Cover Image for Karbala - 1 (कर्बला-1) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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लेख•1923•42 मिनट

कर्बला-1

Karbala - 1

कर्बला के ऐतिहासिक संघर्ष और हज़रत हुसैन के अन्याय के विरुद्ध अमर बलिदान की पृष्ठभूमि पर प्रेमचंद का अत्यंत प्रामाणिक व संवेदनशील आलेख।

Work Details

प्रकार: लेख
वर्ष: 1923
पठन समय: 42 मिनट (6,286 शब्द)

हजरत मुहम्मद की मृत्यु के बाद कुछ ऐसी परिस्थिति हुई कि खिलाफत का पद उनके चचेरे भाई और दामाद हजरत अली को न मिलकर उमर फारूक को मिला। हजरत मुहम्मद ने स्वयं ही व्यवस्था की थी कि खलीफा सर्व-सम्मति से चुना जाया करे, और सर्व-सम्मति से उमर फारूक चुने गए। उनके बाद अबूबकर चुने गए। अबूबकर के बाद यह पद उसमान को मिला। उसमान अपने कुटुंब वालों के साथ पक्षपात करते थे, और उच्च राजकीय पद उन्हीं को दे रखे थे। उनकी इस अनीति से बिगड़कर कुछ लोगों ने उनकी हत्या कर डाली। उसमान के संबंधियों को संदेह हुआ कि यह हत्या हजरत अली की ही प्रेरणा से हुई है। अतएवं उसमान के बाद अली खलीफा तो हुए, किंतु उसमान के एक आत्मीय संबंधी ने, जिसका नाम मुआबिया था, और जो शाम-प्रांत का सूबेदार था, अली के हाथों पर बैयत न की, अर्थात्‌ अली को खलीफा नहीं स्वीकार किया । अली ने मुआबिया को दंड देने के लिए सेना नियुक्त की। लड़ाइयां हुईं, कितु पांच वर्ष की लगातार लड़ाई के बाद अंत को मुआबिया को ही विजय हुई। हजरत अली अपने प्रतिद्वंद्वी के समान कूटनीतिज्ञ न थे। वह अभी मुआबिया को दबाने के लिए एक नई सेना संगठित करने की चिंता में हो थे कि एक हत्यारे ने उनका वध कर डाला।

मुआबिया ने घोषणा की थी कि अपने बाद में अपने पुत्र को खलीफा नामजद न करूंगा, वरन्‌ हजरत अली के ज्येष्ठ पुत्र हसन को खलीफा बनाऊंगा। कितु जब इसका अंत-काल निकट आया, तो उसने अपने पुत्र यजीद को खलीफा बना दिया। हसन इसके पहले ही मर चुके थे। उनके छोटे भाई हजरत हुसैन खिलाफत के उम्मीदवार थे, कितु मुआबिया ने यजीद को अपना उत्तराधिकारी बनाकर हुसैन को निराश कर दिया।

खलोफा हो जाने के बाद यजीद को सबसे अधिक भय हुसैन का था, क्योंकि वह हजरत अलो के बेटे और हजरत मुहम्मद के नवासे (दौहित्र) थे। उनकी माता का नाम फातिमा जोहरा था, जो मुस्लिम विदुषियों में सबसे श्रेष्ठ थीं। हुसैन बड़े विद्वान्‌, सच्चरित्रू, शांत-प्रकृति, नम्न, सहिष्णु, ज्ञानी, उदार और धार्मिक पुरुष थे। वह वीर थे, ऐसे वीर कि अरब में कोई उनकी समता का न था। किंतु वह राजनीतिक छल-प्रपंच और कुत्सित व्यवहारों से अपरिचित थे। यजीद इन सब बातों में निपुण था। उसने अपने पिता अमीर मुआबिया से कूटनीति की शिक्षा पायी थी। उसके गोत्र

(कबीले) के सब लोग कूटनीति के पंडित थे। धर्म को वे केवल स्वार्थ का एक साधन समझते थे । भोग-विलास और ऐश्वर्य का उनको चस्का पड़ चुका था । ऐसे भोग-लिप्सु प्राणियों के सामने सत्यव्रती हुसैन की भला कब चल सकती थी, और चली भी नहीं ।

यजीद ने मदीने के सूबेदार को लिखा कि तुम हुसैन से मेरे नाम पर बैयत, अर्थात्‌ उनसे मेरे खलीफा होने की शपथ लो। मतलब यह कि वह गुप्त रीति से उन्हें कत्ल करने का षड्यंत्र रचने लगा। हुसैन ने बैयत लेने से इनकार किया। यजीद ने समझ लिया कि हुसैन बगावत करना चाहते हैं, अतएव वह उनसे लड़ने के लिए शक्ति-संचय करने लगा। कूफा-प्रांत के लोगों को हुसैन से प्रेम था। वे उन्हीं को अपना खलीफा बनाने के पक्ष में थे। यजीद को जब यह बात मालूम हुई, तो उसने कूफा के नेताओं को धमकाना और नाना प्रकार के कष्ट देना आरंभ किया। कूफा-निवासियों ने हुसैन के पास, जो उस समय मदीने से मकक्‍्के चले गए थे, संदेशा भेजा कि आप आकर हमें इस संकट से मुक्त कीजिए। हुसैन ने इस संदेश का कुछ उत्तर न दिया, क्योंकि वह राज्य के लिए खून बहाना नहीं चाहते थे। इधर कूफा में हुसैन के प्रेमियों की संख्या बढ़ने व्मणी) लोग उनके नाम पर बैयत करने लगे। थोडे ही दिनों में इन लोगों की संख्या बीस हजार तक पहुंच गई। इस बीच में इन्होंने हुसैन की सेवा में दो संदेश भेजे, कितु हुसैन ने उसका भी कुछ उत्तर नहीं दिया। अंत को कूृफा वालों ने एक अत्यंत आग्रहपूर्ण पत्र लिखा, जिसमें हुसैन को हजरत मुहम्मद और दीन- इस्लाम के निहोरे अपनी सहायता करने को बुलाया । उन्होंने बहुत अनुनय-विनय के बाद लिखा था--'अगर आप न आए, तो कल कयामत के दिन अल्लाह-ताला के हुजूर में हम आप पर दावा करेंगे कि या इलाही, हुसैन ने हमारे ऊपर अत्याचार किया था, क्‍योंकि हमारे ऊपर अत्याचार होते देखकर वह खामोश बैठे रहे। और, सब लोग फरयाद करेंगें कि ऐ खुदा, हुसैन से हमारा बदला दिला दे | उस समय आप क्‍या जवाब देंगे और खुदा को क्‍या मुंह दिखायेंगे?''

