Cover Image for Rooh-e-Hayat (रूहे-हयात) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1912•28 मिनट

रूहे-हयात

Rooh-e-Hayat

प्रेमचंद की कहानी 'रूहे-हयात' गुजराती नाम की एक अनाथ और स्वावलंबी स्त्री के अटूट जीवन-उत्साह, जुझारूपन और निःस्वार्थ समाज-सेवा की मर्मस्पर्शी कथा है।

पात्र:गुजराती, रामरतन, सत्यदेव
स्थान:उत्तर प्रदेश का एक देहाती गाँव

रूहे-हयात का मूल पाठ

रूहे-हयात (जीवन की प्राण-शक्ति) मेरे गाँव में गुजरती यतीम लड़की थीं। माँ-बाप की सूरत तक इसे याद न थी। गाँव के लड़कों के साथ खेलती। कोई मारता तो रोती और फिर खेलने लगती। कोई तरस खाकर कुछ दे देता तो दौड़कर ले लेती। जहाँ नींद आ जाती, वहाँ सो रहती । जहाँ खाने को पाती, वहीं खा लेती। जो कुछ फटे-पुराने चीथड़े मिल जाते, वही पहन लेती। अगर कोई रहम से गोद में उठा लेता तो फूली न समाती थी। मगर वह अपने हमसिन (समवयस्क) बच्चों से ज़्यादा दबी, उदास या रोती न थी। उसके गदराए हुए बदन पर दूसरी माएँ रश्क करती थीं। इसकी खन्‍दारूई (मुस्कुराहट) दिलों को पिघला देती थी। लोग इसे देखकर ख़ामख़्वाह गोद में उठा लेते थे।

जब इसने होश सँभाला तो खेतों में मजदूरी करने लगी। टोकरी सर पर उठाए हुए गाती। खेत नराते हुए हमजोलियों से चहल करती। सारे गाँव की लौंडी थी, सारे गाँव की दुलारी। किसी के लिए बाज़ार से सौदा लाती, किसी के धान कूटती, कोई इसे उतारे कपड़े दे देता, कोई फटी-पुरानी साड़ी-वह इसी में मग्न थी। न बैठी हुई बसोरती, न अपने हाल पर आँस बड़ाती। किसी के घर गाना उठे, कहीं ढोल की सदा (आवाज) कानों में आए, सबसे पहले वहाँ जा पहुँचती। इसका दिल मुसर्रत का भूखा था। जिन्दगी इसके लिए अजीरन, जंजाल, सोहाने-रूह (कष्टपूर्ण)न थी। यह एक नेमत थी जिसका वह फितरतन तब्अन (दिल से) लुत्फ उठाती थी। यहाँ तक कि शबाब आ पहुँचा। निगाहों में शोखी नुमूदार हुई। जवानी गरदन उठाकर चलने लगी। गाँव वालों को इसकी शादी की फिकर हुई। सयानी लड़की गाँव में कँवारी कैसे रहे ? इसे उनकी गैरत गव्वारा (सहन) नहीं कर सकती थी। आपस में सलाह हुई। किसी ने अनाज दिया, किसी ने रुपये। वर की तलाश होने लगी।


2

ससुराल में गुजराती की हालत अपने गाँव से भी बदतर थी। इसका शौहर रामरतन करीब के रेलवे स्टेशन पर पानी पाण्डे था। मिजाज का बड़ा सख्त, निहायत गुस्सावर और हमेशा त्यौरियाँ चढ़ी रहती थीं। बावजूद येके गुजराती स्टेशन के मुलाजमीन के गेहूँ पीसती थी और अपनी रोटियों के लिए शौहर की मोहताज न थी, लेकिन इससे रामरतन की सख्ती और हुकूमत में कोई कमी न वाका होती थी। बाहर वह एक जिन्दादिल, खुशबाश आदमी था। मगर घर में कृदम रखते ही उसके सर पर भूत सवार हो जाता था। शायद इसका बाइस इसकी बदगुमानी थी। वह न चाहता था कि गुजराती किसी के घर जाए या किसी से राह-ओ-रसम पैदा करे और वह गुजराती के लिए गैर-मुमकिन था। इसने अब तक आज़ादाना जिन्दगी बसर की थी। यह कैद अब इससे न सही जाती थी। इस आज़ादी ने इस खानादारी (घरेलू जीवन) की फिकरों में बेनयाज़ (बेपर्वा) बना रखा था। रामरतन तनख्वाह के अलावा रोजाना कुछ-न-कुछ ऊपर से कमा लिया करता था और तुर्रा यह कि पानी को दूध के दामों बेचकर वह ठण्डे पानी की मरगूब सदा (मनपसन्द आवाज) लगाता हुआ हर एक गाड़ी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक तेजी से निकल जाता था।

