बहुत से लोग यह शीर्षक देखकर ही चौंक पड़ेंगे। वाह | लड़के तो आप ही स्वाधीन होते हैं। वह तो बचपन हीं में न पुट्ठे पर हाथ रखने देते हैं, न मुंह में लगाम डालन देते हैं और जहां जया समझ आईं कि सरपट दौड़ना शुरू कर देते हैं। जरूरत है कि उन्हें आज्ञा पालन सिखाओ, बड़ों का अदब करना सिखाओ, संयम सिखाओ। उन्हें स्वाघीन बनाना तो ऐसा ही है, जेसा आग पर तेल छिड़कना।
यह समय है कि लड़के आजकल उससे कहीं ज्यादा स्वाधीन हैं, जितने कि उनके माता-पिता इस उप्र में खुद थे। इस स्वाधीन प्रवृत्ति का जो नतीजा हो रहा है, उसे देखकर यदि माता-पिता के मन में ऐसी शंका पैदा हो तो कोई आश्चर्य नहीं,
लेकिन इसीलिए तो जरूरत है कि लड़कों को स्वाधीन बनने की शिक्षा दी जाय। बालक जितना ही बलशाली होगा, उतना ही स्वाधीन भी होगा, लेकिन अभी हम
उसे इसको शिक्षा नहीं देते। अगर युवकों को फौज के लिए भरती किया जाय, तो उन्हें कवायद सिखाने की जरूरत होती है। अगर वे गायक बनना चाहें, तो यह संभव नहीं है, कि बिला सिखाए आप-ही-आप गाने लग जाय, लेकिन यह देखकर भी कि हमारे बालक वृन्द जितने स्वाधीन आज हैं, उतने किसी अतीत काल में न थे। हम उन्हें बचपन से इस समस्या को हल करने की उचित शिक्षा नहीं दे रहे हैं।
थोड़े से शब्दों में, बालक को प्रधानत: ऐसी शिक्षा देनी चाहिए, कि वह जीवन में अपनी रक्षा आप कर सके।
यह तो मानी हुई बात है कि आज के बालक स्वाधीन हैं, और अब किसी
बस की बात नहीं है कि इस दशा को पलट दे। इसके बहत से कारण हैं-परिवारों
का देहातों से निकलकर शहरों में आबाद होना, जहां परिचित जनों के दबाव और स्वभाव से लोग मुक्त हो जाते हैं, पुराने नीति- व्यवहारों का शिथिल हो जाना, जिनका पहले विद्रोही युवकों पर बहुत दबाव पड़ता था। मोटरकार, सिनेमा और समाचार- पत्र सब स्वाघीनता की प्रवृत्ति को मजबूत करते हैं।
लेकिन इस पर आंसू बहाने से काम न चलेगा। पगने जमाने में जब बड़ों का हकक््म और अदब मानना समाज का सबसे मान्य नियम था और हर एक छोटी जाति अपने से ऊंची जाति के सामने अदब से सिर झुकाठी थी, तब ,बालकों को बचपन ही से अदब करना सिखाया जाता था और उचित भी था, लेकिन आज किसी बाहरी सत्ता की आज्ञाओं को मानने की शिक्षा देना बालकों की सबसे बडी जरूरत की तरफ से आंखें बंद कर लेना है। युवकों के सामने आज जो परिस्थिति है उसमें अदब और नप्नता का इतना महत्त्व नहीं हैं, जितना व्यक्तिगत विचारों और कामों की स्वाधीनता का।
इस नई शिक्षा का आशय क्या है? आज्ञा-पालन हमारे जीवन का एक अंग है और हमेशा रहेगा। अगर हर एक आदमी अपने मन की करने लगे, तो समाज का शोराजा बिखर जायगा। अवश्य हर एक घर में जीवन के इस मौलि+- तत्त्व की रक्षा होनी चाहिए, लेकिन इसके साथ ही माता-पिता की यह कोशिश भो होनी चाहिए, कि उनके बालक उन्हें पत्थर की मूर्ति या पहेली न समझें। चतुर माता-पिता बालकों के प्रति अपने व्यवहार को जितना स्वाभाविक बना सकें, उतना बनाना चाहिए, क्योंकि बालक के जीवन का उद्देश्य कार्य क्षेत्र में आना है, केवल आज्ञा मानना नहीं। वास्तव में जो बालक इस तरह की शिक्षा पाते हैं, उसमें से आत्म-विश्वास का लोप हो जाता है। वे हमेशा किसी की आज्ञा का इंतजार करते हैं। हम समझते हैं कि आज कोई बाप अपने लड़के को ऐसी आदत डालने वालो शिक्षा न देगा।
