Cover Image for Khauf-e-Ruswai (खौफे-रुसवाई) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1911•33 मिनट

खौफे-रुसवाई

Khauf-e-Ruswai

प्रेमचंद की कहानी 'खौफे-रुसवाई' (बदनामी का डर) प्रेम, वैवाहिक विश्वास, सामाजिक बदनामी और राजनीतिक संदेह के बीच के संघर्ष को प्रस्तुत करती है। सरला और धीरेन चौधरी के माध्यम से कहानी दिखाती है कि प्रतिष्ठा बचाने का डर किस तरह रिश्तों, रहस्यों और नैतिक निर्णयों को प्रभावित करता है।

पात्र:सरला, धीरेन चौधरी, जोतिन्द्र सेन
स्थान:कलकत्ता; धीरेन चौधरी का घर, पुलिस-जांच और हिरासत का परिवेश

खौफे-रुसवाई का मूल पाठ

एक आरास्ता व पैरास्त (पूर्ण सुसज्जित) कमरे में एक नाजुक-अंदाम (कृशांग) नफीसपोश (सुन्दर वस्त्र पहने) औरत मेज के सामने रुखसारों (कपोलों) पर हाथ रखे बैठी है। वह किसी गहरे खयाल में गर्क (निमग्न) है, मगर जाहिरा इस ख़याल में गौर की महवियत (तल्लीनता) नहीं है, बल्कि बेचैनी और इंतशार (परेशानी) इजतराब (बेचैनी) और घबराहट के आसार (चिन्ह) उसके हसीन चेहरे पर नमूदार (प्रकट) है।

सरला बाबू धीरेन चौधरी की बीवी है। धीरेन कलकत्ते के एक होनहार बैरिस्टर थे। खलीक (सज्जन) और गरीबनवाज (निर्धनों का सहायक), फैशनेबिल सोसाइटी से मोहतरीज रहने वाला (बचने वाला), न बॉल से रगबत (रुचि), न घुड़दौड़ के शैदा (आसकत, आशिक)। वह थियेटरों और पोलिटिकल जलसों में बहुत कम शरीक होते । उनके औकात का बेशतर हिस्सा (अधिकतर समय) अपने मुकदमात की तहकीक व ततबीक (जाँच पड़ताल) में सर्फ (व्यतीत) होता था। उनके दोस्तों का हल्का निहायत महदूद (सीमित) था, जहाँ तकल्लुफ और जाहिरदारी (ऊपरी दिखावट, आडम्बर) के बदले खुलूस (सरलता) और दोस्तों के मरासिम (रस्में) बरते जाते थे। धीरेन को फैशन से इन्तहा दर्जे की नफ़रत थी। बावजूद इसके कि कलकत्ते का हर एक गोशा (कोना) पोलिटिकल ख़बरों से गूँज रहा था, मगर धीरेन को उनसे सिर्फ इतनी हमदर्दी थी कि अखबारों में उनका तजकरा (चर्चा) देख लिया करता था। पोलिटिक्स से उसे मुनासिबत (लगाव), न थी। वह अपने दोस्तों में एक सीधा सलीम उत्तबा (प्रसन्‍नचित्त) आदमी मशहूर था। इसके बरअक्श (विपरीत) सरला नेशनलिस्ट अकायद (विश्वासों) की औरत थी। उसने आला दर्जे की अंगरेजी तालीम पायी थी। और हिन्दुस्तान के पोलिटिकल और इक्तिसादी (आर्थिक) मामलात से उसे बहुत ज्यादा दिलचस्पी थी। एक बार वह अपने कॉलेज की लेडी प्रिंसिपल से सिर्फ़ इस बिना पर झगड़ पड़ी कि लेडी साहिबा ने बरसबील तजकरा (चर्चा चलने पर) हिन्दुस्तानी औरत के मुतल्लिक जंबान से कुछ इहानत-आमेज (अपमानजनक) कलमात (शब्द) निकाले थे। आजादी-ए-निस्वाँ (नारी-स्वातंत्र) के मुताल्िक भी इसके ख़यालात बहुत पसीं (दृढ़ , अंतिम) थे। बावजूद इन असबाब के वह हिन्दुस्तानी मुहब्बत और जज्बात की औरत थी। वजा (रीति) की पाबंद, शौहर की अदब और मुहब्बत करने वाली।

सरला सोचती थी, “क्या यह मुमकिन है ? उन्हें इन मुआमलात (विषयों, बातों) से मुतलक (जरा भी) दिलचस्पी न थी। यह सब किसी बदख्वाह (अहित-चिंतक) की शरारत है। किसी सियाहबातिन (कलुषमना, पापात्मा) शख्स ने यह दरोग (झूठ) इख्तिराअ (आविष्कार, ईजाद) किया है। ऐसा हरगिज मुमकिन नहीं।”


