Cover Image for Devi (देवी) by Munshi Premchand - Short Story
Cover Image for Devi (देवी) by Munshi Premchand - Short Story
कहानी•1935•41 मिनट

देवी

Devi

प्रेमचंद की कहानी 'देवी' तुलिया नामक एक दलित स्त्री के असाधारण पतिव्रत, नैतिक साहस और धर्मपरायणता की गाथा है, जो अपनी चतुरता और त्याग से एक अनाथ विधवा को उसका अधिकार दिलाती है।

पात्र:तुलिया, बंसीसिंह, गिरधर सिंह, ठकुराइन
स्थान:एक भारतीय ग्रामीण परिवेश; तुलिया की झोपड़ी, गाँव के खेत और ठाकुर का घर

देवी का मूल पाठ

बूढ़ों में जो एक तरह की बच्चों की-सी बेशर्मी आ जाती है वह इस वक्त भी तुलिया में न आई थी, यद्यपि उसके सिर के बाल चांदी हो गये थे। ओर गाल लटक कर दाढ़ों के नीचे आ गये थे। वह खुद भी निश्चित रूप से अपनी उम्र न बता सकती थी, लेकिन लोगों का अनुमान था कि वह सो की सीमा को पार कर चुकी है। ओर अभी तक चलती तो अंचल से सिर ढाँककर, आँखें नीची किये हुए, मानो नवेली बहू है। थी तो चमारिन, पर क्‍या मजाल कि किसी घर का पकवान देखकर उसका जी ललचाया। गाँव में ऊँची जातों के बहुत-से घर थे। तुलिया का सभी जगह आना-जाना था। सारा गाँव उसकी इज्जत करता था ओर गृहिणियाँ तो उसे श्रद्धा की आँखों से देखती थीं। उसे आग्रह के साथ अपने घर बुलाती, उसके सिर में तेल डालती, माँग में सेंदूर भरती, कोई अच्छी चीज पकाई होती, जैसे हलवा या खीर या पकोड़ियाँ, तो उसे खिलाना चाहती, लेकिन बुढ़िया को जीभ से सम्मान कहीं प्यारा था। कभी न खाती। उसके आगे-पीछे कोई न था। उसके टोले के लोग कुछ तो गाँव छोड़कर भाग गये थे,

कुछ प्लेग ओर मलेरिया की भेंट हो गये थे ओर अब थेड़े-से खंडहर मानो उनकी याद में नंगे सिर खड़े छाती-सी पीट रहे थे। केवल तुलिया की मंड़ेया ही जिन्दा बच रही थी, ओर यद्यपि तुलिया जीवन-यात्रा की उस सीमा के निकट पहुँच चुकी थी, जहाँ आदमी धर्म और समाज के सारे बन्धनों से मुक्त हो जाता हैं ओर अब श्रेष्ठ प्राणियों को भी उससे उसकी जात के कारण कोई भेद न था, सभी उसे अपने घर में आश्रय देने को तैयार थे, पर मान- प्रिय बुढ़िया क्यों किसी का एहसान ले, क्यों अपने मालिक की इज्जत में बट्टा लगाये, जिसकी उसने सो बरस पहले केवल एक बार सूरत देखी थी। हाँ, केवल एक बार!

तुलिया की जब सगाई हुई तो वह केवल पाँच साल की थी ओर उसका पति अठारह साल का बलिष्ठ युवक था। विवाह करके वह कमाने पूरब चला गया। सोचा, अभी इस लड़की के जवान होने में दस --बारह साल की देर है। इतने दिनों में क्‍यों न कुछ धन कमा लूँ ओर फिर निश्चिन्त होकर खेती-बारी करूँ। लेकिन तुलिया जवान भी हुई, बूढ़ी भी हो गई, वह लोटकर घर न आया। पचास साल तक उसके खत हर तीसरे महीने आते रहे। खत के साथ जवाब के लिए एक पता लिखा हुआ लिफाफा भी होता था और तीस रुपये का मनीआर्डर। खत में वह बराबर अपनी विवशता, पराधीनता ओर दुर्भाग्य का रोना रोता था -- क्‍या