दूसरा सिद्धांत यह है कि माता-पिता को कोई बात खुद न तय करती चाहिए, बल्कि लड़कों पर ही छोड देनी चाहिए। एक बाद: 'ह ने जब अपने बालक को एक अध्यापक को सौंपा, तो यह सलाह दी-जितनी जल्दी हो सके, अपने को ब्रेकार बना लेना। हमारा यह कर्त्तव्य नहीं है कि हम सदा अपने लड़कों से अपनी आज्ञाएं मनवाते रहें, बल्कि उनको इस योग्य बना दें, कि वह खुद अपने मार्ग का अपने-आप निश्चय कर लें। युवकों मे यह प्रवृत्ति जितनी अधिक होब्ी, उतनी ही सफल उनको शिक्षा
भी समझनी चाहिए।
तीसरा सिद्धांत यह है कि गृहस्थी को जनंतत्र के कायदों पर चलना चाहिए। तजुर्बे से यह बात मालूम होती है, कि हम जनतंत्र पर चाहे कितना ही विश्वास क्यों न रक्खें, हमारे घरों में स्वेच्छाचार ही का राज्य है। घर का मालिक मुसोलिनी या केसर की तरह डटा हुआ उसे जिस रास्ते चाहता है, ले जाता है और कभी इसफ्रा उलटा दिखाई देता है। घर में न कोई कायदा है न कोई कानून। जो जिसके जी मे आता हे, करता है, जेसे चाहता है, रहता है, कोई किसी की खबर नहीं लेता। लडके अपनी राह जाते हैं, जवान अपनी राह और बूढे अपनी राह। दोनों ही तरीके जनतंत्र से कोसों दूर हैं--पहले तरीके में स्वतंत्रता का नाम नहीं, दूसरे तरीके में जिम्मेदारी का। यह दोनों तरीके लड़कों की शिक्षा की दृष्टि से अनुचित हैं। करना यह चाहिए कि घर के मामलों में शुरू ही से बच्चों की राय ली जाय। छोटा बालक भी- अग्मा उसको सीधे रास्ते पर लगाया जाय--अपनी जिम्मेदारी को समझने लगता है। जिः लड़कों के साथ मां-बाप बुरा व्यवहार करते हैं, वे भी उनके साथ सच्चा स्नेह रखत हैं, मगर मां-बाप उनकी इस प्रकृति को अपने स्वेच्छाचार से कुचल डालते हैं और उसका बुरा नतीजा हम रोज अपनी आंखों से देखते हैं।
हर एक मामूली आदमी को यह जानकर गर्व और आनंद होता है कि घर म उसका भी कोई स्थान है, वह भी कुछ समझा जाता है। बालक भी इस भाव 7 खाली नहीं होता। सफल परिवार का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि वह इस प्र॒र्वृत्त को व्यवहार में लावे। ऐसा बालक सदैव परिवार के सम्मान की रक्षा करेगा। यहा उसे स्वाधीन राय कायम करने का पाठ मिल रहा है। हो सकता है कि इस विपय में कुछ लोगों का कड़वा तजुर्बा हो- युवकों ने परिवार के हित की ओर ध्यान न देकः अपने ही अधिकारों पर जोर दिया हों। अभिमान और विलास उनकी राय में आज्वल के युवकों में जरूरत से ज्यादा मौजूद है, लेकिन यह बालक का दोष नहीं, श बाप का दोष है। बालकों को यह शिक्षा देने के लिए समय, धैर्य, बुद्धि और सहान्भात की जरूरत है। इसका आशय यह है कि बच्चा ज्योंही आने और पैसे में फक समझने लगें, उनके हाथ में पैसे दे दिए जाय, उनका वजीफा बांध दिया जाय और कुमारावस्था में ही उन्हें इस योग्य बना दिया जाय कि बे पैसे का मूल्य समझने लगें और खच को आमदनी के अंदर रखने की आदत सीखें।
हम इन बातों पर ध्यान नहीं देते। कितने ही मां-बाप अपने लड़कों के विषय में उतने ही बेखबर होते हैं, जितने अपने तोते या कुत्ते के विषय में। बदमाश आर शरीफ बालकों की पारिवारिक स्थिति की परीक्षा ली जाय, तो सिद्ध हो जायगा कि बाल-चरित्र यें जो दोष आ जाते हैं, उसका कारण घर बालों की लापरवाही है।