धर्म- प्राण हुसैन ने जब यह पत्र पढ़ा, तो उसके रोएं खड़े हो गए, और उनका हृदय जल के समान तरल हो गया। उनके गालों पर धर्मानुराग के आंसू बहने लगे। उन्होंने तत्काल उन लोगों के नाम एक आश्वासन-पत्र लिखा--' मैं शीघ्र ही तुम्हारी सहायता को आऊंगा।'' और अपने चचेरे भाई मुसलिम के हाथ उन्होंने यह पत्र कृफा वालों के पास भेज दिया।

मुसलिम मार्ग की कठिनाइयां झेलते हुए कूफा पहुंचे। उस समय कूफा का सूबेदार एक शांत पुरुष था। उसने लोगों को समझाया-'' नगर में कोई उपद्रव न होने पाए। में उस समय तक किसी से न बोलूंगा, जब तक कोई मुझे क्लेश न पहुंचाएगा।''

जिस समय यजीद को मुसलिम के कूफा पहुंचने का समाचार मिला, तो उसने एक दूसरे सूबेदार को कूफा में नियुक्त किया जिसका नाम ' ओबैद बिन-जियाद' था। यह बड़ा निठुर और कुटिल प्रकृति का मनुष्य था। इसने आते-ही-आते कूफा में एक सभा की, जिसमें घोषणा की गई कि, '“जो लोग यजीद के नाम पर बैयत लेंगे, उन पर खलीफा की कृपादृष्टि होगी, परंतु जो लोग हुसैन के नाम पर बैयत लेंगे,

उनके साथ किसी तरह की रियायत न की जाएगी। हम उसे सूली पर चढ़ा देंगे और उनकी जागीर या वृत्ति जब्त कर लेंगे।'' इस घोषणा ने यथेष्ठ प्रभाव डाला। कूफा वालों के हृदय कांप उठे। जियाद को वे भली-भांति जानते थे। उस दिन जब मुसलिम भी मसजिद में नमाज पढ़ाने के लिए खड़े हुए, तो किसी ने उनका साथ न दिया। जिन लोगों ने पहले हुसैन की सेवा में आवेदन-पत्र भेजा था, उनका कहीं पता न था। सभी के साहस छूट गए थे। मुसलिम ने एक बार कुछ लोगों की सहायता से जियाद को घेर लिया। किंतु जियाद ने अपने एक विश्वास-पात्र सेवक के मकान की छत पर चढ़कर लोगों को यह संदेशा दिया कि ''जो लोग यजीद की मदद करेंगे उन्हें जागीर दो जाएगी, और जो लोग बगावत करेंगे, उन्हें ऐसा दंड दिया जाएगा कि कोई उनके नाम को रोने वाला भी न रहेगा।'' नेतागण यह धमकी सुनकर दहल उठे और मुसलिम को छोड़-छोड़कर दस-दस, बीस-बीस आदमी विदा होने लगे। यहां तक कि मुसलिम वहां अकेला रह गया। विवश हो उसने एक वृद्धा के घर में शरण लेकर अपनी जान बचाई। दूसरे दिन जब ओबैदुल्लाह को मालूम हुआ कि मुसलिम अमुक वृद्धां के घर में छिपा है, तो उसने तीन सौ सिपाहियों को उसे गिरफ्तार करने के लिए भेजा। असहाय मुसलिम ने तलवार खींच ली, और शत्रुओं पर टूट पड़े। पर अकेले कर ही क्‍या सकते थे। थोड़ी देर में जख्मी होकर गिर पड़े। उस समय सूबेदार से उनकी जो बातें हुईं, उनसे विदित होता है कि वह केसे वीर पुरुष थे। गवर्नर उनकी भय-शून्य बातों से और भी गरम हो गया। उसने उन्हें तुरंत कत्ल करा दिया।

हुसैन, अपने पूज्य पिता की भांति, साधुओं का-सा सरल जीवन व्यतीत करने के लिए बनाए गए थे। कोई चतुर मनुष्य होता, तो उस समँय दुर्गम पहाड़ियों में जा छिपता, और यमन के प्राकृतिक दुर्गों में बैठकर चारों ओर से सेना एकत्र करता। देश में उनका जितना मान था, और लोगों को उन पर जितनी भक्ति थी, उसके देखते बीस-पच्चीस हजार सेना एकत्र कर लेना उनके लिए कठिन न था। किंतु वह अपने को पहले ही से हारा हुआ समझने लगे। यह सोचकर वह कहीं भागते न थे। उन्हें भय था कि शात्रु मुसे अवश्य खोज लेगा। वह सेना जमा करने का भी प्रयत्न न करते थे। यहां तक कि जो लोग उनके साथ थे, उन्हें भी अपने पास से चले जाने की सलाह देते थे। इतना ही नहीं, उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि मैं खलीफा बनना चाहता हूं। वह सदैव यही कहते रहे कि मुझे लौट जाने दो, में किसी से लड़ाई नहीं करना चाहता। उनकी आत्मा इतनी उच्च थी कि वह सांसारिक राज्य-भोग के लिए संग्राम-क्षेत्र में उतरकर उसको कलुषित नहीं करना चाहते थे। उनके जीवन का उद्देश्य आत्म-शुद्धि और धार्मिक जीवन था। वह कृफा में जाने को इसलिए सहमत नहीं हुएं थे कि वहां खिलाफत स्थापित करें बल्कि इसलिए कि वह अपने सहधर्मियों की विपत्ति को देख "न सकते थे। वह कूृफा जाते समय अपने सब संबंधियों से स्पष्ट शब्दों में कह गए थे कि मैं शहीद होने जा रहा हूं। यहां तक कि वह एक स्वष्त का भी उल्लेख करते थे, जिसमें उनके नाना ने उनको स्वर्ग आने का निमंत्रण दिया था, और वह उनके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनकी टेक केवल यह थी कि