2

हक़ीक़त यह थी कि आज पुलिस सुपररिटेंडेंट ने कई कांस्टेविलों के साथ धीरेन बाबू के मकान की तलाशी ली थी। मंगल के रोज़ चार बजे शाम को हैरीसन रोड के किनारे एक नौजवान बंगाली ने एक अंगरेज अफ़सर पर बमगोला चलाया धा। इस हौलनाक (भयानक) हादसे ने सारे शहर में खलबली डाल दी थी। खाना-तलाशियों की गर्मबाजारी थी और सबसे अचम्भे की बात यह थी कि धीरेन बाबू पर कत्ल की अयानत (प्रगट) करने का जुर्म लगाया गया था। जो शख्स सुनता उसे हैरत होती। धीरेन बाबू ! नहीं, वह हरगिज ऐसे मुआमलों में शरीक उर्श हो सकते। वह ऐसे सीधे-सादे, सलामत-पंसद, अपने काम में शवे-रोज (दिन-रात) महव (तल्लीन) रहने वाले आदमी थे कि किसी को उनकी मुताल्लिक ऐसी मुतवहिदृश (भयानक) ख़बर सुनकर एतबार नहीं आता था और धीरेन बाबू पर यह सुबहा एक मुखबिर के बयान की बदौलत आयद (लागू) हुआ था। मुखबिर ने साफ़-साफ़ कहा था कि मंगल को चार बजे धीरेन बाबू हैरीसन रोड पर मौजूद थे और उन्होंने कातिल को अपने हाथ से बमगोला दिया था। इसी बयान की बदौलत आज धीरेन बाबू की खाना-तलाशी हुई | सन्दूक, अल्मारिया, कागजात, खुतूत एक भी तफ़्तीश-कुनंदा (जाँच-पड़ताल करने वाला) अफ़सर की मुंतजस (चतुर) निगाहों से न बचा और बावजूद कि कोई सबूत ऐसा न मिला जिससे धीरेन बाबू पर आनत-जुर्म के शुबहा की ताईद (पुष्टि) हो सके। ताहम सुपरिटेंडेंट ने उन्हें जेरे-.हिरासत (कैद में) ले लिया।

सरला इन्हीं परेशान करने वाले वाकिआत के असर से इस वक्त देचैन है। वह खयाल करती थी-'“जरूर सुपर्रिटेंडेंट पुलिस से गलती हुई। उसने धोखा खाया, मंगल को चार बजे धीरेन अदालत से होंगे। अदालत में इसका सबूत मिल सकता है। उनके मुवक्किल और अहबाब (मित्र, दोस्त) इसकी तसदीक कर सकते हैं, मगर धीरेन ने सुपर्रिटेंडेंट पुलिस के रू-ब-रू (सामने) अपनी बरीयत (रिहाई) का सबूत क्‍यों न दे दिया। मुमकिन है उस वक्‍त घबराहट में उन्हें ख़याल न रहा हो । अब जरूर उन्होंने सफाई कर ली होगी और गालिबन आते ही होंगे।

इन ख़यालत से सरला का दिल जरा हल्का हुआ। इसी अस्नाय (बीच) में एक मोटरकार दरवाजे पर आकर रुकी | सरला का कलेजा धड़कने लगा। वह मसर्रत से बेताब होकर जीने से नीचे उतरी। मोटर घर ही का था, मगर इसमें धीरेन बाबू की बजाय जोतिन्द्र सेन बैठे थे जो धीरेन के दिली-दोस्तों में थे।

सरला ने पूछा, “धीरेन कहाँ हैं ? देखा पुलिस वालों ने कैसी हिमाकत की है। तुम जानते हो मंगल के दिन शाम के वक्‍त वह हाईकोर्ट में थे। क्यों, सफाई हो गई ना ? कब तक आएँगे ? तुम उनसे मिले थे ?”

जोतिन्द्र के चेहरे ने सरला के खयाल की ताईद नहीं की। वह फिक्रमंद और दर्दनाक निगाहों से सरला की तरफ देख रहे थे। सरला ने घबराकर कहा, “जोतिन, तुम इस क़दर परेशान क्‍यों हो ? साफ-साफ क्‍यों नहीं कहते ?””

जोतिन ने कुछ सोचकर कहा, “शायद धीरेन आज शब (शत) को न आ सकें। मुमकिन है, कुछ तवक्कुफ़ (विलम्ब) हो। ज्यों ही उनकी सफाई होगी, गालिबन उनका तुमते मिलना जरूरी है। मैं ख़याल करता हूँ....!” यह कहते-कहते जोतिन वाबू रुक गये। सरला ताड़ गई कि यह कोई मनहूस ख़बर लाये हैं। घबराकर बोली, “जोतिन, मुझसे इस वक्‍त पहेलियाँ मत बुझाओ, जो कुछ कहना हो साफ़ साफ़ कहो। मुझमें अब वरदाश्त करने की ताक़त नहीं है। क्या धीरेन अभी रिहा न हो सकेंगे ? क्‍या उन्होंने अपने वरीयत (रिहाई) के सबूत में यह नहीं कहा कि दह मंगल को चार बजे अदालत में थे? मेरे खयाल में यह तो बहुत काफी सबूत था।"

जोतिन्द्र ने लम्बी साँस लेकर कहा, “मंगल के दिन से पहर (तीसरे पहर) को वह अदालत में नहीं थे।'

सरला, “क्या ! अदालत में नहीं थे। आखिर तब कहाँ थे ?”

जोतिन्द्र “यही तो वह बतलाते नहीं।'

सरला, “क्यों, आखिर वजह ? क्‍या आप ही अपने दुश्मन हुए हैं ?”

जोतिन्द्र, “वह मुतलक कुछ नहीं जाहिर करते। अदालत में उनके दो वजे तक रहने का सबूत मिलता है। यह भी साबित होता है कि वह एक किराये की गाड़ी में बैठकर कहीं गये, मगर कहाँ गये थे और तीन बजे से छः बजे तक कहाँ रहे, इसका कुछ पता नहीं देते ।' “ सरला ने आलमे-बहशत (घवरायी हुई अवस्था) में सिर को हाथों से थामकर कहा, “मेरी अक्ल कुछ काम नहीं करती। धीरेन को क्‍या हो गया है ? यह गैर-मुमकिन है कि वह इस साजिश में शरीक हों। अगर वह खुद अपनी जवान से कहें तब भी मुझे एतवार नहीं आ सकता। मगर वह साफ़-साफ़ हक़ीक़ते-हाल क्‍यों नहीं कहते ? कया तुम लोगों ने उन्हें नहीं समझाया ?”

