Cover Image for Vidhwans (विध्वंस) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1921•16 मिनट

विध्वंस

Vidhwans

प्रेमचंद की कहानी 'विध्वंस' भुनगी नाम की एक गरीब, निःसंतान गोंड़ विधवा की त्रासद कहानी है, जो बनारस के पास एक गाँव में भाड़ चलाकर अपना जीवनयापन करती है। जमींदार पंडित उदयभान उसके जीवन के एकमात्र सहारे को नष्ट कर देते हैं और उसे फिर से भाड़ बनाने से रोकते हैं। संघर्ष अंततः ऐसी विनाशकारी आग में बदल जाता है जो गाँव और स्वयं पंडित उदयभान की संपत्ति को भी भस्म कर देती है।

पात्र:भुनगी, पंडित उदयभान, दो चपरासी
स्थान:उत्तर भारत के बनारस जिले का बीरा गाँव

विध्वंस का मूल पाठ

जिला बनारस में बीरा नाम का एक गाँव है। वहाँ एक विधवा वृद्धा, संतानहीन, गोंड़िन रहती थी, जिसका भुनगी नाम था। उसके पास एक धुर भी जमीन न थी और न रहने का घर ही था। उसके जीवन का सहारा केवल एक भाड़ था। गाँव के लोग प्रायः एक बेला चबैना या सत्तू पर निर्वाह करते ही हैं, इसलिए भुनगी के भाड़ पर नित्य भीड़ लगी रहती थी। वह जो कुछ भुनाई पाती वही भून या पीस कर खा लेती और भाड़ ही की झोंपड़ी के एक कोने में पड़ रहती। वह प्रातःकाल उठती और चारों ओर से भाड़ झोंकने के लिए सूखी पत्तियाँ बटोर लाती। भाड़ के पास ही, पत्तियों का एक बड़ा ढेर लगा रहता था। दोपहर के बाद उसका भाड़ जलता था। लेकिन जब एकादशी या पूर्णमासी के दिन प्रथानुसार भाड़ न जलता, या गाँव के जमींदार पंडित उदयभान पाँडे के दाने भूनने पड़ते, उस दिन उसे भूखे ही सो रहना पड़ता था। पंडित जी उससे बेगार में दाने ही न भुनवाते थे, उसे उनके घर का पानी भी भरना पड़ता था। और कभी-कभी इस हेतु से भी भाड़ बन्द रहता था। वह पंडित जी के गाँव में रहती थी, इसलिए उन्हें उससे सभी प्रकार की बेगार लेने का अधिकार था। उसे अन्याय नहीं कहा जा सकता। अन्याय केवल इतना था कि बेगार सूखी लेते थे। उनकी धारणा यह थी कि जब खाने ही को दिया गया तो बेगार कैसी। किसान को अधिकार है कि बैलों को दिन भर जोतने के बाद शाम को खूँटे से भूखा बाँध दे। यदि वह ऐसा नहीं करता तो यह उसकी दयालुता नहीं है, केवल अपनी हित चिन्ता है। पंडित जी को उसकी चिंता न थी क्योंकि एक तो भुनगी दो-एक दिन भूखी रहने से मर नहीं सकती थी और यदि दैवयोग से मर भी जाती तो उसकी जगह दूसरा गोंड़ बड़ी आसानी से बसाया जा सकता था। पंडित जी की यही क्या कम कृपा थी कि वह भुनगी को अपने गाँव में बसाये हुए थे।

चैत का महीना था और संक्रांति का पर्व। आज के दिन नये अन्न का सत्तू खाया और दान दिया जाता है। घरों में आग नहीं जलती। भुनगी का भाड़ आज बड़े जोरों पर था। उसके सामने एक मेला-सा लगा हुआ था। साँस लेने का भी अवकाश न था। गाहकों की जल्दबाजी पर कभी-कभी झुँझला पड़ती थी, कि इतने में जमींदार साहब के यहाँ से दो बड़े-बड़े टोकरे अनाज से भरे हुए आ पहुँचे और हुक्म हुआ कि अभी भून दे। भुनगी दोनों टोकरे देख कर सहम उठी। अभी दोपहर था पर सूर्यास्त के पहले इतना अनाज भुनना असंभव था। घड़ी-दो-घड़ी और मिल जाते तो एक अठवारे के खाने भर को अनाज हाथ आता। दैव से इतना भी न देखा गया, इन यमदूतों को भेज दिया। अब पहर रात तक सेंतमेंत में भाड़ में जलना पड़ेगा; एक नैराश्य भाव से दोनों टोकरे ले लिये।