करूँ तूला, मन में तो बड़ी अभिलाषा हे कि अपनी मंड़ेया को आबाद कर देता ओर तुम्हारे साथ सुख से रहता, पर सब कुछ नसीब के हाथ है, अपना कोई बस नहीं। जब भगवान लावेंगे तब आऊँगा। तुम धीरज रखना, मेरे जीते जी तुम्हें कोई कष्ट न होगा। तुम्हारी बांह पकड़ी है तो मरते दम तक निबाह करूँगा। जब आँखें बन्द हो जाएँगी तब क्‍या होगा, कोन जाने? प्राय: सभी पत्रों में थोड़ेसे -- फेरफार के साथ यही शब्द और यही भाव होते थे। हाँ, जवानी के पत्रों में विरह की जो ज्वाला होती थी, उसकी जगह अब निराशा की राख ही रूह गई थी। लेकिन तुलिया के लिए सभी पत्र एक-से प्यारे थे, मानो उसके हृदय के अंग हों। उसने एक खत भी कभी न फाड़ा था -- ऐसे शगुन के पत्र कहीं फाड़े जाते हें -- उनका एक छोटा-सा पोथा जमा हो गया था। उनके कागज का रंग उड़ गया था, स्याही भी उड़ गई थी, लेकिन तुलिया के लिए वे अभी उतने ही सजीव, उतने ही सतृष्ण, उतने ही व्याकूुल थे। सब के सब उसकी पेटारी में लाल डोरे से बंधे हुए, उसके दीर्घ जीवन से संचित सोहाग की भांति, रखे हुए थे। इन पत्रों को पाकर तुलिया गदगद हो जाती। उसके पाँव जमीन पर न पड़ते, उन्हें बार-बार पढ़वाती ओर बार-बार रोती। उस दिन वह अवश्य केशों में तेल डालती, सिन्दूर से माँग भरवाती, रंगीन साड़ी पहनती, अपनी पुरखिनों के चरन छूती और

आशीर्वाद लेती। उसका सोहाग जाग उठता था। गाँव की विरहिनियों के लिए पत्र पत्र नहीं, जो पढ़कर फेंक दिया जाता हे, अपने प्यारे परदेसी के प्राण हें, देह से मूल्यवान। उनमें देह की कठोरता नहीं, कलुषता नहीं, आत्मा की आकुलता ओर अनुराग है। तुलिया पति के पत्रों ही को शायद पति समझती थी। पति का कोई दूसरा रूप उसने कहाँ देखा था?

रमणियाँ हंसी से पूछती -- क्‍यों बुआ, तुम्हें फूफा की कुछ याद आती है -- तुमने उनको देखा तो होगा? ओर तुलिया के झुरियों से भरे हुए मुखमण्डल पर योवन चमक उठता, आँखों में लाली आ जाती। पुलककर कहती -- याद क्‍यों नहीं आती बेटा, उनकी सूरत तो आज भी मेरी आँखें के समाने हें बड़ी-बड़ी आँखें, लाल- लाल ऊँचा माथा, चोड़ी छाती, गठी हुई देह, ऐसा तो अब यहाँ कोई पट्टा ही नहीं है। मोतियों के-से दांत थे बेटा। लाल-लाल कुरता पहने हुए थे। जब ब्याह हो गया तो मैंने उनसे कहा, मेरे लिए बहुत-से गहने बनवाओगे न, नहीं में तुम्हारे घर नहीं रहूँगी। लड़कपन था बेटा, सरम-लिहाज कुछ थोड़ा ही था। मेरी बात सुनकर वह बड़े जोर से ठट्ठा मारकर हँसे ओर मुझे अपने कंधे पर बेठाकर बोले -- में तुझे गहनों से लाद दूँगा, तुलिया, कितने गहने पहनेगी। में परदेस कमाने जाता हूँ, वहाँ से रुपये भेजूँगा, तू बहुत-से गहने बनवाना। जब वहाँ से आऊँगा तो अपने साथ भी

