कफ़न का मूल पाठ
झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अंधकार में लय हो गया था। घीसू ने कहा—“मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।”
माधव चिढ़कर बोला—”मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?” “तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफ़ाई!”
“तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।” चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मज़दूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की क़सम थी। जब दो-चार फ़ाक़े हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक़्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनो साधु होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई संपत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिए जाते थे। संसार की चिंताओं से मुक्त! क़र्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई ग़म नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ क़र्ज़ दे देते थे। मटर, आलू की फ़सल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक़्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाए थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहांत हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से यह औरत आई थी, उसने इस ख़ानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-ग़ैरतों का दोज़ख़ भरती रहती थी। जब से वह आई, यह दोनों और भी आलसी और आरामतलब हो गए थे। बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्ब्याज भाव से दुगुनी मज़दूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इंतज़ार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोएँ।
घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा—“जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!” माधव को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ़ कर देगा। बोला- “मुझे वहाँ जाते डर लगता है।”
“डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।” “तो तुम्हीं जाकर देखो न?”
“मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं था! और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुँह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी!” “मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हो गया तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!”
“सब कुछ आ जाएगा। भगवान दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपए देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था, मगर भगवान ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।” जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुक़ाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़्यादा संपन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज़्यादा विचारवान था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाज़ों की कुत्सित मंडली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाज़ों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मंडली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते!
दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठंडा हो जाने दें। कई बार दोनों की ज़बानें जल गईं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा ज़बान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा ख़ैरियत इसी में थी कि वह अंदर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठंडा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते। घीसू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आई, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक़ बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ा थी, बोला—“वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लड़की वालों ने सबको भर पेट पूरियाँ खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूरियाँ खाईं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला। कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, माँगो, जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौरियाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कंबल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर!”
माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मज़ा लेते हुए कहा—“अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।” “अब कोई क्या खिलाएगा? वह ज़माना दूसरा था। अब तो सबको किफ़ायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत ख़र्च करो, क्रिया-कर्म में मत ख़र्च करो। पूछो, ग़रीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, ख़र्च में किफ़ायत सूझती है!”
“तुमने एक बीस पूरियाँ खाई होंगी?” “बीस से ज़ियादा खाई थीं!”
“मैं पचास खा जाता!” “पचास से कम मैंने न खाई होंगी। अच्छा पका था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।”
आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलियाँ मारे पड़े हों। और बुधिया अभी तक कराह रही थी। दो
सवेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठंडी हो गई थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था। माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आए और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।
मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह ग़ायब था, जैसे चील के घोंसले में माँस? बाप-बेटे रोते हुए गाँव के ज़मींदार के पास गए। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा—“क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।”
घीसू ने ज़मीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा—“सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। माधव की घरवाली रात को गुज़र गई। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दग़ा दे गई। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गए। घर उजड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।” ज़मींदार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कंबल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यूँ तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब ग़रज़ पड़ी तो आकर ख़ुशामद कर रहा है। हरामख़ोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दंड देने का अवसर न था।
जी में कुढ़ते हुए दो रुपए निकालकर फेंक दिए। मगर सांत्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ़ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो। जब ज़मींदार साहब ने दो रुपए दिए, तो गाँव के बनिए-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? घीसू ज़मींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना ख़ूब जानता था। किसी ने दो आने दिए, किसी ने चारे आने। एक घंटे में घीसू के पास पाँच रुपए की अच्छी रक़म जमा हो गई। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे।
गाँव की नर्म दिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं। तीन
बाज़ार में पहुँचकर घीसू बोला—“लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गई है, क्यों माधव!” माधव बोला—“हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।”
“तो चलो, कोई हलक़ा-सा कफ़न ले लें।” “हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?”