जोतिन्द्र, “समझाया क्‍यों नहीं, घंटों बैठे सरमगजनी (माथापच्ची) करते रहे, मगर जब कुछ उनके ख़याल में आये, और ऐसे कम फहम (अल्पज्ञ) नहीं हैं कि हमको उनके समझाने की ज़रूरत हो। क्‍या वह नहीं जानते कि यह ऐसे नाजुक मौके पर उनका साफ़-साफ़ न कहना कैसे ख़तरनाक नताइज (परिणाम) पैदा करेगा, मगर इत्ष वक्‍त वह किसी की नहीं सुनते । कहते हैं, “बला से, मैं चन्द सालों के लिए ज्लावतन (देश-निष्कासित) हो जाऊंगा। जलावतनी और कैद झेलने के लिए आमादा हैं। मगर मंगल को कहाँ थे, यह नहीं बताते। इसलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ कि शायद कुछ तुम्हें मालूम हो ! कुछ मालूम है ? वह ज़्यादातर कहाँ आते-जाते हैं ?”

सरला ने सिर हिलाकर जवाब दिया, “मैंने उन्हें कहीं आते-जाते नहीं देखा। मैं तो अब तक इसी ख़याल से खुश थी कि मंगल को चार बजे वह जरूर कचरहरी में रहे होंगे। मेरी समझ में कुछ नहीं आता। आखिर वह क्यों ख़ामोश हैं ? क्या समझे हुए हैं ? जरा मुझे उनके पास ले चलो। शायद वह मुझसे कुछ अपने दिल की बात कहें। जरूर कहेंगे, मैं उन्हें समझाऊँगी। मुझे यक्रीन है कि मैं उनकी जबान से हक़ीक़ते-हाल सुन लूंगी। वह मेरी दरख़्वास्त को रद्द नहीं कर सकते। बस मुझे उनके पास ले चलो ।”

सरला का गला भर आया। जोतिद्र तस्कीन-दह (तसल्ली देने वाले) लहजे में बोले, “मेरा भी यही खयाल है कि शायद तुमसे वह कुछ बतलायें। इसीलिए मैं तुम्हारे पास आया था, मगर अब रात ज्यादा हो गई है और इस वक्‍त उनकी मुलाक़ात करने की कोशिश फिजूल है। मजिस्ट्रेट की इजाजत मिलनी मुश्किल होगी। मैं कल तुम्हें वहाँ ले चलूँगा। ईश्वर ने चाहा तो सब अच्छा ही होगा। हाय, यह क्‍या ? दिल को ढारस दो, घबराने की कोई बात नहीं है।”

सरला की आँखों में अश्क उमड़े हुए थे, मगर उसने जब्त किया और जोतिन से हाथ मिलाते हुए बोली, “जोतिन, तुम्हारी इन इनायतों का शुक्रिया अदा करने के लिए मेरी जबान में अल्फ़ाज नहीं हैं, मगर मैं इन्हें फरामोश (विस्मृत, भूला हुआ) नहीं कर सकती ।

सरला की आवाज फिर रुक गई। वह कैसी खुश-खुश जीने से उतरी थी। धीरेन की वापसी की उम्मीद ने उसक चंहर॑ को रोशन कर दिया था, मगर अब इस पर हसरती-यास (कामना व निराशा) की जर्दी (पीलापन) छायी हुई थी। जोतिन बाबू आहिस्ता-आहिस्ता फ़िक्रमन्द कमरे से बाहर चले गये। वह सोचते जाते थे-गरीब ! अभी उसे क्‍या खबर कि क्या बीतने वाली है। काश, वह जालिम अपनी जबान से कुछ कह देता, मगर तब भी अजीब गोमगो (अस्पष्ट, गोल बात) का मामला है।


3

दस बज गये थे। सरला ने कुछ नहीं खाया। निवाले मुँह से बाहर निकले आते थे। वह पलंग पर गई, मगर नींद न आयी थी। मेज के सामने अख़बार लेकर बैठी, मगर अख़बार हाथ में था और आँखें खिड़की की तरफ़ | तब वह उठकर टहलने लगी। उसका जी चाहता था कि इसी वक्त धीरेन के पास चलूँ। चलकर मजिस्ट्रेट से कहूँ कि मुझे उनसे मुलाक़ात करने दो। क्या वह इन्कार करेगा ?” हाय ! धीरेन इस वक्त क्या करते होंगे। काश, मैं उनके पहलू में होती ! क्या वह मुझसे भी अपने दिल का हाल छिपाएँगे ? क्या इस वक्‍त उन्हें मेरा ख़याल होगा ?” कभी-कभी उसका दिल झुँझलला उठता और वह अपने शौहर को बेरहम ख़याल करती। क्या उन्हें ख़बर नहीं कि मैं किस कदर बेचैन हूँ ! इतने दिनों तक साथ रहने पर भी उन्हें मेरे दिल का और मेरी मुहब्बत का अन्दाजा नहीं हुआ। वह क्‍यों खामोश हैं ? क्‍यों ?

