Cover Image for Deshi Cheezon Ka Prachar Kaise Badh Sakta Hai (देशी चीज़ों का प्रचार कैसे बढ़ सकता है) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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निबंध•1905•12 मिनट

देशी चीज़ों का प्रचार कैसे बढ़ सकता है

Deshi Cheezon Ka Prachar Kaise Badh Sakta Hai

मुंशी प्रेमचंद का एक विचारोत्तेजक निबंध जिसमें भारतीय उद्योग-धंधों की उन्नति, विज्ञापनों का महत्व और ग्रामीण बाजारों में स्वदेशी वस्तुओं के प्रसार की व्यावहारिक योजना प्रस्तुत की गई है।

Work Details

प्रकार: निबंध
वर्ष: 1905
पठन समय: 12 मिनट (1,683 शब्द)

आजकल जब इस सवाल पर बहस छिड़ती है कि हिन्दुस्तानी उद्योग-धंधों की तरक्की क्यों नहीं होती तो आमतौर पर यह कहा जाता है कि अभी जनता में देश-प्रेम और कौमी हमदर्दी का खयाल ऐसा नहीं फैला है, कि वह निजी फायदे को नज़रअंदाज़ करके अपने देश की चीज़ों को, बावजूद उनकी खामियों और बुराइयों के, दूसरे देशों की चीज़ों से बढ़कर जगह दें। इसमें शक नहीं है कि यह दलील एक हद तक ठीक है और वास्तविकता पर आधारित है। मगर हम यह हरगिज़ नहीं कह सकते कि हमारी व्यापारिक मंदी केवल इसी कारण से है। इसके कुछ और कारण भी हैं जो नीचे की पंक्तियों से प्रकट होंगे।

व्यापार के रास्ते में पहली बाधा यह है कि अभी तक हमारे देश वालों को हिन्दुस्तानी उद्योग-धंधों और कारखानों की ज़रा भी जानकारी नहीं है। जिन लोगों को अखबार पढ़ने की आदत है वह अलबत्ता कुछ कारखानों से परिचित हैं। आमतौर पर यह हमको नहीं मालूम कि हिन्दुस्तान में कौन-सी चीज़ कहां बनती है। इस अज्ञान को दूर करने का सिर्फ यही इलाज है कि विज्ञापनों से अधिक से अधिक फायदा उठाया जाए और विभिन्‍न देशी भाषाओं में आसानी से समझ में आने वाले विज्ञापन प्रकाशित किए जाएं। उनको आम रास्तों पर ज़्यादा से ज़्यादा चिपकाया जाए। हर शहर के प्रतिष्ठित लोगों की सूची बनाई जाए और समय-समय पर विज्ञापन उनके पास भेजे जाएं। कारखानों और उनकी जगहों के नाम खूब रौशन कर दिए जाएं। जिन कारखानों ने इस तरकीब से फायदा उठाया है उनको आज अच्छी तरक्की हासिल है। सियालकोट, कानपुर वगैरह शहरों में खास-खास चीज़ों के कारखाने खूब रौनक पर हैं। देशी दवाइयों के इश्तिहार खूब छपते हैं और आम सड़कों पर भी खूब ज़्यादा दिखाई पड़ते हैं। इसी वजह से हमारी देशी दवाएं अंग्रेज़ी दवाओं के मुकाबले में बहुत ज़्यादा गिरी हुई हालत में नहीं हैं। कई आयुर्वेदिक दवाखानों की खासी आमदनी है। अभी बहुत दिन नहीं बीते कि बनारस में नई चाल के रेशमी कपड़े बनने शुरू हुए और आज काशी सिल्क को लोकप्रियता प्राप्त है। ऐसा कौन-सा सजधज का शौकीन आदमी होगा जिसके संदूक में दो-एक जोड़े काशी सिल्क के न होंगे। इस तात्कालिक उन्‍नति और लोकप्रियता का यही कारण है कि हर प्रकार के नमूनों के टुकड़े आस-पास चारों तरफ काफी बड़ी संख्या में रवाना किए गए। कुछ पढ़े-लिखे लोग हर ढंग के कपड़े ले-लेकर दूर-दूर के शहरों में गए और उनकी अच्छाइयां और खूबियां जनता के दिलों पर अच्छी तरह जमा दीं।

एक बार हमने एक बज़ाज से पूछा कि तुम कानानोर से देशी कपड़े क्‍यों नहीं मंगाते। उसने जबाब दिया कि उन कपड़ों की बिक्री में नफा बहुत कम होता है। नफ़े की यह कमी पूंजी के सिद्धांतों से संबंध रखती है जिन पर हम इस वक्त बहस नहीं करना चाहते। कैसा अच्छा होता कि हर शहर के कुछ जिन्दादिल, पुरजोश, पढ़े - लिखे लोग कमर कसकर थोड़ी-सी पूंजी जुटा लेते और इस पूंजी से देशी कपड़े मंगाकर मोल के दामों पर बेचते। यह ज़रूरी नहीं है कि यह लोग एक बाकायदा दुकान खोलें और दुकान का किराया और दुकानदार की तनख्वाह बढ़ाकर कपड़े को और भी महंगा कर दें बल्कि एक उत्साही सज्जन देशप्रेम से काम लेकर आनरेरी मैनेजर हो जाएं और शाम-सबेरे घंटा-दो-घंटा समय इस काम के लिए दें। जब जनता की ओर से उनके प्रयत्नों के लिए प्रशंसा मिलने लगे, देशी कपड़ों की मांग ज़्यादा हो जाए तो पूंजी भी बढ़ाई जा सकती है, दुकान और दुकानदारी का खर्चा भी उठाया जा सकता है।

