Cover Image for Galiyan (गालियां) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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निबंध•1909•19 मिनट

गालियां

Galiyan

भारतीय समाज में अपशब्दों (गालियों) के अत्यधिक प्रयोग, इसके मनोवैज्ञानिक कारणों और सामाजिक-नैतिक पतन पर मुंशी प्रेमचंद का एक तीखा और विचारोत्तेजक समाजशास्त्रीय निबंध।

Work Details

प्रकार: निबंध
वर्ष: 1909
पठन समय: 19 मिनट (2,821 शब्द)

हर एक जाति का बोल-चाल का ढंग उसकी नैतिक स्थिति का पता देता है, अगर उस दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दुस्तान सारी दुनिया की तमाम जातियों में सबसे नीचे नजर आएगा। बोलचाल की गंभीरता और सुथरापन जाति की महानता और उसको नैतिक पवित्रता को व्यक्त करती है और बदजबानी नैतिक अंधकार और जाति के पतन का पक्का प्रमाण है। जितने गंदे शब्द हमारी जबान से निकलते हैं शायद ही किसी सभ्य जाति की जबान से निकलते हों। हमारी जबान से गालियां ऐसे धड़ल्ले पे निकलती हैं कि जैसे उनका जबान पर आना एक जरूरी बात है। हम बात-बात पर गालियां बकते हैं और हमारी गालियां सारी दुनिया की गालियों से निराली, घृणित और गंदी होती हैं। हमीं हैं कि एक दूसरे के मुंह से माओं, बहनों, बेटियों के बारे में गंदी से गंदी गालियां सुनते हैं और पैतरे बदलकर रह जाते हैं बल्कि बहुत बार हम इसका एहसास भी नहीं होता कि हमारा कुछ अपमान हुआ है। जिन गालियों का जवाब किसी दूसरी कौम का आदमी तलवार और पिस्तौल से देगा उससे कई गुना घृणित और गंदी गालियां हम इस कान से सुनकर उस कान उड़ा देते हैं। हमारी गालियों से मां, बहन, बीबी, भाई, कोई नहीं बचता। हम अपनी नापाक जबानों से इन पाक रिश्तों को नापाक करते रहते हैं।

यों तो गालियां बकना हमारा सिंगार है मगर खासतौर पर जबर्दस्त गुस्से की हालत में हमारी जबान के पर लग जाते हैं। गुस्से की घटा सर पर मंडलाई और मुंह से गालियां मूसलाधार मेह की तरह बरसने लगीं। अपने दुश्मन या विरोधी को दूर से खड़े खरी-खोटी सुना रहे हैं, आस्तीनें चढ़ाते हैं, पैतरे बदलते हैं, आंखें लाल- पीली करते हैं और सारा जोश चंद नापाक गालियों पर खत्म हो जाता है। विरोधी की सत्तर पुश्तों को जबान की गंदगी से लथपथ कर देते हैं। उसी तरह विरोधी भी दूर ही से खड़ा हमारी गालियों का तुर्कों बतुर्कों जवाब दे रहा है। इसी तरह घंटों तक गाली-गलौच के बाद हम धीमे पड़ जाते हैं और हमारा गुस्सा पानी हो जाता है। इससे बढ़कर हमारे जातीय कमीनेपन और नामर्दी का सुबूत नहीं मिल सकता कि जिन गालियों को सुनकर हमारे खून में जोश आ जाना चाहिए उन गालियों को हम दूध की तरह पी जाते हैं। और फिर अकड़कर चलते हैं कि जैसे हमारे ऊपर फूलों की वर्षा हुई है। यह भी जातीय पतन की देन है। जातीय पतन दिलों की इज्जत और स्वाभिमान की चेतना मिटाकर लोगों को बेगैरत और बेशर्म बना देती है। जब अनुभूति की शक्ति मिट गई तो खून में जोश कहां से आए। जो कुछ थोड़ा-बहुत बासी कढ़ी का-सा उबाल आता है उसका जोर जबान से कुछ थोड़े से गंदे शब्द निकाल देने पर ही खत्म हो जाता है।

