Cover Image for Malkana Rajput Musalmanon Ki Shuddhi (मल्काना राजपूत मुसलमानों की शुद्धि) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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लेख•1923•27 मिनट

मल्काना राजपूत मुसलमानों की शुद्धि

Malkana Rajput Musalmanon Ki Shuddhi

मल्काना राजपूतों के शुद्धि आंदोलन और उसके कारण बढ़ रहे सांप्रदायिक तनाव पर प्रेमचंद की गंभीर, संतुलित और दूरदर्शी समीक्षा।

Work Details

प्रकार: लेख
वर्ष: 1923
पठन समय: 27 मिनट (3,982 शब्द)

शुमाली (उत्तरीय) हिन्दुस्तान में मल्काना राजपूतों की शुद्धि का मसला अपने नताइज (परिणामों) के एतबार से जितना अहम हो रहा है, उतना शायद और कोई मसला न होगा। बिलखसूस (विशेषतया) इसलिए कि जहां तक अखबारों से ज़ाहिर होता है, हिन्दू जमाते इस तहरीक को जारी रखने और कवीतर (अधिक शक्तिशाली ) बनाने के लिए मुत्तफिक (सहमत) हो गयी है। शायद हिन्दुस्तान की तारीख में पहली बार आर्यसमाज ओर सनातन धर्म मसलेहीन (सुधारवादियों) और अंजुमन (समिति, संघ) में इत्तफाक और इत्तिहाद (एकता और मेल-जोल) नज़र आ रहा है। कोई शक नहीं कि हमारे मुस्लिम बिरादराने-वतन इस इत्तिफाक को शुबाआमेज्ञ (संदेहपूर्ण) नज़रों से देख रहे हैं और इस इज़्तिमाअ (सम्मिलन) को अपने कौमी वजूद के लिए खौफनाक समझते हैं। अब तक तबलीग (धर्म-प्रचार) के मैदान में मुसलमान यक्‍्कयेनाज़ (गर्व करने में अनुपम) थे। कोई इनका रकीब ( प्रतिद्वंदी) न था, लेकिन ये सूरते-हाल बहुत सुर्अत (शीघ्रता) से तब्दील होती जा रही है और मुसलमानों को यह अंदेशा होने लगा है कि कहीं यह तहरीक ( आंदोलन) हमारे कौमी ज़बंहाल (दुर्दशा) का पेशखेमा (पृष्ठभूमि) तो नहीं है? आर्य समाज से उन्हें ज़्यादा खौफ नहीं थी, जब तक शर्द्धि को तहरीक आर्यसमाज तक महदूद (सीमित) थी। वो उसकी ज़्यादा परवाह न करते थे, लेकिन हिन्दुओं की मज्मूई (सामूहिक) ताकत को उसकी इमदाद और इशाअत (प्रचार) पर आमादा देखकर मुसलमानों में सख्त बदगुमानी पैदा हो गई है। अब भो कुछ मुतास्सिब ( धार्मिक ) मुसलमान कांग्रेस के कामों में शरीक होते हैं और इस मुगायरत ( अलगाव) के फितने ( दंगे ) को फरू ( खत्म) करने की कोशिश में मुन्‍्हमिक ( संलग्न) हैं, मगर इन्हें जम्हरे-इस्लाम (इस्लामी लोकतंत्र ) अपने मज़हबी दायरे से खारिज ( बाहर' समझता है। ऐसे आदमियों की तादाद रोज़-ब-रोज़ ज़्यादा होती जाती है जो स्वराज की तहरीक ही से बदज़न (बदगुमान) हो गए हैं और स्वराज्य को हिन्दू- राज्य का मुतारादिफ (पर्यायवाची) कहने लगे हें।

हम ये मानते हैं कि हरेक कौम को अपने मज़हबी सदाकतों की इशाअत ( प्रचार | का कामिल (पूर्ण) इस्तेहकाक (अधिकार) है। इस आम हक से किसी जीफहम (बुद्धिमान) इंसान को इंकार नहीं हो सकता, मगर इसके साथ ही हमको यह भी मालूम है कि तब्दौले-मज़हब की हरेक मिसाल बेशुमार आदमियों को इससे कहीं ज़्यादा रूहानी सदमा पहुंचाती है। जहां तक उनको रूहानी- सुकून अता करती है, एक हिन्दू मुसलमान होता हैं तो लाखों हिन्दुओं के दिलों में तअस्सुफ (संताप, पश्चाताप ) का जोश पैदा होता है। यहां तक कि वो उस मुर्तद (धर्म बदलमे वाले) को जान से मार डालने की तदबारें सोचने लगते हैं। मज़हबी तौहीन का सबसे मुहलिक (घातक ? पहलू यही है कि कोई आदमी इससे मुनहरिफ (विमुख) हो जाय। ये गोया उस मज़हब को खामी का ऐलान है और ऐसे शख्स की जुबानी जो हमेशा से उसका मुतीअ (अनुयायी) रहा है। एक हिन्दू विधवा किसो मुसलमान के निकाह में आ जाती है तो हिन्दुओं को इससे जितना सदमा होता है, उसका इज़हार नहीं किया जा