चपरासी ने डाँट कर कहा- देर न लगे, नहीं तो तुम जानोगी।

भुनगी- यहीं बैठे रहो, जब भुन जाय तो ले कर जाना। किसी दूसरे के दाने छुऊँ तो हाथ काट लेना।

चपरासी- बैठने की हमें छुट्टी नहीं है, लेकिन तीसरे पहर तक दाना भुन जाय।

चपरासी तो यह ताकीद करके चलते बने और भुनगी अनाज भूनने लगी। लेकिन मन भर अनाज भूनना कोई हँसी तो थी नहीं, उस पर बीच-बीच में भुनाई बन्द करके भाड़ भी झोंकना पड़ता था। अतएव तीसरा पहर हो गया और आधा काम भी न हुआ। उसे भय हुआ कि जमींदार के आदमी आते होंगे। आते ही गालियाँ देंगे, मारेंगे। उसने और वेग से हाथ चलाना शुरू किया। रास्ते की ओर ताकती और बालू नाँद में छोड़ती जाती थी। यहाँ तक कि बालू ठंडी हो गयी, सेवड़े निकलने लगे। उसकी समझ में न आता था, क्या करे। न भूनते बनता था न छोड़ते बनता था। सोचने लगी कैसी विपत्ति है। पंडित जी कौन मेरी रोटियाँ चला देते हैं, कौन मेरे आँसू पोंछ देते हैं। अपना रक्त जलाती हूँ तब कहीं दाना मिलता है। लेकिन जब देखो खोपड़ी पर सवार रहते हैं, इसलिए न कि उनकी चार अंगुल धरती से मेरा निस्तार हो रहा है। क्या इतनी-सी जमीन का इतना मोल है ? ऐसे कितने ही टुकड़े गाँव में बेकाम पड़े हैं, कितनी बखरियाँ उजाड़ पड़ी हुई हैं। वहाँ तो केसर नहीं उपजती फिर मुझी पर क्यों यह आठों पहर धौंस रहती है। कोई बात हुई और यह धमकी मिली कि भाड़ खोद कर फेंक दूँगा, उजाड़ दूँगा, मेरे सिर पर भी कोई होता तो क्या बौछारें सहनी पड़तीं।

वह इन्हीं कुत्सित विचारों में पड़ी हुई थी कि दोनों चपरासियों ने आकर कर्कश स्वर में कहा- क्यों री, दाने भुन गये।

भुनगी ने निडर हो कर कहा- भून तो रही हूँ। देखते नहीं हो।

चपरासी- सारा दिन बीत गया और तुमसे इतना अनाज न भूना गया ? यह तू दाना भून रही है कि उसे चौपट कर रही है। यह तो बिलकुल सेवड़े हैं, इनका सत्तू कैसे बनेगा। हमारा सत्यानाश कर दिया। देख तो आज महाराज तेरी क्या गति करते हैं।

परिणाम यह हुआ कि उसी रात को भाड़ खोद डाला गया और वह अभागिनी विधवा निरावलम्ब हो गयी।

