Cover Image for Putra Prem (पुत्र प्रेम) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी••19 मिनट

पुत्र प्रेम

Putra Prem

प्रेमचंद की कहानी 'पुत्र प्रेम' बाबू चैतन्यदास के अर्थशास्त्र-संचालित मस्तिष्क और एक पिता के सच्चे पश्चात्ताप की करुण गाथा है।

पात्र:बाबू चैतन्यदास, प्रभुदास, शिवदास, तपेश्वरी
स्थान:वाराणसी और मणिकर्णिका घाट

पुत्र प्रेम का मूल पाठ

बाबू चेतन्यदास ने अर्थशास्त्र खूब पढ़ा था, ओर केवल पढ़ा ही नहीं था, उसका यथायोग्य व्यवहार भी वे करते थे। वे वकील थे, दो-तीन गाँवों मे उनकी जमींदारी भी थी, बेंक में भी कुछ रुपये थे। यह सब उसी अर्थशास्त्र के ज्ञान का फल था। जब कोई खर्च सामने आता तब उनके मन में स्वभावतः प्रश्न होता था -- इससे स्वयं मेरा उपकार होगा या किसी अन्य पुरुष का? यदि दो में से किसी का कुछ भी उपहार न होता तो वे बड़ी निर्दयता से उस खर्च का गला दबा देते थे। “व्यर्थ! को वे विष के समाने समझते थे। अर्थशास्त्र के सिद्धान्त उनके जीवन-स्तम्भ हो गये थे।

बाबू साहब के दो पुत्र थे। बड़े का नाम प्रभुदास था, छोटे का शिवदास। दोनों कालेज में पढ़ते थे। उनमें केवल एक श्रेणी का अन्तर था। दोनो ही चतुर, होनहार युवक थे। किन्तु प्रभुदास पर पिता का स्नेह अधिक था। उसमें सदुत्साह की मात्रा अधिक थी ओर पिता को उसकी जात से बड़ी-बड़ी आशाएँ थीं। वे उसे

विद्योन्नति के लिए इंग्लेण्ड भेजना चाहते थे। उसे बेरिस्टर बनाना उनके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा थी।

किन्तु कुछ ऐसा संयोग हुआ कि प्रभुदास को बी0ए0 की परीक्षा के बाद ज्वर आने लगा। डाक्टरों की दवा होने लगी। एक मास तक नित्य डाक्टर साहब आते रहे, पर ज्वर में कमी न हुई दूसरे डाक्टर का इलाज होने लगा। पर उससे भी कुछ लाभ न हुआ। प्रभुदास दिनों दिन क्षीण होता चला जाता था। उठने-बेठने की शक्ति न थी यहाँ तक कि परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने का शुभ-संवाद सुनकर भी उसके चेहरे पर हर्ष का कोई चिन्ह न दिखाई दिया। वह सदेव गहरी चिन्ता में डुबा रहता था। उसे अपना जीवन बोझ सा जान पड़ने लगा था। एक रोज चेतन्यदास ने डाक्टर साहब से पूछा यह क्‍या बात हे कि दो महीने हो गये ओर अभी तक दवा कोई असर नहीं हुआ?

डाक्टर साहब ने सन्देहजनक उत्तर दिया -- में आपको संशय में नही डालना चाहता। मेरा अनुमान है कि यह टयुबरक्युलासिस

हे।

चेतन्यदास ने व्यग्र होकर कहा -- तपेदिक? डाक्टर -- जी हाँ उसके सभी लक्षण दिखायी देते हे।

चेतन्यदास ने अविश्वास के भाव से कहा मानों उन्हे विस्मयकारी बात सुन पड़ी हो -- तपेदिक हो गया!

डाक्टर ने खेद प्रकट करते हुए कहा -- यह रोग बहुत ही गुप्तरीति से शरीर में प्रवेश करता हे।

चेतन्यदास -- मेरे खानदान में तो यह रोग किसी को न था। डाक्टर -- सम्भव हे, मित्रों से इसके जर्म (कीटाणु )मिले हो। चेतन्यदास कई मिनट तक सोचने के बाद बोले -- अब क्‍या करना चाहिए।

डाक्टर -- दवा करते रहिये। अभी फेफड़ों तक असर नहीं हुआ है इनके अच्छे होने की आशा हे।

चेतन्यदास -- आपके विचार में कब तक दवा का असर होगा?

