एक अपूर्ण कहानी का मूल पाठ
बाबू सेवाराम ने बड़े-बड़े फिलासफ्रों का मुताला किया था। फूलसफा में एम. ए. थे, मगर जिन्दगी यक रास्ता मिराइन ईसवी से ज़्यादा बेहतः कोई रहनुमा न मिला था। इस्तदलाल की दुनिया में तो वो बर्गसन और जाटे कई-कई फिलासफू्रों के मोत्कृद थे, मगर दुनिया-ए-अमल में वो लज्जावती के पैरो थे। इसकी मर्जी के खिलाफ कोई काम करके वो फ्लसफियाना हमलों का नितना ना बनना चाहते थे। इसका नतीजा यह था कि घर में लज्जावती का राज था। सेवाराम अपनी चारपाई आप बिछा लें, नौकर बैठा रहता था, लेकिन लज्जावती के इशारे पर काम करता था। वह कहीं बाहर से घर में आती तो घर में हलचल मच जाती, मगर सेवाराम घर में आये तो किसी को घर में ख़बर भी न होती थी। वह कॉलेज से लौटकर अपने कमरे में जाते, कपड़े उतारते, तब कुछ नाश्ता करने खुद आते थे। आज वह अपने कमरे में न जाकर सीधे लज्जावती के पास आये। लज्जा ने उनके चेहरे की तरफ देखा, बोली, “कपड़े तो उतार देते। चेहरा कुछ उतरा हुआ है।”
सेवाराम ने किताबों का बण्डल चारपाई पर पटक दिया और खड़े-खड़े बोले, “एक नई मुसीबत आ खड़ी हुई है। मोहनी को किसी तरह समझा-बुझाकर यहाँ से रवाना करना चाहिए। प्रिंसिपल साहब ने आज मुझे बुरी तरह डाटा ।”
सेवाराम का चेहरा देखकर उनके फूलसफी होने का वहम भी नहीं हो सकता था। मोटे-मोटे होंठ, छोटी-छोटी आँखें, बड़ी-बड़ी मूँछें, फरबा जिस्म और तारकोल का-सा रंग। ऊँची अचकन पहनते थे और पाजामा भी ऊँचा ही पहनते थे।
एक अपूर्ण कहानी का सारांश
'एक अपूर्ण कहानी' मुंशी प्रेमचंद का एक दुर्लभ एवं अपूर्ण कथा-अंश है, जिसमें दर्शनशास्त्र के एक प्राध्यापक के दांपत्य और पारिवारिक जीवन का अत्यंत सजीव तथा व्यंग्यात्मक चित्रण मिलता है। कथा के मुख्य पात्र बाबू सेवाराम दर्शनशास्त्र में एम.ए. हैं। सैद्धांतिक और बौद्धिक जगत में वे बर्गसन और अन्य पश्चिमी दार्शनिकों के सिद्धांतों पर विचार करते हैं, परंतु अपने व्यावहारिक जीवन में वे पूरी तरह अपनी पत्नी लज्जावती के आज्ञाकारी और समर्पित अनुयायी हैं।
घर के भीतर लज्जावती का पूर्ण आधिपत्य और शासन चलता है। स्थिति यह है कि घर का नौकर सेवाराम के किसी काम की परवाह नहीं करता और सेवाराम को अपनी चारपाई स्वयं बिछानी पड़ती है, जबकि लज्जावती के एक इशारे पर समूचा घर तत्पर रहता है। लज्जावती के बाहर से लौटने पर घर में हलचल मच जाती है, वहीं सेवाराम के आने की किसी को भनक तक नहीं लगती।
प्रतिदिन के नियम के विपरीत, एक दिन सेवाराम कॉलेज से लौटकर अपने कमरे में जाने और कपड़े बदलने के बजाय सीधे परेशान हालत में लज्जावती के पास पहुँचते हैं। उनका चेहरा उतरा हुआ देखकर लज्जावती उनसे कारण पूछती है। सेवाराम किताबों का बंडल चारपाई पर पटकते हुए बताते हैं कि एक नई मुसीबत आ खड़ी हुई है और 'मोहनी' को समझा-बुझाकर यहाँ से विदा करना आवश्यक है, क्योंकि आज कॉलेज के प्रिंसिपल साहब ने उन्हें इस बात पर बुरी तरह डांटा है। इसी मोड़ पर बाबू सेवाराम के बाह्य रूप-रंग—मोटे होंठ, छोटी आँखें, बड़ी मूँछें, भारी शरीर और सांवले रंग—का हास्यपूर्ण परिचय देते हुए यह कहानी अपूर्ण रह जाती है।
प्रकाशन इतिहास
प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- दार्शनिक ज्ञान बनाम व्यावहारिक विवशता: कहानी उच्च बौद्धिक अध्ययन और यथार्थ जीवन के विरोधाभास को सामने लाती है। दर्शनशास्त्र के ज्ञाता होकर भी बाबू सेवाराम घरेलू धरातल पर नितांत दब्बू और विवश दिखाई देते हैं।
- पारिवारिक सत्ता और दांपत्य समीकरण: प्रेमचंद ने गृहस्थी में पति-पत्नी के सत्ता-संतुलन का सटीक और मनोरंजक खाका खींचा है, जहाँ बौद्धिक रूप से प्रतिष्ठित पुरुष पर उसकी पत्नी का अटूट नियंत्रण है।
- पात्र-चित्रण में सजीव व्यंग्य: बाबू सेवाराम के शारीरिक स्वरूप और उनके दार्शनिक व्यक्तित्व के बीच का विषमतापूर्ण चित्रण प्रेमचंद की यथार्थपरक हास्य-व्यंग्य शैली का सुंदर उदाहरण है।
- नाटकीय उत्सुकता का आरंभ: अत्यंत संक्षिप्त होने के बावजूद कथा में 'मोहनी' और 'प्रिंसिपल साहब की नाराजगी' का उल्लेख जोड़कर लेखक ने एक गंभीर कौतूहल और सामाजिक तनाव की नींव रखी है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: एक अपूर्ण पांडुलिपि के रूप में भी यह रचना प्रेमचंद की सूक्ष्म अवलोकन दृष्टि, मध्यमवर्गीय मनोविज्ञान और पारिवारिक संबंधों के द्वंद्व को हास्य-व्यंग्य के माध्यम से उद्घाटित करने की विशिष्ट कला को दर्शाती है।
