महरी का मूल पाठ
भगवान् भला करे लललूजी की माँ का, जिनके बल पर हर प्रकार का आराम हेै। अन्यथा डाकखाने की नोकरी जहाँ सात-आठ घंटे की हाजिरी ओर कभी दफ्तर को देर न हो, यह चमत्कार नहीं तो ओर क्या हे? घरबार का सारा काम सदा स्वयं ही समय पर हो जाता, हमारी गाड़ी कभी 'लेट' होती ही नहीं। घर की सभी चूलें घड़ी के पुर्जो की भाँति सदा अपनी-अपनी जगह पर ठीक रहती हैं। यह सब लल्लूजी की माँ का जादू है। यदि मुझे किसी छुट्टी के दिन दफ्तर जाना पड़ जाय तो रो पहडूँ लेकिन वे बेचारी हैं कि उनको न इतवार से मतलब हे,न ही बड़े दिन से। काम हे कि प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है। मेरा घमण्ड वेतन के साथ-साथ बढ़ता जाता हे लेकिन वे उफ तक नहीं करतीं। घर में प्रभु की कृपा से चार बच्चे हैं, उनके ही काम से एक औरत को अवकाश मिलना कठिन है,फिर पता नहीं वे अन्य कामों के लिए किस प्रकार समय निकाल लेती हैं। मेरे व्यक्तिगत सुख के सभी काम वे स्वयं ही करती हैं। जाड़े में सुबह-सुबह गर्म पानी मौजूद, हजामत का सामान अपनी जगह तैयार, पूजा के बर्तन साफ,
पालिश किए हुए जूते, अर्थात् कहीं से उँगली रखने का कोई अवसर न मिलता। इस पर मजा यह कि इन बातों में कुछ खर्च नहीं होता। एक जमाना था कि मुझे बीस रुपये मासिक मिलते थे। उस समय देसी जूते ओर साधारण से चारखाने के कोट पर गुजर होती थी। अब परमात्मा की कृपा से सो रुपये मासिक मिलते हैं तो पालिशदार जूता और रेशमी कोट से कम नहीं चाहिए। वे बेचारी हैं कि जिस प्रकार पहले रहती थीं, उसी प्रकार आज भी गुजर करती हैं। केवल दूसरे साल एक गहना ओर कार्तिकी के दिन त्रिवेणी स्नान, बस इसी में प्रसन्न हें। इधर हम लोग हें कि प्रत्येक वर्ष वेतन-वृद्धि होती है लेकिन धन्यवाद के स्थान पर सदा उलाहना-उपालम्भ ही मुँह पर रहता है और हर समय पोस्टल एसोसिएशन की पुकार कि वार्षिक वेतन-वृद्धि में बढ़ोतरी ओर दफ्तर के कार्य का समय कम रखा जाय और कोई भी अधिकारी आँख उठाकर न देख सके। में जो दाल-चावल खाता हूँ, वही वे भी खाती हैं। ईश्वर की देन है कि उन्हें सनन््तोष रहता है ओर मुझे असन्तोष ओर अधीरता।
में पूरा का पूरा वेतन लल्लूजी की माँ के हाथ में ही दे देता हूँ और मुझे वह सुख-सुविधा मिलती है जो तीन सो रुपये के अफसर को भी नसीब न हो। अतिथि भी प्रसन्न रहते हैं ओर सभी सम्बन्धी भी सन्तुष्ट हैं। सच पूछिए तो जितना काम वे करती हें वह सो रुपये से अधिक का होता है। साहब लोग अपने बच्चों के लिए पन्द्रह-बीस रुपये मासिक पर आया रखते हैं लेकिन उनको वह आराम ओर प्यार नसीब नहीं होता जो मेरे बच्चों को है। यदि में एक बावर्ची रखूँ तो कम से कम दस रुपये मासिक ओर भोजन देने पर भी इतना अच्छा खाना नहीं बना सकता।
इस पर मजा यह कि सदा खर्च में किफायत दृष्टि में रहती है। यदि में पन्द्रह रुपये मासिक पर अपने लिए एक बेरा रखूँ तो भी वह इतनी देखभाल ओर रख-रखाव नहीं कर सकेगा। फिर बच्चों के कपड़ों की सिलाई ही दस-पन्द्रह रुपये मासिक की हो जाती है। झाड़ू-बर्तन की नोकरानी ही दस-पाँच रुपये मासिक ले
