Cover Image for Kashmiri Seb (कश्मीरी सेब) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1936•9 मिनट

कश्मीरी सेब

Kashmiri Seb

‘कश्मीरी सेब’ प्रेमचंद की छोटी लेकिन तीखी व्यंग्य-कहानी है, जिसमें एक साधारण खरीदारी के अनुभव के माध्यम से रोजमर्रा के व्यापार में होने वाली बेईमानी पर टिप्पणी की गई है। कथावाचक कश्मीरी और अच्छे बताए गए चार सेब खरीदता है, लेकिन घर पहुँचने पर चारों खराब निकलते हैं। यह घटना उसे बेईमानी, विश्वास और स्वयं ग्राहक की सावधानी की जिम्मेदारी पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

विषय:
पात्र:कथावाचक, फल-विक्रेता, फल-विक्रेता का नौकर
स्थान:औपनिवेशिक भारत के एक शहर का बाज़ार और कथावाचक का घर

कश्मीरी सेब का मूल पाठ

कल शाम को चौक में दो-चार जरूरी चीजें खरीदने गया था। पंजाबी मेवाफरोशों की दूकानें रास्ते ही में पड़ती हैं। एक दूकान पर बहुत अच्छे रंगदार,गुलाबी सेब सजे हुए नजर आये। जी ललचा उठा। आजकल शिक्षित समाज में विटामिन और प्रोटीन के शब्दों में विचार करने की प्रवृत्ति हो गई है। टमाटो को पहले कोई सेंत में भी न पूछता था। अब टमाटो भोजन का आवश्यक अंग बन गया है। गाजर भी पहले ग़रीबों के पेट भरने की चीज थी। अमीर लोग तो उसका हलवा ही खाते थे; मगर अब पता चला है कि गाजर में भी बहुत विटामिन हैं, इसलिए गाजर को भी मेजों पर स्थान मिलने लगा है। और सेब के विषय में तो यह कहा जाने लगा है कि एक सेब रोज खाइए तो आपको डाक्टरों की जरूरत न रहेगी। डाक्टर से बचने के लिए हम निमकौड़ी तक खाने को तैयार हो सकते हैं। सेब तो रस और स्वाद में अगर आम से बढक़र नहीं है तो घटकर भी नहीं। हाँ, बनारस के लंगड़े और लखनऊ के दसहरी और बम्बई के अल्फाँसो की बात दूसरी है। उनके टक्कर का फल तो संसार में दूसरा नहीं है मगर; मगर उनमें विटामिन और प्रोटीन है या नहीं, है तो काफी है या नहीं, इन विषयों पर अभी किसी पश्चिमी डाक्टर की व्यवस्था देखने में नहीं आयी। सेब को यह व्यवस्था मिल चुकी है। अब वह केवल स्वाद की चीज नहीं है, उसमें गुण भी है। हमने दूकानदार से मोल-भाव किया और आध सेर सेब माँगे।

दुकानदार ने कहा-बाबूजी बड़े मजेदार सेब आये हैं, खास कश्मीर के। आप ले जाएँ, खाकर तबीयत खुश हो जाएगी।

मैंने रूमाल निकालकर उसे देते हुए कहा-चुन-चुनकर रखना।

दूकानदार ने तराजू उठाई और अपने नौकर से बोला-लौंडे आध सेर कश्मीरी सेब निकाल ला। चुनकर लाना।

लौंडा चार सेब लाया। दूकानदार ने तौला, एक लिफाफे में उन्हें रखा और रूमाल में बाँधकर मुझे दे दिया। मैंने चार आने उसके हाथ में रखे।

घर आकर लिफ़ाफा ज्यों-का-त्यों रख दिया। रात को सेब या कोई दूसरा फल खाने का कायदा नहीं है। फल खाने का समय तो प्रात:काल है। आज सुबह मुँह-हाथ धोकर जो नाश्ता करने के लिए एक सेब निकाला, तो सड़ा हुआ था। एक रुपये के आकार का छिलका गल गया था। समझा, रात को दूकानदार ने देखा न होगा। दूसरा निकाला। मगर यह आधा सड़ा हुआ था। अब सन्देह हुआ, दुकानदार ने मुझे धोखा तो नहीं दिया है। तीसरा सेब निकाला। यह सड़ा तो न था; मगर एक तरफ दबकर बिल्कुल पिचक गया। चौथा देखा। वह यों तो बेदाग था; मगर उसमें एक काला सूराख था जैसा अक्सर बेरों में होता है। काटा तो भीतर वैसे ही धब्बे, जैसे किड़हे बेर में होते हैं। एक सेब भी खाने लायक नहीं। चार आने पैसों का इतना गम न हुआ जितना समाज के इस चारित्रिक पतन का। दूकानदार ने जान-बूझकर मेरे साथ धोखेबाजी का व्यवहार किया। एक सेब सड़ा हुआ होता, तो मैं उसको क्षमा के योग्य समझता। सोचता, उसकी निगाह न पड़ी होगी। मगर चार-के-चारों खराब निकल जाएँ, यह तो साफ धोखा है। मगर इस धोखे में मेरा भी सहयोग था।

