भारतीय एकता के विरोधी यह कहते कभी नहीं थकते कि जब तक हिन्दुओं ओर मुसलमानों में हिस्से का समझौता न हो जाय, मुसलमान इम संग्राम में शामिल नहीं हो सकते। इस कथन में कितनी सच्चाई है, इसे मुसलिम जनता अब समझने लगी है। वह यह है, कि जब तक एक तीसरी शक्ति इन दोनो जातियों के बैमनस्थ से फायदा उठाने वाली रहेगी, एकता का सूर्य कभी उदय न होगा। पूरी एकता तो स्वराज्य मिल जाने पर ही हो सकती है। हिस्से का निश्चय करने के लिए एक से अधिक बार कोशिशें की गई, यहां तक कि आज भी सर तेजबहादुर सप्र सर्वदल- सम्मेलन करने में लगे हुए हैं, मगर उन कोशिशों का फल कया निकला? समझौता न हुआ, न हुआ। कोई रोजगार शुरू किया जाता है, तो पहले ही से यह निश्चय नहीं कर लिया जाता कि हम इतने रुपये फी सैकड़े नफा लेंगे। पहले ता उसके लिए पूंजी जमा की जाती है। फिर संगठन शुरू हाता है तब माल की तैयारी होती है, इसके बाद खपत का सवाल होता है, आखिर में नफं का प्रएइन आता है। यहां पहल ही में नफे के हिस्से तय करन की सलाह की जाती है। अरे भाई जान, पहले पूंजी ता लगाओ, अभी नफे का क्या सवाल है? हिन्दुस्तान अगर इतने दिनों की गुलामी से कुछ मीख सका है, तो वह यह है कि समाज के किसी अंग को असंतुष्ट रखकर कोई राष्ट्र दुनिया में उन्नति नहीं कर सकता। हमें विश्वास है कि भारत इस सबक को अब कभी न भूलेगा। महात्मा गांधी ने तो यहां तक कह दिया है कि मुसलमान जितना चाहें ले लें, इसमें हिस्से का सवाल ही नहीं। स्वराज्य के अधीन राजपद धन कमाने का साधन नहीं, प्रजा की सेवा का साधन होगा। हम तो यही समझे बैठे हैं। अगर उस दछ्ण में भी हमारे मुसलमान भाई राजपदों या मेम्बरियों में बड़ा हिस्सा लेने का आग्रह करेंगे तो स्वराज्य-सरकार उनके मार्ग में बाधक न बनेगी। उस वक्त राजपद वही स्वीक्पार करेंगे जो देश के लिए त्याग करना चाहेंगे, धन लोलुप, और विलासी जनों के लिए स्वराज्य-शासन में कोई स्थान न होगा।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', अप्रैल, 1930 में प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]