जाती। अर्थात् चाहे जो हिसाब लगाइए, यदि मेरा लगभग समस्त वेतन भी नोकरों को भेंट कर दिया जाय तो भी इतना आराम नसीब नहीं हो सकता, जितना कि इस भागवान के रहने से उपलब्ध हे।
इसे अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव समझिए या अखबार पढ़ने अथवा बड़े-बड़े नेताओं के भाषणों का परिणाम, प्रायः मेरे मन में आता हे कि अपने जीवन-साथी से इतनी मेहनत कराना भारी अत्याचार हे ओर वास्तव में एक ओरत का इस सीमा तक काम करना अन्याय हे, लेकिन वह बेचारी अपने मुँह से कुछ नहीं कहती। सम्भवतः उनके मन में कभी विचार ही नहीं आता है। मेरे मन में कभी-कभी उफान सा उठता है कि एक महरी या नोकरानी रख दूँ तो शायद उन्हें कुछ आराम मिले। वास्तव में बहुत स्वार्थीपन की बात है कि में तो बाबू बना हुआ हर प्रकार का आराम उठाऊँ ओर घर की देवी नोकरानी की भाँति दिन-भर काम ही करती रहे। लेकिन जब कभी देवीजी से इसकी चर्चा होती हे तो वे सदा हँसकर टाल देती हें -- क्यों बेकार में खर्च बढ़ाओगे? में कुछ पढ़ी-लिखी तो हूँ नहीं जो दिन- भर पलंग पर लेटी रहूँ, या सुबह-शाम पार्क की सैर को जाऊँ। जिस तरह काम चलता हे, चलने दो।
यदि में दबाव देता हूँ तो वे कहने लगती हैं -- में तो मना नहीं करती, महरी रख लो।
मेरे समय से पहले तो सदा एक नोकरानी घर में रही, मुझे वही समय याद आता हे। बुढ़िया नोली के बाद घर में कोई नोकरानी नहीं रही। भगवान् भला करे, उसकी कमर झुक गई थी लेकिन मरते दम तक अकेली ही सारा काम करती रही। सदा सेवा ही की, स्वयं कभी बीमारी तक में भी कोई सेवा न ली। उस पर मजा यह कि केवल एक रुपया वेतन और खाने पर, और वह उम्र भर का वेतन भी मरने पर घर में ही छोड़ मरी। माँ से अधिक सेवा करने वाली, दुःख-दर्द बाँटने वाली! अब ऐसे नोकर कहाँ मिलते हैं। क्या समय था, अत्यल्प वेतनों पर भी लोग सम्पन्न
थे। इसके प्रतिकूल आजकल वह समय है कि आय ओर व्यय, दोनों में वृद्धि उस पर भी हर समय असन्तोष। पहले प्रत्येक वस्तु सस्ती थी। लट्टा और उत्तम मलमल चार आने गज, अच्छी
मिठाई पाँच-छह आने सेर। अब खर्च दोगुना हो गया हे मगर वह बात ढूँढ़े नहीं मिलती। भगवान् करे वह समय एक बार तो पुनः आ जाय, चाहे थोड़े ही समय के लिए हो लेकिन एक बार तो 'टके सेर भाजी ओर टके सेर खा जा' बिक जाय।
अब मेंने किसी आवश्यकता के कारण नहीं ओर न किसी के कहने पर बल्कि अपनी इच्छा से, फेशन की दृष्टि से एक महरी रखने का संकल्प कर लिया, लेकिन यह संकल्प रास नहीं आया। हर बार नयी मुसीबतों से दो-चार होना पड़ा और आराम तो एक ओर, चिन्ता ही चिन्ता रही। प्रतिदिन बर्तनों ओर कपड़ों का गुम होना आरम्भ हुआ। खर्चे अत्यधिक बढ़ गए। यदि पहले दस- पन्द्रह रुपये के घी में काम चल जाता था तो अब पच्चीस का लगने लगा। नोकरानी है कि हर समय अपने पिछले स्वामी की बड़ाई का गीत गाती रहती है -- वहाँ यह होता था वह होता था, इस प्रकार घी परनालों में बहाया जाता था, दूध से बर्तन धुलते थे, यह मिलता था वह मिलता था।
अर्थात् आराम कम ओर खर्च अधिक हो गया, हर समय की बकझक ऊपर से।
