Cover Image for Rajhath (राजहठ) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी••24 मिनट

राजहठ

Rajhath

प्रेमचंद की कहानी 'राजहठ' राजा देवमल और उनके सुपुत्र कुँवर इंदरमल के बीच रियासत के बेजा खर्चों और दशहरे के उत्सव को लेकर हुए विचारों के टकराव की कहानी है।

पात्र:राजा देवमल, कुँवर इंदरमल, रानी भान कुँवर
स्थान:अचलगढ़ और इंदौर के पास शिव मंदिर

राजहठ का मूल पाठ

दशहरे के दिन थे, अचलगढ़ में उत्सव की तेयारियाँ हो रही थीं। दरबारे आम में राज्य के मंत्रियों के स्थान पर अप्सराएँ शोभायमान थीं। धर्मशालों ओर सरायों में घोड़े हिनहिना रहे थे। रियासत के नोकर, क्या छोटे, कया बड़े, रसद पहुँचाने के बहाने से दरवाजे आम में जमे रहते थे। किसी तरह हटाये न हटते थे। दरबारे खास में पंडित ओर पुजारी और महन्त लोग आसन जमाए पाठ करते हुए नजर आते थे। वहाँ किसी राज्य के कर्मचारी की शकल न दिखायी देती थी। घी और पूजा की सामग्री न होने के कारण सुबह की पूजा शाम को होती थी। रसद न मिलने की वजह से पंडित लोग हवन के घी ओर मेवों के भोग के अग्निकुंड में डालते थे। दरबारे आम में अंग्रेजी प्रबन्ध था ओर दरबारे खास में राज्य का।

राजा देवमल बड़े होसलेमन्द रईस थे। इस वार्षिक आनन्दोत्सव में वह जी खोलकर रुपया खर्च करते। जिन दिनों अकाल पड़ा, राज्य के आधे आदमी भूखों तड़पकर मर गए। बुखार, हैजा ओर प्लेग में हजारों आदमी हर साल मृत्यु का ग्रास बन जाते थे।

राजय निर्धन था इसलिए न वहाँ पाठशालाएँ थीं,न चिकित्सालय, न सड़कें। बरसात में रनिवास दलदल हो जाता ओर अंधेरी रातों में सरेशाम से घरों के दरवाजे बन्द हो जाते। अंधेरी सड़कों पर चलना जान जोखिम था। यह सब ओर इनसे भी ज्यादा कष्टप्रद बातें स्वीकार थी मगर यह कठिन था, असम्भव था कि दुर्गा देवी का वार्षिक आनन्दोत्सव न हो। इससे राज्य की शान बट्टा लगने का भय था। राज्य मिट जाए, महलों की ईटें बिक जाएँ मगर यह उत्सव जरूर हो। आस पास के राजे-रईस आमंत्रित होते, उनके शामियानों से मीलों तक संगमरमर का एक शहर बस जाता, हफ्तों तक खूब चहल-पहल धूम-धाम रहती। इसी की बदोलत अचलगढ़ का नाम अटलगढ़ हो गया था।

मगर कुँवर इन्दरमल को राजा साहब की इन मस्ताना कार्रवाइयों में बिलकुल आस्था न थी। वह प्रकृति से एक बहुत गम्भीर और सीधा-सादा नवयुवक था। यों गजब का दिलेर, मौत के सामने भी ताल ठोंककर उतर पड़े मगर उसकी बहादुरी खून की प्यास से पाक थी। उसके वार बिना पर की चिड़ियों या बेजबान जानवरों