गालेबन वह ऐसी खुश-आइन्द सदा को मुसाफिरों की तस्कीन के लिए काफी समझता था। चारों तरफ से 'पानी-पानी” की आवाजें आती थीं, लेकिन रामरतन उस वक़्त तक मुखातब न होता था, जब तक इसकी त्याफाशनासी या मुसाफ्र की बेनकाब नवाजिश (कृपा) इसे मुतहर्रिक (क्रियाशील) करती थी। इतनी एतहात पर भी जब मुसर्रत से इसका गला न छूटता था तो उसे कुदरतन गुजराती पर गुस्सा आता था, मगर गुजराती इन आए दिन की कशमकशों को जिन्दगी की एक मामूली कैफियत ख्याल करती थी। इसकी शिगुफ़्ता तर्ई (खुशदिली) और आजादारबी (मनमौजीपन) पर इनका बहुत ही खफीफ (कम) असर पड़ता था।


3

गुजराती की शादी के पाँच साल बाद मैं फिर अपने मौज़ा पर गई। शहर में प्लेग फैला हुआ था, वरना हम शहरियों को देहात की जिन्दगी में क्या लुत्फ ? सावन का महीना था। गाँवों की कई लड़कियाँ ससुराल से आई हुई थीं। मेरा आना सुनकर सबकी सब (मुझसे मिलने आईं | इनमें गुजराती भी थी। उसका चेहरा शगुफ्ता (खिला हुआ) तो न था, पर इसकी हुस्न मुतऐयिन- के परदा में शबाब की हरारत और सुरखी झलक रही थी। सुबह खिजा न थी, शबेमाह (चाँदनी रात) थी, जब्त और शौक पिनहा (गुप्त) की तफूसीर (भाष्य) इसकी गोद में एक चाँद-सा बच्चा था। मैंने इससे गले मिलने के बाद बच्चे को गोद में लिया तो मेरा कलेजा सन्‍न से हो गया। यह दोनों आँखों का अन्धा था। गुजराती से पूछा, “इसे कोई बीमारी हुई थी या जन्म से ऐसा ही है ?”

गुजराती ने आँखों .में ऑसू भर कर कहा, “नहीं बहन जी, इसे सीतला जी निकल आई थीं। इसी में दोनों आँखें जाती रहीं। बहुत मान-मनौती की, मगर देवी जी ने आँखें ले ही लीं। जान छोड़ दी, यही बहुत किया ।”

“बेचारे की जिन्दगी ही ख़राब हो गयी।”

“भगवान की यही मरजी थी तो किसी का क्या बस चलता |”

“इसका बाप अभी इसी स्टेशन पर है ?”

गुजराती की डबडबाई आँखों से आँसू की बूँदें गिर पड़ीं। बोली, “उन्हें तो भगवान ने बुला लिया। साल भर हो गए। एक मुसाफिर को पानी पिलाने लगे कि इतने में गाड़ी खुल गयी। मुसाफिर जेब में से पैसे निकालने लगा। ये उससे पैसे लेने को लेपके। गाड़ी तेज हो गयी। न जाने कैसे गिर पड़े। पटरी के नीचे दब गए। भाग में मुँह देखना भी न बदा था। तब से फिर यहीं चली आई हूँ। मेहनत-मज़दूरी करके दिन काटती हूँ। आप लोगों की दया-धरम से लड़का जी जाए, बस मुझे और कुछ न चाहिए। यहाँ की रोटियाँ खाकर पली हूँ, यहीं मरूँगी।”

दूसरे दिन नागपंचमी थी, गाँवों की बड़ी-छोटी लड़कियाँ बनाव-श्ुुंगार करके अपनी-अपनी गुड़िया लेकर मेले चलीं। एक तालाब के किनारे मेला लगता है। वहाँ नाग की पूजा होती है। इन्हें दूध-चावल खिलाया जाता है। गुजराती भी खुश-खुश इस मेले में थी। इसके गाने की सुरीली आवाज दिल को खेंच लेती थी। इसका दिन रंजो-गम के बारेगिरा (बोझ) के नीचे इसी तरह खुशफुहमिया कर रहा था, जैसे कोई जानदार घोड़ा सवार की रान के नीचे जोश से चलता है।

मैं सावन भर अपने मौजा में रही। आए-दिन औरतों का गाना होता था। कभी-कभी स्वॉग भरे जाते थे, और नकहलें भी होती थीं। गुजराती इन तफ्रियों की रूहे-रवाँ (प्राणवायु) थी। मैंने इसे नसीबों को कोसते या तकृदीर को रोते नहीं देखा। हयात (जीवन) एक नेमत है। इसकी जिन्दगी इस हकीकत की पहली मिसाल थी।