गुस्से की हालत में जबान की यह रवानी औरतों में ज्यादा रंग दिखाती हेै। दो हिन्दुस्तानी औरतों की तू-तू मैं-मैं देख्खिए और फिर सोचिए कि जो लोग हमको अर्ध-बर्बर कहते हैं वे किस हद तक ठीक कहते हैं। कुजड़े, खटिक, भठियारे यह सब जातियां जबानी गंदगी के लिए: (क्या नैतिक गंदगी नहीं?) खासतौर पर मशहूर हैं। क्या-क्या गंदगियां उनकी जबान से निकलती हैं कि तौबा | जिन शब्दों की याद एक लज्जाशील स्त्री के गालों को लाज से लाल कर देगी, वे शब्द इन औरतों की जबान से बेधड़क और मोटरकार की रवानी के साथ निकलते हैं। अब्बासी और दुलरिया जरा पुरजोर लहजे में विचारों का लेन-देन कर रही हैं। अब्बासी दुलरिया के बेटे को चबा जाती है। दुलरिया उसके शौहर को कच्चा खा जाती है। तब अब्बासी उसके दामाद को निगल लेती है। इसके जवाब में दुलरिया उसके दामाद को देवी की भेट चढ़ा देती है। अब्बासी झुंझलाकर दुलारिया के बूढ़े दादा की लंबी दाढ़ी को जलाकर खाक कर देती है क्‍योंकि इस गरीब के बदन में अब हड्डियों को छोड़कर गोश्त का नाम भी नहीं रहा वर्ना शायद उसे भी निगल जाती। दुलरिया जामे से बाहर होकर अब्बासी के सातों पुश्त के मुंह पर तारकोल लपेट देती है। बदकिस्मती से यह रवानी अधिकांश श्रेणियों की औरतों में कमोबेश पाई जाती है, और यह गालियां उन गंदी नापाक गालियों के मुकाबले में कुछ भी नहीं हैं जो हम आए दिन बाजारों और गलियों में सुना करते हैं।

गालियों से हमें कुछ प्रेम-सा हो गया है। गालियां बकने और सुनने से हमारा जी ही नहीं भरता। साफ-सुथरा मजाक हमारे यहां करीब-करीब गायब है। मजाक जो कुछ है वह गाली-गलौज पर खत्म हो जाता है। हमने गालियां देने और सुनने के लिए रिश्ते मुकर्रर कर लिए हैं। बीवी का भाई अपने बहनोई और बहनोई के दोस्त और उन दोस्तों के परिचितों और टोले-मुहल्ले के हर आदमी के लिए यकसां तौर पर फोहश मजाक का निशाना है। जो होता है उसे अपनी हैसियत के हिसाब से गालियां देता है। उसकी बहनें और उसके घर की बड़ी-बूढियां एक भी इस भेडियाधसान हमले से बेदाग नहीं रहने पातीं। इस गरीब को गंदी-गंदी बातें सुनाना हर आदमी अपना हक समझता है। उसे गंदे शब्दों से पुकारना, उसे ललचाई नजरों से देखना हर बड़े-बूढ़े का जरूरी काम है। उसी तरह जब कोई आदमी अपने ससुराल जाता है तो सारा मुहल्ला उसे गालियां सुनाता है। जवान लोग खामखाह उसकी बहन से ब्याह करने पर आमादा होते हैं और बूढ़े उसकी मां से औरत-मर्द का रिश्ता मिलाते हैं और यह बेहूदा बातचीत जिंदादिली में दाखिल समझी जाती है। शादियों में दूल्हे के साथ ससुराल में कदम-कदम पर जबानी और अमली मजाक किए जाते हैं। सालियां, सलहजें, सास सभी उसे गालियां देने और उसके मुंह से गालियां सुनने की तमन्ना रखती हैं। देवर-भौजाई की नोक-झोंक कौन नहीं जानता। भावज के साथ हर तरह की दिल्‍लगी जायज है। और वह दिललगी क्‍या है? गालियां | हमारे यहां गालियों का कुछ कम घृणित नाम दिल्लगी है।