पर नहीं होते थे। उसकी तलवार कमजोरों पर नहीं उठती थी। गरीबों की हिमायत, अनाथों की सिफारिशें, निर्धनों की सहायता ओर भाग्य के मारे हुओं के घाव की मरहम-पट्टी इन कामों से उसकी आत्मा को सुख मिलता था। दो साल हुए वह इंदोर कालेज से ऊँची शिक्षा पाकर लोटा था और तब से उसका यह जोश असाधारण रूप में बढ़ा हुआ था, इतना कि वह साधारण समझदारी की सीमाओं को लाँच गया था, चोबीस साल का लम्बा- तड़ेगा है, कल जवान, धन ऐश्वर्य के बीच पला हुआ, जिसे चिन्ताओं की कभी हवा तक न लगी, अगर रुलाया तो हँसी ने। वह ऐसा नेक हो, उसके मर्दाना चेहरे पर चिन्ता का पीलापन और झुर्रियाँ नजर आयें यह एक असाधारण बात थी। उत्सव का शुभ दिन पास आ पहुँचा था,सिर्फ चार दिन बाकी थे। उत्सव का प्रबन्ध पूरा हो चुका था, सिर्फ अगर कसर थी तो कहीं-कहीं दोबारा नजर डाल लेने की। तीसरे पहर का वक्त था, राजा साहब रनिवास में बेठे हुए कुछ चुनी हुई अप्सराओं का गाना सुन रहे थे। उनकी सुरीली तानों से जो खुशी हो रही थी; उससे कहीं ज्यादा खुशी यह सोचकर हो रही थी कि यह तराने पोलिटिकल एजेन्ट को भड़का देंगे। वह आँखें बन्द करके सुनेगा ओर खुशी के मारे उछल-उछल पड़ेगा।

इस विचार से जो प्रसन्नता होती थी वह तानसेन की तानों में भी नहीं हो सकती थी। आह, उसकी जबान से अनजाने ही -- वाह- वाह” निकल पड़ेगी। अजब नहीं कि उठकर मुझसे हाथ मिलाये ओर मेरे चुनाव की तारीफ करें इतने में कुँवर इन्दरमल बहुत सादा कपड़े पहने सेवा में उपस्थित हुए ओर सर झुकाकर अभिवादन किया। राजा साहब की आँखें शर्म से झुक गई, मगर कुँवर साहब का इस समय आना अच्छा नहीं लगा। गानेवालियों को वहाँ से उठ जाने का इशारा किया।

कुँवर इन्दरमल बोले -- महाराज, कया मेरी बिनती पर बिलकुल ध्यान न दिया जायेगा?

राजा साहब की गद्दी के उत्तराधिकारी राजकुमार की इज्जत करते थे और मुहब्बत तो कुदरती बात थी, तो भी उन्हें यह बेमोका हठ पसन्द न आता था। वह इतने संकीर्ण बुद्धि न थे कि कुँवर साहब की नेक सलाहों की कद्र न करें। इससे निश्चय ही राज्य पर बोझ बढ़ता जाता था ओर रिआया पर बहुत जुल्म करना पड़ता था। में अंधा नहीं हूँ कि ऐसी मोटी-मोटी बातें न समझ सकूँ। मगर अच्छी बातें भी मोका-महल देखकर की जाती हैं। आखिरकार नाम और यश, इज्जत ओर आबरु भी कोई चीज है? रियासत में संगमरमर की सड़कें बनवा दूँ, गली-गली मदरसे खोल दूँ, घर-घर कुएँ खोदवा दूँ, दवाओं की नहरें जारी कर दूँ

मगर दशहरे की धूम-धाम से रियासत की जो इज्जत ओर नाम हे वह इन बातों से कभी हासिल नहीं हो सकता। यह हो सकता हे कि धीरे-धीरे यह खर्च घटा दूँ मगर एकबारगी ऐसा करना न तो उचित है ओर न सम्भव। जवाब दिया -- आखिर तुम क्‍या चाहते हो? क्या दशहरा बिलकुल बन्द कर दूँ?