भुनगी को अब रोटियों का कोई सहारा न रहा। गाँववालों को भी भाड़ के विध्वंस हो जाने से बहुत कष्ट होने लगा। कितने ही घरों में दोपहर को दाना ही न मयस्सर होता। लोगों ने जा कर पंडित जी से कहा कि बुढ़िया को भाड़ जलाने की आज्ञा दे दीजिए, लेकिन पंडित जी ने कुछ ध्यान न दिया। वह अपना रोब न घटा सकते थे। बुढ़िया से उसके कुछ शुभचिंतकों ने अनुरोध किया कि जा कर किसी दूसरे गाँव में क्यों नहीं बस जाती। लेकिन उसका हृदय इस प्रस्ताव को स्वीकार न करता। इस गाँव में उसने अपने अदिन के पचास वर्ष काटे थे। यहाँ के एक-एक पेड़-पत्ते से उसे प्रेम हो गया था ! जीवन के सुख-दुःख इसी गाँव में भोगे थे। अब अंतिम समय वह इसे कैसे त्याग दे ! यह कल्पना ही उसे संकटमय जान पड़ती थी। दूसरे गाँव के सुख से यहाँ का दुःख भी प्यारा था।

इस प्रकार एक पूरा महीना गुजर गया। प्रातःकाल था। पंडित उदयभान अपने दो-तीन चपरासियों को लिये लगान वसूल करने जा रहे थे। कारिंदों पर उन्हें विश्वास न था। नजराने में, डाँड़-बाँध में, रसूम में वह किसी अन्य व्यक्ति को शरीक न करते थे। बुढ़िया के भाड़ की ओर ताका तो बदन में आग-सी लग गयी। उसका पुनरुद्धार हो रहा था। बुढ़िया बड़े वेग से उस पर मिट्टी के लोंदे रख रही थी। कदाचित् उसने कुछ रात रहते ही काम में हाथ लगा दिया था और सूर्योदय से पहले ही उसे समाप्त कर देना चाहती थी। उसे लेशमात्र भी शंका न थी कि मैं जमींदार के विरुद्ध कोई काम कर रही हूँ। क्रोध इतना चिरजीवी हो सकता है इसका समाधान भी उसके मन में न था। एक प्रतिभाशाली पुरुष किसी दीन अबला से इतना कीना रख सकता है उसे उसका ध्यान भी न था। वह स्वभावतः मानव-चरित्र को इससे कहीं ऊँचा समझती थी। लेकिन हा ! हतभागिनी ! तूने धूप में ही बाल सफेद किये।

सहसा उदयभान ने गरज कर कहा- किसके हुक्म से ?

भुनगी ने हकबका कर देखा तो सामने जमींदार महोदय खड़े हैं।

उदयभान ने फिर पूछा- किसके हुक्म से बना रही है ?

भुनगी डरते हुए बोली- सब लोग कहने लगे बना लो, तो बना रही हूँ।

उदयभान- मैं अभी इसे फिर खुदवा डालूँगा। यह कह उन्होंने भाड़ में एक ठोकर मारी। गीली मिट्टी सब कुछ लिये दिये बैठ गयी। दूसरी ठोकर नाँद पर चलायी लेकिन बुढ़िया सामने आ गयी और ठोकर उसकी कमर पर पड़ी। अब उसे क्रोध आया। कमर सहलाते हुए बोली- महाराज, तुम्हें आदमी का डर नहीं है तो भगवान् का डर तो होना चाहिए। मुझे इस तरह उजाड़ कर क्या पाओगे ? क्या इस चार अंगुल धरती में सोना निकल आयेगा ? मैं तुम्हारे ही भले की कहती हूँ, दीन की हाय मत लो। मेरा रोआँ दुखी मत करो।

उदयभान- अब तो यहाँ फिर भाड़ न बनायेगी।

भुनगी- भाड़ न बनाऊँगी तो खाऊँगी क्या ?

उदयभान- तेरे पेट का हमने ठेका नहीं लिया है।

भुनगी- टहल तो तुम्हारी करती हूँ खाने कहाँ जाऊँ ?