4

मुझे एक मुद्दतदराज तक फिर अपने मौजे में जाने का इत्तिफाक्‌ न हुआ। प्लेग का दौर तो हर साल ही होता था, पर अब हम इसके खूगर (आदी) हो गये थे।

दस साल गुजर गये। एक रोज गुजराती ने मेरे पास एक नाई के हाथों नवेद (निमन्त्रण-पत्र) भिजवाया। मैंने न वेद पढ़ा तो बेअख्तियार उसे कूबूल कर लिया। गुजराती ने अपना नया मकान बनवाया था। उसका गृह-प्रवेश (नये मकान में सुकूनत अख्तियार करते वक्‍त यह मजबी रस्म अदा की जाती है) धूम से होने वाला था। गुजराती ने मुझसे बहुत मिन्‍नत की थी कि बहन तुम जरूरी आओ, नहीं तो मुझे रंज होगा। और मैं फिर तुम्हें कभी अपना मुँह न दिखाऊँगी। मुझे ताज्जुब हुआ कि गुजराती को नया मकान बनवाने की तौफीक्‌ (सामर्थ्य) क्‍यों कर हुई ? रोटियाँ ही बड़ी मुश्किल से चलती थीं। घर क्यों कर बनवा लिया ? तक्रीब (उत्सव) की मुकर्रर तारीख को मैं अपने मौजा में जा पहुँची । गुजराती ऐसी खुश हुई, गोया अन्धा आँखें पा जाए। मेरे पैरों पर गिर पड़ी और रोकर बोली, “मैं जानती थी कि तुम जरूर से ज़रूर आओगी। मेरा मन कहता था कि तुम मुझे भूली नहीं हो /” यह कहकर वह मुझे अपने नये घर में ले गई। कच्चा मकान था, मगर पटा हुआ। दरवाज़ा पर वसीअ (विस्तृत) सहन। एक तरफ पक्का कुआँ और इससे लगा हुआ शिवजी का मन्दिर था। अन्दर का आँगन भी चौड़ा, चारों तरफ बरामदे, कमरे हवादार। सोंधी-सोंधी मिट्टी की खुशबू आ रही थी, और अगरचे धूप तेज थी, मगर अन्दर एक खास तरावट मालूम होती थी।

मैंने कहा, “ऐसा मकान तो सारे गाँव में न होगा। देखकर जी खुश हो गया ।”

गुजराती ने अन्दाजे-तफाखुर (गर्व के भाव से) से कहा, “बहन जी, यह सब पुम्हारी दया है। मेरे दिल में यही अरमान था, वह पूरा हो गया। आठ साल हो गए। मैंने दिन को दिन और रात को रात नहीं समझा। चार-चार पंसेरी गेहूँ रोज रात को पीसती थी। दिन भर मजूरी करती थी। गाँव भर के कपड़े सीती थी और सच्ची बात तो यह है कि गाँव वालों की कृपा नहीं होती तो मेरा क्या होता, किसी ने लकड़ी दी, किसी ने बाँस दिए, घर तैयार हो गया। इस लड़के को जन्म दिया, इसकी नाव तो किसी तरह पार लगानी ही थी। आँखें होतीं तो कौन चिन्ता थी। कमा खाता, लेकिन जब भगवान ने आँखें ले लीं तो इसके बैठने का ठिकाना करना मेरा धरम हो गया। नहीं तो बेचारे को कौन पूछता ? बाप रहता तो यह बोझ उसके सर पड़ता। अब तो उनका बोझ भी मुझी को उठाना पड़ेगा। उनके नाम को रोने और नसीबे को कोसने से थोड़े ही कुछ होता है !”

इसी अस्ना (दौरान) में गुजराती का लड़का भी अन्दर आ गया। उसके जिस्म पर एक जोफरानी रंग का कुरता था। धोती जर्द (पीली रंग की) थी। खड़ाऊँ पहने हुए था। चेहरे से मासूमियत बरस रही थी। गुजराती ने कहा, “बेटा, तुम्हारी मौसी आई हैं। इन्हें कुछ सुनाओ।”

लड़के ने फौरन अदब से मेरे पैरों पर सर झुका दिया, और एक संस्कृत का श्लोक पढ़ने लगा । लब-ओ-लहजा ऐसा साफ था और तर्जे-अदा ऐसी दिलकश कि मुझे बेअख़्तियार इसकी हालत पर रोना आ गया। काश ! बीना (सनेत्र) होता तो न जाने क्‍या करता। शायद फितरत ने इसकी जहानत (प्रतिभा) और फ्रासत (चतुरता) के तवाज़ुन (सन्तुलन) के एतबार से इसे बीनाई (आँखों की रोशनी) से मरहम कर दिया था।