इन्दरमल ने राजा साहब के तेवर बदले हुए देखे, तो आदरपूर्वक बोले -- मैंने कभी दशहरे के उत्सव के खिलाफ मुँह से एक शब्द नहीं निकाला, यह हमारा जातीय पर्व है, यह विजय का शुभ दिन है, आज के दिन खुशियाँ मनाना हमारा जाती कर्तव्य है। मुझे सिर्फ इन अप्सराओं से आपत्ति है, नाच-गाने से इस दिन की गम्भीरता ओर महत्ता डूब जाती हे।

राजा साहब ने व्यंग्य के स्वर में कहा -- तुम्हारा मतलब है कि रो-रोकर जश्न मनाएँ, मातम करें।

इन्दरमल ने तीखें होकर कहा -- यह न्याय के सिद्धान्तों के खिलाफ बात है कि हम तो उत्सव मनाएँ, ओर हजारों आदमी उसकी बदोलत मातम करें। बीस हजार मजदूर एक महीने से मुफ्त में काम कर रहे हे, क्या उनके घरों में खुशियाँ मनाई जा रही हैं? जो पसीना बहायें वह रोटियों को तरसें ओर जिन्होंने हरामकारी को अपना पेशा बना लिया हे, वह हमारी महफिलों की

शोभा बनें। में अपनी आँखों से यह अन्याय और अत्याचार नहीं देख सकता। में इस पाप-कर्म में योग नहीं दे सकता। इससे तो यही अच्छा हे कि मुँह छिपाकर कहीं निकल जाऊँ। ऐसे राज में रहना, में अपने उसूलों के खिलाफ ओर शर्मनाक समझता हूँ।

इन्दरमल ने तेश में यह धृष्टतापूर्ण बातें कीं। मगर पिता के प्रेम को जगाने की कोशिश ने राजहठ के सोए हुए काले देव को जगा दिया। राजा साहब गुस्से से भरी हुई आँखों से देखकर बोले

  • हाँ, में भी यही ठीक समझता हूँ। तुम अपने उसूलों के पक्के हो तो में भी अपनी धुन का पूरा हूँ।

इन्दरमल ने मुस्कराकर राजा साहब को सलाम किया। उसका मुस्कराना घाव पर नमक हो गया। राजकुमार की आँखों में कुछ बूुँदें शायद मरहम का काम देतीं।

राजकुमार ने इधर पीठ फेरी, उधर राजा साहब ने फिर अप्सराओं को बुलाया और फिर चित्त को प्रफुल्लित करनेवाले गानों की

आवाजें गूँजने लगीं। उनके संगीत-प्रेम की नदी कभी इतने जोर- शोर से न उमड़ी थी, वाह-वाह की बाढ़ आई हुई थी, तालियों का

शोर मचा हुआ था ओर सुर की किश्ती उस पुरशोर दरिया में हिंडोले की तरह झूल रही थी।

यहाँ तो नाच-गाने का हंगामा गरम था और रनिवास में रोने-पीटने का। रानी भान कुँवर दुर्गा की पूजा करके लोट रही थी कि एक लॉंडी ने आकर यह मर्मान्तक समाचार दिया। रानी ने आरती का थाल जमीन पर पटक दिया। वह एक हफ्ते से दुर्गा का ब्रत रखती थीं। मृगछाले पर सोती ओर दूध का आहार करती थीं। पाँव थराये, जमीन पर गिर पड़ी। मुरझाया हुआ फूल हवा के झोंके को न सह सका। चेरियाँ सम्हल गयीं ओर रानी के चारों तरफ गोल बांधकर छाती और सिर पीटने लगीं। कोहराम मच गया। आँखों में आँसू न सही, आँचलों से उनका पर्दा छिपा हुआ था, मगर गले में आवाज तो थी। इस वक्त उसी की जरूरत