सकता। हिन्दुस्तान के लोग मज़हब-परवर (धर्म-पालक) वाके हुए हैं। यहां मज़हब ने 'कौमियत', 'ज़ात', 'हसब-व-नसब' (वंश और प्रतिष्ठा) सब पर सिक्‍का जमा लिया है और इस ज़माने में मुसलमान हिन्दुओं से कोसों आगे हैं। इसलिए हम अंदाज़ा कर सकते हैं किसी मुसलमान के हिन्दू हो जाने से उन्हें कितना सदमा होगा। ऐसी हालत में क्या यह मुनासिब नहीं है कि तब्लीगी तहरीकें यककलम (पूर्णत:) बंद कर दी जाएं और चंद अफराद (व्यक्तियों) के रूहानी इत्मीनान (तुष्टि) के लिए एक कौम के दिल को ईज़ा (कष्ट, यातना) न पहुंचाई जाय। मज़हब अपने सच्चे मानों में खालिक (स्रष्टा/ और माबूद (ईश्वर) का मामला है। हर एक शख्स को इख्तियार है कि वो जिस तरीके (प्रणाली, नियम) से चाहे माबूद की परस्तिश (पूजा) करे। मगर इसकी क्या ज़रूरत है कि इस खफोफ (साधारण) से वाकिये की सारे मुल्क मे तशहीर ( प्रसिद्ध) की जाय? खामख्वाह जुलूस निकाले जाएं, जश्न मनाया जाय। इससे किसी मज़हब की वकत ज़्यादा नहीं होती, कम होती है। हम गिला नहीं करते, मगर हक (सच्चाई) हमको ये कहने पर मजबूर करती है कि हिन्दुओं में इस तहरीक की बिना (नींव) मुसलमानों ने डाली। वो ही उसके जिम्मेदार हं। उन्हीं के मज़हबी जोश ने हिन्दुओं को इज़्तिमाअ (इकट्ठा होने) और इनज़बात (संगठन) पर आमादा किया। जिन सूबों में मुसलमानों को आबादी ज़्यादा हैँ, वहां हिन्दुओं को आसाइश (सुख -चैन) और इत्मीनान मयस्मर नहीं। उनकी लड़कियां, उनको बेवाएं हमेशा इस्लामी -दस्तबुद (लूट खसाट) का शिकार होती रहती हैं और मुसलमान इस मामले में अपनी सुकृत (खामोशी।) को ज़र्रो (सुनहलों ) पालिसी को तोड़ना मुनासिय नहीं समझते। हम हिन्दुओं को इस तहरीक के इजरा ' जारी) के लिए मुहिम # संघर्ष ) नहीं करते, लेकिन चूंकि हिन्दू कौम ज्यादा तालीमयाफ्ता, बिलखेर कोमियत की ज़्यादा दिलदादा है, सिमत (इस दृष्टि से) ये देखकर अफसोस होता है कि बिल आखिर (अंतत:) इसने भी तब्लीग (प्रचार) का वा ही रवेया इस्क्तियार किया, जिस पर उस खुद एतराज़ था, चाहे बांगे- दुहुल (नक्कारे की ऊंची आवाज़) से ऐलान किया जाय कि हिन्दू-कोम ने शुद्धि की तहरीक महज़ अपना शीराज़्ा (संगठन बाधने की लिए जारी की है और उसे किसी फिरका या मज़हब को नुकसान पहुंचाना मंजूर नहीं हे, लेकिन हम कहे बगैर नहीं रह सकते कि ये सरीह (स्पष्ट) एरलक्चात/०ा को पालिसी हैं ओर इसी मौके पर जबकि हमने इसको सियासी मामलात में ममनू (निषिद्ध) समझ रखा है। मज़हबी मामलात में इस पर कमरबंद ( पाबंद ) होना नाकाबिल- अफ्व ( अक्षम्य ) है। यह माद्दीयत ( भौतिकता) का दौर है। माद्दो (भौतिक) अग्राज्ञ (स्वार्थ) ब- मकासिद (उद्देश्य) जिसका मजमुई (सामूहिक नाम सियासयात ( राजनीति) रखा या है, जिन्दगी के कुल शोबों (विभागों) पर हावो हैं। मजहब भी इस कुल्लिये ' सिद्धांत) से मुस्तस्ना (बचा हुआ) नहीं। हम आजकल मजहब को तलकीन ( सदुपदेश ) और तब्लीग ( प्रचार), रूहानी सदाकतों ( आत्मिक सत्यताओं ) के बिना पर नहीं करते। इसमें सियासी और मुल्की फबाइद (लाभ) मुजमिर (गोपक, छिपे हुए) और मखफी गुप्त) होते हैं। जमानए कदीम (प्राचीन काल) में मजहब कुल दुनियावो उमूर