मेरा उसके हाथ में रूमाल रख देना मानो उसे धोखा देने की प्रेरणा थी। उसने भाँप लिया कि महाशय अपनी आँखों से काम लेने वाले जीव नहीं हैं और न इतने चौकस हैं कि घर से लौटाने आएँ। आदमी बेइमानी तभी करता जब उसे अवसर मिलता है। बेइमानी का अवसर देना, चाहे वह अपने ढीलेपन से हो या सहज विश्वास से, बेइमानी में सहयोग देना है। पढ़े-लिखे बाबुओं और कर्मचारियों पर तो अब कोई विश्वास नहीं करता। किसी थाने या कचहरी या म्यूनिसिपिलटी में चले जाइए, आपकी ऐसी दुर्गति होगी कि आप बड़ी-से-बड़ी हानि उठाकर भी उधर न जाएँगे। व्यापारियों की साख अभी तक बनी हुई थी। यों तौल में चाहे छटाँक-आध-छटाँक कस लें; लेकिन आप उन्हें पाँच की जगह भूल से दस के नोट दे आते थे तो आपको घबड़ाने की कोई जरूरत न थी। आपके रुपये सुरक्षित थे। मुझे याद है, एक बार मैंने मुहर्रम के मेले में एक खोंचे वाले से एक पैसे की रेवडिय़ाँ ली थीं और पैसे की जगह अठन्नी दे आया था। घर आकर जब अपनी भूल मालूम हुई तो खोंचे वाले के पास दौड़ा गये। आशा नहीं थी कि वह अठन्नी लौटाएगा, लेकिन उसने प्रसन्नचित्त से अठन्नी लौटा दी और उलटे मुझसे क्षमा माँगी। और यहाँ कश्मीरी सेब के नाम से सड़े हुए सेब बेचे जाते हैं? मुझे आशा है, पाठक बाज़ार में जाकर मेरी तरह आँखे न बन्द कर लिया करेंगे। नहीं उन्हें भी कश्मीरी सेब ही मिलेंगे ?


कश्मीरी सेब का सारांश

कथावाचक एक शाम चौक के बाज़ार से गुजर रहा था जहाँ उसे फल विक्रेता की दुकान पर अत्यंत आकर्षक, गुलाबी और सुंदर सेब दिखाई देते हैं। आधुनिक समय में स्वास्थ्य, विटामिन और प्रोटीन के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण कथावाचक सेब खरीदने के लिए ललचा जाता है। वह दुकानदार से आधा सेर खास 'कश्मीरी सेब' चुनकर देने को कहता है और अपना रूमाल निकालकर दे देता है। दुकानदार अपने नौकर से चार सेब चुनकर तौलवाता है, उन्हें लिफाफे में बाँधकर रूमाल में लपेट देता है, और कथावाचक चार आने देकर घर चला आता है। रात में फल न खाने के नियम के कारण वह लिफाफा सुबह नाश्ते के समय खोलता है।

सुबह जब कथावाचक सेब खाने के लिए निकालता है, तो पहला सेब सड़ा हुआ निकलता है। दूसरा सेब आधा सड़ा हुआ होता है, तीसरा सेब एक तरफ से पिचका हुआ होता है और चौथे सेब में कीड़े का छेद और अंदर काले धब्बे निकलते हैं। चारों में से एक सेब भी खाने योग्य नहीं होता। कथावाचक को चार आने के आर्थिक नुकसान से ज्यादा समाज में घटते नैतिक मूल्यों और चारित्रिक पतन पर दुख होता है। उसे एहसास होता है कि चारों सेबों का खराब निकलना संयोग नहीं बल्कि जान-बूझकर की गई धोखेबाजी है।

कथावाचक यह भी आत्मनिरीक्षण करता है कि इस धोखे में उसकी अपनी असंतुलित सहज-विश्वासप्रियता और ढीलापन भी जिम्मेदार था, जिसने दुकानदार को बेईमानी का अवसर दिया। वह सोचता है कि अंधविश्वास और लापरवाही बेईमानी को बढ़ावा देती है। इसके विपरीत, वह अतीत की एक घटना को याद करता है जहाँ मुहर्रम के मेले में गलती से एक पैसे के बदले अठन्नी दे आने पर एक निर्धन खोंचेवाले ने ईमानदारी से उसकी अठन्नी लौटा दी थी। कथावाचक पाठकों को सचेत करता है कि बाज़ार में आँखें बंद करके खरीदारी न करें, अन्यथा वे भी धोखा खाएँगे।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • व्यापारिक नैतिकता और चारित्रिक पतन: कहानी बाज़ार में घटती ईमानदारी और ग्राहकों के साथ होने वाली धोखेबाजी पर करारा प्रहार करती है। सुंदर पैकिंग और झूठे दावों के पीछे खराब माल बेचना चारित्रिक गिरावट को दर्शाता है।
  • उपभोक्ता जागरूकता और व्यक्तिगत सतर्कता: कथावाचक स्वीकार करता है कि ग्राहक की लापरवाही और अत्यधिक अंधविश्वास भी विक्रेता को बेईमानी का अवसर प्रदान करता है। सजगता ही उपभोक्ता संरक्षण की पहली सीढ़ी है।
  • आधुनिक जीवनशैली और विज्ञापन-प्रभाव: पश्चिमी विचारों और स्वास्थ्य संबंधी आधुनिक चर्चाओं (विटामिन, प्रोटीन) के प्रभाव में आकर लोग बिना सोचे-समझे वस्तु के बाह्य आकर्षण पर मोहित हो जाते हैं।
  • अतीत और वर्तमान के नैतिक मूल्यों की तुलना: कथावाचक अठन्नी लौटाने वाले ईमानदार खोंचेवाले और सड़े सेब बेचने वाले आधुनिक दुकानदार की तुलना करके सामाजिक और नैतिक मूल्यों में आए बदलाव को उजागर करता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: ‘कश्मीरी सेब’ एक अत्यंत व्यावहारिक और रोचक व्यंग्य के माध्यम से दैनिक जीवन की साधारण घटना द्वारा समाज में व्याप्त बेईमानी, घटती व्यावसायिक साख और उपभोक्ता की जिम्मेदारी को रेखांकित करती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "कश्मीरी सेब." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1936, https://munshipremchand.com/works/short-stories/kashmiri-seb. Accessed 22 Sep. 2026.