गुजराती ने लड़के को मादराना गरूर की नजरों से देखकर कहा, “बहन जी, इन्हें मैंने शास्त्री जी के यहाँ पढ़ने को बैठा दिया है। सुबह को पहुँचा देती हूँ। साँझ को लिवा लाती हूँ। दोपहर को यह शास्त्री जी के घर खा लिया करते हैं। बेचारे भले आदमी हैं। इन पर बड़ी दया रखते हैं। कहते थे कि दो साल में यह पंडिताई के काम में पूरे हो जायेंगे। भागवत का अरथ (मानी) तो यह अभी लगा लेते हैं। किसी दिन इनसे कोई कथा सुनवाऊँगी। मैंने समझा, इनसे और कोई काम तो होगा नहीं, यह काम सीख लेंगे तो भले-बुरे किसी तरह निबाह हो ही जायगा ।” गाँव की औरतें जमा थीं। मैं वहीं जा बैठी । मेरा ही इन्तज;र था। गाना शुरू हो गया। गुजराती भण्डारे की तरफ चली गयी। आँगन में कई कड़ाव चढ़े हुए थे। पूरियाँ निकल रही थीं। दरवाजे पर मेहमान आते-जाते थे। कुर्बोजुवार (आसपास) के कई गाँव के लोग मद्ऊ (निमन्त्रित) हुए थे। दिन ढल गया था। गुजराती चाहती थी कि चिराग जलते-जलते अहलेदावत की कतारें उठनी शुरू हो जायें। इसका हुस्ने-इतिजाम (सुप्रबन्ध)े और चतुराई देखकर बेअख़्तियार बलाएँ लेने को जी चाहता था। एक-एक अज॒ (अंग) से तेजी और चुस्ती टपक रही थी। जोफ (कमजोरी) और कोताहजरफी (अयोग्यता) का शाइबा (बहुत थोड़ा मिश्रण) भी न था। वह नाअहलियत (अपात्रता) जो ऐसे मौकों पर अक्सर हमारी गुलूगीर हो जाती है, यहाँ नाम को भी न थी। तीसरे दिन बड़े इसरार के बाद गुजराती ने मुझे रुखसत किया।


5

मगर यह नया मकान गुजराती को रास न आया। मौजा में एक बूढ़ा साधु आकर ठहरा। गुजराती ने उसकी बड़ी आवभगत की। उसका लड़का सत्यदेव अक्सर बाबा जी के पास जाकर बैठा करता। एक रोज़ बाबाजी उसके साथ गायब हो गये। चारों तरफ तलाश हुई। पुलिस में हुलिया लिखाया गया। मैंने कई अख़बारों में ऐलान कराया, पर लड़के का सुराग न मिला। यह लड़का गुजराती की ज़िन्दगी का सहारा था। मुझे यकीन हो गया कि वह इस सदमे से जान बर न हो सकेगी। इसके थोड़े ही दिनों बाद मुझे जब ख़बर मिली कि वह तीरथ करने चली गयी है तो मेरे ख्याल की तसदीक हो गयी। बहुत रंज हुआ। नैरंगिए-रोज़गार (भाग्य-चक्र) ने हरा-भरा बाग वीरान कर दिया। एक नादार (निर्धन) बेकस बेवा के इरादे और हिम्मत को कितनी बेदरदी से पामाल (पददलित) कर दिया।

गुजराती को तीरथ करने में साल भर लगा। उसने ख़्याल किया था कि तीरथ के मुकामों में शायद सत्यदेव का कुछ पता मिले, लेकिन साल भर की तगोदी (प्रयत्न) के बाद वो नामुराद लौट आयी। मैंने इसकी वापसी की ख़बर सुनी तो इजहारे-हमदर्दी के लिए उसके पास जाने का इरादा किया। मगर एक न एक रुख़ना पड़ता गया और छः महीने तक मुझे फुरसत न मिली। बाला आख़िर सातवें महीने में खानगी तरहुदात (घरेलू चिन्ताओं) से मुँह मोड़कर अपने मौजा में जा पहुँची।

