पूर्व और पश्चिम की प्राचीन संस्कृति में विशेष अन्तर न था। हाँ, चूंकि नयी संस्कृति का बड़ा भाग पश्चिम से आया है इसलिए उसे पश्चिमी की उपाधि मिल गयी है। पश्चिमी संस्कृति ने हमें बहुत दिनों तक चकाचौंध में डाल रखा। उसकी चटक-मटक देखकर हम ऐसे मतवाले हुए, कि जो कुछ सुन्दर और सरल भी हमारे यहाँ था वह भी हमारी नजरों से गिर गया। वक्त की पाबन्दी ही लीजिए! हमारे यहाँ पुरानी सभ्यता यह थी कि कोई परिचित या मित्र जिस वक्त चाहे हमारे पास बेरोक-टोक आ सकता था। हम उससे मिलकर खुश होते थे। उस वक्त हमें यह विचार कभी न सताता था कि इस मनुष्य के आ जाने से हमारा समय नष्ट हो जायगा। एक मित्र की दिलजोई हमारी निगाह में रुपये से कहीं ज्यादा मूल्यवान थी। लेकिन अब हम हरेक चीज को रुपये के कांटे पर तौलते हैं, इसलिए अब ऐसे आदमी का आना जिससे हमारा कोई स्वार्थ न सिद्ध होता हो हमें जहन्नुम लगता है। एक आदमी आपको अपना हितैषी समझकर अपना दुःख रोने या केवल विनोद के लिए आपके पास आता है और आप उसके पास एक मिनट बैठना भी भार समझते हैं; क्योंकि समय का मूल्य रुपये से आँका जाता है। मनुष्यता, सहानुभूति, दिलजोई इनका तो कोई मूल्य नहीं है, वह तो बेकार है, व्यर्थ है। अब हमारे बड़े आदमियों के द्वार पर 'नो एडमिटेंस' और 'जरा ठहरिए' का बोर्ड लगा रहता है। जिससे काम है, उसके लिए द्वार खुला है। जिससे कोई प्रयोजन नहीं, उसके लिए बन्द है। और हम इस संस्कृति का बखान करते नहीं थकते। पश्चिम आदमियत का गला घोंटकर स्वार्थ की मशीन बनता गया है, वही हम बनना चाहते हैं।
पूर्वीय सभ्यता अतिथियों के आगमन से फूल उठती थी। उसे अपना अहोभाग्य समझती थी। कोई मेहमान आया, वह चाहे रंक हो या धनी, पाहुने के सत्कार में कोई कसर न होती थी। वह घर में सबसे अच्छी जगह पाता था, सबसे अच्छा भोजन पाता था और सारा घर उसकी सेवा-सत्कार में लग जाता था। इसके विपरीत पश्चिम की सभ्यता ने हमें रोना और झींकना सिखा दिया है। मेहमान आया और हमारे होश-हवास उड़ गये। कैसे कहें यह बला टले, मन में मनाते हैं कि यह आज ही चला जाय। गृहस्वामी का मुँह सूखा हुआ है, स्वामिनी की त्यौरी चढ़ी हुई है। मालूम होता है कोई अमंगल अपनी अँधेरी छाया डाले हुए है। बाबू साहब अपना समय नहीं छोड़ सकते। मेहमान बाहर बरामदे में टिका दिया जाता है। स्वामिनी के पास जमाने भर का ठेका नहीं है कि जो चाहे दनदनाता चला आये और वह सबके लिए भोजन बनाने बैठे। उसे तो अपने घर वालों के लिए भोजन बनाना पहाड़ हो रहा है, तब तक यह जमदूत न जाने कहाँ से फट पड़े। और उधर तो देखो, पहले से सूचना भी न दी, नहीं कोई बहाना कर लेते कि बीमार हैं या कहीं बाहर जा रहे हैं। जिस दिन मेहमान विदा होता है घर में जैसे नया दिन होता है। हम इतने स्वार्थी, इतने संकीर्ण हो गये हैं कि निःस्वार्थ भाव से कोई काम नहीं कर सकते। अगर अतिथि कोई मुकदमा लाया हो, या उससे किसी मोटे मरीज के फंसने की आशा हो, या उसके जरिये कोई बड़ा आर्डर मिलने की सम्भावना हो, तो फिर परिस्थिति बदल जाती है। उस अतिथि की खूब खातिर होती है, मालूम होता है सारा घर उस पर प्राण दे रहा है। यहाँ भी वही रुपया, वही हाय! हाय! और जो सज्जन नये रंग में जितने रंगे हैं उनमें यह