टहलते-टहलते उसकी निगाह धीरेन की मेज पर पड़ी। खुतूत, कागजात, अख़बारात और औराक (पृष्ठ) परेशान की तरह पड़े हुए थे। सरला इज्तिराबी (विकलता, व्याकुलता) तौर पर बैठ गई और उन्हें समेटने लगी । यकायक उसकी निगाह एक कागज के टुकड़े पर पड़ी जो मेज के नीचे गिरा हुआ था। उसने चाहा कि उसे उठाकर दूसरे खुतूत के साथ रख दे, मगर उस पुर्जे पर चंद ऐसे अल्फ़ाज नजर आये जो खुद-ब-खुद उसकी आँखों में चुभ गये। वे अल्फ़ाज़ थे जिनके पर्दे में उसकी परेशानियों का राज पोशीदा (भेद छिपा हुआ) था। “मंगल के दिन चार बजे!-सरला चौंक पड़ी। उसने पुर्जे को उठा लिया। मंगल के दिन चार बजे ही का तो यह वाकया है। उसने इन अल्फ़ाज़ को फिर गौर से देखा। क्या इस पुर्जे का इस वाकियात से कोई तआल्लुक है ? क्यों, मैं न उसे पढ़ूँ, यह मुख्तसिर-सा ख़त था। अन्दाजे-तहरीर (लिखने के ढंग से) से वह मानूस (परिचित) मालूम होती थी। मगर ख़त को पढ़ूँ ? सरला बावजूद कि शौहर को दिलो-जान से चाहती थी, लेकिन अंग्रेजी तालीम के असर ने उसके दिल में यह खयाल कायम कर दिया था कि मुझे अपने शौहर के पोशीदा खुतूत पढ़ने में कोई मजाज (अधिकार) नहीं हैं। क्या मैं इस ख़त को पढ़ लूँ तो वह मुझसे नाराज होंगे? यक़्ीनन इससे इस मामलात पर कुछ न कुछ रोशनी पड़ेगी। इससे कोई ऐसी बात हरगिज नहीं हो सकती जो धीरेन मुझसे छिपाना चाहते हों । बिल्फर्ज (यह मानकर) इसमें कोई मुखफी (गुप्त) बात ही हो, ताहम मैं इस वक्‍त इसे पढ़ने की मुस्तहक (अधिकारी) हूँ। तहजीबे-जदीद (आधुनिक सभ्यता) की यह कैद ऐसे नाजुक मौक़ों पर अमल में नहीं आ सकती। क्या मुझे उनके राजदार बनने का कोई इस्तेहकाक (अधिकार) नहीं है ? मैं साबित कर दूंगी कि मेरे दित्र में भी बातें उसी तरह महफूज (सुरक्षित) रह सकती हैं, जिस तरह उनके दिल में।

उसने खत खोलकर देखा। यह एक मुख़्तसर (संक्षिप्तसा ख़त था। सरला एक निगाह में उसे पढ़ गई और उसे छसा मालूम हुआ, गोया मेरे बदन में जान नहीं है। वह पत्थर की मूरत की तरह बेहिस-ओ-हरकत (स्थिर) हो गई। उसकी उँगलियों के बीच में क़ागज का वह पुर्जा हवा के झोंकों से हिल रहा था और उसकी आँखें दीवार की तरफ गड़ी हुई थीं। उसका चेहरा खाक की तरह जर्द हो गया था। अज्व-ए-मफलूण ([प्राणहीन, बेजान) की तरह उसके दिल-दिमाग इस वक्‍त बेकार हो गये थे। खत का मजमून भी ख़याल में नहीं आता था। वह बहुत देर तक इसी तरह खामोश खड़ी रही। यकायक उसकी निगाहों के सामने से एक पर्दा-सा हट गया और सारी कैफ़ियत नजरों के सामने सूरत-पजीर (स्पष्ट) हो गई। उसने एक ठंडी साँस ली और कुर्सी पर गिर पड़ी। आह ! इस ख़ामोश के यह मायने हैं, इसलिए जबान पर मोहर लगी हुई है। खैर, अब मुझे क्या करना चाहिए ? सरला सोचने लगी-बेशक, यह ख़त धीरेन को इस इल्जाम से बरी कर देगा जो उन पर आयद (आरोपित) है। किसी एहतमाम (प्रयत्न) की जरूरत नहीं। मैं इसे मजिस्ट्रेट के सामने रख दूँगी। जरा-सी तहक़ीक़ात में सारे वाकियात खुल पड़ेंगे और धीरेन फ़ौरन रिहा हो जाएँगे, लेकिन उसके बाद फिर कैसे निभेगी ? क्या उसके बाद भी हम एक-दूसरे की मुहब्बत कर सकेंगे ?

उसे फिर ख़याल आया, क्‍या यह मुमकिन है कि मैं इस राज को इस तरह तश्ते-अज बाम (भेद प्रकट) कर दूँ, जिनके मुखफी (बम्ब की दुर्घटना) रखने के लिए धीरेन यह सब कुछ झेलने को तैयार थे, लेकिन क्या यह मुमकिन है कि मैं ख़ामोशी अज़्तियार कर लूँ और उन्हें इस इल्जाम का खामियाजा उठाने दूँ। जिससे वह बिल्कुल पाक हैं, उन्हें बचाना मेरा फ़र्ज है। आख़िर उसके दिल ने फैसला कर लिया। वह खिड़की की तरफ़ गई, बाहर झआँककर देखा। फिर अपने कमरे में आकर एक चादर ओढ़कर बाहर निकल पड़ी। नौकर-चाकर सब सो गये थे। गलियों में सन्‍नाटा छाया हुआ था। किसी ने उसे बाहर जाते नहीं देखा।

सरला क़दम बढ़ाते हुए थोड़ी देर में एक खूबसूरत मकान के सामने आकर रुकी। कमरे में लैम्प जल रहा था और एक औरत मेज पर बैठी हुई कुछ लिखती दिखाई देती थी। सरला को देखते ही उस औरत ने घबराकर पूछा, “सरला ! तुम यहाँ ? इतनी रात गये ! क्या मामला है ? क्या धीरेन बीमार तो नहीं हैं ?””