(समस्याओं) पर हुक्मरान (शासक) था। अब सियासी हुकूमत और चीरादस्ती (जोर- जबर्दस्ती) का जमाना है। हिन्दुस्तान में ईसाइयत की मनादी इसलिए हो रही है कि अंगरेज्ञी गोरभिण्ट को ऐसी जमात की इमदाद का यकीन हो जाय जो हम-मिल्लत (एक कौम का) होने के बाइस उसके दामन से बाबस्ता (बंधा) रहना अपने बजूद (अस्तित्व) के लिए लाजमी समझे। हिन्दू भी इसी सेलाब की जद (मार, चोट) में आ गए हैं। इस्लामी हुकूमत का जमाना मजहबा तास्सुबात (धार्मिक मदांधता) का जमाना था। उस वक्‍त तब्लीगे-इस्लाम (इस्लाम के प्रचार) का मंशा सियासी नहीं, बल्कि महज मजहबी था और गालिबन मौजूदा जमाने में भी यह तहरीक सियासी वजूद पर मबनी (आधारित) नहीं है। मगर हिन्दुओं की शुद्धि खालिसन (शुद्धत:) और कुल्लियतन (पूर्णत:) सियासी उमूर (मामलात, समस्याओं) पर मबनी है। जात की तफरीक (अंतर) को मिटाना, उसूलों को हम आगोश (आलिंगित, बगलगीर) करना, और इसी किस्म की दोगर तमददुनी तहरीकें सियासी फवाइद (लाभों) को मद्दे-नजर रखकर जारी की गई हैं। हमारा हुब्बे-वतन (देश-प्रेम) हुब्बे-मिल्लत (जाति प्रेम) है। हम किसी अप्र (कार्य, समस्या) को मुल्की नुक्ताए-नजर (दृष्टिकोण) से नहीं बल्कि मजहबी नुक्ताए-नजर से देखने के आदी हैं। हम जुबान से चाहे जो कुछ भी कहें, मगर दिल से हम पहले हिन्दू, बाद को हिन्दुस्तानी हैं, इसमें शक नहीं कि दीगर मुहज़्ज़ब (सभ्य) मुल्कों में भी वतन ने हुब्बे-मिल्लत को कुल्लियतन महव (पूर्णत: समाप्त) नहीं किया है। मगर वहां मजहब की हैसियत सानबी (द्वितीय, है। उनकी निगाहें वसीअ हैं। वह किसी मामले को मुल्की एतबार से जांचने के आदी हैं। फ्रांस, जर्मनी या अमेरीका में अगर हिन्दू या मुसलमान ज्यादा होने लगें तो वहा कोहराम नहीं मचेगा। अमरीका में आज हिन्दियों को तादाद इतनी ज्यादा हो जाय कि वहां हर-एक तालमगाह में हिन्दी की तालीम को जबरी करार देने का मसला दारुल कवाबीन (विधान-मंडल?) में मंजूर हो जाए तो यकौनन अमरीका बाले इस अपने मुल्क के लिए तबाही का शुगुन न ख्याल करेंगे। वहां तफरीक (शत्रुता, विरोध, पृथकता) की बुनियाद रंग है, मजहब नहीं। हम यह नहीं कहत कि उनके तफरीक की बुनियाद हमारी बुनियादे- मुखासेमत (झंझटों के आधार) से कम मुजिर (घातक?) है। वहां भी आए दिन शब्बो-शत्म (गाली-गलौज) की नौबत आती रहती है, मगर उनकी तकदीर अपने हाथ में है। इस मसले पर उनकी जिन्दगी या मौत मबनी ( अवलम्बित) नहीं है। जहां और मुतनाजे (विवादास्पद) उमूर (समस्याएं) हैं, मसलन मजदुरों और सरमायादारों का मसला, वहां एक यह भी है। मगर हिन्दुस्तानी का हालत बिल्कुल जुदागाना (भिन्‍न) है। हिन्दू और मुसलमान दोनों ही सियासी, तमददुगी ( सांस्कृतिक ), माली-मसाइल ( आर्थिक-समस्याओं) में मजहबी तफवीक (तरजीह, प्रधानता) के हामी हैं, और हकीर (क्षुद्र) फवाइद (लाभों) के लिए मुहतमविश्शान ( भव्य, शानदा.) कोमी अग्राज (उद्देश्यों) को कर्बान कर देने में पसोपेश नहीं करते आइए अब देखें कि इस शुद्धि से हिन्दुओं ने क्या फायदा सोच रखा है। साफ जाहिर है कि हिन्दुओं की तादाद ज्यादा हो जाएगी और इसी मुनासबत (अनुपात) से मुसलमानों की तादाद कम होगी। मगर क्या कौमी मुआमलात में तादाद ही सब कुछ