मैं यजीद के नाम पर बेयत न करूंगा। इसका कारण यही था कि यजीद मद्यप, व्यभिचारी और इस्लाम-धर्म के नियमों का पालन न करने वाला था। यदि यजीद ने उनकी हत्या कसने की चेष्टा न की होती, तो वह शातिपूर्वक मदीने में जीवन-भर पड़े रहते। पर समस्या यह थी कि उनके जीवित रहते हुए यजीद को अपना स्थान सुरक्षित नहीं मालूम हो सकता था। उसके निष्कंटक राज्य-भोग के लिए हुसैन का उसके मार्ग से सदा के लिए हट जाना आवश्यक था। और इस हेतु कि खिलाफत एक धर्म-प्रधान संस्था थी, अत: यजीद को हुसैन के रण-द्षेत्र में आने का उतना भय न था, जितना उनके शांति-सेवन का। क्योंकि शांति-सेवन से जनता पर उनका प्रभाव बढ़ता जाता था। इसीलिए यजीद ने यह भी कहा था कि हुसैन का केवल उसके नाम पर बैयत लेना ही पर्याप्त नहीं हे, उन्हें उसके दरबार में भी आना चाहिए। यजीद को उनकी बैयत पर विश्वास न था। वह उन्हें किसी भांति अपने दरबार में बुलाकर उनकी जीवन- लीला को समाप्त कर देना चाहता था। इसलिए यह धारणा कि हुसैन अपनी खिलाफत कायम करने के लिए कूफा गए, निर्मूल सिद्ध होती है। वह कूफा इसीलिए गए कि अत्याचारपीड़ित कूफा-निवासियों को सहायता करें। उन्हें प्राण-रक्षा के लिए कोई जगह दिखाई न देती थी। यदि वह खिलाफत के उद्देश्य से कूफा जाते, तो अपने कुटुंब के केवल बहत.. प्राणियों के साथ न जाते, जिनमें बाल-वृद्ध सभी थे। कूफा वालों पर कितना ही विश्वास होने पर भी वह अपने साथ अधिक मनुष्यों को लाने का प्रयलल करते। इसके सिवा उन्हें यह बात पहले से ज्ञात थी कि कूफा के लोग अपने वचनों पर दृढ़ रहने वाले नहीं हैं। उन्हें कई बार इसका प्रमाण भी मिल चुका था कि थोड़े-से प्रलोभन पर भी वे अपने वचनों से विमुख हो जाते हैं। हुसैन के इष्ट- मित्रों ने उनका ध्यान कूृफा वालों की इस दुर्बलता की ओर खींचा भी, पर हुसैन ने उनकी सलाह न मानी। वह सहादत का प्याला पीने के लिए, अपने को धर्म को वेदी पर बलि देने के लिए, विकल हो रहे थे। इससे हितैषियों के मना करने पर भी वह कूफा चले गए। दैव-संयोग से यह तिथि वही थी। जिस दिन कृफा में मुसलिम शहीद हुए थे। अद्वारह दिन की कठिन यात्रा के बाद वह 'नाहनेवा' के समीप, कर्बला के मैदान में पहुंचे, जो फरात नदी के किनारे था। इस मैदान में न कोई बस्ती थी, न कोई वृक्ष। कूफा के गवर्नर की आज्ञा से वह इसी निर्जन और निर्जल स्थान में डेरे डालने को विवश किए गए।

शत्रुओं की सेना हुसैन के पीछे-पीछे मक्के से ही आ रही थी। और सेनाएं भी चारों ओर फैला दी गई थीं कि हुसैन किसी गुप्त मार्ग से कूफा न पहुंच जाएं। कर्बला पहुंचने के एक दिन पहले उन्हें हुर की सेना मिली। हुसैन ने हुर को बुलाकर पूछा, “तुम मेरे पक्ष में हो या, या विपक्ष में?'' हुर ने कहा, ''में आपसे लड़ने के लिए भेजा गया हूं।'' जब तीसरा पहर हुआ, तो हुसैन नमाज पढ़ने के लिए खड़े हुए, और उन्होंने हुर से पूछा-''तू क्या मेरे पीछे खड़ा होकर नमाज पढ़ेगा?'' हुर ने हुसैन के पीछे खड़े होकर नमाज पढ़ना स्वीकार किया। हुसैन ने अपने साथियों के साथ हुर की सेना को भी नमाज पढाई। हुर ने यजीद की बैयत ली थी। पर वह सद्दिचारशाल पुरुष था। हजरत मुहम्मद के नवासे से लड़ने में उसे संकोच होता

था। वह बड़े धर्म-संकट में पड़ा। वह सच्चे हृदय से चाहता था कि हुसैन मक्का लौट जाय॑। प्रकट रूप से तो हुसैन को ओबैदुल्लाह के पास ले चलने की धमकी देता था, पर हृदय से उन्हें अपने हाथों कोई हानि नहीं पहुंचाना चाहता था। उसने खुले हुए शब्दों में हुसैन से कहा-''यदि मुझसे कोई ऐसा अनुचित कार्य हो गया, जिससे आपको कोई कष्ट पहुंचा, तो मेरे लोक और परलोक, दोनों ही बिगड़ जाएंगे। और यदि मैं आपको ओबेैदुल्लाह के पास न ले जाऊं, तो कूफा में नहीं घुस सकता। हां, संसार विस्तृत है, कयामत के दिन आपके नाना की कृपादृष्टि से वंचित होने की अपेक्षा यही कहीं अच्छा हे कि किसी दुसरी ओर निकल जाऊं। आप मुख्य मार्ग को छोड़कर किसी अज्ञात मार्ग से कहीं और चले जाएं। मैं कूफा के गवर्नर (अर्थात्‌ 'आमिल') को लिख दूंगा कि हुसैन से मेरी भेंट नहीं हुई, वह किसी दूसरी ओर चले गए। में आपको कसम दिलाता हूं कि अपने ऊपर दया कौजिए, और कूफा न जाइए। '' पर हुसैन ने कहा-''तुम मुझे मौत से डराते हो? में तो शहीद होने के लिए ही चला हूं।' उस समय यदि हुसैन हुर की सेना पर आक्रमण करते, तो संभव था, उसे परास्त कर देते, पर अपने इष्ट-मित्रों के अनुरोध करने पर भी उन्होंने यही कहा-'' हम लड़ाई के मैदान में अग्रसर न होंगे, यह हमारी नीति के विरुद्ध है।'' इससे भी यही बात सिद्ध होती है कि हुसैन को अब अपनी आत्मरक्षा का कोई उपाय न सूझता था। उनमें साधुओं का-सा संतोष था, पर योद्धाओं का-सा धैर्य न था, जो कठिन-से-कठिन समय पर भी कष्ट-निवारण का उपाय निकाल लेते हैं। उनमें महात्मा गांधी का-सा आत्मसमर्पण था, किंतु शिवाजी की दूरदर्शिता न थी।