हमारे देश में गालियां केवल गद्य में ही नहीं पद्य में भी दी जाती हैं। हम गालियां गाते हैं और वह भी खुशी के मौके पर। अगर शोक के अवसर पर गालियां गाई जाएं तो शायद उसकी यह व्याख्या की जा सके कि हम जालिम आसमान और बंबफा तकदीर को कोस रहे हैं। लेकिन खुशी के जलसों में गलियां गाना अनोखी बात है। हां, इन गालियों में वह शेतानियत, वह खूंखारी और वह दिल को दुख पहुंचाने की बात नहीं होती जो गुस्से की हालत में गालियों में पाई जाती है। तब भी इन गीतों का एक-एक शब्द दिलों में गंदे खयाल और गंदी भावनाएं उभारता है। इसकी व्याख्या इसके सिव्रा और क्‍या की जा सकती है कि हमारा कामुक स्वभाव वासना उभारने वाली गालियां सुनकर खुश होता है। बारात दरवाजे पर आई और गालियों से उसका स्वागत किया गया और फिर लोग उसके आतिथ्य-सत्कार में लग गए लेकिन ज्योंही खाने का वक्त आया, लोग हाथ-पांव धो-धोकर पत्तलों पर कढी-भात खाने बैठे कि चारों तरफ से गालियों की बोछार होने लगी और गालियां भी ऐसी-वैसी हीं, पंचमेल, कि शैतान सुने तो जहन्नुम से निकल भागे। लोग सपड़-सपड़ भात त्रा रहे हैं, ढोल-मजीरे बज रहे हैं, वाह-बाह मची हे और गालियां गाई जा रही हैं गोया पेट भरने के लिए भात के अलावा गालियां खाना भी जरूरी है। और है भी ऐसा ही। लोग ऐसे शौक से गालियां सुनते हैं कि शायद रामायण, महाभारत और सत्यनारायण की कथा भी न सुनी होगी। मुस्कराते हैं, मुग्ध होकर गर्दन हिलाते हैं और एक दूसरे का नाम गंदगी में लिथेडे जाने के लिए पेश करते हैं। जिन महाशयों के नाम इस तरह पेश होते हैं वे इसे अपना सौभाग्य समझते हैं। और दावत खत्म

होने के बाद कितने ही ऐसे लोग बच रहते हैं जिनके दिल में गालियां खाने की हवस बाकी रहती है। खुशनसीब है वह आदमी जो इस वक्त गालियां खाता है। सारी बिरादरी की आंखें उसकी तरफ उठती हैं। बावजुद इस आदर-सम्मान के वह गरीब बड़े विनयपूर्वक गर्दन झुकाए हुए है। कहीं-कहीं घर की औरतें यह फर्ज अदा करती हैं लेकिन ज्यादातर जगहों में डोमनियां यह पाक रस्म अदा करने के लिए बुलाई जाती हैं। नहीं मालूम ये गीत किसने बनाए हैं। किन्हीं-किन्हीं गीतों में शायरी का रंग पाया जाता है। क्या अजब है, किसी रौशन तबीयत के आदमी ने इसी रंग में अपने फन का कमाल दिखाया हो। इस गाने के लिए गानेवालियों को इनाम देना पड़ता है। दुनिया में हिन्दुओं के सिवा और कौन ऐसी जाति है जो गालियां खाए और गांठ से रुपया खर्च करके इस मैदान में कायस्थ लोग सभी फिरकों से बाजी ले गए हैं। उनके यहां बहुत जमाना नहीं गुजरा कि महफिलों में गालियां बक-बककर इल्मी लियाकत दिखाई जाती थी। दूसरी जातियां शास्त्रार्थ और इल्मी बहसें करती हैं और कायस्थ हजरात गंदी गालियां बकने में अपना पांडित्य दिखाते हैं। क्या उल्टी अक्ल है | शुक्र है कि यह रिवाज अब कम होता जाता है वर्ना गांव में किसी लड़के या लड़की को शादों ठहरी और गांव भर के नौजवान और होनहार लड़के गालियों की गजलें याद करने लगते थे। हफ्तों और महीनों तक गालियों को रटने के अलावा उन्हें और कोई काम नहीं था। घर के बड़े-बूढ़े शाम को दफ्तर और कचहरी से लौटते तो लड़कों से यह गंदी गजलें सबक की तरह सुनते और लबोलहजा दुरुस्त करते। जब बच्चों को गालियां मां के दुृध के साथ पिलाई जाएं तो नैतिक शक्ति क्‍्योंकर आ सकती है।