थी। उसी की बुलन्दी ओर गरज में इस समय भाग्य की झलक छिपी हुई थी।

लोडियाँ तो इस प्रकार स्वामिभक्ति का परिचय देने में व्यस्त थीं ओर भानकुँवर अपने खयालों में डूबी हुई थीं। कुँवर से ऐसी बेअदबी क्‍्योंकर हुई, यह खयाल में नहीं आता। उसने कभी मेरी बातों का जवाब नहीं दिया, जरूर राजा की ज्यादती है।

इसने इस नाच-रंग का विरोध किया होगा, किया ही चाहिए। उन्हें क्या, जो कुछ बनेगी-बिगड़ेगी उसे जिम्मे लगेगी। यह गुस्सेवर हें ही। झलला गये होंगे। उसे सख्त-सुस्त कहा होगा। बात की उसे कहाँ बर्दाश्त, यही तो उसमें बड़ा ऐब है, रुककर कहीं चला गया होगा। मगर गया कहाँ? दुर्गा! तुम मेरे लाल की रक्षा करना, में उसे तुम्हारे सुपुर्द करती हूँ। अफसोस, यह गजब हो गया। मेरा राज्य सूना हो गया और इन्हें अपने राग-रंग की सूझी हुई है। यह सोचते-सोचते रानी के शरीर में कैपकँपी आ गई, उठकर गुस्से से काँपती हुई वह बेधड़क नाच-गाने की महफिल की तरफ चली। करीब पहुँची तो सुरीली तानें सुनाई दीं। एक बरछी-सी जिगर में चुभ गयी। आग पर तेल पड़ गया।

रानी को देखते ही गानेवालियों में एक हलचल-सी मच गई। कोई किसी कोने में जा छिपी, कोई गिरती-पड़ती दरवाजें की तरफ भागी। राजा साहब ने रानी की तरफ घूरकर देखा। भयानक गुस्से का शोला सामने दहक रहा था। उनकी त्योरियों पर भी बल पड़ गए। खून बरसाती हुई आँखें आपस में मिली। मोम ने लोहे को सामना किया।

रानी थर्रायी हुई आवाज में बोली -- मेरा इन्दरमल कहाँ गया? यह कहते-कहते उसकी आवाज रुक गई ओर होंठ काँपकर रूह गए।

राजा ने बेरुखी से जवाब दिया -- में नहीं जानता।

रानी सिसकियाँ भरकर बोली -- आप नहीं जानते कि वह कल तीसरे पहर से गायब हे ओर उसका कहीं पता नहीं? आपकी इन जहरीली नागिनों ने यह विष बोया है। अगर उसका बाल भी बाँका हुआ तो उसके जिम्मेदार आप होंगे।

राजा ने तुर्सी से कहा -- वह बड़ा घमण्डी और बिनकहा हो गया है, में उसका मुँह नहीं देखना चाहता।

रानी कुचले हुए साँप की तरह ऐंठकर बोली -- राजा, तुम्हारी जबान से यह बातें निकल रही हें! हाय मेरा लो, मेरी आँखों की पुलती, मेरे जिगर का टुकड़ा, मेरा सब कुछ यों अलोप हो जाए ओर इस बेरहम का दिल जरा भी न पसीजे! मेरे घर में आग लग जाए ओर यहाँ इन्द्र का अखाड़ा सजा रहे! में खून के आँसू रोऊँ ओर यहाँ खुशी के राग अलापे जाएँ!

राजा के नथने फड़कने लगे, कड़ककर बोले -- रानी भानकुँवर

अब जबान बन्द करो। में इससे ज्यादा नहीं सुन सकता। बेहतर होगा कि तुम महल में चली जाओ।

रानी ने बिफरी हुई शेरनी की तरह गर्दन उठाकर कहा - हाँ, में खुद जाती हूँ। में हुजूर के ऐश में विघ्न नहीं डालना चाहती,

मगर आपको इसका भुगतान करना पड़ेगा। अचलगढ़ में या तो भान कुँवर रहेगी या आपकी जहरीली, विषेली परियाँ!