पहली नौकरानी जो मिली उसकी अवस्था बीस-बाईस वर्ष की रही होगी। आप उसे रूपसी नहीं कह सकते हैं लेकिन शिष्ट अवश्य थी ओर उसकी आँखों में एक प्रकार की चमक भी थी। यद्नपि
कोई विशेष बात नहीं हुई लेकिन देवीजी को शिकायत ही रही। वह कहती कि में अब दफ्तर देर से जाता ओर शीघ्र लोट आता हूँ। लेकिन में पूरे समय तक दफ्तर में ही रहता। डाकखाने की नोकरी में देरी और जल्दी केसी। दूसरी शिकायत यह हुई कि में जमना (नौकरानी का नाम)की ओर बहुत देखता हूँ, हर समय उसी से बातें करता रहता हूँ, लेकिन मुझे कोई असामान्य बात नहीं लगी। लेकिन जब शिकायत बढ़ते-बढ़ते कष्ट ओर शोक तक जा पहुँची तो मैंने अन्ततः उसे नोकरी से निकाल दिया। इसके पश्चात् मेंने ढूँढ़कर एक बुढ़िया रखी ताकि घर में किसी प्रकार का सन्देह उत्पन्न न हो ओर आवश्यकता भी पूरी हो जाय, लेकिन यह प्रयोग भी असफल रहा। बुढ़िया से न तो पानी से भरा कोई बर्तन ही उठता है, न पलंग ही उठा सकती है। वह तो हड्डियों ओर खाल का एक थेला-भर थी ओर सच पूछिए तो उसे स्वयं ही एक सेवक की आवश्यकता थी। बहरहाल लल्लूजी की माँ को उससे कोई आराम नहीं मिला। उन्हें पहले जितना काम करना पड़ता था, अब भी उतना ही करना पड़ता था। लेकिन बीच में में बेवकूफ बना। संक्षेप में यह कि अन्ततः उसे भी नोकरी से निकाल दिया और अब एक मध्यम आयु वाली की खोज आरम्भ हुई। सर्विस सीकिंग एजेन्सी के माध्यम से एक चालीस वर्षीया नोकरानी की खोज हुई। उससे पहले अनेक
सेविकाएँ आईं ओर चली गईं। कोई काम का विवरण पूछती ओर काम बताया जाता तो यह कहती हुई उलटे पाँवों चली जाती कि काम तो दो नोकरों का हे ओर वेतन एक का भी नहीं। इस पर जब दूसरी महरी आई तो मैंने कहा कि काम तो कुछ नहीं है, केवल पलंग बिछाकर पड़े रहना होगा। वह भी चली गई। विचित्र दशा है। यदि काम लेता हूँ तो नोकर नहीं रहता। यदि कहता हूँ कि कोई काम नहीं तो भी कोई परिणाम नहीं निकलता। खेर, हफ्ते-पखवाड़े की खोज के पश्चात् एक ओर मिली कि जिस पर न किसी प्रकार के सन्देह हो सकते थे ओर जो कामचोर भी नहीं थी। हर प्रकार से, अपनी बुद्धि से भली प्रकार सोच-विचार कर उसे नोकर रखा।
थोड़े समय में पता चला कि यह ओरत जब चाहती अच्छा काम करती ओर जब न चाहती तो कुछ न करती। ऊपर से यह कि जब जी में आता धृष्टता का व्यवहार करती। एक दिन की घटना सुनिए -- देवीजी ने थाली में मिट्टी ओर मिट्टी में पंजे का
निशान देखा तो उससे पूछा -- चम्पा, यह थाली तो बहुत मेली हे।
चम्पा बोली -- ये तो साफ पंजे ओर उँगलियों के निशान हें। में ही कया, सभी देख सकते हें। मगर ये मेरी नहीं हें, हुमा (यह मेरी बड़ी लड़की का नाम है) की होंगी। लड़के तो इस घर में मिट्टी से खेला ही करते हें।
देवी -- अरी चम्पा, क्यों इतना झूठ बोलती है। लड़की के इतनी बड़ी उँगलियाँ कहाँ। बेकार बातें बनाती है और बच्चों को बदनाम करती हे।
चम्पा -- में तो बात बनाती हूँ मगर झूठ तो तुम ही बोला करती हो।
देवी -- जबान संभालकर बात कर। यह महीना पूरा हो ले तो हम तुझे बर्खास्त कर देंगे।