मैंने समझा था, गुजराती के दरवाज़े पर खाक उड़ रही होगी। सन्नाटा छाया होगा और वो खुद सोगवारों की-सी गमगीन सूरत बनाए उदास बैठी होगी, लेकिन जब उसके दरवाज़े पर पहुँची तो उम्मीद के बरअक्स (प्रतिकूल) चारों तरफ रौनक और चहल-पहल नजर आयी। बाहर सहन में क्यारियाँ बनी हुई थीं। उन पर गुलाब और बेले खिले हुए थे। मन्दिर के महराबों पर लटाएँ चढ़ी हुई थीं। क॒ुएँ दो-तीन साधु बैठे हुए गॉजे के दम लगा रहे थे। अन्दर गई तो आँगन में कई गायें और मभैंसें बैँधी हुई थीं। बछरे कुलेलें कर रहे थे। नौ बज गये डे। एक तरफ दही बिलोया जा रहा था। दूसरी तरफ्‌ बड़ी-बड़ी हॉडियों में दूध गरम हो रहा था, चारों तरफ्‌ बरामदों में खूँटियों पर पिंजरे लटके हुए थे। उनमें तरह-तरह की चिड़ियाँ पली हुई थीं। एक किनारे एक हिरन का बच्चा कटोरी में दूध पी रहा था। गुजराती मुझे देखते ही टूटकर गले मिली। उसके जिस्म पर एक जेवर भी न था। गले में कंठी थी और कलाइयों में चाँदी की चूड़ियाँ। मगर चेहरा फूल की तरह शगुफ्ता था। बड़ी-बड़ी आँखों से रूहनियत टपक रही थी। ताजियत के (शोक के) अल्फाज होंठों पर आकर रुक गये थे। उसने मेरे दुविधे का सही अन्दाज़ा करके खुद ही पहल की और बोली, “आओ बहन जी। तुमसे मिलने को बहुत जी चाहता था। बड़ी राह दिखायी। घर पर तो सब कुशल है ? बच्चे अच्छी तरह हैं ?”

मैंने कहा, “तुम्हारे यहाँ तो एक पूरा गौशाला खुल गया है।”

गुजराती, “हाँ, यह गाँवों के बच्चों का गौशाला है। ज़िन्दगी में आदमी को कुछ न कुछ काम तो करना ही चाहिए। यह सब दूध गाँव भर के लड़कों को पिलाती हूँ। कभी-कभी साधु-सन्‍्त लोग आ जाते हैं। इन्हें कुछ दे देती हूँ। चिड़ियाँ दिल बहलाने के लिए पाल रखी हैं। इन्हीं जानवरों के रखरखाव में दिन कट जाता है। बहनजी, तुमसे परदा नहीं करती। मुझसे तो निराश होकर रोया नहीं जाता और क्‍यों रोऊँ ? पहले अकेले सत्यदेव के लिए सब-कुछ करती थी, अब गाँव भर के बच्चों के लिए करती हूँ। जब सब बच्चे आ-आकर अपना-अपना हिस्सा दूध पीने लगते हैं तो मुझे जितना आनन्द मिलता है, वह तुमसे कह नहीं सकती। सत्यदेव यहाँ रहता तो यह सुख मुझे कहाँ मयस्सर होता ? कभी-कभी बुराई में भी भलाई हो जाती है। गाँव के लोग चारा-भूसा दे देते हैं। मुझे बैठे-बिठाए सनेत में जस मिलता है। बस एक यही लालसा और है कि गाँव में एक छोटी-सी धरमशाला बन जाय। मुझे आठों पहर इसकी चिन्ता रहती है। देखें भगवान कब तक यह मुराद पूरी करते हैं। मरने से पहले इतना काम और हो जाता तो मेरा जीवन सफल हो जाता। तुम्हें भी मेरी कुछ-न-कुछ मदद करनी पड़ेगी ।”

कितनी हिम्मत आला थी, कितना पाकीज़ा जोशे-ख़ैर (उपकार का उत्साह)। मैं इसकी जगह पर होती तो या तो रो-रोकर मर ही जाती या जिन्दा भी रहती तो मुरदा से बदतर। बोली, “हाँ, हाँ, तुम काम शुरू करो। मुझसे जो कुछ हो सकेगा, मैं इसमें दरेज न करूँगी। तुम्हारी हिम्मत को धन्य है कि अकेली जान पर इतनी बलाएँ उठा रखी हैं। इतने सबाब (पुण्य) का बोझ लेकर कैसे स्वर्ग में जाओगी ?”