संकीर्णता उतनी ही अधिक है। देहातियों में, मजदूरों में, स्त्रियों में यह प्रवृत्ति अभी उतनी तीव्र नहीं है जितनी शिक्षित और सभ्य समाज में। अपने लिए, जो कुछ हो अपने लिए, यही उनका जीवन-तत्व है। हम यह नहीं कहते कि इस नयी संस्कृति में और उस पुरानी अतिथि-सेवा में सब बुराइयाँ ही बुराइयाँ या खूबियाँ ही खूबियाँ हैं। पुरातन आतिथ्य में बहुधा बेफिक्र और निकम्मे मेहमान सिर पर सवार हो जाते थे, लेकिन बेफिक्र या निकम्मे आदमियों के सत्कार में भी तो कुछ सज्जनता थी, कुछ उदारता थी। इस नयी संकीर्णता में तो कोरा स्वार्थ है, कोरी खुदगर्जी।
पश्चिम ने हमें सबसे जहरीला जो उपहार पहुँचाया है वह यही खुदगर्जी। समस्त संसार को स्वार्थ के पैरों तले रौंदकर वह स्वयं स्वार्थ का पिशाच हो गया है। उसमें न हृदय है, न कोमलता है, न दर्द है। बस सिर से पैर तक, भीतर से बाहर तक स्वार्थ भरा हुआ है। हँसना-बोलना, रोना-गाना एक भी स्वार्थ से खाली नहीं। प्राचीन संस्कृति में चिकित्सक के लिए किसी मरीज से फीस लेना हराम था। वैद्य जी या हकीम साहब को जिस वक्त किसी मरीज का बुलावा मिल जाये, उसी वक्त अपनी नींद-प्यास परित्याग कर उसे जाना पड़ता था, इसमें कोई रियायत न थी। हाँ, अगर दवा पर कुछ खर्च हुआ हो या कोई कुछ खुशी से दे दे, तो उसे वह ले लेते थे। पर दवा के बहाने फीस वसूल करने की कल्पना तक उनके मन में न आती थी। मरीज की सेवा करना उनका कर्तव्य था, इसी को वह अपना गौरव समझते थे। पर आज जो कुछ होता है, वह हम रोज ही देखते हैं। हाँ, इस परोपकार का एक रूप अभी बाकी है। कितने ही वैद्य या डॉक्टर गरीबों से फीस नहीं लेते, हाँ, दवा में कुछ दाम की बचत निकाल ली जाती है। यही वह मानव-प्रेम है, जो पश्चिम ने इन डेढ़ सौ सालों में हमें दिया है।
वकील पुराने जमाने में भी होते थे, अध्यापक भी प्राचीन युग में थे, पर वकील सरकार से वेतन पाता था और अध्यापक भिक्षा माँगकर विद्या-दान देता था। मनुष्य स्वार्थ का पुतला होकर रह गया है। अगर उसमें प्रतिभा है, तो संसार का इससे कोई उपकार नहीं हो सकता। वह जायदाद पैदा करेगा, पहाड़ों पर जायेगा, हवा में उड़ेगा, शराब उड़ायेगा। मुफ्त में क्यों किसी की सेवा करे? उसके पश्चिमी गुरु ने उसे यह नया पाठ पढ़ाया है। अब तो हमारे महात्मा लोग बिना पैसे के आशीर्वाद भी नहीं दे सकते। पहले बुद्धि या सिद्धि की सफलता सेवा और उपकार में थी, अब स्वार्थ-सिद्धि में। मरीज के होठों पर प्राण लगे हों, डॉक्टर साहब बिना फीस लिये नहीं जा सकते। यह तो दूनी-चौगुनी फीस वसूल करने का मौका है। ऐसी शिकायतें क्या रोज सुनने में नहीं आतीं? जब सभी स्वार्थ के उपासक हैं, कुएं में भांग पड़ गयी है, तो हमारे अध्यापक जी ने क्या अपराध किया? वह भी योरोप जायेंगे, वहाँ से लौटकर लम्बा वेतन लेंगे। कैरियर बनाना ही तो जीवन का उद्देश्य है। वाह रे पश्चिम! तेरी लीला ईश्वर की लीला से भी विचित्र है। क्या वे दिन फिर कभी आयेंगे जब हमारी पुरानी संस्कृति का अभ्युदय होगा? उस संस्कृति का जिसमें परोपजीविता का कलंक न था। क्या आशा है!
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', नवम्बर, 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]