इधर हुसैन और उनके आत्मीय तथा सहायकगण तो अपने-अपने खीमे गाड़ रहे थे, और उधर ओबैदुल्लाह-कूफा का गवर्नर-लड़ाई की तैयारी कर रहा था। उसने 'उमर-बिन-साद' नाम के एक योद्धा को बुलाकर हुसैन की हत्या करने के लिए नियुक्त किया, और इसके बदले में 'रै' सूबे के आमिल का उच्च पद देने को कहा। उमर-बिन-साद विवेक-हीन प्राणी न था। वह भली-भांति जानता था कि 'हुसैन की हत्या करने से मेरे मुझ पर ऐसी कालिमा लग जाएगी, कितु 'रै' सूबे का उच्च पद उसे असमंजस में डाले हुए था। उसके संबधियों ने समझाया-'' तुम हुसैन की हत्या करने का बीड़ा न उठाओ, इसका परिणाम अच्छा न होगा।'' उमर ने जाकर ओबैदुल्लाह से कहा-'' मेरे सिर पर हुसैन के वध का भार न रसख्रिए।'' परंतु 'रै' की गवर्नरी छोड़ने को बह तैयार न हो सका। अतएव अब ओबैदुल्लाह ने साफ-साफ कह दिया कि 'रै' का उच्च पद हुसैन की हत्या किए बिना नहीं मिल सकता। यदि तुम्हें यह सौदा महंगा जंचता हो, तो कोई जबरदस्ती नहीं है। किसी और को यह पद दिया जाएगा।”' तो उमर का आसन डोल गया। वह इस निषिद्ध कार्य के लिए तैयार हो गया। उसने अपनी आत्मा को ऐश्वर्य-लालसा के हाथ बेच दिया। औबेदुल्लाह ने प्रसन्‍न होकर उसे बहुत कुछ इनाम-इकराम दिया, और चार हजार सैनिक उसके साथ नियुक्त कर दिए। उमर-बिन-साद की आत्मा अब भी उसे क्षुब्ध करती रही। वह सारी रात पड़ा अपनी अवस्था या दुरवस्था पर विचार करता रहा। वह जिस विचार से देखता, उसी से अपना यह कर्म घृणित जान पड़ता था। प्रात:काल वह फिर कूफा के गवर्नर

के पास गया। उसने फिर अपनी लाचारी दिखाई। परंतु 'रै' की सूबेदारी ने उस पर फिर विजय पाई। जब वह चलने लगा, तो ओबेदुल्लाह ने उसे कड़ी ताकीद कर दी कि हुसैन और उनके साथी फरात नदी के समीप किसी तरह न आने पाएं, और एक घूंट पानी भी न पी सकें। हुर की एक हजार सेना भी उमर के साथ आ मिली। इस प्रकार उमर के साथ पांच हजार सैनिक हो गए। उमर अब भी यही चाहता था कि हुसैन के साथ लड़ना न पड़े। उसने एक दूत उनके पास भेज कर पूछा-'' आप अब क्या निश्चय करते हैं?'' हुसैन ने कहा-''कृफावालों ने मुझसे दगा की है। उन्होंने अपने कष्ट कौ कथा कहकर मुझे यहां बुलाया, और अब वह मेरे शत्रु हो गए हैं। ऐसी दशा में मक्के लौट जाना चाहता हूं, यदि मुझे जबरदस्ती रोका न जाय।'' उमर मन में प्रसन्‍न हुआ कि शायद अब कलंक से बच जाऊं। उसने यह समाचार तुरत ओबेैदुल्लाह को लिख भेजा। किंतु वहां तो हुसैन की हत्या करने का निश्चय हो चुका था। उसने उमर को उत्तर दिया-'' हुसैन से बैयत लो, और यदि वह इस पर राजी न हों, तो मेरे पास लाओ।''

शत्रुओं को, इतनी सेना जमा कर लेने पर भी, सहसा हुसैन पर आक्रमण करते डर लगता था, कि कहीं जनता में उपद्रव न मच जाए। इसलिए इधर तो उमर-बिन- साद कर्बला का चला और उधर ओबेदुल्लाह ने कृफा की जामामस्जिद में लोगों को जमा किया। उसने एक व्याख्यान देकर उन्हें समझाया-''यजीद के खानदान ने तुम लोगों पर कितना न्याय-युक्त शासन किया है, और वे तुम्हारे साथ कितनी उदारता से पेश आए हैं | यजीद ने अपने सुशासन से देश को कितना समृद्धिपूर्ण बना दिया है रास्ते में अब चोरों और लुटेरों का कोई खटका नहीं है। न्यायालयों में सच्चा, निष्पक्ष न्याय होता है। उसने कर्मचारियों के वेतन बढा दिए हैं। राज भक्तों की जागीरें बढ़ा दी गई हैं। विद्रोहियों के कोट तरस-नहस कर दिए गए हैं, जिसमें वे तुम्हारी शांति में बाधक न हो सकें। तुम्हारे जीवन-निर्वाह के लिए उसने विरस्थायी सुविधाएं दे रक्खी हैं। ये सब उनकी दयाशीलता और उदारता के प्रमाण हैं। यजीद ने मेरे नाम फरमान भेजा है कि में तुम्हारे ऊपर विशेष कृपादृष्टि करूं, और जिसे एक दीनार वृत्ति मिलती है, उनकी वृत्ति सौ दोनार कर दूं। इसी तरह वेतन में भी वृद्धि कर दं। और तुम्हें उसके शत्रु हुसैन से लड़ने के लिए भेजूृं। यदि तुम अपनी उन्‍नति और वृद्धि चाहते हो तो तुरंत तैयार हो जाओ। विलंब से काम बिगड़ जाएगा।''

यह व्याख्यान सुनते ही स्वार्थ के मतवाले नेता लोग, धर्माधर्म के विचार को तिलांजलि देकर, समर-भूमि में चलने की तैयारों करने लगे। 'शिमर' ने चार हजार सवार जमा किए, और वह बिन-साद से जा मिला। रिकाब ने दो हजार, हसीन ने चार हजार, मसायर ने तीन हजार और एक अन्य सरदार ने दो हजार योद्धा जमा किए। सब-के-सब दल-बल सजाकर कर्बला को चले। उमर-बिन-साद के पास अब पूरे बाईस सहस्न॒ सैनिक हो गए। केसी दिल्लगी है कि बहत्तर आदमियों को परास्त करने के लिए इतनी बड़ी सेना खड़ी हो जाए। उन बहत्तर आदमियों में