उदयभान- गाँव में रहोगी तो टहल करनी पड़ेगी।

भुनगी- टहल तो तभी करूँगी जब भाड़ बनाऊँगी। गाँव में रहने के नाते टहल नहीं कर सकती।

उदयभान- तो छोड़ कर निकल जा।

भुनगी- क्यों छोड़ कर निकल जाऊँ। बारह साल खेत जोतने से असामी काश्तकार हो जाता है। मैं तो इस झोंपड़े में बूढ़ी हो गयी। मेरे सास-ससुर और उनके बाप-दादे इसी झोंपड़े में रहे। अब इसे यमराज को छोड़ कर और कोई मुझसे नहीं ले सकता।

उदयभान- अच्छा तो अब कानून भी बघारने लगी। हाथ-पैर पड़ती तो चाहे मैं रहने भी देता, लेकिन अब तुझे निकाल कर तभी दम लूँगा। (चपरासियों से) अभी जा कर उसके पत्तियों के ढेर में आग लगा दो, देखें कैसे भाड़ बनता है।

एक क्षण में हाहाकार मच गया। ज्वाला-शिखर आकाश से बातें करने लगा। उसकी लपटें किसी उन्मत्त की भाँति इधर-उधर दौड़ने लगीं। सारे गाँव के लोग उस अग्नि-पर्वत के चारों ओर जमा हो गये। भुनगी अपने भाड़ के पास उदासीन भाव में खड़ी यह लंकादहन देखती रही। अकस्मात् वह वेग से आ कर उसी अग्नि-कुंड में कूद पड़ी। लोग चारों तरफ से दौड़े, लेकिन किसी की हिम्मत न पड़ी कि आग के मुँह में जाय। क्षणमात्र में उसका सूखा हुआ शरीर अग्नि में समाविष्ट हो गया।

उसी दम पवन भी वेग से चलने लगा। ऊर्ध्वगामी लपटें पूर्व दिशा की ओर दौड़ने लगीं। भाड़ के समीप ही किसानों की कई झोंपड़ियाँ थीं, वह सब उन्मत्त ज्वालाओं का ग्रास बन गयीं। इस भाँति प्रोत्साहित होकर लपटें और आगे बढ़ीं। सामने पंडित उदयभान की बखार थी, उस पर झपटीं। अब गाँव में हलचल पड़ी। आग बुझाने की तैयारियाँ होने लगीं। लेकिन पानी के छींटों ने आग पर तेल का काम किया। ज्वालाएँ और भड़कीं और पंडित जी के विशाल भवन को दबोच बैठीं। देखते ही देखते वह भवन उस नौका की भाँति जो उन्मत्त तरंगों के बीच में झकोरे खा रही हो, अग्नि-सागर में विलीन हो गया और वह क्रंदन-ध्वनि जो उसके भस्मावशेष में प्रस्फुटित होने लगी, भुनगी के शोकमय विलाप से भी अधिक करुणाकारी थी।


विध्वंस का सारांश

'विध्वंस' बनारस जिले के बीरा गाँव में रहने वाली भुनगी नाम की एक असहाय, संतानहीन गोंड़ विधवा और गाँव के क्रूर जमींदार पंडित उदयभान पाँडे के बीच के कारुणिक व विनाशकारी संघर्ष की कहानी है। भुनगी के पास न तो अपनी ज़मीन थी और न ही रहने का मकान। उसके जीवन-यापन का एकमात्र सहारा उसका भाड़ (अनाज भूनने की भट्टी) था, जहाँ गाँववाले सत्तू और चबैना भुनवाने आते थे। वह भाड़ जलाकर, दिन भर सूखी पत्तियाँ बटोरकर और बेगार करके अपनी जीविका चलाती थी। जमींदार उदयभान उससे मुफ़्त में अपने घर के दाने भुनवाते थे और पानी भरवाते थे, परंतु भुनगी को इस बेगार के बदले कोई मजदूरी या अन्न नहीं मिलता था।

चैत की संक्रांति के पर्व पर, जब भुनगी के भाड़ पर गाँववालों की बहुत भीड़ थी, जमींदार के चपरासी दो बड़े टोकरे भरकर अनाज लाए और उसे तुरंत भूनने का हुक्म दिया। दोपहर बीतने और अत्यधिक काम होने के कारण भुनगी अकेला मन भर अनाज समय पर नहीं भून सकी और कुछ दाने अधभुने (सेवड़े) रह गए। इस पर क्रोधित होकर चपरासियों की शिकायत पर पंडित उदयभान ने उसी रात भुनगी का भाड़ खुदवाकर नष्ट कर दिया। भुनगी पूरी तरह निराश्रित हो गई। गाँववालों के कहने पर भी उसने पचास वर्षों से बसे अपने गाँव को छोड़ने से साफ इनकार कर दिया।