सन्दूक-भर गहने लाऊँगा। मेरा डोला हुआ था बेटा, माँ-बाप की ऐसी हेसियत कहाँ थी कि उन्हें बारात के साथ अपने घर बुलाते उन्हीं के घर मेरी उनसे सगाई हुई ओर एक ही दिन में मुझे वह कुछ ऐसे भाये कि जब वह चलने लगे तो में उनके गले लिपट कर रोती थी और कहती थी कि मुझे भी अपने साथ ले चलो, में तुम्हारा खाना पकाऊँगी, तुम्हारी खाट बिछाऊँगी, तुम्हारी धोती छाँटूगी। वहाँ उन्हीं के उमर के दो-तीन लड़के और बेठे हुए थे। उन्हीं के सामने वह मुस्करा कर मेरे कान में बोले -- ओर मेरे साथ सोयेगी नहीं? बस, में उनका गला छोड़कर अलग खड़ी हो गई और उनके ऊपर एक कंकड़ फेंककर बोली -- मुझे गाली दोगे तो कहे देती हूँ, हाँ!

ओर यह जीवन-कथा नित्य के सुमिरन और जाप से जीवन-मन्त्र बन गयी थी। उस समय कोई उसका चेहरा देखता! खिला पड़ता था। घूंघट निकालकर भाव बताकर, मुँह फेरकर हँसती हुई, मानो उसके जीवन में दुख जेसी कोई चीज हे ही नहीं। वह अपने जीवन की इस पुण्य स्मृति का वर्णन करती, अपने अन्तस्तल के इस प्रकाश को दर्शाती जो सो बरसों से उसके जीवन-पथ को कांटों और गढ़ों से बचाता आता था। कैसी अनन्त अभिलाषा था, जिसे जीवन-सत्यों ने जरा भी धूमिल न कर पाया था।

वह दिन भी थे, जब तुलिया जवान थी, सुंदर थी ओर पतंगों को उसके रूप-दीपक पर मँडराने का नशा सवार था। उनके अनुराग ओर उनन्‍्माद तथा समर्पण की कथाएँ जब वह काँपते हुए स्वरों ओर सजल नेत्रों से कहती तो शायद उन शहीदों की आत्माएँ स्वर्ग में आनन्द से नाच उठती होंगी, क्योंकि जीते जी उन्हें जो कुछ न मिला वही अब तुलिया उन पर दानों हाथों से निछावर कर रही थी। उसकी उठती हुई जवानी थी। जिधर से निकल जाती युवक समाज कलेजे पर हाथ रखकर रूह जाता। तब बंसीसिंह नाम का एक ठाकुर था, बड़ा छेला, बड़ा रसिया, गाँव का सबसे मनचला जवान, जिसकी तान रात के सन्नाटे में कोस-भर से सुनायी पड़ती थी। दिन में सेकड़ों बार तुलिया के घर के चक्कर लगाता। तालाब के किनारे, खेत में, खलिहान में, कुँए पर, जहाँ वह जाती, परछाईं की तरह उसके पीछे लगा रहता। कभी दूध लेकर उसके घर आता, कभी घी लेकर। कहता, तुलिया, में तुझसे कुछ नहीं चाहता, बस जो कुछ में तुझे भेंट किया करूँ, वह ले लिया कर। तू मुझसे नहीं बोलना चाहती मत बोल, मेरा मुँह नहीं देखना चाहती, मत देख लेकिन मेरे चढ़ावों को ठुकरा मत। बस, में इसी से सन्तुष्ट हो जाऊँगा। तुलिया ऐसी भोली न थी, जानती

थी यह उंगली पकड़ने की बातें हैं, लेकिन न जाने केसे वह एक दिन उसके धोखे में आ गयी -- नहीं, धोखे में नहीं आयी -- उसकी जवानी पर उसे दया आ गयी। एक दिन वह पके हुए कलमी आमों की एक टोकरी लाया! तुलिया ने कभी कलमी आम न खाये थे। टोकरी उससे ले ली। फिर तो आये दिन आम की डलियाँ आने लगीं। एक दिन जब तुलिया टोकरी लेकर घर में जाने लगी तो बंसी ने धीरे से उसका हाथ पकड़कर अपने सीने पर रख लिया ओर चट उसके पेरों पर गिर पड़ा। फिर बोला -- तुलिया, अगर अब भी तुझे मुझ पर दया नहीं आती तो आज मुझे मार डाल। तेरे हाथों से मर जाऊँ, बस यही साध हे।