है? तजुर्बा तो यह बतलाता है कि फीजमाना (इस युग में) तादाद की कोई वक्‍त नहीं। जर्मनी के छ: करोड़ बाशिन्दे रूएजमों (संपूर्ण पृथ्वी ) के बांशिन्दों को दावते-जंग (युद्ध का आह्वान) दे सकते हैं। छ: करोड़ का इंगलिस्तान बत्तीस करोड़ के हिन्दुस्तान पर कामयाबी के साथ हुक्मरानी कर सकता हे, तो तादाद की इतनी अहमियत क्‍यों है? सिक्‍खों की तादाद कभी सोलह या सत्रह लाख से ज्यादा न थी, लेकिन उन्होंने पंजाब और सरहदी सूबों पर हुकूमत की और अगर अंगरेजों ने उनके कदम न रोक दिए होते तो गालिबन वह अपनी सल्तनत की हुदुद (सीमा) को और भी ज्यादा वसीअ कर सकते। गोरी या गजनी दस-बीस करोड़ की जमात लेकर हिन्दुस्तान पर हमलावर नहीं हुए थे। यूनान ने किसी जमाने में आलमगीर (विश्वव्यापी ) सल्‍्तनत कायम की। इटली भी एक जमाने में सारे योरोप पर हावी था। इससे जाहिर होता है कि तादादी फौकियत (संख्या की प्रधानता) सियासी फौकियत (राजनीतिक प्रधानता) की मूजिब ( कारण) नहीं। बल्कि बाहमी ( आपसी ) इन्जबात (संगठन) और इत्तिफाक (एकता) ही वह चीज है जो कौम को कवी (शक्तिशाली) और बाअसर बना देती है।

हिन्दू आज चौबोस करोड़ हैं। अगर बहुत सरगर्मी (उत्साह) से काम लिया गया तो गालिबन दो-चार साल में सवा चौबीस करोड हो जाएंगे। इससे ज्यादा किसी तरह नहीं हो सकते। सारे मुल्क को हम-मजहब (एकधर्मी ) बनाने का खयाल जुनून से ज्यादा वकत नहीं रखता, तो जब चौबीस करोड़ हिन्दुओं ने अपने को सियासी गुलामी से आजाद करने के नाकाबिल पाया तो ॥/4 (चौथाई) करोड़ हिन्दुओं के इजाफे से क्‍या तवक्कों (आशा) की जा सकती है? शायद ज्यादा से ज्यादा इसका असर यह होगा कि एक या दो मेंबर कौंसिल में ज्यादा हो जाएंगे, तो इतने हकीर (तुच्छ) नतीजे के लिए इस कदर शोरोशराब (शोरोगुल, चौख-पुकार) की क्‍यों जरूरत समझी जाती है? क्‍या इस तहरीक के हामियों को इतना भी नजर नहीं आता कि इससे बाहमी मुगायरत (आपस में बेगानापन) बढ़ती जाती है और रोज- बरोज स्वराज्य के मंजिले-मक्सूद से दूर होते जाते हैं। वही अमृतसर है, जहां तीन साल कब्ल (पूर्व) हिन्दुओं और मुसलमानों ने खूनी यगानगठत (एकता, सहमति) का ऐसा ऊंचा मेयार (स्तर) पेश किया था, जिसकी नजीर (उदाहरण) हिन्दुस्तान की तारखी में मुश्किल से मिल सकती है। उसी अमृतसर में आज दोनों फिरकों में खुरेजी के बाजार गर्म है। इसके लिए हम एक बड़ी हद तक इसी शुद्धि को तहरीक को मूरिद-ए-इल्जाम (दोषी) समझते हैं। गनीमत हे कि अभी तक कांग्रेस के हामी मुसलमानों ने तहम्मुल (सहनशीलता) और जब्त से काम लिया है। मगर अब इसकी अलामतें (लक्षण) नजर आ रही हैं, जैसाकि मौलाना अबुल कलाम आजाद की एक ताजा तकरीर से साबित होता है (खुदा करे वह रिपोर्ट नादुरुस्त हो) कि अब उन लोगों का तहम्मुल (सहनशीलता) भी इन्तिहाई हद तक पहुंच गया है, और यही कैफियत रही तो वह दिन दूर नहीं है, जब हमको उनकी मुखालफत का अलानिया (खुल्लमखुल्ला) सामना करना पड़ेगा। यह खबर भी जब उस कुद्सीसिफात ( देवात्मा) , फना-फीलकौम (कौम पर मिटने वाला) , पाकनफ्स ( पवित्र आत्मा) बुजुर्ग को मिलेगी जो इस वक्‍त यरवदा जेल में अपनी कौम का कफ्फारा