बच्चों में स्वाधीनता के भाव पैदा करने के लिए यह जरूरी है कि जितना जल्दी हो सके, उन्हें कुछ काम करने का अवसर दिया जाय। आमतौर पर यह समझ जाता है कि अच्छे माता-पिता का कर्त्तव्य अपनी संतानों को कठिनाइयों से दूर रखना है। इसका फल यह है कि ऊंचे खानदानों में लड़के क्रियाहीन हो जाते हैं। जब उन्हे बिना कोई उद्योग किए ही सारी चीजें मिल जाती हैं, तो फिर वे काम क्यों करे
हालांकि विचार शास्त्र का यह एक मोटा सिद्धांत है कि लडकों को अपने हाथ से अपने उद्योग से, कोई काम कर दिख्गने में या कोई चीज बनाकर खडी कर देने में जितना आनंद मिलता है, उतना और किसी बात में नहीं। लडका अपनी कागज की नाव पानी में डालकर जितना खुश होता है, उतना बडे-बडे विशाल जहाजों को चलते देखकर नहीं होता।
हमारे सुचालित मदरसों में अब इस बात को लोग समझने लगे हैं कि लडकों को हाथ से कुछ काम कराना अव्वल दर्जे की मानसिक और नैतिक साधना है। हर एक घर में ऐसा ही होना चाहिए। लड़कों में आत्म-विश्वास उत्पन्न करने का इससे उत्तम साधन नहीं है।
सम्पन्न घरों में अपने हाथ से कुछ करना अपमान समझा जाता है। लडकों के हर एक काम के लिए नौकर लगे हुए हैं। आने-जाने के लिए मोटेरं हैं, उन्हें सैर कराने के लिए खूब साफ कपड़े पहना दिए जाते हैं और ताकीद कर दी जाती है कि एझपडे मैले न होने पावें। उनके मनोरंजन के लिए सिनेमा हैं, चित्रशालाएं हैं जहां उन्हें केबल आंख से देखने को जरूरत है, खुद कुछ करना नहीं पड़ग। इससे परतंत्रता की जो बुरी आदत पड़ जाती है, वह जिंदगी भर साथ नहीं छोडती। ऐसे ही विलास में पले हुए यतक् हैं, जो अपने स्वार्थ क॑ लिए अपने भाइयों का अहित करते हैं सरकार की बेजा रुशामद करते हैं।
हम बहुधा लड़कों को कोई नया काम करते देखकर घबड़ा जाते हैं। घड़ी छ रहा है, कहीं तोड न डाले। लड़के ने कलम हाथ से लिया ओर हां, हां, हां का शोर मचा | ऐसा नहीं होना चाहिए। लड़कों की स्वाभाविक रचनाशीलता को जगाना चाहिए। लड़का खिलौने बनाना चाहे, बेतार का यंत्र बनाना चाहे, मछली का शिकर ऋऊरना चाहे, तरकारियां पैदा करना चाहे, कपड़े सीना चाहं, बीन बजाना चाहे, नाटकों पे अभिनय करना चाहे, या कविता लिखना चाहे, उसे बाधा मत दो। अगर कोई बालक साल क चंद हफ्ते भी प्राकृतिक शक्तियों के बीच मे रहे, दरिया में किश्ती चलाए, मैदान में गाड़ी चलाए या फावड़ा लेकर खेत में काम करे, तो उसे आप्म-विश्वास को जो अनुभव होगा, वह पुस्तकों और उपदेशों से नहीं हो सकता। आश्चर्य तो यह है कि वह लोग भो, जिनकी जवानी कठिनाइयों में गुजरी, अपने ब।लकों को जीवन- संग्राम के उत्साह बढाने वाले कामों से बचाते हें।
हम यहां यह बतला देना चाहते हैं कि स्वाधीनता से हमारा मतलब क्या है? इसका यह मतलब नहीं है कि हम बिना रोक-टोक जो कुछ चाहे करें और कुछ चाहे न करें। इसका मतलब यह है कि बाहरी दबाव कौ जगह हममें आत्म- संयम का उदय हो। सच्चा स्वाधीन आदमी वही है, जिसका आत्मा के शासन से संयरित हो जाता है, जिसे किसी बाहरी दबाव की जरूरत नहीं पड़ती। बालकों में इतना विवेक होना चाहिए कि वे हर एक क 3 के गुण-दोष को भातर कौ आखों से देखें।
प्रकाशन इतिहास
[लेख। 'हंस', अप्रैल, 1930 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]