डाक्टर -- निश्चय पूर्वक नहीं कह सकता। लेकिन तीन चार महीने में वे स्वस्थ हो जायेंगे। जाड़ों में इस रोग का जोर कम हो जाया करता है।

चेतन्यदास -- अच्छे हो जाने पर ये पढने में परिश्रम कर सकेंगे?

डाक्टर -- मानसिक परिश्रम के योग्य तो ये शायद ही हो सकें।

चेतन्यदास -- किसी सेनेटोरियम (पहाड़ी स्वास्थयालय) में भेज दूँ तो केसा हो?

डाक्टर -- बहुत ही उत्तम। चेतन्यदास -- तब ये पूर्णरीति से स्वस्थ हो जाएँगे?

डाक्टर -- हो सकते है, लेकिन इस रोग को दबा रखने के लिए इनका मानसिक परिश्रम से बचना ही अच्छा हे।

चेतन्यदास नेराश्य भाव से बोले -- तब तो इनका जीवन ही नष्ट हो गया।

गर्मी बीत गयी। बरसात के दिन आये, प्रभुदास की दशा दिनो दिन बिगड़ती गई। वह पड़े-पड़े बहुधा इस रोग पर की गई बड़े बड़े डाक्टरों की व्याख्याएँ पढ़ा करता था। उनके अनुभवों से अपनी अवस्था की तुलना किया करता था। उनके अनुभवों स अपनी अवस्था की तुलना किया करता। पहले कुछ दिनो तक तो वह अस्थिरचित-सा हो गया था। दो चार दिन भी दशा सँभली रहती तो पुस्तकें देखने लगता ओर विलायत यात्रा की चर्चा करता। दो चार दिन भी ज्वर का प्रकोप बढ़ जाता तो जीवन से निराश हो जाता। किन्तु कई मास के पश्चात जब उसे विश्वास

हो गया कि इस रोग से मुक्त होना कठिन है तब उसने जीवन की भी चिन्ता छोड़ दी पथ्यापथ्य का विचार न करता, घरवालों की निगाह बचाकर ओषधियाँ जमीन पर गिरा देता मित्रों के साथ बेठकर जी बहलाता। यदि कोई उससे स्वास्थ्य के विषय में कुछ पूछता तो चिढ़कर मुँह मोड लेता। उसके भावों में एक शान्तिमय उदासीनता आ गई थी, ओर बातों में एक दार्शनिक मर्मज्ञता पाई जाती थी। वह लोक रीति ओर सामाजिक प्रथाओं पर बड़ी निर्भकता से आलोचनाएँ किया करता। यद्यपि बाबू चेतन्यदास के मन में रह-रहकर शंका उठा करती थी कि जब परिणाम विदित ही है तब इस प्रकार धन का अपव्यय करने से क्या लाभ तथापि वे कुछ तो पृत्र-प्रेम ओर कुछ लोक मत के भय से घेर्य के साथ दवा दारू करते जाते थे।

जाड़े का मोसम था। चेतन्यदास पुत्र के सिरहाने बेठे हुए डाक्टर

साहब की ओरे प्रश्नात्मक दृष्टि से देख रहे थे। जब डाक्टर

साहब टेम्परेचर लेकर (थर्मामीटर लगाकर ) कुर्सी पर बेठे तब

चेतन्यदास ने पूछा -- अब तो जाड़ा आ गया। आपको कुछ अन्तर मालूम होता हे?