(प्रायश्चित ) अदा कर रहा है, तो मालूम नहीं, उसके सरीउलहिस (तीत्र) संवदेनशील) दिल पर क्या गुजरेगी। हिन्दू-मुस्लिम इत्तिहाद उसके कौमी तामीर (निर्माण) की बुनियाद थी। उसे उसने अपने खूने-जिगर से कायम किया था। वह इसी मजबूत बुनियाद पर अपनी आलीशान इमारत खड़ी करना चाहता था। इससे कब्ल (पूर्व) जमाना-ए-हाल के मुदीरों (संपादकों ) में किसी ने इस बुनियाद को मुस्तहकम (स्थायी ) और पायेदार बनाने की जरूरत नहीं समझी थी या उनमें इसकी सलाहियत (योग्यता) ही न थी। मगर आज अफसोस है कि आज हमारे चंद मजहबी फिदाइयों (भक्तों) को मजनूनाना (विश्लिप्त) सरगर्मी (उत्साह) इस बुनियाद को मुतजलजिल (कम्पित) किए देती है। हमको हिन्दुओं के तदब्बुर (बुद्धि) पर एतमाद (भरोसा) था। हमको अंदेशा था कि हिन्दू कौम की जानिब से इस इत्तिहाद को कोई अंदेशा नहीं है। अगर अंदेशा था तो मुसलमानों की जानिब से कि वह अबंबि-इख्तियार (सत्ता£ गरियों) को तहरीस-व-तरतीब (प्रलोभपूर्ण संगठन) का शिकार न हो जाएं। मगर हुआ क्या? हिन्दुओं ने पहले इस बुनियाद पर फावड़ा चलाया और यह हजरात दलीलें केसी पेश करते हैं | कोई कहता है हिन्दू अपने तईं मजबूत बना रहे हें और मुसलमानों को खुश होना चाहिए कि उनके बिरदराने-वतन में मुकाबले और मुजादल (लड़ाई) को कुव्वत पैदा हो रही है। इस अक्ल पर आंसू बहाने के सिवा और क्या किया जा सकता है? एक भाई को दूसरे भाई का गला घोंटकर मुकाबले का सबक सिखाया जा रहा हे? इस पहलू से देखा जाए तो हमें हिन्दुस्तानियों से ज्यादा हमासिफत (सर्वगुण-संपन्‍न) मौसूफ ( प्रशंसित) और कोई कौम नजर न आएगी, क्योंकि यहां हर एक घर का एक अखाड़ा है और वहां भाई-भाई, बाप बेटे मुकाबले और मुजादले (लड़ाई) की मश्क (कोशिश) कर रहे हैं। हमसे ज्यादा खुशनसीब और कौन होगा? मि

दुनिया में सबसे खौफनाक काम मजहबी तास्सुबात ( धार्मिक मदांधता ) को बरअंगेख्त करना (उकसाना) है। यहां तक कि सल्तनतें भी इस दायरे में कदम रखने की जुर्रत नहीं करती, मगर हिन्दुओं की दिलेर कौम इस वक्‍त शुजात ( बहादुरी ) के जोश में किसी रुकावट की परवा नहीं करतीं। कोई मार्शल लॉ और सख्त से सख्त जबरी कवानीन ( दमनकारी कानून) इनने मोहलिक (नाशक?) नहीं हो सकते, जितने बरअंगेख्ता तास्सुबात। इससे मस्तूरात ( स्त्रियों) को बाहर निकालना मुश्किल हो जायगा। अमृतसर में एक हिन्दु लड़की की बेहुरमती ( बेइज्जती ) ने कितनी जानें हलाक की ! ऐसे हादसे रोज ही वुकुअ (घटित, दुर्घटना के रूप) में आते रहेंगे और इस तरह रोज ही खून-खराबा होता रहेगा। अगर इस बाहमी जंग - व-जदल से कोई तीसरी पार्टी फायदा न उठाने वाली होती और हिन्दुओं और मुसलमानों ही के शिकस्त और फतेह पर मसले का दारोमदार होता तो एक फरीक (पक्ष, दल) दूसरे परगालिब ( प्रबल,विजेता 2 आकर अपने तईं मुबारकबादी का मुस्तहक ( पात्र, योग्य / समझ सकता था, लेकिन जब हम देख रहे हैं कि इस किस्म के इख्तिलाफात ( मतभेद ) हमारी गुलामी की जंजीरों को और मजबूत किए देते हैं तो करीने -कयास ( ज्ञानगम्य) नहीं मालूम होता। क्योंकर कोई फहमीदा ( बुद्धिमान) शख्स इन हालात को मुतमइन ( निश्चित) नजरों से देख सकता है? हमारे बाहमी इत्तिफाक ने दुश्मनों के पित्ते पानी कर दिए थे। इतना अहम

