Cover Image for Mirzapur Conference Mein Ek Mahattvapoorn Prastav (मिर्जापुर कांफ्रेंस में एक महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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सम्पादकीय•1931•4 मिनट

मिर्जापुर कांफ्रेंस में एक महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव

Mirzapur Conference Mein Ek Mahattvapoorn Prastav

मिर्जापुर कांफ्रेंस में युसुफ इमाम द्वारा प्रस्तुत उस ऐतिहासिक प्रस्ताव का समर्थन, जिसमें कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को सांप्रदायिक राजनीति से अलग रहने का आह्वान किया गया था।

Work Details

प्रकार: सम्पादकीय
वर्ष: 1931
पठन समय: 4 मिनट (596 शब्द)

मिर्जापुर ने सबसे महत्व की जो बात की, वह थी श्री यूसुफ इमाम के प्रस्ताव को स्वीकार करना। इसका अभिप्राय यह था कि कांग्रेस वालों को किसी साम्प्रदायिक कार्य में प्रमुख भाग नहीं लेना चाहिए। इसका यह आशय कदापि नहीं कि आर्य-समाज या ब्रह्म-समाज या अन्य अगणित पंथों के मानने वाले, कांग्रेस के फार्म पर हस्ताक्षर करते ही अपने-अपने धर्म को तिलांजलि दे दें। इसका आशय यह है कि साम्प्रदायिकता के रूप में जो राजनीतिक पाखंड फैलाया जाता है, उससे कांग्रेस वाले कोई सरोकार न रक्खें। उदाहरण के तौर पर देखिए—आर्य-समाज या ब्रह्म-समाज यदि कांग्रेस के मन्तव्य के विरुद्ध हिन्दू-हितों की रक्षा के लिए एक डेपुटेशन ले जायें या कोई प्रस्ताव ही स्वीकृत करें, तो कांग्रेस वालों को उससे पृथक् होना पड़ेगा। जहाँ तक शुद्ध धर्म का संबंध है, कांग्रेस वाले भी अन्य प्राणियों की भांति स्वाधीन हैं, लेकिन ज्योंही धर्म राजनीति के क्षेत्र में कदम रक्खे, कांग्रेस वालों को उससे नाता तोड़ लेना चाहिए।

कांग्रेस में दुर्भाग्यवश हिन्दू और मुस्लिम मनोवृत्तियों का अभी तक काफी जोर है। हिन्दू सभा के सैकड़ों ही उपासक इस आन्दोलन को इस समय कमजोर देखकर कांग्रेस में आ मिले हैं और यहां भी वही जहरीला असर फैला रहे हैं। अगर कांग्रेस में इस मनोवृत्ति को प्रोत्साहन न मिलता, तो पंथगत द्वेष कभी इतना भीषण रूप न धारण करता। हममें से अधिकांश लोग अब भी कहने को तो कांग्रेसमैन हैं, इंकलाब की चीख मारते हैं, झंडे का गीत गला फाड़-फाड़ कर गाते हैं, लेकिन अंदर देखिए, तो राष्ट्रीयता छू नहीं गई। कानपुर में अगर हिन्दुओं ने अधिक मुसलमानों को मारा, या मुसलमानों ने हिन्दुओं का वध करने में बाजी मारी, तो वे संतुष्ट हैं। धर्म के संकीर्ण क्षेत्र के बाहर उनकी निगाह नहीं पहुंचती, वह या तो हिन्दू हैं, या मुसलमान, हिन्दुस्तानीपन का भाव उनसे कोसों दूर है। वे लोग मौके की ताक में हैं, ज्योंही जनता को धर्म की ओर झुकते देखेंगे, तुरन्त कांग्रेस से निकल भागेंगे, क्योंकि उन्हें तो लीडरी चाहिए, चाहे कांग्रेस से मिले या हिन्दूसभा में, या मुसलिम लीग में। हिन्दूसभा की लीडरी ज्यादा मूल्यवान है, क्योंकि रुचि भी तो उधर ही है।

जब तक इस दूषित मनोवृत्ति का हम अंत न कर देंगे, जब तक अपना हिन्दू या मुसलमान होना भूल न जाएंगे, जब तक हम अन्य धर्मावलम्बियों के साथ उतना ही प्रेम न करेंगे जितना निज धर्म वालों के साथ करते हैं, सारांश यह कि जब तक हम पंथजनित संकीर्णता से मुक्त न हो जाएंगे, इस बेड़ी को तोड़कर फेंक न देंगे, देश का उद्धार होना असम्भव है। कोई नहीं कहता कि आप नमाज़ न पढ़ें। नहीं, जो मनुष्य धर्म-भाव शून्य है, वह राष्ट्रीयता के भाव से भी शून्य रहेगा। पाँचों वक्त नमाज़ पढ़िए, तीसों रोज़े रखिए, देवताओं की जितनी पूजा चाहे कीजिए, जितनी संध्या चाहे कीजिए, हवन की सुगंध से देश को सुगंधित कर दीजिए, मगर धर्म को राजनीति से गड़बड़ न कीजिए क्योंकि धर्म ईश्वर और मनुष्य के संबंध की वस्तु है। हम तो यहां तक कहते हैं कि अगर आपके धर्म में कुछ ऐसी बातें हैं जो राष्ट्रीयता की परीक्षा में पूरी नहीं उतरतीं, सर्वदेशिक हितों में बाधक होती हैं, तो उन्हें त्याज्य समझिए। काफिर और म्लेच्छ का हमारे धर्म से नामोनिशान मिट जाना चाहिए। धर्म इतना उदार हो जाना चाहिए कि यदि हमारा पुत्र या स्त्री किसी दूसरे धर्म की अनुयायी हो जाये, तो हमें ज़रा भी शोक या ताप न हो। इसी एकता में हमारे उद्धार की शक्ति है। हम इस प्रस्ताव का हृदय से स्वागत करते हैं और आशा करते हैं कि कांग्रेस के साम्प्रदायिक मनोवृत्ति वाले लीडरों के दिल पर उसका अच्छा असर पड़ेगा।


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', अप्रैल, 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "मिर्जापुर कांफ्रेंस में एक महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/mirzapur-conference-mein-ek-mahattvapoorn-prastav. Accessed 22 Sep. 2026.