भी कितने ही बालक और कितने ही वृद्ध थे। फिर प्यास ने सभी को अधमरा कर रखा था।

किंतु शत्रुओं ने अवस्था को भली-भांति समझकर यह तैयारी की थी। हुसैन की शक्ति न्याय और सत्य की शक्ति थी। यह यजीद और हुसैन का संग्राम न था। यह इस्लामी धार्मिक जन-सत्ता का पूर्व इस्लाम की राजसत्ता से संघर्ष था। हुसैन उन सब व्यवस्थाओं के पक्ष में थे, जिनका हजरत मोहम्मद द्वारा प्रादुर्भाव हुआ था। मगर यजीद उन सभी बातों का प्रतिपक्षी था। देवयोग से इस समय अधर्म ने धर्म को पैरों- तले दबा लिया था; पर यह अवस्था एक क्षण में परिवर्तित हो सकती थी, और उसके लक्षण भी प्रकट होने लगे थे। बहुतेरे सेनिक जाने को तो चले जाते थे, परंतु अधर्म के विचार से सेना से भाग आते थे। जब ओबेदुल्लाह को यह बात मालूम हुई, तो उसने कई निरीक्षक नियुक्त किए। उनका काम यही था कि भागने वालों का पता लगाएं। कई सिपाही इस प्रकार जान से मार डाले गए। यह चाल ठीक पड़ी। भगोड़े भयभीत होकर फिर सेना में जा मिले।

इस संग्राम में सबसे घोर निर्दयता जो शत्रुओं ने हुसैन के साथ की, वह पानी का बंद कर देना था। ओबेदुल्लाह ने उमर को कड़ी ताकीद कर दी थी कि हुसैन के आदमी नदी के समीप न जाने पाएं। यहां तक कि वे कुएं खोदकर भी पानी न निकालने पाएं। एक सेना फरात-नदी की रक्षा करने के लिए भेज दी गई। उसने हुसेन की सेना और नदी के बीच में डेरा जमाया। नदी की ओर जाने का कोई रास्ता न रहा। थोड़े नहीं, छ: हजार सिपाही नदी का पहरा दे रहे थे। हुसैन ने यह ढंग देखा, तो स्वयं इन सिपाहियों के सामने गए, और उन पर प्रभाव डालने की कोशिश की, पर उन पर कुछ असर न हुआ। लाचार होकर वह लौट आए। उस समय प्यास के मारे इनका कंठ सूखा जाता था, स्त्रियां और बच्चे बिलख रहे थे, किंतु उन पाषाण- हृदय पिशाचों को इन पर दया न आती थी। हे

शहीद होने के तीन दिन पहले हुसैन और अन्य प्राणी प्यास के मारे बेहोश हो गए। तब हुसैन ने अपने प्रिय बंधु अब्बास को बुलाकर, उन्हें बीस सवार तथा तोस पैदल देकर, उनसे कहा-'' अपने साथ बीस मश्कें ले जाओ, और पानी से भर लाओ। '' अब्बास ने सहर्ष इस आदेश को स्वीकार किया। वह नदी के किनारे पहुचे। पहरेदार ने पुकारा-'' कौन है ?'' इधर उस पहरेदार का एक भाई भो था। वह बोला-'' में हूं, तेरे चाचा का बेटा। पानी पीने आया हूं।'' पहरेदार ने कहा-''पी ले।'' भाई ने उत्तर दिया-' केसे पी लूं? जब हुसैन और उनके बाल-बच्चे प्यासे मर रहे हैं, तो मैं किस मुंह से पी लूं?'' पहरेदार ने कहा-''यह तो जानता हूं, पर करूं कया, हुक्म से मजबूर हूं।'' अब्बास के आदमी मश्कें लेकर नदी की ओर चले गए और पानी भर लिया। रक्षक-दल ने इनको रोकने की चेप्टा को, पर ये लोग पानी लिए हुए बच निकले।

हुसैन ने ओंतम बार संधि करने का प्रयास किया। उन्होंने उमर-बिन-साद को संदेशा भेजा कि “आज मुझसे रात को, दोनों सेनाओं के बीच में, ममिलना। उमर निश्चित समय पर आया। हुसैन से उसकी बहुत देर तक एकांत में बातें हुईं। हुसैन ने संधि की तीन शर्तें बताई-() या तो हम लोगों को मक्के वापस जाने दिया जाए, (2) या सीमा. प्रांत की ओर शांतिपूर्वक चले जाने की अनुमति मिले, (3) या में

यजीद के पास भेज दिया जाऊं। उमर ने ओबैदुल्लाह को यह शुभ सूचना सुनाई, और वह उसे मानने के लिए तैयार भी मालूम होता था, किंतु शिमर ने जोर दिया कि दुश्मन चंगुल में आ फंसा है, तो इसे निकलने न दो, नहीं तो उसकी शक्ति इतनी बढ़ जाएगी कि तुम उसका सामना न कर सकोगे। उमर मजबूर हो गया।

मोहर्रम की नवीं तारीख को, अर्थात्‌ हुसैन की शहादत से एक दिन पहले, कूफा के दिहातों से कुछ लोफ हुसैन की सहायता करने आए। ओबैदुल्लाह को यह बात मालूम हुई, तो उसने उन आदमियों को भगा दिया, और उमर को लिखा-'' अब तुरंत हुसैन पर आक्रमण करो, नहीं तो इस टालमटोल की तुम्हें सजा दी जाएगी।'' फिर क्या था, प्रात:काल बाईस हजार योद्धाओं की सेना हुसेन से लड़ने चली। जुगुनू की चमक को बुझाने के लिए मेघ-मंडल का प्रकोप हुआ।

हुसैन को मालूम हुआ, तो वे घबराए। उन्हें यह अन्याय मालूम हुआ कि अपने साथ अपने साथियों और सहायकों के भी प्राणों की आहुति दें। उन्होंने इन लोगों को इसका एक अवसर देना उचित समझा कि वे चाहें, तो अपनी जान बचाएं, क्योंकि यजीद को उन लोगों से कोई शत्रुता न थी। इसलिए उन्होंने उमर-बिन-साद को पैगाम भेजा कि हमें एक रात के लिए मोहलत दो। उमर ने अन्य सेना-नायकों से परामर्श करके मोहलत द दी। तब हजरत हुसैन ने अपने समस्त सहायकों तथा परिवार वालों को बुलाकर कहा-''कल जरूर यह भूमि मेरे खून से लाल हो जाएगी। मैं तुम लोगों का हृदय से अनुगृहीत हूं कि तुमने मेरा साथ दिया। में अल्लाहताला से दुआ करता हूं कि वह तुम्हें इस नेकी का सवाब दे। तुमसे अधिक वीरात्मा और पवित्र हृदय वाले मनुष्य संसार में न होंगे। में तुम लोगों को सहर्ष आज्ञा देता हूं कि तुममें से जिसकी इच्छा हो, चला जाय, में किसी को दबाना नहीं चाहता, न किसी को मजबूर करता हूं। कितु इतना अनुरोध अवश्य करूंगा कि तुममें से प्रत्येक मनुष्य मेरे आत्मीय जनों में से एक-एक को अपने साथ ले ले। संभव है, खुदा तुम्हें तबाही से बचा ले, क्‍योंकि शत्रु मेरे रुधिर का प्यासा है। मुझे पा जाने पर उसको और किसी कौ तलाश न होगी।''