(महत्त्वपूर्ण ) होते हुए भी यह हमारी कौमी किलाबंदी का नाजुकतरीन पहले था। हरीफ ( शत्रु) इसी मुकाम (स्थान) पर अपनी मर्क॑जी ( केन्द्रीय) ताकत का असर डालना चाहता था और हमारी नामाल-अंदेशी ( अदृदर्शिता) और कोताहनजरों (संकीर्ण दृष्टि) के बाइस उसकी कोशिशें कामयाब हो गईं।

हम शुद्धि के हामियों से पूछते हैं क्या हिन्दुओं को मुस्तदकम (शक्तिशाली?) बनाने का यही एक वसीला (उपाय) है? उनको क्यों नहीं अपनाते, जिनके अपनाने से हिन्दू कौम को असली कुव्वत हासिल होगी। करोड़ों अछूत ईसाइयों के दामन में पनाह लेते चले जाते हैं। उन्हें क्‍यों नहों गले से लगाते? अगर आप कौम के सच्चे खैरख्वाह हैं तो उन अछूतों को उठायें, इन पामालों (पद-दलितों) के जख्म पर मरहम रखें। उनमें तालीम और तहजीब की रोशनी पहुंचायें, आला (ऊंच) और अदना (नीच) की केदों को मिटायें। छुतछात की बेमाना (अर्थहीन) और मुहमिल (निरर्थक) कैदों से कौम को पाक कीजिए। क्‍या हमारी रासिखुल-एतिकाद (अटल धर्मविश्वासी), मजहबी जमातें डोमों और चमारों से बिरादराना मसावात (समानता) करने के लिए तैयार हैं? अगर नहीं हैं तो उनकी शीराजाबंदी (संगठन, जोड़ने) का दावा बातिल (झूठा) है। आप या तो हुक्काम की रेशादवानियों (गुप्त कोशिशों) के शिकार हो गए हैं, या मजहबी तंगनजरी ने आपकी बिसारत (दृष्टि) को गायब कर दिया है। आपको वाजीै (स्पष्ट) हो कि मुसलमानों से दुश्मनी करे अपने पहलू में कांटे बोके आप अपनी कौम को मजबूत नहीं कर रहे हैं। आप मुसलमानों को जबरन कहरन हुकमुरा कौम की मदद लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं। आप अपनी तलवार मुकाबिल (प्रतिद्वंद्वी) के हाथ में दे रहे हैं। आपका खुदा ही हाफिज है। फिर भी क्‍या खबर है कि जिन मुसलमानों या बरायेनाम मुसलमानों को पाक करने के लिए आप सारी कौम को तबाही को तरफ लिए जा रहे हैं, वह हमेशा हिन्दू-दामन से बाबस्ता (बंधे) रहेंगे? कम-अज-कम (कम-से-कम) साबिकेतजर्बात (विगत अनुभव) तो इस इस्तिक्लाल (मजबूती, दृढ़ता) की शहादत (गवाही) नहीं देते, और समाज ने जितने मारके की शुद्धियां कीं, हर मौके पर धोखा खाया। धर्मपाल, धर्मवीर व गैरअहम (महत्त्वीन) सब के सब आज फिर मुसलमान हैं, तो कौन यह कहने की जुर्जत कर सकता है कि मल्काने राजपूत इस नयी मेहमानी का लुत्फ उठाने के बाद अपने घर की तरफ रुख न करेंगे? हमको शक है कि इस जोश-व-खरोश के बाद जब इन हिन्दुओं को हिन्दू सोसाइटी से कमाहका (पूर्णत:) वाफफियत होगी, वे देखेंगे कि हमको शुद्धि से कोई खास फायदा नहीं हासिल हुआ-हमार साथ अब भी वही छूतछात जारी है। हमारी औलादों की शादियों में अब और भी ज्यादा रुकाबढें पैदा हो गयी हैं, तो मुतनफ्फिर (घृणा करने वाला) होकर फिर इस्लाम का दरवाजा खटखटायेंगे। मुस्लिम सरबरावर्द गाने कौम (कौम के प्रतिष्ठित व्यक्ति) को पॉलिसी को जितनी मद्हा (प्रशंसा) व सिताइश (तारीफ) की जाय, वह कम है। वह मोतरिफ ' स्वीकार करने वाला) है कि हिन्दुओं को अपनी मजहबी तब्लीग का कामिल (संपूर्ण) इस्तेहकाक (अधिकार) है, लेकिन जब यह तब्लीग इन्फिारादी (व्यक्तिगत) हैसियत से गुजरकर मजमूई (सामूहिक) सूरत इख्तियार कर लेती है, जब अखबारों में उसके

जोर और तरक्की की खुश-आइंद (प्रिय) खबरें शाया (प्रकाशित) होती हैं, मुबारकबाद दी जाती हैं, चंदे होते हैं, वालण्टिर जमा किये जाते हैं, एक बाकायदा शुर्ध्किंप खोल दिया ये है तो सूरते-हाल तब्दील हो जाती हैं और उनका यह कौल बिल्कुल सही है।