थोड़े ही दिनों में गुजराती ने धर्मशाला की तामीर शुरू करा दी, कुर्बोजुवार के ज़मींदारों और महाजनों ने मदद की। काम चल निकला और चन्द माह में एक पुख्ता दो-मंजला इमारत खड़ी हो गई, जिसमें पचास आदमी बआसाइश (आराम से) ठहर सकते थे। मगर इधर तो धर्मशाला बन रही थी, उधर गुजराती पर फालिज का हमला हुआ। शबाना-रोज (रात-दिन) की मसरूफियत बलाए-जान हो गयी। साल भर तक इलाज होता रहा। बचने की कोई उम्मीद न थी। सारा जिस्म माऊफ (विकृत) हो गया था, लेकिन हयात बाकी थी। जान बच गयी। हाँ, दोनों हाथ बेकार हो गये, और आँखों की बीनाई भी जाती रही। गोशाला तबाह हो गयी। चश्माए-फैज (दया-स्रोत) खुश्क हो गया। चिड़ियाँ बन्द कैद से आजाद हो गयीं। कुत्ते और बिल्लियाँ, हिरन और नेवले आवारागर्द हो गये। एक बार फिर लहलहाता हुआ बाग वीरान हो गया। मैं भी पर्सशे हाल (हाल-चाल-पूछने) के लिए गुजराती के पास पहुँची। उसकी बिलकुल काया ही पलट गयी थी। बदन तार-तार, चेहरा जर्द, सर के बाल खाल-खाल रह गए थे, जैसे किसी ने पौधे की टहनियाँ और पत्ते तोड़ लिए हों, सिर्फ ढूँठ ही बाकी रह गया हो। दोनों आँखें बैठ गई थीं। मैं इसकी हालत देखकर रो पड़ी। गुजराती ने कहा, “बहनजी, तुम खूब आयीं। भेंट हो गई। कौन जाने, अब मिलना बदा है या नहीं। अब थोड़े ही दिनों की मेहमान हूँ। इतना करना कि धरमसाला बना रहे और हर साल इसकी मरम्मत होती जाय |”

मैंने तशफ्फी (सान्त्वना) देते हुए कहा, “इसकी तरफ से तुम बेफिक्र रहो। मैं इसके लिए इसी मौजाँ का एक हिस्सा वक्‍फ (दान) कर दूँगी। अब तो यहाँ अकेले पड़े-पड़े तुम्हारी तबियत घबराती होगी। कोई तिमारदारी करने वाला भी नहीं। क्‍यों न मेरे साथ चलो। वहाँ बाल-बच्चों में जी बहलता रहेगा। मैं खुद तुम्हारी खिदमत में हाजिर रहूँगी। कोई तकलीफ न होगी।”

गुजराती ने रूखी हँसी हँसकर कहा, “जो काम जिन्दगी भर न किया, वह अब करूँ, तन पालूँ ?”

मैंने कुछ आजुर्दा-ख़ातिर (दुःखित) होकर कहा, “इसमें तन पालने की कौन बात है। तुम्हारा इस हालत में पड़ा रहना मुझसे नहीं देखा जाता।”

गुजराती कुछ जवाब न देने पाई थी कि चार पाँच औरतें घूँघट निकाले हुए आ गयीं और बोलीं, “बुआजी, आज तो बाल-काण्ड (रामायण का एक बाब “अध्याय”) होगा न। थोड़ा ही तो रह गया है। इसे आज समःपत (खत्म) कर दीजिए ।”

गुजराती ने ताक की तरफ इशारा करके कहा, “हाँ, आज हो जायगा। रामायण उतार लो।'

एक औरत ने रामायण उतार ली और एक-एक चौपाई पढ़ने लगी। गुजराती उसके मतलब समझाती जाती थी। मुझे अब तक न मालूम था कि गुजराती ने इतनी इस्तेदाद (योग्यता) बहम पहुँचा ली है। गौर से सुनने लगी।

डेढ़-दो घण्टे तक रामायण की कथा होती रही। अभी ये औरतें बैठी ही थीं कि गाँव की कई लड़कियाँ आ गयीं। गुजराती इन्हें पढ़ाने में मसरूफ हो गयी और दोपहर तक यह शुगल जारी रहा। इसी दौरान में कई औरतें अपने बच्चों को दिखाने भी आयीं। गुजराती इन्हें देख-देखकर दवाएँ देती जाती थीं। साधु-सन्‍्तों के फैजे-सोहबत (सत्संग) से इसे इस फुन में मलका (महारत) हो गया था।

जब तख्लिया (एकान्त) हो गया तो गुजराती ने मुझसे कहा, “तुम्हारे साथ चलूँ तो यह सब काम कौन करेगा ? पड़े-पड़े आराम से खाने में यह सुख कहाँ मिल सकता है ?”