डाक्टर -- बिलकुल नहीं, बल्कि रोग ओर भी दुस्साध्य होता जाता

है।

चेतन्यदास ने कठोर स्वर में पूछा -- तब आप लोग क्यो मुझे इस भ्रम में डाले हुए थे कि जाडे में अच्छे हो जायेंगे? इस प्रकार दूसरों की सरलता का उपयोग करना अपना मतलब साधने का साधन हो तो हो इसे सज्जनता कदापि नहीं कह सकते।

डाक्टर ने नम्नरता से कहा -- ऐसी दशाओं में हम केवल अनुमान कर सकते है। ओर अनुमान सदेव सत्य नही होते। आपको जेरबारी अवश्य हुई पर में आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मेरी इच्छा आपको भ्रम में डालने के नहीं थी।

शिवदास बड़े दिन की छुट्टियों में आया हुआ था, इसी समय वह कमरे में आ गया ओर डाक्टर साहब से बोला -- आप पिता जी की कठिनाइयों का स्वयं अनुमान कर सकते हैं। अगर उनकी बात नागवार लगी तो उन्हे क्षमा कीजिएगा।

चेतन्यदास ने छोटे पुत्र की ओर वात्सल्य की दृष्टि से देखकर कहा - तुम्हें यहाँ आने की जरूरत थी? मै तुमसे कितनी बार कह चुका हूँ कि यहाँ आया करो। लेकिन तुमको सब्र ही नही होता।

शिवदास ने लज्जित होकर कहा -- मैं अभी चला जाता हूँ। आप

नाराज न हों। मे केवल डाक्टर साहब से यह पूछना चाहता था कि भाई साहब के लिए अब क्‍या करना चाहिए।

डाक्टर साहब ने कहा -- अब केवल एक ही साधन ओर हे इन्हे इटली के किसी सेनेटोरियम मे भेज देना चाहिये।

चेतन्यदास ने सजग होकर पूछा -- कितना खर्च होगा? 'ज्यादा स ज्यादा तीन हजार। साल भर रहना होगा? निश्चय हे कि वहाँ से अच्छे होकर आवेंगे।

“जी नहीं यह तो यह भयंकर रोग हे साधारण बीमारियों में भी कोई बात निश्चय रूप से नही कही जा सकती।

“इतना खर्च करने पर भी वहाँ से ज्यों के त्यों लोटा आये तो?

“तो ईश्वर की इच्छा। आपको यह तसकीन हो जाएगी कि इनके लिए मे जो कुछ कर सकता था। कर दिया।'

आधी रात तक घर में प्रभुदास को इटली भेजने के प्रस्ताव पर वाद-विवाद होता रहा। चेतन्‍्यदास का कथन था कि एक संदिग्ध फल के लिए तीन हजार का खर्च उठाना बुद्धिमत्ता के प्रतिकूल है। शिवदास फल उनसे सहमत था। किन्तु उसकी माता इस प्रस्ताव का बड़ी दृढ़ता के साथ विरोध कर रही थी। अंत में

माता की धिक्कारों का यह फल हुआ कि शिवदास लज्जित होकर उसके पक्ष में हो गया बाबू साहब अकेले रह गये। तपेश्वरी ने तर्क से काम लिया। पति के सदभावों को प्रज्वलित करेन की चेष्टा की। धन की नश्वरता की लोकोक्तियाँ कहीं इनं शस्त्रों से विजय लाभ न हुआ तो अश्रु वर्षा करने लगी। बाबू साहब जल- बिन्दुओं क इस शर प्रहार के सामने न ठहर सके। इन शब्दों में हार स्वीकार की -- अच्छा भाई रोओं मत। जो कुछ कहती हो वही होगा।

तपेश्वरी -- तो कब? रुपये हाथ में आने दो।' 'तो यह क्‍यों नही कहते कि भेजना ही नहीं चाहते?

'भेजना चाहता हूँ किन्तु अभी हाथ खाली हैं। क्‍या तुम नहीं जानती?

बैक में तो रुपये हे? जायदाद तो हे? दो-तीन हजार का प्रबन्ध करना ऐसा क्‍या कठिन हे?

चेतन्यदास ने पत्नी को ऐसी दृष्टि से देखा मानो उसे खा जायेगें ओर एक क्षण के बाद बोले -- बिलकुल बच्चों की-सी बातें करती हो। इटली में कोई संजीवनी नही रक्खी हुई हे जो तुरन्त

चमत्कार दिखायेगी। जब वहाँ भी केवल प्रारबध ही की परीक्षा करनी है तो सावधानी से कर लेंगे। पूर्व पूरुषों की संचित जायदाद ओर रक्खे हुए रुपये में अनिश्चित हित की आशा पर बलिदान नहीं कर सकता।

तपेश्वरी ने डरते-डरते कहा -- आखिर, आधा हिस्सा तो प्रभुदास का भी हे?