' यह कहकर उन्होंने इसलिए चिराग बुझा दिया कि जाने वालों को संकोचवश वहां न रहना पड़े। कितना महान्‌ पवित्र और निस्वार्थ आत्मसमर्पण है।

कितु इस वाक्य का समाप्त होना था कि सब लोग चिल्ला उठे-''हम एंसा नहीं कर सकते। खुदा वह दिन न दिखाए कि हम आपके बाद जीते रहें। हम दूसरों को कया मुंह दिखाएंगे? उनसे क्या यह कहेंगे कि हम अपने स्वामी, अपने बंधु तथा अपने इष्ट-मित्रों को शत्रुओं के बीच में छोड़ आए, उनके साथ एक भाला भी न चलाया, एक तलवार भी न चलाई। हम आपको अकेला छोड़कर कदापि नहीं जा सकते, हम अपने को, अपने धन को और अपने ऊल को आपके चरणों पर न्‍्योछावर कर दंगे।''

इस तरह नवीं तारीख, मोहर॑म को रात, आधी कटो। शेष रात्रि लोगों ने ईश्वर- प्रार्थना में काटी। हुसैन ने एक रात की मोहलत इसलिए नहीं ली थी कि समर को रही सही तैयारी पूरी कर लें। प्रातःकाल तब सब लोग सिजदे करते और अपनी मुक्ति

के लिए दुआए मांगते रहे।

प्रभात हुआ-वह प्रभात, जिसकी संसार के इतिहास में उपमा नहीं है। किसकी आंखों ने यह अलोकिक दृश्य देखा होगा कि बहत्तर आदमी बाईस हजार योद्धाओं के सम्मुख खड़े हुसैन के पीछे सुबह की नजाम इसलिए पढ़ रहे हैं कि अपने इमाम के पीछे नमाज पढ़ने का शायद अंतिम सौभाग्य है। वे केसे रणधीर पुरुष हैं, जो मानते हैं कि एक क्षण में हम सब-के-सब इस आंधी में उड़ जाएंगे, लेकिन फिर भी पर्वत की भांति अचल खड़े हैं, मानो संसार में कोई ऐसी शक्ति नहीं है, जो उन्हें भयभीत कर सके। किसी के मुख पर चिंता नहीं है, कोई निराश और हताश नहीं है। युद्ध के उनन्‍्माद ने, अपने सच्चे स्वामी के प्रति अटल विश्वास ने, उनके मुख को तेजस्वी बना दिया है। किसी के हृदय में कोई अभिलाषा नहीं है। अगर कोई अभिलाषा है, तो यही कि केसे अपने स्वामी की रक्षा करें। इसे सेना कौन कहेगा, जिसके दमन को बाईस हजार योद्धा एकत्र किए गए थे। इन बहत्तर प्राणियों में एक भी ऐसा न था, जो सर्वथा लड़ाई के योग्य हो। सब-के-सब भूख-प्यास से तड़प रहे थे। कितनों के शरीर पर तो मांस का नाम तक नहीं था, और उन्हें बिना ठोकर खाए दो पग चलना भी कठिन था। इस प्राण-पीड़ा के समय ये लोग उस सेना से लड़ने को तैयार थे, जिसमें अरब-देश के वे चुने हुए जवान थे, जिन पर अरब को गर्व हो सकता था।

उन दिनों समर की दो पद्धतियां थीं-एक तो सम्मिलित, जिसमें समस्त सेना मिलकर लड़ती थी, और दूसरी व्यक्तिगत, जिसमें दोनों दलों से एक -एक योद्धा निकलकर लड़ते थे। हुसैन के साथ इतने कम आदमी थे कि सम्मिलित संग्राम में शायद वह एक क्षण भी न ठहर सकते। अत: उनके लिए दूसरी शैली ही उपयुक्त थी। एक-एक करके योद्धागण समर -श्षेत्र में आने और शहीद होने लगे। लेकिन इसके पहले अंतिम बार हुसैन ने शत्रुओं से बड़ी ओजस्विनी भाषा में अपनी निर्दोषिता सिद्ध की। उनके अंतिम शब्द ये थे-

"खुदा की कसम, में पद-दलित और अपमानित होकर तुम्हारी शरण न जाऊंगा, और न में दासों की भांति लाचार होकर यजीद की खिलाफत को स्वीकार करूंगा! ऐ खुदा के बंदो | में खुदा से शांति का प्रार्थी हूं। और उन प्राणियों से, जिन्हें खुदा पर विश्वास नहीं है, जो गरूर में अंधे हो रहे हैं, पनाह मांगता हूं।''

शेष कथा आत्म-त्याग, प्राण-समर्पण, विशाल धैर्य और अविचल बीरता की अलौकिक और स्मरणीय गाथा है, जिसके कहने और सुनने से आंखों में आंसू उमड़ आते हैं, जिस पर रोते हुए लोगों को तेरह शताब्दियां बीत गईं, और अभी अनंत शताब्दियां रोते बीतेंगी।

हुर का जिक्र पहले आ चुका है। यह वही पुरुष है, जो पहले हजार सिपाहियों के साथ हुसैन के साथ-साथ आया था, और जिसने उन्हें इस निर्जल मरुभूमि पर ठहरने को मजबूर किया था। उसे अभी तक आशा थी कि शायद ओबैदुल्लाह हुसैन के साथ न्याय करे। किंतु जब उसने देखा कि लड़ाई छिड़ गई, और अब समझौते की कोई आशा नहीं है, तो अपने कृत्य पर लज्जित होकर वह हुसैन की सेना से

आ मिला। जब वह अनिश्चित भाव से अपने मोरचे से निकलकर हुसैन की सेना की ओर चला, तब उसी सेना के एक सिपाही ने कहा-''तुमको मैंने किसी लड़ाई में इस तरह कांपते हुए चलते नहीं देखा।''

हुर ने उत्तर दिया-'' में स्वर्ग और नरक की दुविधा में पड़ा हुआ हूं, और सच यह है कि में स्वर्ग के सामने किसी चीज की हस्तो नहीं समझता, चाहे कोई मुझे मार डाले।''