एक महीने बाद, जब भुनगी छिपकर चुपचाप फिर से अपना भाड़ बनाने लगी, तो पंडित उदयभान लगान वसूलने जाते समय वहाँ से गुज़रे। भाड़ बनता देख उन्होंने क्रोधित होकर उसे ठोकर मार दी, जो भुनगी की कमर पर लगी। जब भुनगी ने अन्याय का विरोध किया और अपनी बूढ़ी उम्र व वर्षों के निवास की दुहाई दी, तो अहंकार में चूर जमींदार ने अपने चपरासियों को भुनगी के भाड़ के पास बने पत्तियों के ढेर में आग लगाने का हुक्म दे दिया।

पत्तियों के ढेर में आग लगते ही भुनगी ने अपनी जीविका और आश्रय को जलते देखा। निराशा और क्षोभ के पराकाष्ठा में वह उसी जलते हुए अग्निकुंड में कूद पड़ी और अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद भीषण हवा चली और भुनगी की चिता से उठी ज्वालाएँ पहले पास की झोपड़ियों और फिर पंडित उदयभान की विशाल बखार तथा उनके आलीशान भवन तक पहुँच गईं। देखते ही देखते पंडित उदयभान का पूरा महल और धन-संपदा राख के ढेर में बदल गई। भुनगी पर किया गया अन्याय और अत्याचार अंततः जमींदार के अपने संपूर्ण विनाश ('विध्वंस') का कारण बन गया।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • सामंती उत्पीड़न और बेगार प्रथा का घिनौना रूप: कहानी यह उजागर करती है कि कैसे ज़मींदार वर्ग असहाय और गरीब ग्रामीणों, विशेषकर निम्न जातियों और विधवाओं से बिना किसी पारिश्रमिक के जबरन काम (बेगार) करवाता था और उनके न्यूनतम जीवन-आधार को भी अपनी सनक में नष्ट कर देता था।
  • शोषित वर्ग का मौन प्रतिरोध और आत्म-बलिदान: भुनगी का चरित्र भारतीय ग्रामीण समाज की उस चरम सीमा को दर्शाता है जहाँ शोषित व्यक्ति के पास जब विरोध का कोई साधन नहीं बचता, तो वह अपने प्राणों की आहुति देकर अनजाने में अत्याचारी के विरुद्ध सबसे बड़ा प्रतिशोध ले लेता है।
  • अहंकार का विनाश और प्राकृतिक/नैतिक न्याय: पंडित उदयभान का अहंकार और निर्दयता यह मानती थी कि गरीब विधवा का विनाश करके वे अपनी हनक बनाए रख सकते हैं। परंतु कहानी का अंत यह दिखाता है कि अन्याय की आग केवल पीड़ित को नहीं जलाती, बल्कि अत्याचारी के अपने साम्राज्य को भी भस्म ('विध्वंस') कर देती है।
  • गाँव से जुड़ाव और विस्थापन की पीड़ा: भुनगी का पचास वर्षों से रहे गाँव को न छोड़ने का हठ यह दर्शाता है कि एक विपन्न और असहाय ग्रामीण के लिए अपनी मिट्टी, झोपड़ी और यादों का मूल्य किसी भी अन्य सुख से बढ़कर होता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'विध्वंस' प्रेमचंद की एक अत्यंत सशक्त और प्रभावकारी कहानी है, जो सामाजिक विषमता, जातीय उत्पीड़न और सामंती अत्याचार के विरुद्ध नैतिक सचेतता फैलाती है। यह कहानी चेतावनी देती है कि असहाय की आह और उसके सर्वनाश से उपजी ज्वाला अंततः शोषणकारी व्यवस्था को भस्म कर देती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "विध्वंस." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/short-stories/vidhwans. Accessed 22 Sep. 2026.