राजा पर इस धमकी को कोई असर न हुआ। गेंडे की ढाल पर कच्चे लोहे का असर कया हो सकता हे!जी में आया कि साफ- साफ कह दें, भान कुँवर चाहे रहे या न रहे यह परियाँ जरूर रहेंगी लेकिन आपने को रोककर बोले -- तुमको अख्तियार हे, जो ठीक समझो वह करो।

रानी कुछ कदम चलकर फिर लोटीं और बोली -- त्रिया-हठ रहेगी या राजहठ?

राजा ने निष्कम स्वर में उत्तर दिया -- इस वक्त तो राजहठ ही रहेगी।

रानी भानकुँवर के चले जाने के बाद राजा देवमल फिर अपने कमरे में आ बेठे, मगर चिन्तित ओर मन बिलकुल बुझा हुआ, मुर्दे के समान। रानी की सख्त बातों से दिल के सबसे नाजुक हिस्सों में टीस और जलन हो रही थी। पहले तो वह अपने ऊपर

झुँझलाए कि मैंने उसकी बातों को क्‍यों इतने धीरज से सुना मगर जब गुस्से की आग धीमी हुई ओर दिमाग का सन्तुलन फिर असली हालत पर आया तो उन घटनाओं पर अपने मन में विचार करने लगे। न्यायप्रिय स्वभाव के लोगों के लिए क्रोध एक चेतावनी होती है, जिससे उन्हें अपने कथन ओर आचार की अच्छाई ओर बुराई को जाँचने ओर आगे के लिए सावधान हो जाने का मोका मिलता हैं। इस कड़वी दवा से अकसर अनुभव को शक्ति संकट को व्यापकता ओर चिन्तन को सजगता प्राप्त होती है। राजा सोचने लगे -- बेशक रियासत के अन्दरुनी हालात के लिहाज से यह सब नाच-रंग बेमोका है। बेशक वह रिआया के साथ अपना फर्ज नहीं अदा कर रहे थे। वह इन खर्चो ओर इस नेतिक धब्बे को मिटाने के लिए तेयार थे, मगर इस तरह कि नुक्ताचीनी करने वाली आँखें उसमें कुछ ओर मतलब न निकाल सकें। रियासत की शान कायम रहे। इतना इन्दरमल से उन्होंने साफ कह दिया था कि अगर इतने पर भी अपनी जिद से बाज नहीं आता तो उसकी ढिठाई हे। हर एक मुमकिन पहलू से गोर करने पर राजा साहब के इस फेसले में जरा भी फेरफार न हुआ। कुँवर का यों गायब हो जाना जरूर चिन्ता की बात है ओर रियासत के लिए उसके खतरनाक नतीजे हो सकते हैं मगर वह अपने आप को इन नतीजों की जिम्मदारियों से बिलकुल बरी

समझते थे। वह यह मानते थे कि इन्दरमल के चले जाने के बाद उनका यह महफिलें जमाना बेमोका ओर दूसरों को भड़कानेवाला था मगर इसका कुँवर के आखिरी फैसले पर क्‍या असर पड़ सकता हे? कुँवर ऐसा नादाँ, नातजुर्बेकार ओर बुजदिल तो नहीं हे कि आत्महत्या कर लें, हाँ, वह दो-चार दिन इधर-उधर आवारा घूमेगा ओर अगर ईश्वर ने कुछ भी विवेक उसे दिया तो वह दुखी ओर लज्जित होकर जरूर चला आएगा। में खुद उसे ढूँढ़ निकालूँगा। वह ऐसा कठोर नहीं है कि अपने बूढ़े बाप की मजबूरी पर कुछ भी ध्यान न दे।

