हमारे मुसलमान भाइयों ने आखिर वह कर ही डाला, जिसकी हमें शंका थी; पर यह समझकर कि शायद योरोप के नये वातावरण में वह कुछ उदार हो जायें, हम उस शंका को बहलाते रहे थे। महात्मा गांधी जी भी यही समझकर गोलमेज में सम्मिलित हुए थे। अगर उन्हें यह मालूम होता, कि मुस्लिम मेम्बर वहाँ यह अड़ंगा लगायेंगे, तो वह जाते ही क्यों। हालाँकि अभी तक महात्मा जी निराश नहीं हुए हैं और हमारी ईश्वर से प्रार्थना है, कि उनकी आशावादिता प्रवंचना न निकले, पर हमें सन्देह अवश्य है। मुसलमानों ने बहुत दिन इस देश पर राज्य किया है और अब भी वह कई देशों में स्वराज्य कर रहे हैं, इसलिए उनकी राजनैतिक बुद्धि पर कम से कम इतना विश्वास अवश्य था कि इस अवसर पर वह मुल्क का साथ देंगे। मिस्र, तुर्की आदि देशों के नेताओं ने मुस्लिम नेताओं से जो अपीलें की थीं, उसने हमारे विश्वास को दृढ़ कर दिया था, पर अब मालूम हुआ कि हमारा विश्वास मिथ्या था। हिन्दू बहुमत में हैं। किसी हिकमत से भी उनकी संख्या घटायी नहीं जा सकती। उधर मुसलमान कोई ऐसी व्यवस्था न मंजूर करेंगे, जिसमें बहुमत से किसी हानि की सम्भावना हो। इसलिए भारत को जन्म-जन्मान्तर तक इसी पराधीनता की दशा में रहना होगा। उनकी रक्षा के लिए भारत पर अंग्रेजों का शासन अनिवार्य है। नहीं तो हिन्दू मुसलमानों से पुरानी अदावतें निकालेंगे, और भारत में उनका रहना मुश्किल कर देंगे। तो क्या हिन्दू उस वक्त तक चुपचाप बैठे रहें, जब तक उनका बहुमत घटते-घटते अल्पमत न हो जाय? इसके सिवा और कोई उपाय नहीं सूझता।
गोलमेज के मुस्लिम प्रतिनिधियों को हिन्दुओं पर विश्वास नहीं है, अंग्रेजों पर विश्वास है। जिनसे उनका चोली-दामन का साथ है, जिनके साथ उनका भाईचारा है, उन पर उन्हें विश्वास नहीं है। अंग्रेजों पर उन्हें विश्वास है, जो उन पर शासन करते हैं। हम कैसे कहें कि वे मुसलमान प्रतिनिधि स्वाधीनता के उतने ही इच्छुक नहीं हैं, जितने हिन्दू हैं, या वह देश का या अपनी जाति का नफ़ा-नुकसान नहीं समझते। उनमें सभी शिक्षित हैं, विचारशील हैं। देश के दुर्भाग्य के सिवा हम इसे क्या कहें। शायद ईश्वर को यह मंजूर नहीं है कि अभी भारत स्वाधीन हो, शायद अभी भारत ने आजादी का वह मूल्य नहीं दिया, जो देना चाहिए, और अभी उसे और बलिदान की जरूरत है।
इंग्लैंड में आजकल नया निर्वाचन हो रहा है। उस निर्वाचन में कंजरवेटिव दल के बहुमत पाने की ही सम्भावना है। मिस्टर रैम्जे मैकडोनाल्ड के पृथक हो जाने से मजदूर दल की शक्ति बहुत कुछ क्षीण हो गयी है। आपस में बिखरा हुआ मजदूर दल कंजरवेटिव दल को परास्त कर सकेगा, इसमें सन्देह है। रैम्जे मैकडोनाल्ड का भाग्य भी अब उन्हीं लोगों के हाथों में है, जो अब तक उनके विपक्षी थे और जिनके राजनैतिक विचार मैकडोनाल्ड के विचारों से उतने ही भिन्न हैं, जितना प्रकाश अन्धकार से। मैकडोनाल्ड साहब ने अभी जो कुलाँट मारी है, इससे सिद्ध कर दिया है कि वह सिद्धान्त के उतने प्रेमी नहीं, जितने समय-प्रवाह के। वह समय की गति देखकर अपने विचारों में उलट-फेर कर सकते हैं, तो क्या अब वह कंजरवेटिव दलवालों को अप्रसन्न करने का नैतिक साहस दिखा सकेंगे? हमें इसमें सन्देह है। उन्होंने महात्मा गांधी के यह कहने पर कि प्रतिनिधियों का चुनाव ही इस ढंग पर हुआ है कि आपस में किसी समझौते का होना संदिग्ध था, जो फटकार बतायी उससे उनके मानसिक परिवर्तन का कुछ पता चलता है। महात्मा जी ने एक सत्य बात कही थी। हाँ, वह कड़वा सत्य था।