यह कहकर उसने घोर्ड के एड़ लगाई, और हुसैन के पास आ पहुंचा। हुसैन ने उसका अपराध क्षमा कर दिया, और उसे गले में लगाया। तब हुर ने अपनी सेना को संबोधित करके कहा-''तुम लोग हुसैन की शर्तें क्‍यों नहीं मानते? कितने खेद की बात है कि तुमने स्वयं उन्हें बुलाया, और जब वह तुम्हारी सहायता करने आए, तो तुम उन्हों को मारने पर उद्यत हो गए। वह अपनी जान लेकर चले भी जाना चाहते हैं, किंतु तुम लोग उन्हें कहीं जाने भी नहीं देते? सबसे बड़ा अन्याय यह कर रहे हो कि उन्हें नदी से पानी नहीं लाने देते। जिस पानी को पशु और पक्षी तक पी सकते हैं, वह भी उन्हें मयस्सर नहों।''

इस पर शत्रुओं ने उन पर तीरों की वर्षा कर दी, और हुर भी लड़ते हुए, वोर- गति को प्राप्त हुए। उन्हीं के साथ उनका पुत्र भी शहीद हुआ।

आश्चर्य होता है कि दुःख भी कि इतना सब कुछ हो जाने पर भी हुसैन को इन नर-पिशाचों से कुछ कल्याण की आशा बनी हुई थी। वह जब अवसर पाते थे, तभी अपनो नि्दोषिता प्रकट करते हुए उनसे आत्मरक्षा की प्रार्थना करते थे। दुराशा में भी यह आशा इसलिए थी कि वह हजरत मोहम्मद के नवासे थे, और उन्हें आशा होती थी कि शायद अब भी में उनके नाम पर इस कष्ट से मुक्त हो जाऊं। उनके इन सभी संभाषणों में आत्म-रक्षा की इतनी विषद्‌ चिंता व्याप्त है, जो दौन चाहे न हो, पर करुण अवश्य है, और एक आत्मदर्शी पुरुष के लिए, जो स्वर्ग में इससे कहीं उत्तम जीवन का स्वप्न देख रहा हो, जिसको अटल विश्गरा हो कि स्वर्ग में हमारे लिए अकथनीय सुख उपस्थित है, शोभा नहीं देती। हुर ने शह*< होने के पश्चात्‌ हुसैन ने फिर शत्रु-सेना के सम्मुख खड़े होकर कहा-

“मैं तुमसे न्विदन करता हूं कि मेरी इन तीन बातों में से एक को मान लो-

(]) ''मुझे यजीद के पस जाने दो कि उससे बहस करूँं। यदि मुझे निश्चय हो जाएगा कि वह सत्य पर है, तो में उसकी बैयत कर लूंगा।''

इस पर किसी पाषाण- हृदय ने कहा-'' तुम्हें यजीद के पास न जाने देंगे। तुम मधुरभाषी हो, अपनी बातों में उसे फसा लोगे, और इस समय मुक्त होकर देश में विद्रोह फैला दोगे।''

(2)“'जब यह नहीं मानते, तो छोड़दो कि मैं अपने नाना के रोज़े की मुजाबिरी करूं। ''

(इस पर भी किसी ने उपुयक्त शंका प्रकट को)

(३) “अगर ये दोनों बातें तुम्हें अस्वीकार हैं, तो मुझे और मेरे आशिकों को

पानी दो, क्योकि प्राणि-मात्र को पानी लेने का हक है।'' (इसका भी वैसा की कठोर और निराशाजनक उत्तर मिला)

इस प्रश्नोत्तर के बाद हुसैन की ओर से बुरीर मैदान में आए। उधर से मुअक्कल निकला। बुरीर ने अपने प्रतिपक्षी को मार लिया, और फिर खुद सेना के हाथों मारे गए। बुरीर के बाद अब्दुल्लाह निकले और दस-बीस शत्रुओं को मारकर काम आए।

अब्दुल्लाह के बाद उनका पुत्र, जिसका नाम वहब था, मैदान में आया। उसकी वीर-गाथा अत्यंत मर्मस्पर्शी है, और राजपूताने के अमर वीर-वृत्तांत की याद दिलाती है। वहब का विवाह हुए अभी केवल सत्रह दिन हुए थे। हाथ की मेहंदी तक न छूटी थी। जब उसके पिता शहीद हो गए, तो उसकी माता उससे बोलीं-

*'मीख्वाहम कि मरा अज्ञ खूने-खुद शरतबे दिही ताशीरे कि अज़पिस्ताने मन खुरदई बर तो हलाल गरदद।''

कितने सुंदर शब्द हैं, जो शायद ही किसी वीर-माता के मुंह से निकल होंगे। भावार्थ यह है-

“मेरी इच्छा है कि तू अपने रक्त का एक घूंट मुझे दे, जिसमें कि यह दूध जो तूने मेरे स्तन से पिया है, तुझ पर हलाल हो जाए।''

वहब के शहीद हो जाने के बाद क्रम से कई योद्धा निकले, और मारे गए! इस्लामी पुस्तकों में तो उनकी वीरता का बड़ा प्रशंसात्मक वर्णन किया गया है। उनमे से प्रत्येक ने कई-कई सौ शत्रुओं को पराम्त किया। ये भक्तों के मानने की बाते #। जो लोग प्यास से तड़प रहे थे, भूख से आंखों से तले अंधेरा छा जाता था, उनपर इतनो असाधारण शक्ति और वीरता कहां से आ गई? उमर-बिन साद को सता मे 'शिमर' बड़ा क्रूर और दुष्ट आदमी था। इस समर में हुसैन और उनके साथियों क साथ जिस अपमान मिश्रित निर्दयता का व्यवहार किया गया, उसका दायित्य इसत' शिमर के सिर है। यह धार्मिक संग्राम था, और इतिहास साक्षी है कि धार्मिक संग में पाशविक प्रवृत्तियां अत्यंत प्रचंड रूप धारण कर लेती हैं। इस पर संग्राम में ऐथ प्रतिष्ठित प्राणी के 'साथ जितनी घोर दुष्टता और दुर्जनता दिखाई गई, उसकी उपमा संसार के धार्मिक्र संग्रामों में भी मुश्किल से मिलेगी, हुसैन के जितने साथी शहोद हुए, प्राय: उन सभो की लाझों को पेरगें तले रौंदा गया, उनके सिर काटकर भन्‍त पर उछाले और पेरों से नुकराए गए। पर कोई भी अपमान और बड़ी -से- बड़ी निदयत उनकी उस कीर्ति को नहीं मिटा सकतो, जो इस्लाम के इतिहास का आज भी गाए बढ़ा रही है। इस्लाम के साहित्य और इतिहास में उन्हें वह स्थान प्राप्त है, जो हिन्दू साहित्य में अंगद, जामवंत, अर्जुन, भीम आदि को प्राप्त है। सूर्यास्त होते- होते सहायता में कोई भी नहों बचा।