चम्पा -- तुम क्या बर्खास्त करोगी, में खुद ही थोड़े दिनों में नोकरी छोड़ने वाली हूँ। केवल अपना सुभीता देख रही थी। मेरा आदमी हेरान हे कि में इतने दिनों यहाँ केसे रही। वे तो शुरू से ही इस घर के खिलाफ थे। यहाँ किसी नोकर का गुजारा हो ही नहीं सकता। सब चीजों पर ताले और मुहरें लगी हैं। सूखी
तनख्वाह ही तनख्वाह हे। यह बात तो साफ हे कि यहाँ कभी कोई नौकर नहीं रहा हे।
जब में शाम को दफ्तर से आया तो मुझे यह बात पता चली। मैंने यह कहकर टाल दिया कि तुमको नोकर नहीं रखना हे तो निकाल दो। जो मेंने लल्लूजी की माँ के साथ किया, उस अन्याय पर मुझे बाद में बहुत पश्चात्ताप हुआ। खैर, उस समय तो यह बात आई गई हो गई ओर मैंने चम्पा को समझा दिया। ओर फिर कुछ दिनों तक काम चलता रहा।
एक दिन की बात सुनिये। देवीजी ने दस बार चम्पा-चम्पा पुकारा। वह नीचे थी लेकिन बोली नहीं। चम्पा सुनती हे लेकिन बोलती नहीं। तब देवीजी नीचे आईं ओर उससे कहा - तुझे पचास आवाजें दीं, तूने जवाब न दिया।
चम्पा -- अरे बीबी! रहने दो, क्यों झूठ बोलती हो। तुमने दस बार ही तो पुकारा और पचास बार कहती हो। तुमने ही तो कहा था कि महीना बन्द हो जाय तो हम निकाल देंगे, और आज पहली तारीख हे। अब में क्यों बोलूँ।
देवीजी गुस्से से आग होकर चली आईं। चम्पा उत्तर देने में बिजली, बेचारी पर्दे में रहने वाली देवीजी चुप होकर मेरे कारण गुस्सा पी जाती और मुझसे कुछ न कहतीं। मेरा कमरा भली प्रकार साफ न होता ओर यदि वे कुछ कहती तो वह कहती कि कोन बड़ा साफ कमरा है। एक दिन चम्पा ने चीनी मिट्टी के गुलदान तोड़ डाले। देवीजी ने पूछा तो कहा -- लड़कों ने तोड़े हैं।
देवीजी -- लड़के इनको कभी नहीं छूते।
चम्पा -- तो साहब मैंने ही तोड़े। मुझे कब कहा था कि गुलदान न तोड़ें। शीशे के बर्तनों को कहा था,सो आज तक एक भी नहीं टूटा है। जो काम करेगा उससे टूट-फूट भी होगी। गुलदान पुराने तो थे। आपको नोकर नहीं रखना हे, बेकार झूठे आरोप लगाती हैं।
जब शाम को में पहुँचा तो कहा -- हाँ सरकार, खता हो गई। साफ करने पर एक दूसरे पर गिर गया ओर टूट गए।
में यथासम्भव प्रसन्न रहने का प्रयज्ञ करता हूँ। कया करूँ, दिन-भर दफ्तर की हाय-हाय, शाम से घर की परेशानियाँ। एक दिन मेंने कहा कि - चम्पा, मेरे जूते में एक कील निकल आई है, उसको किसी चीज से ठोक दे।
वह चुप रही। शायद मन में यह सोचती रही होगी कि जिस समय नोकर रखा था उस समय यह नहीं कहा था कि यह काम भी उसी के जिम्मे होगा। शायद इसी विचार से उसने उसमें हाथ तक नहीं लगाया। मुझे सुबह को कील वेसी ही मिली तो मैंने उससे पूछा कि तूने कल शाम को जो कील दबाई थी वह रात में फिर निकल आई। तो वह उत्तर देती है -- बाबू, जूते पुराने हैं, कहाँ तक चलें। इनको बदल डालो ओर अच्छे दाम के जूते ले लो कि कुछ चलें।
इस भाँति जब मेरा नाक में दम आ गया तो मेंने उसे निकाल दिया और फिर कोई महरी न रखी। इस प्रकार खोया हुआ चेन आप ही आप मिल गया। सच हे, अब नोकरों का समय नहीं रहा, प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपना सर्वश्रेष्ठ नौकर है।
महरी का सारांश