गुस्से में हम गाली बकें, दिल्‍लगी में हम गाली बकें, गालियां बककर लियाकत का जोर हम दिखाएं, गीत में गली हम गाए- जिंदगी का कोई काम इससे खाली नहीं, यहां तक कि धार्मिक मामलों में भी हमारे यहां गाली बकने की जरूरत हे। दूसरे सूबों का हमें तजुर्बा नहीं मगर संयुक्त प्रांत के कुछ हिस्सों में दीवाली के दा दिन बाद दूज के रोज गाली बकने वाली पूजा होती है। सारे गांव या मुहल्ले की औरतें नहा-धोकर जमा होती हैं,जमीन पर गोबर का एक पुतला बनाया जाता है, इस पुतले के इर्द-गिर्द औरतें बेठती हैं और कुछ पान-फूल चढ़ाने के बाद गाली बकना शुरू कर दती हैं। यह त्योहार इसीलिए बनाया गया है। आज के दिन हर औरत का फर्ज है कि वह अपने प्यारों को गालियां दे। जो आज के दिन गालियों से बच जाएगा उसे साल भर के अंदर जरूर यमराज घसीट ले जाएंगे। गोया यमराज से बचने के लिए गालियों की यह मोटी दीवार उठाई गई है | हमने काल से लड़ने क॑ लिए कैसा हथियार निकाला ! रूहों-कहीं यह रिवाज है कि दूज के दिन बजाय अपने प्यारों क॑ दुश्मनों को गालियां दी जाती हैं और गोबर का पुतला फर्जी दुश्मन समझा जाता है। दुश्मन "को खूब जी भर कोसने के बाद औरतें इस पुतले की छातो पर ईंट का एक टुकड़ा रख देती हैं और फिर उसे मूसल से कूटना शुरू करती हैं। इस तरह दुश्मन का निशान गोया हस्ती क॑ सफे से मिटा दिया जाता है। गालियों से केवल घर्म खाली था, वह कसर भी पूरी हो णई।

हमारी रुचि इतनी विकृत हो गई हे कि हममें से कितने ही शौकीन, रंगीन तबियत के लोग ऐसे निकलेंगे जो सुंदरियों के मुंह से गालियां सुनना सबसे बड़ा सौभाग्य समझते हैं। बदजबानी भी गोया हसीनों के नखरे में दाखिल है। प्रेमीजनों का यह संप्रदाय उस सुंदरी को हरगिज प्रेमिका न कहेगा जिसकी जबान में शोखी और तेजी नहीं। जबान का शोख होना माशूकियत का सबसे जरूरी जुज समझा जाता है। मगर अफसोस कि जबान की शोखी का मतलब कुछ और ही खयाल किया जाता है। अगर माशूक दिल्लगीबाज हाजिरजवाब हो तब तो गोया चार चांद लग गए। मगर हमारे यहां जबान कौ शोखी गाली बकने का दूसरा नाम है। मियां मजनूं लैला से हुस्न का जकात तलब करते हैं। लैला तेवर बदलकर गाली दे बैठती है। मियां मजनूं जरा और सरगर्म होते हैं तो लैला उनकी मैयत देखने की तमन्ना जाहिर करने लगती है। इस गाली-गलौच का शुमार माशुकाना शोखी में दाखिल है। जिस हालत में कि जबान से सच्चाई और आत्मीयता में डूबे हुए शब्द निकलने चाहिए उस हालत में हमारे यहां गाली-गलौज होने लगता है, और अक्सर निहायत गंदा, फोहश। मगर हमारे स्वर्ग-जैसे देश में ऐसे लोग भो हें जिन्हें इन गालियों में मुहब्बत की दुगनी तेज शराब का मजा आता है और जिनकी महफिलें इस जबानी तेजी के बगैर सूनी और बेरौनक 7हती हैं। हमारी तहजीब का ढंग ही निराला है। इसी नैतिक पतन ने हिन्दुस्तान को आज ऐसी बेगैरत और बेशर्म कौम बना रक्खा है।