जमींदारों और काश्तकारों में जाबजा (जगह-जगह ) बदमगजिगयां होती रहती हैं, उनका शुमार मुल्क के मामूली वाकेआत में किया जाता है। इस तरफ किसी को तवज्जो नहीं होती, लेकिन अगर यही बदमजगियां ज्यादा इज्तिमाई (सामूहिक ) सूरत इख्तियार कर लें, किसानों के छत्ते कायम हो जायें, उधर जमींदारों की टोलियां बन जायें और आपस में बाकायदा जंग छिड़ जाय, तो सारे मुल्क में बावेला (हाहाकार) मच जायेगा।

बड़े शद्दोमद (जोर-शोर) के साथ कहा जाता है कि मल्काना तो दरअसल हिन्दु हैं। इन्हें मुसलमान समझना ही गलती है। वह हिन्दु नाम रखते हैं, हिन्दु देवताओं की पूजा करते हैं, शादियों में पुरोहितों को बुलाते हैं। सिर्फ मुर्दे दफन करते हैं और खतना कराते हैं, इसलिए उन्हें फिर हिन्दू दायरे में लेकर हम मुसलमानों पर कोई ज्यादती नहीं कर रहे हैं। मगर सवाल तो यह है कि अब तक मल्कानों का शुमार मर्दुमशुमारी के कागजात में किस जैल (समुदाय) में होता था? हिन्दुओं में या मुसलमानां में? जब यह जाहिर है कि वे मुसलमान शुमार किये जाते हैं तो उन्हें तब्दीले मजहब पर आमादा करना यकीनन मुसलमानों की आदादी-कुव्वत (संख्या को शक्ति) को जरर (आघात, हानि) पहुंचाना है। हिन्दुओं में कितने ही ऐसे फिरके हैं जो इस्लामी रस्मोरिवाज की पाबंदी करते हैं, पांचों पीरों की परस्तिश (पूजा) करते हैं, सैयद गाजी के मजार पर सिजदे करते हैं, ताजियों को शर्बत चढ़ाते हैं, मुहर्रम में सब्ज कपद़ पहनकर निकलते हैं। अगर इसी दलील पर आज वे सबके सब मुसलमान हो जाय ते क्‍या हिन्दू यह खयाल करके अपने को तस्कीन दे लेंगे कि वह तो बराएनाम हिन्दू थे? हिन्दुओं में ऐसे फिरके मौजूद हैं जो गायकुशी (गो-हत्या) करते हैं, मुसलमाना के घर के जूठे टुकड़े खाते हैं, मगर आज उनके मुसलपान होने को खबर पाकर हिन्दू जामे से बाहर हो जायेंगे। इसीलिए न कि इससे उनकी तादादी कुब्वले मारिज (संख्या-शक्ति के दौरान) खतरे में आती है। यह भी एक हुज्जत (दलील) पेश का जाती है कि मल्काने खुद-बखुद दस्तबस्ता (हाथ जोड़े) इल्तिजा कर रहे हैं कि हम हिन्दू बिरादरी में दाखिल कौजिए, हम अब मुसलमान नहीं रहना चाहते। माना, मगर क्या अब तक मल्काने सोते थे या आज किसी मोजिज ( पैगम्बरी चमत्कार) से उनको मजहबी इरादत ( श्रद्धा) हिन्दुओं के तरफ मुन्तकिल (स्थानान्तरित) हो गयी है? कोई तहरीक (आन्दोलन) बिला खर्जी (बाहरी) तहरीक और इश्तिआल (उत्तेजना/ क आलमगीर (विश्वव्यापी) नहीं हुआ करती। नमक ही इजाफाए-महसूल (कर-वृद्धि / को ले लीजिए। सियासी और बाखबर हलकों में इस पर जिस कदर चूनोचरा ' वाद 6 विवाद) हो रही है, इसके अस्रे-अशीर (छोटा हिस्सा) भी गरीब देहातियों में नह है, जिन पर इस इजाफे का बार (भार) पड़ेगा। अवाम में इश्तिआल (उत्तेजना) पैदा करने से होता है। यह शुद्धि की तहरीक भी इसी किस्म की है। शुद्धि के हामियो

ने महीनों और बरसों से यह तैयारी की होगी, ढेले तोड़े होंगे, ककर चुने होंगे, पानी से सेराब करके ढेलों को नरम किया होगा, तब जाकर अब तुख्मरेजी (बीजारोपण) का मौका आया है। इस किस्म की दलीलें पेश करना अपने को तूदए-तजहीक (हंसी का पात्र) बनाना हे।

