों मे आपकी खूब पूजा होने लगी। किसी को अपने सामने समझते ही नथे।

मगर स्त्री उन्हे बराबर समझाया करती कि रानियों के झमेलें मे न फँसों, नहीं कई दिन पछताओगे।

मगर भावी तो होकर ही रहती है, कोई लाख समझाये-बुझाये। पंडितजी के उपासकों मे बिड़हल की रानी भी थी। राजा साहब का स्वर्गवास हो चुका था, रानी साहिबा न जाने किस जीर्ण रोग से ग्रस्त थी। पण्डितजी उनके यहाँ दिन मे पाँच-पाँच बार जाते। रानी साहिबा उन्हें एक क्षण के लिए भी देर हो जाती तो बेचेन हो जाती, एक मोटर नित्य उनके द्वार पर खड़ी रहती थी। अब पण्डित जी ने खूब केंचुल बदली थी। तंजेब की अचकन पहनते, बनारसी साफा बाधते ओर पम्प जूता डाटते थे। मित्रगण भी उनके साथ मोटर पर बेठकर दनदनाया करते थे। कई मित्रों को

रानी साहिबा के दरबार मे नोकर रखा दिया। रानी साहिबा भला अपने मसीहा की बात केसी टालती।

मगर चर्खे जफाकार ओर ही षडयन्त्र रच रहा था।

एक दिन पण्डितजी रानी साहिबा की गोरी-गोरी कलाई पर एक हाथ रखे नब्ज देख रहे थे, ओर दूसरे हाथ से उनके हृदय की गति की परीक्षा कर रहे थे कि इतने मे कई आदमी सोटे लिए हुए कमरे मे घुस आये ओर पण्डितजी पर टूट पड़े। रानी भागकर दूसरे कमरे की शरण ली ओर किवाड़ बन्द कर लिए। पण्डितजी पर बेभाव पड़ने लगे। यों तो पण्डितजी भी दमखम के आदमी थे, एक गुप्ती सदेव साथ रखते थे। पर जब धोखे मे कई आदमियों ने धर दबाया तो क्या करते? कभी इसका पेकर पकड़ते कभी उसका। हाय-हाय! का शब्द मुँह से निकल रहा था पर उन बेरहमों को उन पर जरा भी दया न आती थी,एक आदम ने एक लात जमाकर कहा -- इस दुष्ट की नाक काट लो।

दूसरा बोला -- इसके मुँह मे कालिख ओर चूना लगाकर छोड़ दो।

तीसरा -- क्‍यों वेद्यजी महाराज, बोलो क्या मंजूर हे? नाक कटवाओगे या मुँह मे कालिख लगवाओगें?

पण्डित -- भूलकर भी नही सरकार। हाय मर गया!

दूसरा -- आज ही लखनऊ से रफरेट हो जाओं नही तो बुरा होगा।

पण्डित -- सरकार मे आज ही चला जाऊँगा। जनेऊ की शपथ खाकर कहता हूँ। आप यहाँ मेरी सूरत न देखेंगे।

तीसरा -- अच्छा भाई, सब कोई इसे पाँच-पाँच लाते लगाकर छोड़ दो।

पण्डित -- अरे सरकार, मर जाऊँगा, दया करो

चोथा -- तुम जेसे पा्खंडियो का मर जाना ही अच्छा है। हाँ तो शुरू हो।

पंचलत्ती पड़ने लगी, धमाधम की आवाजें आने लगी। मालूम होता था नगाड़े पर चोट पड़ रही हे। हर धमाके के बाद एक बार हाय की आवाज निकल आती थी, मानों उसकी प्रतिध्वनि हो।

पंचलत्ती पूजा समाप्त हो जाने पर लोगों ने मोटेराम जी को घसीटकर बाहर निकाला ओर मोटर पर बेठाकर घर भेज दिया, चलते-चलते चेतावनी दे दी, कि प्रातःकाल से पहले भाग खड़े होना, नही तो ओर ही इलाज किया जाएगा।

मोटेराम जी लंगड़ाते, कराहते, लकड़ी टेकते घर मे गए और धम से गिर पड़े चारपाई पर गिर पड़े। स्त्री ने घबराकर पूछा -- केसा जी हे? अरे तुम्हारा क्या हाल हे? हाय-हाय यह तुम्हारा चेहरा केसा हो गया!