इन्दरमल से फारिग होकर राजा साहब का ध्यान रानी की तरफ पहुँचा और जब उसकी आग की तरह दहकती हुई बाते याद आयी तो गुस्से से बदन में पसीना आ गया और वह बेताब होकर उठकर टहलनें लगे। बेशक, में उसके साथ बेरहमी से पेश आया। माँ को अपनी ओलाद ईमान से भी ज्यादा प्यारी होती है ओर उसका रुष्ट होना उचित था मगर इन धमकियों के क्‍या माने? इसके सिवा कि वह रुठकर मैके चली जाए ओर मुझे बदनाम करे, वह मेरा और क्‍या कर सकती हे? अक़्लमन्दों ने कहा है कि औरत की आज बेवफा होती हे, वह मीठे पानी की चंचल, चुलबुली-चमकीली धारा है, जिसकी गोद में चहकती ओर चिमटती है उसे बालू का ढेर बनाकर छोड़ती है। यही भानकुँवर

है जिसकी नाजबरदारियाँ मुहब्बत का दर्जा रखती हैं। आह, क्या वह पिछली बातें भूल जाऊँ! क्‍या उन्हें किस्सा समझकर दिल को तसकीन दूँ।

इसी बीच में एक लोंडी ने आकर कहा कि महारानी ने हाथी मँगवाया है ओर न जाने कहाँ जा रही हें। कुछ बताती नहीं। राजा ने सुना ओर मुँह फेर लिया।

शहर इन्दोर से तीन मील दूर उत्तर की तरफ घने पेड़ों के बीच में एक तालाब हे जिसके चाँदी-जेसे चेहरे से काई का हरा मखमली घूँघट कभी नहीं उठता। कहते हैं किसी जमाने में उसके चारों तरफ पक्के घाट बने हुए थे मगर इस वक्त तो सिर्फ यह अनश्रुति बाकी थी जो कि इस दुनिया में अकसर ईट-पत्थर की यादगारी से ज्यादा टिकाऊ हुआ करती है।

तालाब के पूरब में एक पुराना मन्दिर था, उसमें शिव जी राख की धूनी रमाये खामोश बेठे हुए थे। अबाबीलें और जंगली कबूतर उन्हीं अपनी मीठी बोलियाँ सुनाया करते। मगर उस वीराने में भी उनके भक्तों की कमी न थी। मंदिर के अन्दर भरा हुआ पानी

ओर बाहर बदबूदार कीचड़, इस भक्ति के प्रमाण थे। वह मुसाफिर जो इस तालाब में नहाता उसके एक लोटे पानी से अपने ईश्वर की प्यास बुझाता था। शिव जी खाते कुछ न थे मगर पानी बहुत पीते थे। उनकी न बुझनेवाली प्यास कभी न बुझती थी।

तीसरे पहर का वक्त था। क्वार की धूप तेज थी। कुँवर इन्दरमल अपने हवा की चालवाले घोड़े पर सवार इन्दोर की तरफ से आए ओर एक पेड़ की छाया में ठहर गए। वह बहुत उदास थे। उन्होंने घोड़े को पेड़ से बाँध दिया और खुद जीन के ऊपर डालनेवाला कपड़ा बिछाकर लेट रहे। उन्हें अचलगढ़ से निकले आज तीसरा दिन हे मगर चिन्ताओं ने पलक नहीं झपकने दी। रानी भानकुँवर उसके दिल से एक पल के लिए भी दूर न होती थी। इस वक्त ठण्डी हवा लगी तो नींद आ गई। सपने में देखने लगा कि जेसे रानी आई हैं ओर उसे गले लगाकर रो रही हैं। चॉककर आँखें खोलीं तो रानी सचमुच सामने खड़ी उसकी तरफ आँसू भरी आँखों से ताक रही थीं। वह उठ बेठा ओर माँ के पैरों को चूमा। मगर रानी ने ममता से उठाकर गले लगा लेने के बजाय अपने पाँव हटा लिए ओर मुँह से कुछ न बोली।

इन्दरमल ने कहा -- माँ जी, आप मुझसे नाराज हें?

रानी ने रुखाई से जवाब दिया -- में तुम्हारी कोन होती हूँ!

