महाशय सुदर्शन जी का यह नोट हमें उस समय मिला जब हम स्वयं “चांद' (मारवाड़ी अंक-गोयनका ) के विषय म॑ अपने विचार प्रकट करन जा रहे थे, मगर सुदर्शन जी ने हमारे भावों को इतने जोरदार और मर्मस्पर्शी शब्दों में व्यक्त कर दिया है कि अब हमें कुछ लिखने की जरूरत नहीं मालूम होती। ' चांद ' ने स्त्री-समाज क॑ सुधार का बीडा उठाया है। कह नहीं सकते, सुधार से उसके मनस्वी सम्पादक का क्या मंशा है। वह अंगेज महिलाओं का आदर्श हमारे सामने पेश करता है, या रूसी, या अमेरिकन, या उसने खुद कोई नमूना ईजाद किया है। हमारी समझ में तो ऐसा भ्रष्ट साहित्य संसार की किसी भाषा में नहीं है। गन्दी चीजें बिकती खूब हैं, इसमें सन्देह नहीं। कोई उसे पसन्द न करे, पर एक बार पढ़ना अवश्य चाहता है। भांडों की गन्दी गालियां सुनने और उन पर हंसने के लिए लोग बेदरेग रुपये खर्च करते हैं। यह
मन की एक प्रवृत्ति है। शराब की तरफ क्यों मन लपकता है? हम जानत हैं कि यह अच्छी चीज नहीं, फिर भी शौक से पीते हैं। 'चांद' के सुयोग्य सम्पादक ने मन की इसी प्रवृत्ति से अपना मतलब गांठने की तरकीब निकाली है। कह नहीं सकते, उसे कहां तक सफलता हो रही है। सुनते हैं, उसक्री ग्राहक-संख्या 5000 हो गयी है। किसी सरकारी ऑडिटर ने इसकी तस्दीक भी की है। फिर भला सन्देह की कहां गुंजाइश है? मगर उस पर भी ।000 रु> माहवार का घाटा हो रहा है। शायद सहगल साहब को कोई दफीना मिल गया होगा, या सम्भव है कारूँ का खजाना या पारस पत्थर हाथ लग गया हो, जभी तो इतनी बडी हानि हर महीना उठा रहे हैं और यह सब हिन्दू-स्त्रियों के उद्धार के लिए | उनकी दुरवस्था देखकर आप रक्त के आंसू रोते रहते हैं। आप उन्हें कामी पुरुषों के हमलों से बचाने के लिए ही तो कामासक्त नरेशों की कामलीला के नग्न चित्र खींचते रहते हैं। महिलाओं को राजा साहब की गैलरी और पट्टों के जोड़ का हाल सुनाकर आप उनके सुधार ओर संस्कार की कुछ कम कोशिश कर रहे हैं | खेर '
'चांद' ने पक्के ओर कुशल व्यापारियों की भांति बिक्री क॑ सिद्धान्त को सर्वोपरि समझा है। चीज बिकनी चाहिए, उससे किसी की हानि होती है तो हमारी बला से ! मुर्दा दोजख में जाय या बहिएत में, हमें अपने हलवे-मांडे से मतलब हैं। इधर हमसे कई महिलाओं ने 'चांद' की हृण 4 प्रवृत्ति की शिकायत की, फिर भी ' चांद ' के कार्यालय में ऐसे पत्रों का तांता लगा रहता है जिनमें ऐसे ही लेखों का आदेश किया जाता है। हम तो जनता से यही कहेंगे कि यदि वह स्त्री-समाज का उपकार चाहती है, तो उसे 'चांद' का बहिष्कार करना चाहिए। ऐसे साहित्य से समाज को जो हानि हो रही है, उसका अनुमान करना कठिन हैं। अगर ' मातृ-मन्दिर' में भी इसी नीति का पालन किया गया, तो स्त्रिया का ईएवर ही मालिक है। ऐसी मनोव॒त्ति का आदमी “मातृ-मन्दिर जसी संस्था का संचालक हो, यह समाज का दुर्भाग्य है।
प्रकाशन इतिहास
[टिप्पणी। हिन्दी मासिक 'माधुरी' वर्ष 8, खण्ड 1, संख्या 6, दिसम्बर, 1929 में प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित। 'आलोचना और पुस्तक-परिचय' स्तम्भ में सुदर्शन की 'चांद' पर प्रकाशित टिप्पणी पर दिया गया प्रेमचंद का नोट।]