“कैसा बुरा रिवाज़ है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।” “कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।”
“और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपए पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।” दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस बाज़ार की दूकान पर गए, कभी उसकी दूकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गई। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अंदर चले गए। वहाँ ज़रा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा—“साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।”
इसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आईं और दोनों बरामदे में बैठकर शांतिपूर्वक पीने लगे। कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गए। घीसू बोला—“कफ़न लगाने से क्या मिलता? आख़िर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।”
माधव आसमान की तरफ़ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो—“दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बामनों को हज़ारों रुपए क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!” “बड़े आदमियों के पास धन है, फूँके। हमारे पास फूँकने को क्या है?”
“लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?” घीसू हँसा—“अबे, कह देंगे कि रुपए कमर से खिसक गए। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपए देंगे।”
माधव भी हँसा, इस अनपेक्षित सौभाग्य पर बोला—“बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो ख़ूब खिला-पिलाकर!” आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गई। घीसू ने दो सेर पूरियाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबख़ाने के सामने ही दूकान थी। माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया ख़र्च हो गया। सिर्फ़ थोड़े से पैसे बच रहे।
दोनों इस वक़्त इस शान में बैठे पूरियाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का ख़ौफ़ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था। घीसू दार्शनिक भाव से बोला—“हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?”
माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की—“ज़रूर से ज़रूर होगा। भगवान, तुम अंतर्यामी हो। उसे बैकुंठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था।” एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी। बोला—“क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?”
घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनंद में बाधा न डालना चाहता था। “जो वहाँ वह हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?”
“कहेंगे तुम्हारा सिर!” “पूछेगी तो ज़रूर!”
“तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!” माधव को विश्वास न आया। बोला—“कौन देगा? रुपए तो तुमने चट कर दिए। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सेंदुर मैंने डाला था।”
“कौन देगा, बताते क्यों नहीं?” “वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया। हाँ, अबकी रुपए हमारे हाथ न आएँगे।”
ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाए देता था। वहाँ के वातावरण में सुरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं।
और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मज़े ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है। भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूरियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनंद और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया।
घीसू ने कहा—“ले जा, ख़ूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गई। मगर तेरा आशीर्वाद उसे ज़रूर पहुँचेगा। रोएँ-रोएँ से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!” माधव ने फिर आसमान की तरफ़ देखकर कहा—“वह बैकुंठ में जाएगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी।”
घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला—“हाँ, बेटा बैकुंठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई। वह न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो ग़रीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं? श्रद्धालुता का यह रंग तुरंत ही बदल गया। अस्थिरता नशे की ख़ासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ।