तुलिया न टोकरी पटक दी, अपने पाँव छुड़ाकर एक पग पीछे हट गयी ओर रोषभरी आँखों से ताकती हुई बोली -- अच्छा ठाकुर, अब यहाँ से चले जाव, नहीं तो या तो तुम न रहूँगी। तुम्हारे आमों में आग लगे, ओर तुमको क्‍या कहूँ] मेरा आदमी काले कोसों मेरे नाम पर बेठा हुआ है इसीलिए कि में यहाँ उसके साथ कपट करूँ! वह मर्द हे, चार पेसे कमाता है, क्या वह दूसरी न रख सकता था? क्‍या ओरतों की संसार में कमी है? लेकिन वह मेरे नाम पर चाहे न हो। पढ़ोगे उसकी चिट्टियाँ जो मेरे नाम भेजता है? आप चाहे जिस दशा में हो, में कोन यहाँ बेठी देखती हूँ, लेकिन मेरे पास बराबर रुपये भेजता है। इसीलिए कि में यहाँ दूसरों से

विहार करूँ? जब तक मुझको अपनी ओर अपने को मेरा समझता रहेगा, तुलिया उसी की रहेगी, मन से भी, करम से भी। जब उससे मेरा ब्याह हुआ तब में पाँच साल की अल्हड़ छोकरी थी। उसने मेरे साथ कौन-सा सुख उठाया? बांह पकड़ने की लाज ही तो निभा रहा है! जब वह मर्द होकर प्रीत निभाता हे तो में ओरत होकर उसके साथ दगा करूँ

यह कहकर वह भीतर गयी ओर पत्रों की पिटारी लाकर ठाकुर के सामने पटक दी। मगर ठाकुर की आँखों का तार बँधा हुआ था, ओठ बिचके जा रहे थे। ऐसा जान पड़ता था कि भूमि में धंसा जा रहा है।

एक क्षण के बाद उसने हाथ जोड़कर कहा -- मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया तुलिया। मैंने तुझे पहचाना न था। अब इसकी यही सजा हे कि इसी क्षण मुझे मार डाल। ऐसे पापी का उद्बार का यही एक मार्ग है।

तुलिया को उस पर दया नहीं आयी। वह समझती थी कि यह अभी तक शरारत किये जाता है। झललाकर बोली -- मरने को जी चाहता है तो मर जाव। क्‍या संसार में कुँए-तालाब नहीं, या तुम्हारे पास तलवार-कटार नहीं है। में किसी को क्‍यों मारूँ?

ठाकुर ने हताश आँखों से देखा।

“तो यही तेरा हुक्म हे?”

“मेरा हुक्म क्‍यों होने लगा? मरने वाले किसी से हुक्म नहीं माँगते। ”

ठाकुर चला गया ओर दूसरे दिन उसकी लाश नदी में तेरती हुई मिली। लोगों ने समझा तड़के नहाने आया होगा, पाँव फिसल गया होगा। महीनों तक गाँव में इसकी चर्चा रही, पर तुलिया ने जबान तक न खोली, उधर का आना-जाना बन्द कर दिया।

बंसीसिंह के मरते ही छोटे भाई ने जायदाद पर कब्जा कर लिया ओर उसकी स्त्री ओर बालक को सताने लगा। देवरानी ताने देती, देवर ऐब लगाता। आखिर अनाथ विधवा एक दिन जिन्दगी से तंग आकर घर से निकल पड़ी। गाँव में सोता पड़ गया था। तुलिया भोजन करके हाथ में लालटेन लिये गाय को रोटी खिलाने निकली थी। प्रकाश में उसने ठकुराइन को दबे पाँव जाते देखा। सिसकती ओर अंचल से आँसू पोंछृती जाती थी। तीन साल का बालक गोद में था।

तुलिया ने पूछा -- इतनी रात गये कहाँ जाती हो ठकुराइन? सुनो, बात क्‍या हे, तुम तो रो रही हो।

ठकुराइन घर से जा तो रही थी,पर उसे खुद न मालूम था कहाँ। तुलिया की ओर एक बार भीत नेत्रों से देखकर बिना कुछ

जवाब दिये आगे बढ़ी। जवाब केसे देती? गले में तो आँसू भरे हुए थे और इस समय न जाने क्‍यों ओर उमड़ आये थे।

तुलिया सामने आकर बोली -- जब तक तुम बता न दोगी, में एक पग भी आगे न जाने दूँगी।

ठकुराइन खड़ी हो गयी ओर आँसू-भरी आँखों से क्रोध में भरकर बोली -- तू क्या करेगी पूछकर? तुझसे मतलब?

