Cover Image for Bimar Bahin (बीमार बहिन) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1932•5 मिनट

बीमार बहिन

Bimar Bahin

प्रेमचंद की कहानी 'बीमार बहिन' एक छोटे भाई की अपनी बीमार बहन के प्रति निश्छल प्रेम, सेवा और ईश्वर से प्रार्थना की मार्मिक कहानी है।

पात्र:सेवती, भोंदू
स्थान:घर और गाँव का मंदिर

बीमार बहिन का मूल पाठ

सेवती आज कई दिन से बीमार है। चारपाई से उठ नहीं सकती। कहीं खेलने नहीं जा सकती।

भोंदू उसका छोटा भाई है। जब सेवती पानी माँगती है तो भोंदू दौड़कर कटोरे में पानी लाता है।

जब सेवती गरमी से बेचैन हो जाती है, तो वह उसे पंखा झलने लगता है। वह चाहता है, मेरी प्यारी बहन जल्दी से अच्छी हो जाण । अकेले खेजने में उसका जी नहीं लगता !

भोंदू को ज्योंही मदरसे से छुट्टी होती है, दौड़ा हुआ सेवती के पास आता है और उसे कहानियाँ सुनाता है। सेवती शौक से सुनती और खुश होती है।

कल शाम को सेवती की तबीयत बहुत खराब हो गयी। जोर-जोर से कराहने लगी। भोंदू घबड़ा गया। माँ-बाप से सुना था, ईश्वर बड़ा दयालु है, तो क्या वह एक बालक की प्रार्थना न सुनेगा ?

ज्योंही मंदिर में आरती होने लगी, वह वहाँ गया और प्रतिमा के सामने भूमि पर सिर रखकर ईश्वर की प्रार्थना करने लगा, “भगवान ! तुम दयालु हो, दीन पर कृपा रखते हो। मेरी सेवती को जल्द अच्छा कर दो ।”

[“कुमार', हिंदी बाल पत्रिका का प्रथम अंक, जुलाई 1932 से प्रस्तुत (प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य”, 1988) (प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ, 2005)]


बीमार बहिन का सारांश

'बीमार बहिन' बाल मनोविज्ञान और भाई-बहन के सहज, निष्कपट और आत्मीय प्रेम को दर्शाने वाली एक अत्यंत मार्मिक लघुकथा है। सेवती कई दिनों से बीमार है और चारपाई से उठ नहीं पाती तथा खेलने भी नहीं जा सकती। उसका छोटा भाई भोंदू अपनी बहन से अत्यंत स्नेह करता है। जब भी सेवती पानी माँगती है, भोंदू दौड़कर कटोरे में पानी लाता है और गर्मी में उसे पंखा झलता है। बहन के बिना अकेले खेलने में उसका मन नहीं लगता और वह चाहता है कि उसकी प्यारी बहन शीघ्र स्वस्थ हो जाए। मदरसे से छुट्टी होते ही वह सीधे सेवती के पास दौड़कर आता है और उसे कहानियाँ सुनाकर उसका मन बहलाता है, जिससे सेवती प्रसन्न होती है।

एक शाम सेवती की तबीयत बहुत अधिक बिगड़ जाती है और वह दर्द से जोर-जोर से कराहने लगती है। बहन की यह दशा देखकर भोंदू अत्यंत घबरा जाता है। उसने अपने माता-पिता से सुना था कि ईश्वर बड़े दयालु हैं। भोंदू के बालमन में यह विश्वास जागता है कि दयालु ईश्वर किसी बालक की सच्ची पुकार अवश्य सुनेंगे। ज्यों ही गाँव के मंदिर में संध्या आरती शुरू होती है, वह मंदिर पहुँचता है और भगवान की प्रतिमा के सम्मुख भूमि पर सिर रखकर सच्चे मन से प्रार्थना करता है कि हे भगवान, तुम दयालु हो और दीनों पर कृपा करते हो, मेरी सेवती को जल्दी स्वस्थ कर दो।


प्रकाशन इतिहास

यह कहानी सर्वप्रथम जुलाई 1932 में हिंदी बाल पत्रिका कुमार के प्रथम अंक में प्रकाशित हुई थी। बाद में यह प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (1988) तथा प्रेमचंद की अप्राप्य कहानियाँ (2005) में संकलित की गई।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • भाई-बहन का निश्छल प्रेम: कहानी में भोंदू की अपनी बीमार बहन सेवती के प्रति गहरी आत्मीयता, सेवा-भाव और निरंतर देखरेख का अत्यंत मार्मिक चित्रण है।
  • बाल मनोविज्ञान का सुंदर अंकन: भोंदू का बहन के बिना खेल में मन न लगना, मदरसे से लौटकर उसे कहानियाँ सुनाना और उसकी पीड़ा देखकर व्याकुल हो जाना बच्चों के संवेगात्मक संसार को प्रामाणिक रूप से व्यक्त करता है।
  • बाल-सुलभ श्रद्धा और विश्वास: माता-पिता की बात पर विश्वास कर मंदिर जाना और ईश्वर के सम्मुख शीश नवाकर बहन के स्वास्थ्य की प्रार्थना करना बालक की निष्कलंक आस्था और सादगी को उजागर करता है।
  • पारिवारिक संवेदना और सहभागिता: कहानी दर्शाती है कि कठिन समय और बीमारी में परिवार के भीतर बच्चों की सहज सहानुभूति और आपसी जुड़ाव किस प्रकार संबल बनता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'बीमार बहिन' सरल और संक्षिप्त कलेवर में बच्चों के निस्वार्थ प्रेम, आत्मीयता और अटूट विश्वास का प्रभावी संदेश देती है। प्रेमचंद ने बहुत कम शब्दों में बालमन की संवेदनशीलता को अमर रूप प्रदान किया है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "बीमार बहिन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1932, https://munshipremchand.com/works/short-stories/bimar-bahin. Accessed 22 Sep. 2026.