मोटे -- हाय भगवान, मर गया।

स्त्री -- कहाँ दर्द है? इसी मारे कहती थी, बहुत रबड़ी न खाओं। लवणभास्कर ले आऊँ?

मोटे -- हाय, दुष्टों ने मार डाला। उसी चाण्डालिनी के कारण मेरी दुर्गति हुई। मारते-मारते सबों ने भुरकुस निकाल दिया। स्‍त्री -- तो यह कहो कि पिटकर आये हो। हाँ,पिटे हो। अच्छा हुआ। हो तुम लातों ही के देवता। कहती थी कि रानी के यहाँ मत आया-जाया करो। मगर तुम कब सुनते थे।

मोटे -- हाय, हाय! राँड, तुझे भी इसी दम कोसने की सूझी। मेरा तो बुरा हाल है और तू कोस रही है। किसी से कह दे, ठेला-वेला लावे, रातों-रात लखनऊ से भाग जाना है। नहीं तो सबेरे प्राण न बचेंगे।

स्त्री -- नही, अभी तुम्हारा पेट नही भरा। अभी कुछ दिन ओर यहाँ की हवा खाओ! केसे मजे से लड़के पढ़ाते थे, हाँ नही तो वेद्य बनने की सूझी। बहुत अच्छा हुआ, अब उम्र भर न भूलोगे। रानी कहाँ थी कि तुम पिटते रहे ओर उसने तुम्हारी रक्षा न की। पण्डित -- हाय, हाय वह चुड़ेल तो भाग गई। उसी के कारण। क्या जानता था कि यह हाल होगा, नहीं तो उसकी चिकित्सा ही क्यों करता?

स्त्री -- हो तुम तकदीर के खोटे। केसी वेद्यकी चल गई थी।

मगर तुम्हारी करतूतों ने सत्यानाश मार दिया। आखिर फिर वही पढोनी करना पड़ी। हो तकदीर के खोटे।

प्रातःकाल मोटेराम जी के द्वार पर ठेला खड़ा था ओर उस पर असबाब लद रहा था। मित्रों मे एक भी नजर न आता था। पण्डित जी पड़े कराह रहे थे ओर स्त्री सामान लद॒वा रही थी।


पण्डित मोटेराम जी शास्त्री का सारांश

'पण्डित मोटेराम जी शास्त्री' मुंशी प्रेमचंद की एक अत्यंत मनोरंजक और व्यंग्यात्मक कहानी है, जो समाज में फैले पाखंड, नीम-हकीमी (फर्जी वैद्यकी) और लालच पर आधारित है।

कहानी का मुख्य पात्र पंडित मोटेराम शास्त्री एक स्वार्थी और अवसरवादी अध्यापक है। वह स्वदेशी और स्वराज आंदोलनों के समय भी अपनी निष्ठा बदलकर अधिकारियों से वफादारी के प्रमाण-पत्र हासिल करता रहता है। जब अध्यापन कार्य से उसकी आर्थिक और सामाजिक तरक्की नहीं होती, तो वह बच्चों को पढ़ाने (तोते रटाने) से तंग आकर फर्जी वैद्य बनने की योजना बनाता है।

अपनी पत्नी के पूछने पर कि बिना आयुर्वेद पढ़े वैद्य कैसे बनोगे, मोटेराम तर्क देता है कि दुनिया में विद्या से ज्यादा बुद्धि और ढोंग का महत्व है। वह 'भिषगाचार्य' की उपाधि अपनाकर, गुप्त रोगों के इलाज का बड़ा साइनबोर्ड लगाकर, हरड़-बहेड़ा-आँवला कूटकर और अखबारों में दूर-दराज के शहरों (रंगून, लंका, मद्रास) के फर्जी प्रशंसा-पत्र छपवाकर लोगों को ठगने की योजना बनाता है। वह अपनी फीस भी साधारण वैद्यों से अधिक (पाँच रुपये) रखता है ताकि लोग उसे बहुत बड़ा वैद्य समझें।