अब निज कुटुँब के योद्धाओं को बारी आई। इस वंश के पूर्वज 'हाशिम' नाम के एक पुरुष थे। इसीलिए हजरत मोहम्मद का वंश हाशिमी कहलाता है। इस संग्राम में पहला हाशमी जो क्षेत्र में आया, वह अब्दुल्लाह था। यह उसी मुसलिम नाम के बोर का बालक था, जो पहले शहीद हो चुका था। उसके वाद कुदुंब के और बोर निकले। जाफर इमाम हसन के तीन बेटे, अब्बास के कई भाई, हजरत अलो के कई बेटे और सब बारी-वारी से लड़कर शहीद हुए। हजरत अब्बास से हुसेत ने कहा--'' मैं बहुत प्यासा हूं।'' संध्या हो गई थी। अब्बास पानी लाने चले, पर रास्ते

में घिर गए। वह असाधारण वीर पुरुष थे। हाशिमी लोगों में इतनी वीरता से कोई नहीं लड़ा। एक हाथ कट गया, तो दूसरे हाथ से लड़े। जब वह हाथ भी कट गया तो जमीन पर गिर पड़े। उनके मरने का हुसैन को अत्यंत शोक हुआ। बोले-'' अब मेरी कमर टूट गई।'” अब्बास के बाद हुसैन के नौजवान बेटे अकबर मैदान में उतरे। हुसैन ने अपने हाथों उन्हें शस्त्रों से सुसज्जित किया। आह | कितना हृदय-विदारक दृश्य है। बेटे ने खड़े होकर हुसैन से जाने की आज्ञी मांगी, पिता की वीर हृदय अधीर हो गया। हुसैन ने निराशा और शोक से अली अकबर को देखा, फिर आंखें नीची कर लीं और रो दिए। जब वह शहीद हो गया, तो शोक विह्ल पिता ने जाकर लाश के मुंह पर अपना मुंह रख दिया, और कहा-''बेटा, तुम्हारे बाद अब जीवन को धिक्‍्कार है।'' पुत्र-प्रेम की इहलोक की ममता के आदर्श पर, धर्म पर, गौरव पर कितनी बड़ी विजय हे?

अब हुसैन अकेले रह गए। केवल एक सात वर्ष का भतीजा और हसन का एक दुधमुंहां पोता बाकी था। हुसैन घोड़े पर सवार महिलाओं के ग्ब्रीमों की ओर आये, और बोले-''बच्चे को लाओ, क्योंकि अब उसे कोई प्यार करने वाला न रहेगा।'' स्त्रियों ने शिशु को उनको गोद में रख दिया। वह अभी उसे प्यार कर रहे थे कि अकस्मात्‌ एक तौर उसकी छाती में लगा, और वह हुसैन की गोदी में ही चल बसा। उन्होंने तुरंत तलवार से गढ़ा खोदा और बच्चे की लाश वहीं गाड़ दो। फिर अपने भतीजे को शत्रुओं के सामने खड़ा करक बोले-''ऐ अत्याचारियो, तुम्हारी निगाह में में पापी हूं, पर इस बालक ने तो कोई अपराध नहीं किया, इसे क्‍यों प्यासों मारते हो ?2'' यह सुनकर किसी नर-पिशाच ने एक तीर चलाया, जो बालक के गले को छेदता हुआ हुसैन की बांह में गड़ गया। तीर के निकलते ही बालक को क्रीडाओं का अंत हो गया।

हुसैन अब रण- क्षेत्र की ओर चले। अब तक रण में जाने वालों को वह अपने खोम के द्वार तक पहुंचाने आया करते थे। उन्हें पहुचाने वाला अब कोई मर्द न था। अब आपकी बहन जैनब ने आपको रोकर विदा किया। हुसैन अपनी। पुत्री सकीना को बहुत प्यार करते थे। जब यह राने लगी, तो आपने उसे छाती से लगाया, और तत्काल शोक के आवेग में कई शेर पढें, जिनका एक- एक शब्द करुण-रस में डूबा हुआ है। उनके रण «क्षेत्र में आते ही शत्रुओं में खलबली पड़ गई, जैसे गीदड़ों में कोई शेर आ गया। हुसैन तलवार चलाने लगे, और इतनी वोरता से लड़े कि दुश्मनों के छक्के छूट गए। जिधर उनका घोड़ा बिजली को तरह कड़ककर जाता था, लोग काई की भांति फटे जाते थे। कोई सामने आने की हिम्मत न कर सकता था। इस भांति सिपाहियों के दलों को चोरते-फाड़ते वह फरात के किनारे पहुंच गए, और पानी पीना चाहते थे कि किसी ने कपट भाव से कहा--'' तुम यहां पानी पी रहे गे, उधर सेना स्त्रियों क खोमों में घुसी जा रही है।'' इतना सुनते ही लपककर इधर आए, तो ज्ञात हुआ कि किसी ने छल किया है। फिर मैदान में पहुंचे, और शत्रु दल का संहार करने लगे। यहां तक कि शिमर ने त्तीन सेनाओं को मिलाकर उन पर हमला करने की आज्ञा दी। इतना ही नहीं, बगल से और पीछे से भी उन पर तीरों को बौछार होने लगी। यहां तक कि जख्मों

से चूर होकर वह जमीन पर गिर पड़े, और शिमर की आज्ञा से एक सैनिक ने उनका सिर काट लिया। कहते हैं, जेनब यह दृश्य देखने के लिए खीमे से बाहर निकल आई थी। उसी समय उमर-बिन-साद से उसका सामना हो गया। तब वह बोली-'' क्‍यों उमर, हुसैन इस बेकसी से मारे जाएं, और तुम देखते रहो।'' उमर का दिल भर आया आंखें सजल हो गईं और कई बूंदें दाढ़ी पर गिर पड़ीं।

हुसैन की शहादत के बाद शत्रुओं ने उनकी लाश की जो दुर्गति की, वह इतिहास की अत्यंत लज्जाजनक घटना है। उससे यह भली-भांति प्रकट हो जाता है कि मानव- हृदय कितना नीचे गिर सकता है। गुरु गोविन्दर्सिह के बच्चे की कथा भी यहां मात हो जाती है, क्योंकि ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि किसी धर्म-संचालक के नवासों को अपने नाना के अनुयायियों के हाथों यह बुरा दिन देखना पड़ा हो।


प्रकाशन इतिहास

[लेख। 'माधुरी', नवम्बर, 1923 में प्रकाशित। 'कर्बला' (नाटक) में 'नाटक का कथानक' शीर्षक से संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "कर्बला-1." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1923, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/karbala-1. Accessed 22 Sep. 2026.