कुँवर -- आपको यकीन आए न आए, में जब से अचलगढ़ से चला हूँ एक पल के लिए भी आपका ख्याल दिल से दूर नहीं हुआ। अभी आप ही को सपने में देख रहा था।

इन शब्दों ने रानी का गुस्सा ठंडा किया। कुँवर की ओर से निश्चित होकर अब वह राजा का ध्यान कर रही थी। उसने कुँवर से पूछा -- तुम तीन दिन कहाँ रहे?

कुँवर ने जावाब दिया -- क्‍या बताऊँ, कहाँ रहा। इन्दोर चला गया था वहाँ पोलिटिकल एजेन्ट से सारी कथा कह सुनाई। रानी ने यह सुना तो माथा पीटकर बोली -- तुमने गजब कर दिया। आग लगा दी।

इन्दरमल -- क्या करूँ, खुद पछताता हूँ, उस वक्त यही धुन सवार थी।

रानी -- मुझे जिन बातों का डर था वह सब हो गई। अब कोन मुँह लेकर अचलगढ़ जायेंगे।

इन्दरमल -- मेरा जी चाहता हे कि अपना गला घोंट लूँ।

रानी -- गुस्सा बुरी बला हें। तुम्हारे आने के बाद मेंने रार मचाई ओर कुद यही इरादा करके इन्दोर जा रही थी, रास्ते में तुम मिल गए।

यह बातें हो ही रही थीं कि सामने से बहेलियों ओर साडनियों की एक लम्बी कतार आती हुई दिखाई दीं। सौंड़नियों पर मर्द सवार थे। सुरमा लगी आँखों वाले, पेचदार जुल्फोंवाले। बहेलियों में हुस्न के जलवे थे। शोख निगाहें, बेधड़क चितवनें, यह उन नाच- रंग वालों का काफिला था जो अचलगढ़ से निराश ओर खिन्न चला आता था। उन्होंने रानी की सवारी देखी और कुँवर का घोड़ा पहचान लिया। घमण्ड से सलाम किया मगर बोले नहीं। जब वह दूर निकल गए तो कुँवर ने जोर से कहकहा मारा। यह विजय का नारा था।

रानी ने पूछा -- यह क्‍या कायापलट हो गई। यह सब अचलगढ़ से लोटे आते हे ओर ऐन दशहरे के दिन?

इन्दरमल बड़े गर्व से बोले -- यह पोलिटिकल एजेन्ट के इनकारी तार के करिश्में हें, मेरी चाल बिलकुल ठीक पड़ी।

रानी का सन्देह दूर हो गया। जरूर यही बात है यह इनकारी तार की करामात है। वह बड़ी देर तक बेसुध-सी जमीन की

तरफ ताकती रही और उसके दिल में बार-बार यह सवाल पेदा होता था, क्या इसी का नाम राजहठ हे।

आखिरी इन्दरमल ने खामोशी तोड़ी -- क्या आज चलने का इरादा हे कि कल?

रानी -- कल शाम तक हमको अचलगढ़ पहुँचना हे, महाराज घबराते होंगे।


राजहठ का सारांश

'राजहठ' कहानी अचलगढ़ रियासत के राजा देवमल और उनके शिक्षित व संवेदनशील पुत्र कुँवर इंदरमल के बीच नैतिक सिद्धांतों और दिखावटी राजसी परंपराओं के टकराव को रेखांकित करती है। अचलगढ़ में दशहरे का वार्षिक उत्सव अत्यधिक धूमधाम, फिजूलखर्ची और नर्तकियों (अप्सराओं) के नाच-गाने के साथ मनाया जाता है। राजा देवमल का मुख्य उद्देश्य इस आयोजन के माध्यम से ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट को प्रसन्न करना और अपनी रियासत की झूठी शान जमाना है। दूसरी ओर, राज्य की स्थिति अत्यंत दयनीय है; वहाँ अकाल, महामारी, सड़कों और चिकित्सालयों का अभाव है तथा बीस हज़ार मज़दूरों से मुफ़्त में काम (बेगार) करवाया जाता है।