सरला ने मेज के सामने आकर कहा “क्या तुमने नहीं सुना कि धीरेन पर हादसा- ए-बम्ब (बम्ब की दुर्घटना) में शरीक होने का जुर्म आयद हुआ है ? मुखबिर का बयान है कि जिस वक्‍त कातिल के हाथ में बम्ब दिया गया था, उस वक्त धीरेन वहाँ मौजूद थे। यह मंगल के चार बजे दिन का वाकिया है। धीरेन का बयान है कि मुझे इन सोनहात (दुर्घटनाओं) का मुतलक (तनिक भी) इल्म नहीं और न उस वक्‍त मैं वहाँ था, लेकिन यह नहीं बताते कि उस वक्‍त थे कहाँ ? मैं तुमसे पूछती हूँ, मंगल के चार बजे शाम को वह कहाँ थे ?”

वह औरत चौंककर उठ खड़ी हुई। “मंगल के चार बजे! उस दिन तो वह.... ।” कुछ कहते-कहते रुक गई और बहुत मद्धिम लहजे में बोली, “क्यों, वह कुछ बताते नहीं क्या? सिवाय कचहरी के और कहाँ होंगे।”

सरला ने जवाब दिया, “नहीं, उस दिन वह अदालत में नहीं थे।” मगर जब्त हाथ से जाता रहा, उगल पड़ी, “और इस मामले में वह इसलिए ख़मोश हैं कि शायद इजहारे- हाल (स्थिति प्रकट करना) किसी के नामे-नेक (प्रतिष्ठा) पर धब्बा न लगा दे। अब मेरे सामने ऐसी भोली न बनो। में सब जान गयी हूँ। हाँ, मुझे सब कुछ मालूम हो गया है। यह देखो |” यह कहकर उसने वही ख़त मेज पर फेंक दिया।

उस औरत ने लपककर ख़त उठा लिया और उस पर उड़ती हुई निगाह डालकर किसी कदर बवाकाना (निडर) लहजे में बोली, “मुझे किसी का खौफ नहीं है। बेशक धीरेन को मुझसे मुहब्बत है। आज से नहीं, बहुत दिनों से।”

थोड़ी देर तक दोनों खामोश रहीं। तब सरला ने तहक्कुमाना (अधिकारपूर्ण) अन्दाज से कहा, “तो उन्हें बचा क्‍यों नहीं लेतीं ! इस ख़त को मजिस्ट्रेट के पास भेज दो और धीरेन फौरन छूट जाएँगे ।” यह कहकर वह लौट पड़ी और अपने खाना-ए-महजूं (शोकान्वित निवास) में चली आयी।

तड़का हो गया था और सरला की आँखें अभी नहीं झपकी थीं। उसे अब धीरेन की रिहाई की फिक्र न थी। उस फिक्र से अब वह आजाद हो गई थी, मगर जिन फिक्रों ने इस वक्‍त उसे घेरा था, वह उससे भी ज्यादा जॉक़न (प्राण घातक) थीं “थोड़ी देर में यहाँ आते होंगे। मुझसे मुलाक़ात होगी। कया मैं उनसे मिल सकूँगी ? अब मैं किस दावे पर, किस बिरते पर उनसे मिलूँगी ? जब यह मैं जानती हूँ कि उन्हें मुझसे न कभी मुहब्बत थी और न है, तो मैं कौन-सा-मुँह लेकर उनके सामने जाऊँगी। जब तक मैं उल्फत का ख्वाब देख रही थी, मुझे उन पर एतबार था। मगर अब आह ! अब मेरे लिए जिन्दगी में कया उम्मीद है ? मेरा दिल, मेरी जान, मेरी आरजुएँ, मेरी जिन्दगी की खुशियाँ सब उनकी जात से बाबिस्ता (संयुक्त, जुड़ी हुई) थीं। मुहब्बत से औरत का सुहाग कायम है, मेरा सुहाग अब कहाँ है ?”