मैंने इसकी तरफ माजिरत (विवशता) की निगाहों से देखकर कहा, “मैं न जानती थी कि इस हालत में भी तुमने इतने पाँव फैला रखे हैं।

गुजराती बोली, “क्या करूँ बहन जी, मुझसे अपाहजों की तरह नहीं रहा जाता। मुझे इन कामों में जितना सुख मिलता है, वह सोने और खाने में कभी नहीं मिल सकता। मेरा तो जी उकता जाय। न जाने कैसे लोग इस तरह रहते हैं।

मेरी आँखें खुल गयीं। जिन्दगी का कैसा आला मेयार है। बेशक यही जिन्दादिली रूहे-हयात है जो सानिहाल (मुसीबतों) की परवा नहीं करती। जो नेरंगिए-जमाना (काल- चक्र) से बेअसर, हरएक हालात में, रवाँ हो, कितनी ही ख़राब क्‍यों न हो, खिदमत और ऐशार (बलिदान) के रास्ते निकाल लेती है। नहीं, बल्कि हरएक पहलू से बड़ी मुसीबत में इसके जौहर खिलते जाते हैं। जमाना इसे जितना ही पामाल करने (रौंदने) की कोशिश करता है, उतनी ही उसकी हिम्मत मज़बूत होती जाती है, उतनी ही उसकी निगाहें बशीतर और इरादे ज़्यादा बुलन्द होते जाते हैं, जैसे कोई असील (उत्तम) घोड़ा मेहमज़ (जूते की एड़ में लगी कील) की चोट खाकर और भी तरारे भरने लगता है।

गुजराती अभी जिन्दा है और मेरा मौज़ा इसी तरह उसकी जात से फैज (उपकार) पा रहा है।


रूहे-हयात का सारांश

‘रूहे-हयात’ (जीवन की प्राण-शक्ति) गुजराती नाम की एक अनाथ, कर्मठ और असाधारण रूप से जीवंत स्त्री के जीवन-संघर्ष की प्रेरक कथा है। बचपन में ही माता-पिता का साया छिन जाने के बाद वह गाँव भर में मेहनत-मजदूरी कर और लोगों के छोटे-मोटे काम करके हँसते-खेलते बड़ी होती है। अभावों और विपन्नता के बीच भी वह कभी रोती या भाग्य को नहीं कोसती, बल्कि जीवन को ईश्वर का अनुपम वरदान मानकर हर हाल में प्रसन्न रहती है। सयानी होने पर गाँव वाले मिलकर उसका विवाह रेलवे स्टेशन पर पानी पिलाने वाले रामरतन से कर देते हैं। रामरतन क्रोधी, संकीर्ण और शक्की स्वभाव का व्यक्ति है, जो घर में उस पर तरह-तरह की पाबंदियाँ लगाता है। किंतु गुजराती स्वयं स्टेशन के कर्मचारियों का आटा पीसकर स्वावलंबन से रहती है और पति के कठोर स्वभाव को भी सहजता से झेलती है।

विवाह के कुछ वर्षों बाद गुजराती पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ता है। चेचक (शीतला) के प्रकोप से उसके इकलौते बेटे सत्यदेव की दोनों आँखों की रोशनी चली जाती है। इसके कुछ ही समय बाद चलती ट्रेन से गिरकर उसके पति रामरतन की दर्दनाक मृत्यु हो जाती है। वैधव्य और दृष्टिहीन बालक के पालन-पोषण का भार लेकर वह पुनः अपने मायके (गाँव) लौट आती है। वह दिन में मजदूरी व सिलाई करती है और रात भर चार-चार पंसेरी गेहूँ पीसती है। आठ वर्षों के अथक परिश्रम और ग्रामीणों के सहयोग से वह अपने बेटे के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए एक पक्का व हवादार मकान, कुआँ और शिव मंदिर का निर्माण कराती है। इसके साथ ही वह सत्यदेव को शास्त्री जी के पास संस्कृत और भागवत की शिक्षा दिलवाती है ताकि वह आगे चलकर स्वाभिमानपूर्वक पंडिताई कर अपना निर्वाह कर सके। नए घर के गृह-प्रवेश पर वह पूरे उत्साह से विशाल भंडारा आयोजित कर आसपास के ग्रामीणों को भोजन कराती है।

किंतु नियति का क्रूर प्रहार यहीं नहीं थमता। गाँव में ठहरे एक पाखंडी साधु के साथ बालक सत्यदेव अचानक गायब हो जाता है। पुत्र की खोज में गुजराती साल भर तीर्थ-स्थलों की खाक छानती है, पर कोई सुराग नहीं मिलता। इस असह्य आघात से टूटने के बजाय गुजराती अपने व्यक्तिगत दुःख को समूचे गाँव के कल्याण में बदल देती है। वह कई गायें-भैंसें पालकर एक गोशाला शुरू करती है और सारा दूध गाँव के बच्चों को निःशुल्क पिलाने लगती है। साथ ही वह ग्रामीणों और महाजनों के सहयोग से गाँव में पचास यात्रियों के ठहरने योग्य दोमंजिला भव्य धर्मशाला का निर्माण करवाती है।