जो लोग अपनी पूंजी से व्यापारिक सिद्धांतों पर देशी कपड़ों की दुकानें खोलें, उनको चाहिए कि ग्राहकों की आव-भगत, खातिर-तवाज़ो अच्छी तरह करें। देशी चलन के पाबंद लोगों के लिए दो-एक बीड़ा पान, दो- चार इलायचियां, जरा-सी तंबाकू और अंग्रेज़ी चलने वालों के लिए एक-आध सिगरेट या एक प्याली चाय काफी होगी। इस थोड़े से खर्च में यकीन है कि ग्राहकों की संख्या बहुत जल्द बढ़ जाएगी क्योंकि लोगों को इस दुकान से एक खास प्रेम हो जाएगा। दुकानदार भी पढ़ा- लिखा होना चाहिए जो खरीददारों से सभ्यतापूर्वक बातचीत कर सके। ऐसे दुकानदारों को ग्राहकों के साथ उस बेगरज़ी और रूखेपन से नहीं पेश आना चाहिए जिससे आमतौर पर मामूली सौदागर पेश आया करते हैं। अगर इन दुकानों पर दो-एक अंग्रेजी और उर्दू अखबार भी रखने का बंदोबस्त कर दिया जाए तो यह एक और दिलचस्पी बहुत से खरीददारों खींच लाएगी। पढ़े लिखे लोग यहां आकर बैठेंगे तो मौके और वक्त का तकाजा यही होगा कि व्यापार की उन्नति के बारे में बातचीत हो। और इस बातचीत से लोगों के दिलों में जोश पैदा होगा और यह जोश देशी व्यापार को उन्नति देने वाला होगा।

कहीं-कहीं देशी चीजों का जिस जोश और हमदर्दी से स्वागत किया गया है, वह उम्मीद दिलाता है कि अब हिन्दुस्तान का व्यापारिक जागरण बहुत दूर नहीं। लाहौर के आर्य समाज मेम्बरों को सर से पैर तक हिन्दुस्तान की बनी चीजों से सजे हुए देखना सचमुच बहुत दिलचस्प और याद रखने के काबिल दृश्य था। हम अपने समाजी भाइयों के देश-प्रेम और कौमी जोश के हमेशा से प्रशंसक रहे हैं पर हमको उम्मीद है कि हमारी व्यापारिक उन्नति में यह लोग उसी सम्मान और धन्यवाद के अधिकारी होंगे जिसके कि वह राष्ट्रीय और सांस्कृतिक सुधारों में है। बंबई और कलकत्ता जैसे शहरों में स्वदेशी आंदोलन बड़े जोरों के साथ किया जा रहा है मगर हमको उससे कई गुना ज़्यादा खुशी इस बात पर होती है कि हमारे सोए हुए सूबे में भी इस तरह की कमज़ोर आवाजें कभी-कभी सुनाई दे जाती हैं। हमको यकीन है कि इस साल बनारस में कांग्रेस के अधिवेशन का होना बनारस व लखनऊ व कानपुर के व्यापार के लिए बहुत अच्छा साबित होगा। मगर केवल पढ़े-लिखे लोगों के संरक्षण और सहानुभूति से हमारे व्यापार को भी यथेच्छ उन्‍नति नहीं हो सकती जब तक कि आबादी का वह बड़ा हिस्सा भी जो मुल्की और कौमी मामलों की तरफ से बेखबर है, इस अच्छे काम में हाथ न बटाए। पढ़े लिखे लोगों के नाम उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। उनकी रुचि और उनकी काल्पनिक आवश्यकताओं ने कुछ ऐसा रंग पकड़ लिया है, कि अभी उनको पूरा करने के लिए हमारे व्यापार को एक लम्बी अवधि दरकार है।

हमारी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा देहातों में आबाद है, जिसमें बिना किसी अतिरंजना के निन्यानबे फीसदी तो ऐसे हैं जो अलिफ के नाम बे भी नहीं जानते और जिनको शहर में आने का बहुत कम इत्तफाक होता है। लिहाज़ा शहरों में स्वदेशी दुकानों का खुलना, चाहे वह कैसे ही अच्छे उसूलों पर क्यों न हों, व्यापार को बहुत लाभ नहीं पहुंचा सकता। ऐसी दशा में उचित है कि हमारे व्यापारी भी वही ढंग अखितियार करें जो अरसे से विलायतियों ने अख्तियार किया है।