बाबू साहब तिरस्कार करते हुए बोले -- आधा नही, उसमें में अपना सर्वस्व दे देता, जब उससे कुछ आशा होती, वह खानदान की मर्यादा मे ओर ऐश्वर्य बढ़ाता और इस लगाये। हुए लगाये हुए धन के फलस्वरूप कुछ कर दिखाता। मे केवल भावुकता के फेर में पड़कर धन का हास नहीं कर सकता।

तपेश्वरी अवाक रह गयी। जीतकर भी उसकी हार हुई।

इस प्रस्ताव के छः महीने बाद शिवदास बी.ए पास हो गया। बाबू चेतत्यदास ने अपनी जमींदारी के दो आने बन्धक रखकर कानून पढने के निमित्त उसे इंग्लैड भेजा। उसे बम्बई तक खुद पहुँचाने गये। वहाँ से लोटे तो उनके अंतःकरण में सदिच्छायों से परिमित लाभ होने की आशा थी उनके लोटने के एक सप्ताह पीछे अभागा प्रभुदास अपनी उच्च अभिलाषाओं को लिये हुए परलोक सिधारा।

चेतन्यदास मणिकर्णिका घाट पर अपने सम्बन्धियों के साथ बेठे चिता-ज्वाला की ओर देख रहे थे। उनके नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। पुत्र-प्रेम एक क्षण के लिए अर्थ-सिद्धांत पर गालिब हो गया था। उस विरक्तावस्था में उनके मन मे यह कल्पना उठ रही थी। -- सम्भव हे, इटली जाकर प्रभुदास स्वस्थ हो जाता। हाय! मेने तीन हजार का मुँह देखा ओर पुत्र रत्न को हाथ से खो दिया। यह कल्पना प्रतिक्षण सजग होती थी ओर उनको ग्लानि, शोक ओर पश्चात्ताप के बाणों से बेध रही थी। रह रहकर उनके हृदय में वेदना की शूल-सी उठती थी। उनके अन्तर की ज्वाला उस चिता-ज्वाला से कम दग्धकारिणी न थी। अकस्मात उनके कानों में शहनाइयों की आवाज आयी। उन्होने आँख ऊपर उठाई तो मनुष्यों का एक समूह एक अर्थी के साथ आता हुआ दिखाई दिया। वे सब के सब ढोल बजाते, गाते, पुष्य आदि की वर्षा करते चले आते थे। घाट पर पहुँचकर उन्होने अर्थी उतारी ओर चिता बनाने लगे। उनमें से एक युवक आकर चेतन्यदास के पास खड़ा हो गया। बाबू साहब ने पूछा -- किस मुहल्ले में रहते हो?

युवक ने जवाब दिया -- हमारा घर देहात में है। कल शाम को चले थे। ये हमारे बाप थे। हम लोग यहाँ कम आते हे, पर दादा की अन्तिम इच्छा थी कि हमें मणिकर्णिका घाट पर ले जाना।

चेतन्यदास -- ये सब आदमी तुम्हारे साथ हे?

युवक -- हाँ ओर लोग पीछे आते है। कई सो आदमी साथ आये है। यहाँ तक आने में सेंकड़ो उठ गये पर सोचता हूँ कि बूढ़े पिता की मुक्ति तो बन गई। धन ओर ही किसलिए।

चेतन्यदास -- उन्हें क्‍या बीमारी थी?