धर्मशाला का निर्माण पूरा होते ही अत्यधिक श्रम के कारण गुजराती पक्षाघात (लकवा) की शिकार हो जाती है। इस गंभीर व्याधि से उसकी जान तो बच जाती है, किंतु उसके दोनों हाथ निष्प्राण हो जाते हैं और आँखों की रोशनी भी चली जाती है। इस नितांत अशक्त और असहाय अवस्था में भी जब कथावाचिका उसे अपने साथ शहर चलकर आराम से रहने का प्रस्ताव देती हैं, तो वह पराश्रित होकर जीने से साफ इनकार कर देती है। दोनों आँखों से अंधी और हाथों से लाचार होने पर भी वह गाँव की स्त्रियों को रामायण की कथा समझाती है, बालिकाओं को अक्षर-ज्ञान देती है और देशी जड़ी-बूटियों से बीमार बच्चों का उपचार करती है। विपत्तियों के निरंतर आघातों के बीच गुजराती की यह अटूट कर्मठता और जिजीविषा मानवीय आत्मा की अमर प्राण-शक्ति का साक्षात प्रतीक बन जाती है।


प्रकाशन इतिहास

इस कहानी का प्रथम प्रकाशन उर्दू में, उर्दू मासिक पत्रिका ज़माना के जनवरी 1912 के अंक में हुआ था। इसका हिन्दी रूप प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित है।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • अटूट जिजीविषा और अदम्य जीवन-उत्साह (रूहे-हयात): अनाथ बचपन, संकीर्ण व क्रूर पति, असमय वैधव्य, इकलौते नेत्रहीन पुत्र का अपहरण और अंततः स्वयं पक्षाघात तथा अंधत्व जैसी असह्य त्रासदियों के बाद भी गुजराती कभी हार नहीं मानती। वह किसी भी परिस्थिति में विलाप करने या भाग्य को कोसने के बजाय हर संकट का सामना अदम्य साहस और उल्लास के साथ करती है।
  • व्यक्तिगत शोक का लोकमंगल में रूपांतरण: पुत्र-वियोग के असह्य आघात को गुजराती ने निष्क्रिय शोक में नहीं बहने दिया। उसने अपने मातृत्व का विस्तार करते हुए गाँव भर के बच्चों को अपना माना; गोशाला बनाकर उन्हें निःशुल्क दूध पिलाया और परोपकार हेतु दोमंजिला धर्मशाला का निर्माण कराया। यह व्यक्तिगत पीड़ा को उदात्त सामाजिक सेवा में परिणत करने का अनुपम उदाहरण है।
  • श्रम की प्रतिष्ठा और स्वावलंबन: गुजराती का संपूर्ण जीवन स्वावलंबन का प्रेरक पाठ है। ससुराल में पति की प्रताड़ना के बीच भी वह आटा पीसकर अपनी रोटी जुटाती थी और बाद में रात-दिन कड़ा शारीरिक श्रम कर अपने नेत्रहीन बेटे का भविष्य सुरक्षित किया। जीवन के अंतिम पड़ाव में पंगु और दृष्टिहीन होकर भी वह किसी पर बोझ बनने या 'तन पालने' से साफ इनकार कर देती है।
  • शारीरिक अक्षमताओं पर नैतिक संकल्प की विजय: पक्षाघात से दोनों हाथ बेकार हो जाने और आँखों की रोशनी छिन जाने के बावजूद गुजराती गाँव की महिलाओं को रामायण की चौपाइयों का मर्म समझाती है, कन्याओं को शिक्षा देती है और बीमार शिशुओं का देशी नुस्खों से उपचार करती है। यह सिद्ध करता है कि सेवा और लोक-कल्याण का संबंध शारीरिक अंगों की सामर्थ्य से अधिक मन के अगाध संकल्प से होता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'रूहे-हयात' मानवीय संकल्प और कर्म-निष्ठा का ऐसा आख्यान है जो घोर अंधकार में भी आशा का दीप प्रज्वलित करता है। प्रेमचंद ने गुजराती के चरित्र के माध्यम से यह प्रतिपादित किया है कि विपत्तियाँ यदि साधारण मनुष्य को तोड़ देती हैं, तो असाधारण व्यक्तित्व को कुंदन बना देती हैं; जीवन की सार्थकता भाग्यवाद के रोने में नहीं, बल्कि परिस्थितियों से लोहा लेकर निःस्वार्थ परोपकार में रत रहने में ही है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "रूहे-हयात." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1912, https://munshipremchand.com/works/short-stories/rooh-e-hayat. Accessed 22 Sep. 2026.