पाठक जानते हैं कि देहाती किसानों की ज़्यादातर ज़रूरतें कर्ज़ लेकर पूरी हुआ करती हैं। अगर आज आप किसी किसान को पचास रुपये की चीज़ उधार दे दीजिए तो वह बिना यह सोचे कि मुझमें इस चीज़ के खरीदने की योग्यता है या नहीं, फौरन मोल ले लेता है और फिर किसी न किसी तरह रो-धोकर उसकी कीमत अदा करता है। विलायतियों ने देहातियों के इस स्वभाव को बखूबी समझ लिया है। चुनांचे वह जत्थे के जत्थे आते हैं, शहरों में विदेशी और रद्दी माल सस्ते दामों पर खरीदते हैं और तब गांव में जाकर किसी एक मोतबर आदमी की ज़मानत पर किसानों के हाथ सौदा बेचते हैं। किसान अपनी माली हालत से बिल्कुल बेखबर होता है। उसमें दूरदर्शिता नहीं होती। झुंड के झुंड कपड़े खरीदने को टूट पड़ते हैं। आजकल अगर आप किसी गांव में निकल जाइए तो बजाए इसके कि लोग गंजी-गाढे पहने हुए नज़र आएं कोई तो इटली की बनी हुई बनियाइन पहने हुए दिखाई देता है, कोई अमरीका की बनी हुई चादर। वही चीज़ जो बाज़ार में मारी-मारी फिरती है, देहात में जाकर हाथों हाथ बिक जाती है और यह इसी वजह से कि किसानों को खरीदते वक्त दाम नहीं देना पड़ता। इन विलायतियों ने कितने ही जुलाहों को तबाह कर डाला और जुलाहों की तबाही से पूर्वी सूत की मांग जाती रही। इस तरह देशी रुई को मजबूरन इंगलिस्तान की खुशामद करना पड़ी।

हमारे देशी व्यापारियों को वह दिक्‍कतें हरगिज़ नहीं पेश आ सकतीं जो विलायतियों को पेश आती हैं। उनको सैकड़ों कोस की मंज़िल तय करना पड़ती है, गांव में प्रभाव रखने वाले लोगों का सहारा ढूंढ़ना पड़ता है और कभी-कभी कीमत की वसूली से हाथ धोना पड़ता है। देशी व्यापारियों को इन कठिनाइयों के बदले में सिर्फ इतना करना है कि गांव में मोतबर एजेंटों को रवाना करें, उनको उधार माल बेचने की इजाज़त दें और जहां तक हो कम मुनाफा लें। देहाती आमतौर पर ईमानदार होते हैं, सौदा ले लिया तो उसको कीमत अदा करने में गड़बड़ी नहीं करते। अगर खुदा न ख्वास्ता उनका ईमान ज़रा डगमगाया भी तो वह डरपोक ऐसे होते हैं कि दो-चार धमकियों में सीधे रास्ते पर आ जाते हैं। हमने देखा है कि विलायतियों को दाम वसूल करने में बहुत कम दिक्कत होती है। बेचारा किसान सूद पर कर्ज़ लाता है और निश्चित समय पर चीज़ की कीमत अदा करता है। जब विलायतियों को वसूली में कोई दिक्कत नहीं होती तो कोई वजह नहीं कि हमारे देशी एजेंटों को इस काम में कोई दिक्कत हो। बस जाड़े में चीज़ दे आए, उसकी कीमत फसल तैयार होने पर वसूल कर ली। और गर्मी में जो माल बेचा, उसकी कीमत ऊख पेरने के वक्त वसूल कर ली, न कोई ठक-ठक न कोई बखेड़ा। व्यापार का यह ढंग उससे कहीं ज़्यादा लाभदायक और देशभक्तपूर्ण है जिसको हुण्डी कहते हैं। बनारस, मिर्जापुर, इलाहाबाद वगैरह शहरों में हुण्डी का आम रिवाज है। इसका तरीका यह है कि यह हर एक गांव में महाजन की तरफ से कुछ लोग नौकर होते हैं। उनका काम यह है कि देहातियों को रुपया कर्ज़ दें और उनसे एक निश्चित अवधि के भीतर एक का सवाया वसूल कर लें। व्यापार के इस ढंग से चाहे महाजन को फायदा हो, मुल्क या कौम को सरासर नुकसान होता है। क्‍योंकि बेचारे किसान को दोनों तरफ से नुकसान उठाना पड़ता है। उधर तो मुगल सौदागरों को एक का डेढ़ दिया और इधर अपने महाजनों को एक का सवाया देना पड़ा। बेचारे की छोटी-सी आमदनी महाजनों ही भर को हो गई।


प्रकाशन इतिहास

[उर्दू लेख। 'देसी अशिया को क्योंकर फरूग हो सकता है' शीर्षक से उर्दू मासिक पत्रिका 'ज़माना', जून, 1905 में प्रकाशित। हिन्दी रूप 'विविध प्रसंग' भाग-1 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "देशी चीज़ों का प्रचार कैसे बढ़ सकता है." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1905, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/deshi-cheezon-ka-prachar. Accessed 22 Sep. 2026.