युवक ने बड़ी सरलता से कहा, मानो वह अपने किसी निजी सम्बन्धी से बात कर रहा हो। -- बीमार का किसी को कुछ पता नहीं चला। हरदम ज्वर चढा रहता था। सूखकर काँटा हो गये थे। चित्रकूट हरिद्वार प्रयाग सभी स्थानों में ले लेकर घूमे। बेद्यों ने जो कुछ कहा उसमे कोई कसर नही की।

इतने में युवक का एक और साथी आ गया। ओर बोला - साहब, मुँह देखा बात नहीं, नारायण लड़का दे तो ऐसा दे। इसने रुपयों को ठीकरे समझा। घर की सारी पूंजी पिता की दवा दारू में स्वाहा कर दी। थोड़ी सी जमीन तक बेच दी पर काल बली के सामने आदमी का क्‍या बस हे।

युवक ने गदगद स्वर से कहा -- भेया, रुपया पेसा हाथ का मैल है। कहाँ आता हे कहाँ जाता हे, मनुष्य नहीं मिलता। जिन्दगानी है तो कमा खाऊँगा। पर मन में यह लालसा तो नही रह गयी कि हाय! यह नही किया, उस वेद्य के पास नहीं गया नही तो शायद बच जाते। हम तो कहते है कि कोई हमारा सारा घर द्वार लिखा ले केवल दादा को एक बोल बुला दे। इसी माया-मोह का नाम जिन्दगानी हें, नहीं तो इसमे कया रक्खा हे? धन से प्यारी जान जान से प्यारा ईमान। बाबू साहब आपसे सच कहता हूँ अगर दादा के लिए अपने बस की कोई बात उठा रखता तो आज रोते न बनता। अपना ही चित्त अपने को धिक्कारता। नहीं तो मुझे इस घड़ी ऐसा जान पड़ता है कि मेरा उद्धार एक भारी ऋण से हो गया। उनकी आत्मा सुख ओर शान्ति से रहेगी तो मेरा सब तरह कल्याण ही होगा।

बाबू चेतन्‍्यदास सिर झुकाए ये बातें सुन रहे थे। एक-एक शब्द उनके हृदय में शर के समान चुभता था। इस उदारता के प्रकाश में उन्हें अपनी हृदय-हीनता, अपनी आत्मशून्यता अपनी भोतिकता अत्यन्त भयंकर दिखायी देती थी। उनके चित्त पर इस घटना का कितना प्रभाव पड़ा यह इसी से अनुमान किया जा सकता हैं कि प्रभुदास के अन्त्येष्टि संस्कार में उन्होने हजारों रुपये खर्च कर डाले उनके सन्तप्त हृदय की शान्ति के लिए अब एकमात्र यही उपाय रह गया था।


पुत्र प्रेम का सारांश

'पुत्र प्रेम' बाबू चैतन्यदास के शुद्ध उपयोगितावादी और अर्थशास्त्र-संचालित मस्तिष्क और एक पिता के अंतर्द्वंद्व तथा पश्चात्ताप की करुण कहानी है। बाबू चैतन्यदास पेशे से वकील और ज़मींदार हैं। वे अर्थशास्त्र के सिद्धांतों को अपने जीवन का मूलमंत्र मानते हैं और बिना किसी मौद्रिक लाभ या प्रतिफल के एक पैसा भी खर्च करना 'अपव्यय' और विष समान समझते हैं। उनके दो बेटे हैं—प्रभुदास और शिवदास। बड़ा बेटा प्रभुदास पढ़ाई में बहुत होनहार है और चैतन्यदास उसे विलायत (इंग्लैंड) भेजकर बैरिस्टर बनाना चाहते हैं।

अचानक प्रभुदास को तपेदिक (टीबी) की बीमारी हो जाती है। इलाज के बावजूद उसकी हालत बिगड़ती जाती है। डॉक्टर उसे इटली के किसी सेनेटोरियम (स्वास्थ्य केंद्र) भेजने की सलाह देते हैं, जिसमें करीब तीन हज़ार रुपये का खर्च आना था। चैतन्यदास अपनी पत्नी तपेश्वरी की तमाम मिन्नतों और तर्कों के बावजूद इटली भेजने से इनकार कर देते हैं। उनका तर्क होता है कि अनिश्चित लाभ और ऐसे बीमार बेटे पर धन खर्च करना व्यर्थ है जो ठीक होकर भी व्यावसायिक लाभ नहीं दे सकेगा। वे अपने संचित धन को एक अनिश्चित इलाज पर बलिदान करने के बजाय सुरक्षित रखना चाहते हैं। इसके छह महीने बाद, जब छोटा बेटा शिवदास बी.ए. पास होता है, तो चैतन्यदास अपनी ज़मींदारी गिरवी रखकर उसे खुशी-खुशी कानून पढ़ने इंग्लैंड भेज देते हैं, क्योंकि उसमें उन्हें निश्चित प्रतिफल दिखाई देता है।