इंदौर से उच्च शिक्षा प्राप्त कुँवर इंदरमल इस अत्याचार और धार्मिक उत्सव में हरामकारी तथा वेश्यावृत्ति के प्रदर्शन का कड़ा विरोध करते हैं। जब वे अपने पिता को समझाने में असफल रहते हैं और राजा अपनी हठ पर अड़े रहते हैं, तो इंदरमल राज्य छोड़कर चले जाते हैं। महारानी भान कुँवर को जब पुत्र के जाने का समाचार मिलता है, तो वे राजा के सामने अपना विरोध ('त्रिया-हठ') दर्ज कराती हैं और कुँवर की खोज में महल छोड़कर निकल पड़ती हैं।

इंदरमल इंदौर पहुँचकर पॉलिटिकल एजेंट को अचलगढ़ की वास्तविक स्थिति और बेगार के अत्याचार से अवगत करा देते हैं। इसके परिणामस्वरूप पॉलिटिकल एजेंट उत्सव में आने से मना करने का तार भेज देता है, जिससे राजा देवमल को नाच-गाने का आयोजन रद्द करना पड़ता है और कलाकारों का काफिला वापस लौट जाता है। इंदौर के पास शिव मंदिर के समीप महारानी भान कुँवर और इंदरमल का मिलाप होता है। नर्तकियों को निराश लौटते देखकर इंदरमल संतुष्ट होते हैं कि उनकी चाल सफल रही। अंततः महारानी और कुँवर राजा की हठधर्मिता ('राजहठ') के दुष्परिणामों को समझते हुए अचलगढ़ लौटने का निर्णय लेते हैं।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • राजहठ बनाम जन-कल्याण: कहानी में राजा देवमल की जिद (राजहठ) और दिखावे की प्रवृत्ति का पर्दाफाश किया गया है, जहाँ जनता की मूलभूत आवश्यकताओं (स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क) की बलि देकर और बेगार का अत्याचार करके भी राजा अपनी झूठी प्रतिष्ठा बनाए रखना चाहता है।
  • सामंती व्यवस्था और ब्रिटिश अधीनता: प्रेमचंद ने दिखाया है कि किस प्रकार देशी रियासतों के राजा अपने ही देशवासियों और प्रजा का शोषण करके ब्रिटिश अफसरों (पॉलिटिकल एजेंट) को प्रसन्न करने के लिए राज्य के संसाधनों को पानी की तरह बहाते थे।
  • पीढ़ीगत संघर्ष और नैतिक चेतना: कुँवर इंदरमल आधुनिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों का प्रतीक है, जो परंपरा के नाम पर चल रहे सामाजिक व नैतिक भ्रष्टाचार (धार्मिक पर्वों पर नाच-गाना और हरामकारी) को स्वीकार करने से इंकार करता है।
  • त्रिया-हठ और मातृ-प्रेम: महारानी भान कुँवर का पात्र पुत्र-प्रेम और स्वाभिमान का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो राजा के अडियल रवैये के खिलाफ 'त्रिया-हठ' अपनाकर राजसी सुख-सुविधाओं को त्याग देती हैं और सत्य का साथ देती हैं।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: यह कहानी सामंती हठधर्मिता, जनता के शोषण और ब्रिटिश चाटुकारिता पर तीखा प्रहार करती है। प्रेमचंद यह संदेश देते हैं कि आधुनिक जन-चेतना और नैतिक कर्तव्य के सामने अंधा अहंकार और आडंबर अंततः पराजित होते हैं।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "राजहठ." *Munshi Premchand Digital Archive*, https://munshipremchand.com/works/short-stories/rajhath. Accessed 22 Sep. 2026.