यह कौन-सा न्याय है कि जिन मुसलिम नेताओं ने राष्ट्रीय संग्राम में कोई भाग नहीं लिया, जो बराबर सरकार के भक्त बने रहे, जिनके विषय में यह कोई छिपी हुई बात न थी कि वे हिन्दुओं से विरोध रखते हैं, वह तो दर्जनों की संख्या में भेज दिये गये, और वह मुस्लिम-दल जिसने स्वाधीनता के लिए बलिदान किये, जो हिन्दुओं पर विश्वास रखता है, जिसकी संख्या जितनी मुस्लिम लीग के नामलेवों की है उससे कहीं अधिक है, जिसकी शाखाएँ भारत के प्रत्येक भाग में हैं, उस दल का एक आदमी भी न भेजा गया? एक आदमी छूत छुड़ाने को भेज भी दिया गया, तो उसे बोलने का अवसर न दिया गया! क्या यह समझने के लिए किसी सूक्ष्म बुद्धि की ज़रूरत है कि नौकरशाही ने यह चुनाव इसी इरादे से किया था कि गोलमेज में विघ्न पड़े और कोई बात तय न हो सके! पर महात्मा जी ने यह कह दिया, तो सभी भन्ना उठे। सर शफी गरज उठे, मैकडोनाल्ड साहब तड़प उठे, यहाँ तक कि अछूतों के प्रतिनिधि कहलाने वाले डॉक्टर अम्बेडकर भी चीख पड़े।
एक अमेरिकन पत्र के सम्वाददाता ने तो यहाँ तक लिखा कि मुसलिम और अन्य अल्पमतों के नेता महात्मा गांधी से विरोध भी करते हैं, तो सम्मान के साथ, पर डॉक्टर अम्बेडकर तो असज्जनता कर बैठते हैं। क्यों न हो! हिन्दुओं से बदला लेने का इससे अच्छा कौन-सा अवसर आवेगा! अंग्रेज जाति उनका उद्धार करने पर आमादा हो गयी है। हिन्दुओं से सारी पुरानी कसर आज ही निकाल लो। डॉक्टर साहब तो विद्वान आदमी हैं, क्या वह यह नहीं जानते कि विजेताओं ने हमेशा कमजोरों को दबाया है, यहाँ तक कि वही अंग्रेज जाति जिन्हें वह अपना उद्धारक समझ रहे हैं, अपनी पराधीन जातियों पर किस प्रकार शासन कर रही है? अफ्रीकावालों से अंग्रेजों की न्यायपरता की कथा पूछिए, रेड इंडियनों से पूछिए, ऑस्ट्रेलिया के माओरियों से पूछिए, भारतवालों से पूछिए। और यह कोई दो-चार हजार साल पुरानी बात नहीं है, आज भी हम जबरदस्त का ठेंगा अपने सिर पर देख रहे हैं। पुराने जमाने में हिन्दुओं ने भी वही किया तो उन्होंने वही किया जो परम्परा से होता चला आता है। लेकिन देखना यह है कि हिन्दू नेता आज अपने अछूत भाइयों के साथ भी वही पुराना व्यवहार कर रहे हैं, या उसमें कुछ परिवर्तन हुआ है।
काँग्रेस ने राष्ट्र के स्वत्वों की जो घोषणा की है, उसमें हरेक भारतीय के समान अधिकार रखे हैं। किसी दल, मत या जाति को अयोग्य नहीं ठहराया। किसी को विशेष अधिकार नहीं दिया। वोट का हक हरेक को दिया गया है। राज-पद पर भी सबका समान अधिकार माना गया है। यह कहा जा सकता है कि अछूत भाई अभी ऊँची जातियों से बराबरी नहीं कर सकते, क्योंकि वह शिक्षा और सभ्यता में बहुत पिछड़े हुए हैं, पर क्या यह बात स्वराज्य हो जाने पर नहीं कही जा सकती। उस वक्त अगर यहाँ की स्वराज्य सरकार इनके साथ अन्याय करती तो उन्हें शिकायत करने का, आन्दोलन करने का मौका था। इस वक्त तो वह पृथकता का राग अलापकर हमारे शत्रुओं का साथ दे रहे हैं। हिन्दू अब इतने नादान नहीं हैं, कि वह अपने ही देह के एक अंग को अपंग करके संसार में अपना अस्तित्व बनाये रखने का स्वप्न देख सकें। हजारों साल की गुलामी ने अब उन्हें सिखा दिया है कि अपने कुछ भाइयों को नीच बनाकर उन्होंने अपना