माधव बोला—“मगर दादा, बेचारी ने ज़िंदगी में बड़ा दुख भोगा। कितना दुख झेलकर मरी!” वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर।
घीसू ने समझाया—“क्यों रोता है बेटा, ख़ुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गई, जंजाल से छूट गई। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बंधन तोड़ दिए। और दोनों खड़े होकर गाने लगे—
“ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी!” पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाए जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बनाए, अभिनय भी किए। और आख़िर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े।
~ समाप्त ~
कफ़न का सारांश
घीसू और उसका बेटा माधव चमार जाति के हैं और पूरे गाँव में अपनी अत्यधिक आलस और कामचोरी के लिए बदनाम हैं। जाड़ों की एक ठंडी रात में दोनों झोंपड़े के बाहर बुझे हुए अलाव के सामने बैठकर चोरी के उखाड़े आलू भूनकर खा रहे हैं, जबकि अंदर माधव की जवान पत्नी बुधिया प्रसव-वेदना से तड़प रही है। दोनों में से कोई भी कोठरी के अंदर जाकर उसे देखने को तैयार नहीं है—माधव को डर है कि घीसू भुने हुए आलुओं का बड़ा हिस्सा खा जाएगा, और घीसू का तर्क है कि वह उघड़ा बदन कैसे देखे। बुधिया ने पिछले साल से इस घर में आकर व्यवस्था बनाई थी और इन दोनों बेगैरतों का पेट भरती थी। आज वही प्रसव-वेदना से तड़प रही है और ये दोनों इसी इंतजार में हैं कि वह मर जाए तो आराम से सोएँ। आलू खाते समय घीसू बीस साल पहले ठाकुर की बरात में खाए भरपेट भोजन—कचौड़ी, रायता, तरकारी और मिठाइयों—को याद करता है।
सुबह माधव कोठरी में जाकर देखता है तो बुधिया ठंडी हो चुकी होती है और उसके पेट में बच्चा भी मर चुका होता है। बाप-बेटा ज़ोर-ज़ोर से छाती पीटकर रोने लगते हैं। लाश उठाने और जलाने के लिए कफ़न तथा लकड़ी की कोई व्यवस्था नहीं है। दोनों गाँव के ज़मींदार के पास जाते हैं, जो उनसे नफ़रत करने के बावजूद दया दिखाकर दो रुपये फेंक देता है। ज़मींदार से पैसे मिलते देख गाँव के अन्य महाजन और लोग भी कुछ-कुछ पैसे देते हैं, जिससे पाँच रुपये जमा हो जाते हैं।
दोपहर को घीसू और माधव कफ़न खरीदने बाज़ार जाते हैं। बाज़ार में घूमते-घूमते शाम हो जाती है, पर उन्हें कोई कफ़न पसंद नहीं आता। दोनों मन ही मन सोचते हैं कि जो कफ़न लाश के साथ जल ही जाना है, उस पर नया कपड़ा क्यों बर्बाद किया जाए। वे घूमते हुए एक शराबखाने के सामने पहुँच जाते हैं और अंदर चले जाते हैं। कफ़न के पैसों से वे एक बोतल शराब, तली मछली और दो सेर गरम पूरियाँ, कलेजियाँ तथा अचार मँगवाकर पेट भरकर खाते-पीते हैं।
माधव जब शंका व्यक्त करता है कि परलोक में बुधिया पूछेगी कि कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहेंगे, तो घीसू दार्शनिक अंदाज़ में कहता है कि वही लोग फिर से कफ़न के पैसे देंगे। भरपेट खाने के बाद बची हुई पूरियाँ वे एक भूखे भिखारी को दे देते हैं और जीवन में पहली बार दान का आनंद और गौरव महसूस करते हैं। अंत में दोनों नशे में मदमस्त होकर 'ठगिनी क्यों नैना झमकावे' गाते और नाचते हुए ढह जाते हैं।
प्रकाशन इतिहास
प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- चरम गरीबी और संवेदनहीनता का यथार्थ: कहानी दर्शाती है कि जब निरंतर अभाव और शोषण मनुष्य को घेर लेता है, तो उसकी मूलभूत मानवीय संवेदनाएँ और पारिवारिक प्रेम नष्ट हो जाते हैं। घीसू और माधव का व्यवहार व्यक्तिगत नीचता से अधिक सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की देन है।
- सामाजिक रीति-रिवाजों और ढोंग पर व्यंग्य: प्रेमचंद उस सामाजिक परंपरा पर गहरा व्यंग्य करते हैं जहाँ जीवित इंसान को तन ढाँकने को चीथड़ा भी नसीब नहीं होता, परंतु मरने के बाद उसके लिए नए कफ़न की औपचारिकता अनिवार्य मानी जाती है।
- कामचोरी का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पक्ष: जिस समाज में दिन-रात जी-तोड़ मेहनत करने वाले किसानों की हालत भी दयनीय बनी रहती है, वहाँ घीसू का काम न करना एक प्रकार का अचेतन सामाजिक विद्रोह है।
- नशे में क्षणिक मुक्ति और विडंबना: शराबखाने में पूरियाँ और शराब उड़ाते हुए घीसू और माधव अपनी भूख और दुःख से क्षणिक मुक्ति पाते हैं। भिखारी को खाना देकर दान का गौरव महसूस करना कहानी की करुण विडंबना को उजागर करता है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'कफ़न' प्रेमचंद की अंतिम और महानतम कृतियों में से एक है। यह कहानी यथार्थवाद के ऐसे चरम बिंदु को छूती है जहाँ गरीबी के कारण उपजी अमानवीयता और सामाजिक विषमता का नग्न रूप सामने आता है।
