बाँसुरी का मूल पाठ
रात ज़्यादा आ गयी थी। अष्टमी का चाँद ख़ाबगा में जा चुका था। दुपहर के कैंवल की तरह साफु-व-शफ़्फाफ (स्वच्छ एवं उज्ज्वल) आसमान में सितारे खिले हुए थे। किसी खेत के रखवाले की बाँसुरी की आवाज़, जिसे दूरी ने तासीर, सन्नाटे ने सुरीलापन और तारीकी (अंधकार) ने रूहानियत की दिलकृशी (सुंदरता, मनोज्ञता) बख्शी थी, यूँ कानों में आ रही थी, गोया कोई मुबारक रूह नदी के किनारे बैठी हुई पानी की लहरों को या दूसरे साहिल (किनारे) के ख़ामोश व पुरकशिश दरख्तों को अपनी जिन्दगी की दास्ताने-गम सुना रही हो।
यह उर्दू कहानी मूल उर्दू कहानी 'तिरिया चरितर” ('ज़माना', जनवरी, 95) का एक अवतरण मात्र है, जिसे प्रेमचन्द ने एक स्वतन्त्र कहानी के रूप में प्रकाशित करा दिया। अमृतराय ने “गुप्तधन”-] में “त्रिया-चरित्र' प्रस्तुत करते हुए इस अंश को बदलकर इस प्रकार प्रस्तुत किया है--
“रात ज्यादा आ गई थी। अष्टमी का चाँद सोने जा चुका था। दोपहर के कमल की तरह सके जात्तगान में सितारे खिले हुए थे, किसी खेत के रखवाले की बाँसुरी की आवाज, जिसे दूरी ने तासीर, सन्नाटे ने सुरीलापन और अँधेर ने आत्मिकता का आकर्षण दे दिया था, कानों में आ रही थी कि जैसे कोई पवित्र आत्मा नदी के किनारे बैठी टुई पानी की लहरों से या दूसरे किनारे के खामोश और अपनी तरफ खींचने वाले पेड़ों से अपनी जिन्दगी की गम की कहानी सुना रही है।”
बाँसुरी का सारांश
‘बाँसुरी’ प्रेमचंद का एक अत्यंत संक्षिप्त, भावपूर्ण और चित्रात्मक गद्य-गीत है। आधी रात के गहरे सन्नाटे और अष्टमी के चाँद के छिप जाने के बाद, जब साफ और निर्मल आकाश में अनगिनत तारे जगमगा रहे होते हैं, तब किसी खेत के रखवाले की बाँसुरी की सुरीली तान फिज़ा में गूँज उठती है। दूरी ने उस स्वर को गहरा प्रभाव, रात्रि के सन्नाटे ने मिठास और अंधकार ने एक अलौकिक व आध्यात्मिक आकर्षण प्रदान कर दिया है। बाँसुरी का यह मर्मस्पर्शी स्वर ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई पवित्र आत्मा नदी के किनारे बैठी हुई जल की लहरों अथवा दूसरे किनारे के मौन व सम्मोहक वृक्षों को अपने जीवन की विरह और वेदना की गाथा सुना रही है। यह लघु रचना रात्रि की नीरवता, प्रकृति के सौंदर्य और संगीत के कारुणिक प्रभाव का एक सजीव शब्द-चित्र अंकित करती है।
प्रकाशन इतिहास
‘बाँसुरी’ का प्रथम प्रकाशन उर्दू मासिक पत्रिका कहकशाँ के जनवरी 1920 के अंक में हुआ था। यह गद्य-खंड वस्तुतः प्रेमचंद की कहानी तिरिया चरितर (जो ज़माना के जनवरी 1915 के अंक में प्रकाशित हुई थी) का ही एक काव्यात्मक अंश है, जिसे उन्होंने स्वतंत्र रचना के रूप में प्रस्तुत किया था। बाद में अमृतराय ने गुप्त धन (भाग-1) में त्रिया-चरित्र के अंतर्गत इस अंश का रूपांतरण प्रस्तुत किया। इसका हिन्दी रूप प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित है।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- प्रकृति का सन्नाटा और संगीत का सम्मोहन: रचना में रात्रि के नीरव वातावरण, तारों भरे आकाश और नदी तट के सन्नाटे के बीच बाँसुरी की स्वर-लहरी का सम्मोहक प्रभाव चित्रित किया गया है। रात का सन्नाटा और भौगोलिक दूरी संगीत को और अधिक गहरा, मार्मिक तथा कर्णप्रिय बना देते हैं।
- संगीत में आध्यात्मिक और अलौकिक अनुभूति: बाँसुरी की धुन को किसी साधारण वादन के रूप में नहीं, बल्कि एक पवित्र आत्मा (‘मुबारक रूह’) के अंतरंग विलाप के रूप में देखा गया है। अंधकार और एकांत संगीत को एक रूहानी और पारलौकिक आकर्षण प्रदान करते हैं।
- वेदना और विरह की मूक अभिव्यक्ति: बाँसुरी का कारुणिक स्वर नदी की लहरों और खामोश पेड़ों को अपने जीवन का दुःख सुनाता प्रतीत होता है। यह संगीत के माध्यम से मानवीय मन के अकेलेपन, अव्यक्त पीड़ा और विरह-वेदना की सार्वभौमिक अभिव्यक्ति है।
- काव्यात्मक गद्य और बिंब-विधान: प्रेमचंद का यह लघु गद्य उनकी विशिष्ट चित्रात्मक और काव्यात्मक भाषा का श्रेष्ठ उदाहरण है। अष्टमी का अस्त होता चाँद, दोपहर के कमल जैसा उज्ज्वल आकाश और बहती नदी की लहरें मिलकर एक शांत एवं सम्मोहक दृश्य-बिंब की रचना करते हैं।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'बाँसुरी' प्रेमचंद के गद्य-शिल्प के उस विरल रूप को सामने लाती है जहाँ वे सामाजिक यथार्थवाद से परे विशुद्ध काव्यात्मक, संवेदनात्मक और सौंदर्यपरक धरातल पर रचना करते हैं। यह लघु रचना यह स्थापित करती है कि संगीत और प्रकृति का एकांत मिलन मानवीय हृदय की गहनतम उदासी और संवेदना को अद्वितीय अभिव्यक्ति देने में सक्षम है।