सरला की आँखें खिड़की के बाहर सब्जा-जार (हरा-भरा मैदान) की ओर लगी हुई थीं, गोया वह मुस्तक़बिल (भविष्य) के बसीअ (विस्तृत) मैदान में क़दम बढ़ाती चली जाती है। उसके दिमाग में अब एहसास का माद्दा न रहा था। भूख और प्यास, नींद और तकान (थकान) ये ज़रूरतें उसे बिल्कुल महसूस न होती थीं। सुस्त रफ़्तार दिन चढ़ता जाता था और सरला वहीं खिड़की के सामने उन्हीं ख़यालों में डूबी हुई थी। धीरेन की अब तक कुछ ख़बर न थी, मगर सरला को उसकी ज़्यादा तशवीश (चिंता) न थी। वह अपने शौहर को हमेशा एक हलीम और मतीन (सहनशील और दृढ़) शख्स समझती रही। उसने बारहा उनसे उनकी बेनमकी (निर्मोहिता) और बेएतनाई (उदासीनता) की शिकायत की थी। मगर इस ख़याल से उसके दिल को तस्कीन हो गई थी कि उनकी तबीयत ऐसी मतीन वाके (सिद्ध) हुई है। वह समझती थी कि वह तब्अन्‌ (स्वभावतः) इजहारे-जज़्बात (भावा- भिव्यक्ति) से मोतरिज (एतराज करते) रहते हैं। वह उसकी ओर से हमेशा बेतअल्लुक़-से रहते थे। कुछ परवा नहीं थी कि वह कहाँ जाती है, कैसे रहती है, किन चीजों का शौक़ है। ऐसा शाज (कभी) ही कभी इत्तफ़ाक़ हुआ था कि वह दुर्गा-पूजा के दिन सरला के लिए कोई तोहफ़ा लाये हैं। सरला समझती थी कि मुक़द्दगात की मसरूफ़ियत इन बेएतनाइयों (उदासीनताओं) का बाइस (कारण) है। उसे यक्रीन था कि गो जाहिर न सही मगर दिल से वह मेरी मुहब्बत करते हैं। मगर अब इन सर्द-मेहरियों (निर्दयताओं) का राज समझ में आ गया। वह अब दूसरी औरत के दामे-मुहब्बत (प्रेम-पाश) में गिरफ़्तार हैं। जब मुहब्बत का रिश्ता न रहा तो तमददनी रिश्ता (सभ्यता का संबंध) किस काम का। मगरबावजूद इन सर्द मेहरियों के वह शौहर की मुहब्बत में मखमूर (मतवाली) थी। उसने उन्हें अपने दिल में जगह दे दी थी और अब किसी तरह हटा नहीं सकती थी, ख्वाह वह मुहब्बत उसके लिए सोहाने-रूह (आत्मा को काटने वाली) ही क्‍यों न हो। बेशक यह ख़यालात हसद (ईर्ष्य) और जलन के सबब से पैदा हुए थे, मगर हसद की तेजी और जॉकाही (हृदय-द्रावकता) मुहब्बत की कसौटी है।

बहुत देर तक सोचने के बाद सरला इस नतीजे पर पहुँची-“में अब इनका दामन छोड़ दूँगी। इसके सिवा मेरे लिए अब और कोई तदबीर नहीं है। मैंने अब तक नादानिस्ता (अनजाने में) उन्हें क़ैदे-जब्र (बलपूर्वक बन्धन में रखना) में रखा है। अब मैं उन्हें छोड़ दूँगी। उनका गला छूट जायेगा। उनकी जिन्दगी आराम से गुजरेगी। ईश्वर करे वह हमेशा खुश रहें, सरसब्ज (प्रसन्‍न एवं सन्तुष्ट) हों। उन्हें खुश देखकर मैं भी खुश हो लिया करूँगी |”

इन्हीं ख़यालत में दस बज गये। सरला अब तक वहीं बैठी हुई थी। यकायक एक गाड़ी की आवाज उसके कानों में आयी। उसने खिड़की से झाँककर देखा, धीरेन बैठे हुए थे। सरला का कलेजा धड़कने लगा, मगर वह बेजान लावा की तरह बैठी रही। जीने पर क़दमों की आवाज सुनाई दी और जरा देर में धीरेन कमरे में दाखिल हुए। सरला अब भी कुछ न बोली। उसे अल्फ़ाज़ ही न मिले। धीरेन ने उसके पास आकर आगोशे-मुहब्बत (प्रेमालिंगन) में लेना चाहा और बोले, “क्यों सरला, तुम मेरी खातिर बहुत परेशान थीं।”

सरला ने मुँह फेर लिया और हट गई। धीरेन ने कुछ ख़याल न किया। कहने लगे, “पुलिस वालों ने कैसी हिमाक़त की ! खैर, जो कुछ हुआ, वह हुआ । किसी तरह खाना-ए- आफ़ियत (चैन की जगह) में तो पहुँचे। रात भर मुसीबत में मुब्तिला (फंसे) रहा ।”

सरला खामोश उनके चेहरे की तरफ़ ताकती रही। कैसी मक्र (धोखे) की बातें हैं। धीरेन के बर्ताब में कोई फ़र्क न था। वही बेतकल्लुफी, वही आज़ादी गोया कुछ हुआ ही नहीं। सरला ज्यादा मुतहम्मिल (सहनशील) न हो सकी। तरूश (कठोर) लहतले में बोली, “तुम यहाँ क्‍यों आये हो ?”

धीरेन ने तआज्जुब-आमेज (आश्चर्यजनक) लहजे में कहा, “सरला, यह कैसी बातें करती हो। अपने घर के सिवा और कहाँ जाता। तुम मेरे आने से खुश नहीं मालूम होती हो। क्यों, क्या बात हुई ?”

सरला, “अभी उनसे मुलाक़ात की या नहीं ?”

धीरेन, “किससे ? तुम्हारा मतलब मैं नहीं समझा |”

सरला, “धीरेन, अब यह तजाहुल (जानकर अनजान बनना) मत जताओ। अब हीला-साजियों (चालाकियों) का मौक़ा नहीं है। बेहतर है कि हममें सफाई के साथ गुफ़्तगू हो जाये। मुझ पर तुम्हारी सारी बातें रोशन हो गयी हैं। एक ख़त मेरी नजर से गुजर चुका है, जो मुझे मेज के नीचे गिरा हुआ मिला। यह ख़त मैंने तुम्हारी माशूका को दिखाया और गालिबन उसने उसे मजिस्ट्रेट के यहाँ पेश कर दिया। इसलिए अब मुझसे दगल-फसल (छल-कपट) करने की जरूरत नहीं। मैं तुम्हारी खुशी में मुख़िल (बाधक) नहीं होना चाहती। मैं तुम्हें शौक़ से लुत्फे-जिन्दगी (जीवन-सुख) उठाने के लिए आजादी देती हूँ। मुझे अफ़सोस है कि यह बातें मुझे और पहले क्‍यों न मालूम हो गई वरना तुम्हें इतने अरसे तक क़रैदे बेजा (अनुचित बन्धन) में न रहना पड़ता ।”