विलायत में बिलिंग्सगेट नाम का एक बाजार है। वहां की बदजबानी सारे इगलिस्तान में मशहूर है और किताबों में उसकी मिसाल दी जाती है, मगर हमारे हिन्दुस्तान की मामूली बोलचाल के आगे बिलिंग्सगेट के मल्लाह भी शर्म से पानी- पानी हो जाएंगे

गाली हमारा जातीय स्वभाव हो गई है। किसी इक्के पर बैठ जाइए और सुनिए कि इक्केवान अपने घोड़े को कैसी गालियां देता है ऐसी गंदी कि जी मतलाने लगे। वह गरीब घोड़ा और उसकी नेक मां और बुजुर्ग बाप और नालायक दादा, सब इस नेकबख्त औलाद की बदौलत गालियां पाते हैं। हिन्दुस्तान ही तो है, यहां के जानवरों को भी गालियों से लगाव है। बैलगाड़ी वाला भी अपने बेलों को ऐसी फर्माइशी गालियां देता है। और तो था ही, सरकार बहादुर ने आजकल गालियां बकने के लिए एक पहकमा कायम कर रक्‍्खा है। इस महकमे में शरीफजादे और रईसजादे लिए जाते है, उन्हें अच्छी -अच्छी तनख्वाहें दी जाती हैं और रिआयाके अमन-चैन की जिम्मेदारी उन पर रक्खी जाती है। इस महकमे के लोग गालियों से बात करते हैं। उनके मुंह मे जो बात निकलती है, गंदी, घिनौनी। ये लोग गालियां बकना हुकूमत की निशानी और अपने ओहदे की शान समझते हैं। यह भी हमारी टेढ़ी अकल कौ एक मिसाल है कि हम गाली बकने को अमीरी की शान समझते हैं। और देशों में जबान का सुथरापन और मिठास, चेहरे की गंभीरता, शराफत और अमीरी के अंग समझे जाते हैं और हिन्दुस्तान में जबान की गंदगी और चेहरे का झल्लापन हुकूमत का जुज खयाल किया जाए है। देखिए मोटे जमोंदार साहब अपने असामी को कैसी गालियां देते हैं। जनाब तहसीलदार साहब अपने बावर्ची को कैसो खरी-खोटी सुना रहे हैं और सेठ

जी अपने कहार पर किन गंदे शब्दों में गरम होते हैं, गुस्से से नहीं सिर्फ अपनी हुकूमत की शान जताने के लिए। गाली बकना हमारे यहां रईसी और शराफत में दाखिल है। वाह रे हम ।