शिवदास को बंबई से विदा करके लौटने के एक सप्ताह बाद ही अभागा प्रभुदास दम तोड़ देता है। चैतन्यदास जब वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर प्रभुदास की चिता जलते देख रहे होते हैं, तब उनके मन में पश्चात्ताप की पहली ज्वाला उठती है कि काश उन्होंने तीन हज़ार रुपये का मोह न किया होता। उसी समय घाट पर एक निर्धन ग्रामीण युवक अपने पिता की अंतिम यात्रा अत्यंत गाजे-बाजे और श्रद्धापूर्वक लेकर आता है।

पूछने पर वह युवक बताता है कि उसने अपने पिता के इलाज के लिए अपनी थोड़ी-सी ज़मीन बेच दी और घर का सारा धन पानी की तरह बहा दिया। भले ही पिता न बच सके, लेकिन उसे इस बात का सुकून है कि उसने अपने पिता की जान बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। युवक का कहना था कि "रुपया-पैसा हाथ का मैल है, लेकिन इंसान दोबारा नहीं मिलता।"

उस सीधे-सादे ग्रामीण युवक की निस्वार्थ पितृ-भक्ति और उदारता के सामने बाबू चैतन्यदास को अपनी व्यावसायिक हृदयहीनता, भौतिकवादी संकीर्णता और घोर स्वार्थपरता भयंकर रूप में दिखाई देने लगती है। अपने संतापित हृदय की शांति और पश्चात्ताप स्वरूप बाबू चैतन्यदास अंत में प्रभुदास के अंत्येष्टि-संस्कार और क्रिया-कर्म में हज़ारों रुपये पानी की तरह बहा देते हैं।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • अर्थशास्त्र बनाम मानवीय संवेदनाएँ: कहानी में प्रेमचंद ने यह दिखाया है कि जब जीवन के हर पहलू और रिश्तों को केवल लाभ-हानि व अर्थशास्त्र के तराजू पर तोला जाता है, तो मानवीय संवेदनाएँ और पारिवारिक प्रेम नष्ट हो जाते हैं।
  • उपयोगितावादी सोच पर प्रहार: बाबू चैतन्यदास का चरित्र उस आधुनिक व्यावसायिक मानसिकता का प्रतीक है जहाँ अपने ही बीमार संतान के इलाज का फैसला भी इस बात से तय होता है कि उससे भविष्य में कितना आर्थिक रिटर्न (प्रतिफल) मिलेगा।
  • सच्चे प्रेम और कर्तव्य बोध का आदर्श: मणिकर्णिका घाट पर आया ग्रामीण युवक सच्चे प्रेम और पारिवारिक मूल्यों का उदाहरण पेश करता है, जो पैसों को 'हाथ का मैल' मानकर अपने पिता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है।
  • आत्मग्लानि और आत्मबोध: पुत्र की मृत्यु और ग्रामीण की निस्वार्थ भक्ति के बाद चैतन्यदास के भीतर का पिता जागता है। उन्हें बोध होता है कि धन से ऊपर मनुष्य और उसके प्रति कर्तव्य है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'पुत्र प्रेम' भौतिकवादी युग में मानवीय मूल्यों, निस्वार्थ वात्सल्य और नैतिक बोध की पुनर्स्थापना करती है। यह कहानी सिखाती है कि धन का संचय यदि अपनों के जीवन और सुख की कीमत पर हो, तो वह केवल आत्मग्लानि और शोक ही देता है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "पुत्र प्रेम." *Munshi Premchand Digital Archive*, https://munshipremchand.com/works/short-stories/putra-prem. Accessed 22 Sep. 2026.