'महरी' मध्यमवर्गीय जीवन की घरेलू उलझनों, दिखावे की प्रवृत्ति और नौकर-समस्या पर लिखी गई एक अत्यंत हास्य-व्यंग्यात्मक कहानी है। कहानी का नायक एक डाक-बाबू है जिसकी पत्नी (लल्लू की माँ) अत्यंत सुघड़, संतोषी और सलीकेदार स्त्री है। वह बिना किसी नौकर के अकेले घर का पूरा काम बनाती है—चार बच्चों की परवरिश, भोजन, कपड़े सिलना, हजामत का गर्म पानी तैयार रखना और जूतों पर पॉलिश तक। बाबू की वेतन-वृद्धि होने पर अंग्रेजी शिक्षा और फैशन के प्रभाव में वह अपनी पत्नी का काम हल्का करने और 'बाबू' कहलाने की होड़ में घर में एक 'महरी' (कामकाजी नौकरानी) रखने का संकल्प लेता है।
लेकिन महरी रखने का यह प्रयोग डाक-बाबू के लिए आफत बन जाता है:
- पहली महरी 'जमना' (युवती) के आने पर पत्नी शक करने लगती है कि बाबू उस पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जिससे घर में कलह शुरू हो जाता है और जमना को निकालना पड़ता है।
- दूसरी महरी एक अशक्त 'वृद्धा' आती है, जिससे खुद उठना-बैठना भारी था और जिसे स्वयं एक नौकर की जरूरत थी।
- तीसरी महरी 'चम्पा' आती है, जो अत्यधिक ढीठ, कामचोर और मुँहफट है। वह थाली में गंदगी देखकर मालकिन को झूठी ठहराती है, गुलदान तोड़कर उल्टा तर्क देती है और जूतों में कील ठोकने से मना करके नया जूता खरीदने की सलाह देती है।
महरी रखने से घर का बजट बिगड़ जाता है, घी और राशन की बर्बादी होती है तथा दिन-रात की बकझक से घर की शांति छिन जाती है। अंततः डाक-बाबू चम्पा को भी काम से निकाल देते हैं और कभी महरी न रखने का फैसला करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उनकी समर्पित पत्नी के प्रबंधन का कोई मुकाबला नहीं है और जीवन में 'प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपना सर्वश्रेष्ठ नौकर है'।
प्रकाशन इतिहास
प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- मध्यमवर्गीय आडंबर और फैशन पर व्यंग्य: कहानी में मध्यमवर्ग की उस प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य किया गया है जहाँ आवश्यकता न होने पर भी केवल सामाजिक स्टेटस और 'फैशन' के लिए नौकर रखने की होड़ लगी रहती है।
- भारतीय गृहणी का मूक समर्पण और निपुणता: लल्लू की माँ का चरित्र एक आदर्श भारतीय पत्नी की कार्यकुशलता, मितव्ययिता और परिवार के प्रति अगाध प्रेम को उजागर करता है, जिसकी तुलना किसी भी वेतनभोगी नौकर से नहीं की जा सकती।
- घरेलू नौकरों की समस्या का यथार्थवादी चित्रण: प्रेमचंद ने आधुनिक समय में नौकरों की घटती निष्ठा, कामचोरी, ढिठाई और घर के खर्चों को बढ़ाने की समस्या को व्यावहारिक व व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है।
- आत्मनिर्भरता का संदेश: कहानी का निष्कर्ष यह है कि दूसरों पर निर्भर रहने से मानसिक अशांति और आर्थिक हानि होती है; आत्मनिर्भरता ही सुख और चैन की कुंजी है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'महरी' एक हल्की-फुल्की मगर गहरी सीख देने वाली कथा है, जो पारिवारिक तालमेल, गृहस्थी के सुचारू संचालन और दिखावे से दूर रहने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