मोटेराम लखनऊ में अपना अड्डा जमाता है। वहाँ वह अपनी काव्य-कला, अलंकारों के ज्ञान और कामोद्दीपक ओषधियों के बल पर अमीर रईसों और विलासी विधवा रानियों को अपना शिकार बनाता है। एक ही साल में उसकी वैद्यकी की खूब धाक जम जाती है। वह बनारसी साफा, तंजेब की अचकन और पम्प जूता पहनकर मोटर पर घूमने लगता है और अपने दोस्तों को भी रानियों के यहाँ नौकर रखवा देता है।

इसी बीच वह 'बिड़हल की रानी' के इलाज के सिलसिले में दिन में पाँच-पाँच बार उसके महल जाने लगता है। उसकी पत्नी उसे रानियों के चक्कर में न पड़ने की चेतावनी देती है, लेकिन मोटेराम नहीं मानता। एक दिन जब मोटेराम रानी की कलाई पकड़कर नब्ज़ देख रहा होता है और हृदय की गति जाँच रहा होता है, तभी कुछ लाठीधारी लोग कमरे में घुस आते हैं। रानी तो दूसरे कमरे में छिप जाती है, लेकिन वे लोग मोटेराम की जमकर धुनाई (पंचलत्ती पूजा) करते हैं।

वे मोटेराम को मुँह में कालिख लगाने और नाक काटने की धमकी देते हैं। मोटेराम जनेऊ की कसम खाकर रात ही रात लखनऊ छोड़कर भागने का वादा करता है। मार खाकर कराहता हुआ मोटेराम घर पहुँचता है। उसकी पत्नी उसे उसकी करतूतों के लिए फटकारती है। अंततः सुबह होने से पहले मोटेराम ठेले पर अपना सामान लदवाकर लखनऊ से रफूचक्कर हो जाता है और उसे दोबारा वही बच्चों को तोते रटाने की अध्यापकी पर लौटने के लिए मजबूर होना पड़ता है।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • चिकित्सा क्षेत्र में पाखंड और ठगी पर प्रहार: कहानी में प्रेमचंद ने फर्जी वैद्यों (नीम-हकीमों) के ढोंग, विज्ञापनों के आडंबर और जनता को ठगने के नुस्खों को हास्य और व्यंग्य के साथ बेनकाब किया है।
  • अवसरवादिता और स्वार्थपरता: मोटेराम का चरित्र उस प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है जो सिद्धांतों को ताक पर रखकर केवल व्यक्तिगत लाभ और आराम पाने के लिए किसी भी हद तक ढोंग रचने को तैयार रहती है।
  • उच्च वर्ग की विलासिता और अंधविश्वास: कहानी यह दर्शाती है कि समाज का अमीर और विलासी वर्ग गुप्त रोगों और कामोद्दीपक दवाओं के नाम पर फर्जी चिकित्सकों और ठगों के झांसे में कितनी आसानी से आ जाता है।
  • हास्य-व्यंग्य और भाषा-शैली: प्रेमचंद ने कथा में मोटेराम की धूर्तता और उसके पतन का चित्रण इतने सजीव और व्यंग्यात्मक ढंग से किया है कि पाठक हँसते-हँसाते सामाजिक विद्रूपताओं को समझ जाता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'पण्डित मोटेराम जी शास्त्री' समाज में बिना योग्यता के केवल वाकपटुता और ढोंग के बल पर सफलता पाने की चेष्टा करने वालों के अंत और उनके नैतिक पतन का एक यथार्थवादी, व्यंग्यात्मक खाका प्रस्तुत करती है।

इस रचना को उद्धृत करें

शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "पण्डित मोटेराम जी शास्त्री." *Munshi Premchand Digital Archive*, https://munshipremchand.com/works/short-stories/pandit-moteram-ji-shastri. Accessed 22 Sep. 2026.