ही जीवन संकट में डाल दिया है, और उनका उद्धार अब इसी में है कि उन भाइयों को बराबर के अधिकार दें और उन्हें वास्तव में अपना भाई समझें। लेकिन अगर इस वक्त डॉक्टर साहब ने मुसलमानों, ईसाइयों, ऐंग्लो-इण्डियनों के साथ विशेष अधिकार पर जोर दिया, तो यह राष्ट्र क्या होगा, लड़ाइयों का अखाड़ा होगा। भारत का उद्धार अब इसी में है कि हम राष्ट्र-धर्म के उपासक बनें, विशेष अधिकारों के लिए न लड़कर, समान अधिकारों के लिए लड़ें। हिन्दू या मुसलमान, अछूत या ईसाई बनकर नहीं, भारतीय बनकर संयुक्त उन्नति की ओर अग्रसर हों, अन्यथा हिन्दू, मुसलमान, अछूत और सिक्ख सब रसातल को चले जायेंगे।
अगर सम्प्रदायवादियों ने और उनकी पीठ पर हाथ फेरने वाले साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने समझा है, कि राष्ट्रीय भारत गोलमेज के गोलमाल से हताश हो जायगा, तो वह ग़लती पर हैं। इस पराधीनता ने भारत की आत्मा को जगा दिया है, और वह अब किसी शक्ति के रोके नहीं रुकती। धर्म का सम्बन्ध मनुष्य से और ईश्वर से है। उसके बीच में देश, जाति और राष्ट्र किसी को भी दखल देने का अधिकार नहीं। हम इस विषय में स्वाधीन हैं। हम मसजिद में जायें या मन्दिर में, हिन्दी पढ़ें या उर्दू, धोती बाँधें या पाजामा पहनें, हम स्वाधीन हैं, लेकिन धर्म के नाम पर राष्ट्र को भिन्न-भिन्न दलों में विभक्त करना, ईश्वर और मनुष्य के सम्बन्धों को राष्ट्रीय मामलों में घसीट लाना, राष्ट्रीय भारत कभी गवारा न करेगा। भारत ने बहुत कुछ तो समझ लिया है और जो कसर है वह भी अब समझता है, कि सम्पूर्ण भारत का हित एक है, उसमें कोई भी विभिन्नता नहीं है।
सरकारी नौकरियों के लिए अभी तक शिक्षित समाज के मन में मोह है। वही मोह, वही लोभ, इस विभिन्नता का कारण है। लेकिन अगर अभी वह समय नहीं आया तो अब उसके आने में देर नहीं है, जब वास्तविक राष्ट्र शिक्षित समाज की संकीर्ण स्वार्थपरता के विरोध में विद्रोह करेगा। मुट्ठी भर पढ़े-लिखे आदमियों को कोई अधिकार नहीं, कि वह अपने हलुवे-माँड़े के लिए सम्पूर्ण राष्ट्र का जीवन संकटमय बनावें। वह जमाना आ रहा है, जब भारत के किसान, भारत के दूकानदार, भारत के मजदूर, खुद अपना नफ़ा-नुकसान समझेंगे और अपने हितों का शिक्षित समुदाय के पैरों तले कुचला जाना गवारा न करेंगे। शिक्षितों ने जीवन के पश्चिमी, नकली, आडम्बरमय आदर्शों की गुलामी करके भारत को सर्वनाश के गर्त में ढकेल दिया है। भारत का एक सुशिक्षित व्यक्ति आज जरूरतों का ऐसा गुलाम हो गया है, कि उसे जीवित रखने के लिए कम से कम पचास मजदूरों और किसानों को मरना चाहिए। इसी आडम्बरमय जीवन के निर्वाह के लिए तरह-तरह के ढोंग रचे जाते हैं, धर्म की आड़ ली जाती है, संस्कृति का रोना रोया जाता है, विशेष अधिकार का भूत खड़ा किया जाता है, भाषा और लिपि की अनेक कल्पित विभिन्नताओं की दुहाई दी जाती है, केवल इसलिए कि शिक्षितों का खटमली-जीवन आनन्द से व्यतीत हो। वह बंगलों में रहें, मोटरों पर सैर करें, अंग्रेजों से हाथ मिलावें और योरोप की सैर करें। हाँ, वह समय अब दूर नहीं है, जब भारत इस नकली आदर्श से विद्रोह करेगा और पृथकता के मकड़ी के-से जाल को छिन्न-भिन्न कर देगा।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', अक्टूबर, 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]