धीरेन बगलें झौँकने लगा। आखिर राज तशत-अज-बाम (भेद खुलना) हो गया। मैंने क्या हिमाक़त की कि जो खृत को चाक न कर दिया। उसने वह ख़त मजिस्ट्रेट के यहाँ देखा था और हाफिजे (स्मरण-शक्ति) पर बार-बार जोर डालता था कि क्‍यों कर यहाँ पहुँचा। मगर याद ने कुछ काम न दिया। अब हक़ीक़त मालूम हुई और वह अपने ऊपर झुँअलाया, मगर सरला की खुशामद करने लगा, “'मेरी जान ! मैं सख्त नादिम (लज्जित) हूँ, वाकई मुझे सख्त नदामत (लज्जा) है, मगर क्‍या तुम मेरी इस खता को मुआफ़ नहीं कर सकतीं ? अगर किसी के कान में इसकी ज़रा भी भनक पड़ गई तो मेरी खैर नहीं। अभी तक यह भेद छिपा हुआ है। मजिस्ट्रेट बड़ा दाना सख्स (बुद्धिमान व्यक्ति) है। उसने खत को देखकर मुझे तो रिहा कर दिया, मगर उसे अदालत में पेश नहीं किया। अभी तक यह राज सरबस्ता (गुप्त) है, मगर तुम खूब जानती हो कि लोगो को ऐसी बातों की क्‍यों कर तलाश रहती है। पब्लिक को दूसरों की रुसवाई और बदनामी में मज़ा आता है। मेरी ख़ातिर से तुम इस तजकिरे (चर्चा) को ज़बान पर न लाओ। गलतियाँ इन्सान से होती हैं। अगर तुम इसी में खुश हो तो हल्फ़िया कहता हूँ कि अब कभी उसके दरवाजे पर न जाऊँगा।””

सरला, “क्यों तुम उस पर आशिक़ नहीं हो ? उसकी आबरू के ख़ौफ से तुम कैद और जलावतनी (देश-निकाला) झेलने पर आमदा थे और अब तुम कहते हो मैं उसके दरवाजे पर न जाऊँगा। कया इतनी जल्द दिल से नकक्‍्शे-मुहब्बत मिट गया! इन फ़रेब की बातों से कुछ हासिल नहीं। तुम शौक़ से खुशियाँ मनाओ, मैं ज़रा भी मुख़िल (बाधक) न हँगी। हसद का काटा बनकर किसी के पहलू में ख़टकना नहीं चाहती |

धीरेन कुर्सी पर बैठ गये और गमनाक (शोकपूर्ण) लहजे में बोले, “सरला, ऐसी बातें बिल्कुल बेमौके और बेजरूरत हैं। जब तुम देखती हो कि मैं हद दर्ज नादिम और पशेमान (लज्जित और पश्चातापपूर्ण) हूँ और वायदा करता हूँ कि अब उससे कोई सरोकार नहीं रखूँगा तो तुम्हें ऐसी बातें करके मेरा दिल नहीं दुखाना चाहिए। क्‍या तुम नहीं जानतीं कि इन बातों को पोशीदा रखने के लिए में किस हद तक नुक्सानात उठाने के लिए तैयार था? अगर्चे मेरे खिलाफ़ कोई सबूत नहीं था मगर मुझे जलावतन होना गवारा था, बजाय इसके कि मंगल के दिन अपने हरकात (कार्यों) का पता दूँ। अब तक तरह-तरह की अफ़वाहें उड़ती होतीं। यक्रीन मानो, इस रुसवाई के मुक़ाबले में मैं जलावतन होना बेहतर समझता हूँ ।'

सरला, “अगर, राहे-मुहब्बत में कदम रक्‍्खा है तो रुसवाई का क्‍या ख़ोफ ? अगर तुम्हारी मुहब्बत सच्ची है तो तुम्हें सोसाइटी का इस क़दर ख़ौफ न करना चाहिए ।”

धीरेन, “कैसी बातें करती हो, सरला ! सोसाइटी का खौफ़ खुदा के खौफ़ से भी ज्यादा है। अगर तुमने यह रविश (ढंग) अख़्तियार की तो मेरी इज्जत खाक़ में मिला दोगी और मेरा मुस्तकबिल (भविष्य) स्याह (अन्धकारपूर्ण) हो जायेगा। मैं सोसाइटी की निगाहों में जलील हो जाऊँगा। सरला, तुम इस वक़्त गुस्से में हो, मगर जब तुम्हारी तबीयत ठंडी होगी, गुस्सा फरो (शान्त) हो जायेगा और तुम इस मसले पर गौर करोगी तो यक़ीनन मेरी यह ख़ता माफ़ कर दोगी। ऐसी बहुत कम औरतें होंगी जिन्हें अपनी ज़िन्दगी में ऐसी गुत्यियाँ न सुलझानी पड़ती हों। मैं मुबालगा (अतिशयोक्ति) नहीं करता हूँ, सोसाइटी में ऐसी बातें आए दिन हुआ करती हैं, मगर पर्दे के अन्दर। मैं दूसरे का शैदा नहीं, क्या तुम्हें भी मेरी मुहब्बत नहीं। उसी मुहब्बत के सदके, तुम इन बातों को भूल जाओ। मैं पुख्ता वायदा करता हूँ कि अब फिर ऐसा मौक़ा कभी न आएगा ।”