समझ में नहीं आता कि यह तहरीक इस खाम मौके पर क्‍यों जारी की गयी। मुसलमानों के दिल में यह शक पैदा होना फितरी (प्राकृतिक) है कि उन्हें बुलाकर, उन्हें दोस्त बनाकर तो यह बगली घूंसा नहीं लगाया जा रहा है? जब तक उनसे चशमक (विरोध) था, रकीबाना मुखालफत (शत्रु-सा विरोध) का हंगामा गर्म था, तब तक हिन्दुओं को यह तहरीक जारी करने की हिम्मत न पड़ी। अब जब उनसे बिरादराना इत्तहाद कायम होना शुरू हुआ तो हिन्दुओं को उनकी जानिब से कोई अन्देशा नहीं रहा। यह सवाल हरएक मुसलमान के दिल में कुदरती तौर पर पैदा होता है, और इसे मनतको (तक की) इन्तिहा (सीमा) तक ले जाने उसे गुमान होता है कि कहीं ये सब दिलजोइयां (दिल-बहलावे) और तलत्तुफ-आमेजियां (आनंद देना, मेहरबानियां ) , यह इत्तिहाद और इर्तिबात ( मैत्री ) हमें सुफए-हिन्द (हिन्दुस्तान की भूमि) से मिटाने का पेशखेमा (पूर्व -षद्यंत्र ) तो नहीं हैं? इस गुमान का इजाला (निवारण) क्यों कर किया जाये? दलीलों से इसका इजाला नहीं होता। जब हामियाने-शुद्धि (शुद्धि के समर्थक ) यह कहते हैं कि हम इस तहरीक से दस्तबरदार (विरक्त) नहीं होंगे, चाहे इसके नताइज (परिणाम) कितने ही नाखुशगवार क्‍यों न हों, हम तकदोर की- सी सबात स्थिरता के साथ खामोशी से मवानेआत (रुकावटों) को मुत्लक (बिल्कुल) परवाह न करके इस तहरोक ( आंदोलन) को जारी रखेंगे तो ऐसी हालत में इस गुमान जा इजाला होना तो दूर रहा, वह और वासिक (दृढ़) होता जाता है। यह सबात (स्थिरता) और अज्म ( श्रेष्ठता ) किसी ज्यादा कारामद (उपयोगी ) तहरीक के लिए मौजूं (उचित) था।

शुद्धि के हामियों से तो अब हमें ज्यादा माकूलपसंदी को उम्मीद नहीं, उन्हें मजरहबी जुनून ने अजकार रफ्ता (बेकार, नामर्द) कर रखा है। मगर हम हिन्दू कौम से पूछते हैं, अब एसी हालत में शुद्धि तहरीक के मुताल्लिक आप क्‍या तर्जेअमल ( कार्यविधि ) इख्तियार करना चाहते हैं? क्या आप उसके हामियों की दामे-दिरमे ( रुपये- पैसे से), सुखने (जबान से) इमदाद देकर हमेशा के लिए हिन्दू-मुस्लिम इत्तहाद या दूसरे लफ्जों में स्वराज्य और कौमी हुकूमत से दस्तबरदार (विरक्‍्त) होना चाहते हैं या अपनी जुबानी और अमली हमदर्दो को इस तहरीक से अलग करके इस इत्तहाद को कायम रखना चाहते हैं? इतने दिनों में बहुत-कुछ नुकसान हो चुका है। जब्त व तहम्मुल (सहिष्णुता) की रस्सियां तन गयी हैं और घर में बड़ी सेंघ पड़ गयी है, लेकिन अगर आप अब भी चौंके तो इसकी नुकसान-तलाफो ( क्षतिपूर्ति) हो सकती है। जब्तो-तहम्मुल की रस्सियां फिर ढीली हो सकती हैं और चोर सेंध के दरवाजे से भाग सकता है। यही मौका आपके जागने का है, यही मौका आपकी आने वाली तबाही से बचने का है। एक झपकी और ले ली, सहलंगारी (काहिली) से घाट पर पड़े रहे, तो फिर भागना बेसुद (निष्फल) है, क्योंकि उस वक्‍त आपका सब-कुछ

गायब हो चुका होगा। हिन्दुओं कौ मजहबी रवादारी (सहृदयता, उदारता) मशहूर है। मजहबी मजाहेमत उनके यहां ममनूअ (निषिद्ध) है। यह मौका कि हम इस रवादारी (सहृदयता ) का इजहार (प्रकट) करें, और फिर पछताना और हाथ मलना बेसूद (व्यर्थ) होगा।


प्रकाशन इतिहास

[उर्दू लेख। उर्दू मासिक पत्रिका 'ज़माना', मई, 1923 में प्रकाशित। हिन्दी रूप 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "मल्काना राजपूत मुसलमानों की शुद्धि." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1923, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/malkana-rajput-musalmanon-ki-shuddhi. Accessed 22 Sep. 2026.