इन फुटकर गालियों से तबियत भरती न देखकर हमारे बुजुर्गों ने होली नाम का एक त्योहार निकाला कि एक हफ्ते तक हर खास व आम खूब दिल खोलकर गालियां देते .हैं। यह त्योहार हमारी जिंदादिली का त्योहार है। होली के दिनों में हमारी तबियतें खूब उभार पर होती हैं और हफ्ते भर तक जबानी गंदगी का एक गुबार- सा हमारे दिल व दिमाग पर छाया रहता है। जिसने होली के दिन दो-चार कबीर न गाये और दो-चार दर्जन गंदी बातें जबान से न निकालीं वह भी कहेगा कि हम आदमी हैं | जिंदगी तो जिंदादिली का नाम है। लखनऊ में एक जिंदादिली अखबार है। वह भी होली में मस्त हो जाता है और मोटे-मोटे अक्षरों में पुकारता है-

आई होली आई होली, हमने अपनी धोती खोली

यह इस जिंदादिल अखबार की जिदांदिली है |! वह सभ्य और सुसंस्कृत रुचि का समर्थक समझा जाता है। लेकिन जिस देश में गालियों का ऐसा रिवाज हो वहां इसी का सुथरे मजाक में शुमार है। कुछ हिन्दी अखबारों की जिंदादिली उन दिनों अथाह हो जाती है। निरंतर कबीरें छपती हैं और अधिकांश कबीरें शब्दों के अलंकार के पर्दे में गालियों से भरी हुई होती हैं। अगर किसी दूसरी कौम का आदमी इन दो हफ्तों के हिन्दी अखबार उठाकर देखे तो शायद दुबारा उनकी सूरत देखने का नाम न लेगा | हमारे कौमी अखबारों की यह हालत हो जाती है।

तकिया कलाम के तौर पर भी गालियां बकने का रित्राज है और इस मर्ज में ज्यादातर नीम-पढे लोग गिरफ्तार पाए जाते हैं। ये लोग काई एक गाली' चुन लेते हैं और बातचीत के दौरान में उसे इस्तेमाल करना शुरू करते हैं, यहां तक कि बह उनका तकिया कलाम हो जाती है और बहुत बार उनके मुंह से अनायास निकल पड़ती है। यह निहायत शर्मनाक आदत है। इससे नेतिक दुर्बलता का पता चलता " और बातचीत की गंभोरता बिल्कुल घूल में मिल जाती है। जिन लोगों को ऐसी आदत पड़ गई हो उन्हें तबियत पर जोर डालकर जबान में सफाई पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए।

किस्सा कोताह, हम चाहे किसी और बात में शेर न हों, बदजबानी में हम बेजोड़ हैं। कोई कौम इस मैदान में हमको नीचा नहीं दिखा सकती। यह हम मानते हैं कि हमर्म से कितने ही ऐसे लोग हैं जिनकी जबान की पाकीजगी पर कोई एतराज नहीं किया जा सकता मगर कौमी हैसियत से हम इस जबर्दस्त कमजोरी का शिकार हो रहे हैं। कौम की उन्नति या अवनति थोड़े से चुने हुए लोगों के निजी गुणों पर निर्भर नहीं हो सकती।

सच तो यह है कि अभी तक हमारे मार्गदर्शकों ने इस महामारी को जड़ से खोदने की सरगर्म कोशिश नहीं कौ, शिक्षा कौ मंदगति पर इसके सुधार को छोड़ दिया और जनसाधारण की शिक्षा जैसी कुछ उन्नति कर रही है वह सूरज की तरह रौशन है। इस बात को दुहराने की जरूरत नहीं कि गालियों का असर हमारे आचरण

पर बहुत खराब पड़ता है। गालियां हमारी बुरी भावनाओं को उभारती हैं और स्वाभिमान व लाज-संकोच की चेतना को दिलों से कम करती हैं जो हमको दूसरी कौमों की निगाहों में ऊंचा उठाने के लिए जरूरी है।


प्रकाशन इतिहास

[उर्दू लेख। उर्दू मासिक पत्रिका 'ज़माना', दिसंबर, 1909 में प्रकाशित। 'मज़ामीन-ए-प्रेमचंद' में संकलित। हिन्दी रूप 'विविध प्रसंग' भाग-1 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "गालियां." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1909, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/galiyan. Accessed 22 Sep. 2026.