यह कहकर धीरेन बाहर चले गये और सरला वहीं ख़ामोश बैठी सोचती रही-““सोसाइटी का शीराज़ा (व्यवस्था) ऐसे कच्चे धागे से बेँधा हुआ है।”


खौफे-रुसवाई का सारांश

कलकत्ता के बैरिस्टर धीरेन चौधरी की पत्नी सरला अपने पति को सीधा-सादा, कर्तव्यनिष्ठ और समाज की दिखावेबाजी से दूर रहने वाला व्यक्ति मानती है। सरला स्वयं शिक्षित, राष्ट्रवादी विचारों वाली और स्त्री-स्वतंत्रता के प्रति जागरूक है। लेकिन एक दिन एक अंग्रेज अधिकारी पर बम से हुए हमले के बाद पुलिस धीरेन के घर की तलाशी लेती है और उन्हें इस घटना में सहायता करने के संदेह में गिरफ्तार कर लेती है। धीरेन के पास अपने बचाव का अवसर होते हुए भी वह यह नहीं बताते कि घटना के समय वे कहाँ थे।

धीरे-धीरे सरला को पता चलता है कि धीरेन उस समय एक दूसरी स्त्री के पास थे। वह स्त्री भी स्वीकार करती है कि धीरेन उससे प्रेम करते हैं, लेकिन इसी संबंध की प्रतिष्ठा बचाने के लिए धीरेन अपने ऊपर लगे गंभीर आरोप को भी सहने के लिए तैयार हैं। सरला के सामने अब एक कठिन नैतिक और वैवाहिक संकट खड़ा हो जाता है—एक ओर पति को निर्दोष सिद्ध करने का दायित्व है, दूसरी ओर उसके वैवाहिक जीवन का वह भ्रम टूट चुका है जिस पर उसका विश्वास टिका था।

अंततः धीरेन रिहा होकर घर लौटता है। वह सरला से अपने संबंध को छिपाए रखने की विनती करता है और स्वीकार करता है कि उसे समाज में होने वाली बदनामी का भय जेल या देश-निकाले से भी अधिक है। सरला के सामने यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके वैवाहिक संबंध में प्रेम, विश्वास और सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच गहरा विरोध मौजूद है।


प्रकाशन इतिहास

“खौफे-रुसवाई” का प्रथम प्रकाशन उर्दू में अदीब पत्रिका के सितम्बर 1911 के अंक में हुआ। बाद में यह कहानी सोलह अप्राप्य कहानियाँ तथा प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य, खण्ड 1 में संकलित हुई। प्रेमचंद रचनावली के खण्ड 11 में भी इसका पाठ उपलब्ध है।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • सामाजिक प्रतिष्ठा का भय: कहानी का केंद्रीय प्रश्न यह है कि समाज में अपनी इज्जत और प्रतिष्ठा खोने का डर व्यक्ति को किस हद तक सत्य छिपाने और नुकसान सहने के लिए मजबूर कर सकता है।

  • विवाह और विश्वास: सरला के लिए सबसे बड़ा आघात केवल पति के दूसरे स्त्री से संबंध का पता चलना नहीं, बल्कि उस विश्वास का टूटना है जिसके आधार पर उसने अपने वैवाहिक जीवन को समझा था।

  • प्रेम बनाम सामाजिक मर्यादा: धीरेन अपने प्रेम-संबंध को सार्वजनिक होने से बचाने के लिए गिरफ्तारी और देश-निकाले तक का जोखिम उठाने को तैयार है। इस तरह निजी प्रेम और सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच तनाव कहानी का प्रमुख आधार बनता है।

  • स्त्री की चेतना: सरला शिक्षित और आधुनिक विचारों वाली स्त्री है, फिर भी उसका भावनात्मक संसार अपने पति और वैवाहिक संबंध से गहराई से जुड़ा हुआ है। कहानी उसके भीतर पैदा हुए मोहभंग और आत्मनिर्णय की स्थिति को सामने लाती है।

  • औपनिवेशिक राजनीतिक वातावरण: अंग्रेज अधिकारी पर बम-हमले और उसके बाद की पुलिस कार्रवाई कहानी की पृष्ठभूमि में तत्कालीन राजनीतिक उथल-पुथल को उपस्थित करते हैं। लेकिन कहानी का मुख्य तनाव राजनीतिक घटना से अधिक उसके कारण पैदा हुए व्यक्तिगत और वैवाहिक संकट पर केंद्रित है।

  • समाज की निगाह और निजी जीवन: कहानी यह प्रश्न उठाती है कि व्यक्ति के निजी आचरण पर समाज की निगाह किस तरह उसके निर्णयों को नियंत्रित करती है। धीरेन के लिए “सोसाइटी का खौफ” व्यक्तिगत नैतिक निर्णय से भी अधिक प्रभावशाली साबित होता है।

  • रचना की साहित्यिक स्थिति: प्रेमचंद की कुछ दुर्लभ कहानियों की मौलिकता को लेकर बाद के शोध में प्रश्न भी उठाए गए हैं। खौफे-रुसवाई के कथानक और सांस्कृतिक आधार की बंगला कथा-साहित्य से समानता की ओर प्रो. शैलेश जैदी ने संकेत किया है। इसलिए इसे प्रेमचंद के कथा-साहित्य में रखते हुए इसकी रचना-परंपरा पर यह आलोचनात्मक प्रश्न भी ध्यान देने योग्य है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "खौफे-रुसवाई." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1911, https://munshipremchand.com/works/short-stories/khauf-e-ruswai. Accessed 22 Sep. 2026.