'मुझसे कोई मतलब ही नहीं? क्या में तुम्हारे गाँव में नहीं रहती? गाँव वाले एक-दूसरे के दुख-दर्द में साथ न देंगे तो कौन देगा?

“इस जमाने में कौन किसका साथ देता हे तुलिया? जब अपने घरवालों ने ही साथ नहीं दिया ओर तेरे भैया के मरते ही मेरे खून के प्यासे हो गये, तो फिर में ओर किससे आशा रखूँ? तुझसे मेरे घर का हाल कुछ छिपा हे? वहाँ मेरे लिए अब जगह नहीं है। जिस देवर-देवरानी के लिए में प्राण देती थी, वही अब मेरे दुश्मन हैं। चाहते हें कि यह एक रोटी खाय और अनाथों की तरह पड़ी रहे। में रखेली नहीं हूँ उढ़री हूँ, ब्याहता हूँ, दस गाँव के बीच में ब्याह के आयी हूँ। अपनी रत्ती-भी जायदाद न छोड़ूँगी ओर अपना राधा लेकर रहूँगी।'

तेरे भेया', ये दो शब्द तुलिया को इतने प्यारे लगे कि उसने ठकुराइन को गले लगा लिया ओर उसका हाथ पकड़कर बोली

-- तो बहिन, मेरे घर में चलकर रहो। ओर कोई साथ दे या न दे, तुलिया मरते दम तक तुम्हारा साथ देगी। मेरा घर तुम्हारे लायक नहीं है, लेकिन घर में ओर कुछ नहीं शान्ति तो हे ओर में कितनी ही नीच हूँ, तुम्हारी बहिन तो हूँ।

ठकुराइन ने तुलिया के चेहरे पर अपनी विस्मय-भरी आँखें जमा दी।

ऐसा न हो मेरे पीछे मेरा देवर तुम्हारा भी दुश्मन हो जाय।' में दुश्मनों से नहीं डरती, नहीं इस टोले में अकेली न रहती।' लेकिन में तो नहीं चाहती कि मेरे कारन तुझ पर आफत आवे।!'

“तो उनसे कहने ही कौन जाता है, ओर किसे मालूम होगा कि अन्दर तुम हो।'

ठकुराइन को ढाढ़स बँधा। सकुचाती हुई तुलिया के साथ अन्दर आयी। उसका हृदय भारी था। जो एक विशाल पक्के की स्वामिनी थी, आज इस झोपड़ी में पड़ी हुई है।

घर में एक ही खाट थी, ठकुराइन बच्चे के साथ उस पर सोती। तुलिया जमीन पर पड़ रहती। एक ही कम्बल था, ठकुराइन उसको ओढ़ती, तुलिया टाट का टुकड़ा ओढ़कर रात काटती। मेहमान का क्या सत्कार करे, केसे रक्खे, यही सोचा करती।

ठकुराइन के जुठे बरतन माँजना, कपड़े छांटना, उसके बच्चे को खिलाना ये सारे काम वह इतने उमंग से करती, मानो देवी की उपासना कर रही हो। ठकुराइन इस विपत्ति में भी ठकुराइन थी, गर्विणी, विलासप्रिय, कल्पनाहीन। इस तरह रहती थी मानो उसी का घर है ओर तुलिया पर इस तरह रोब जमाती थी मानो वह उसकी लोंडी हे। लेकिन तुलिया अपने अभागे प्रेमी के साथ प्रीति की रीति का निबाह कर रही थी, उसका मन कभी न मैला होता, माथे पर कभी न बल पड़ता।

एक दिन ठकुराइन ने कहा -- तुला, तुम बच्चे को देखती रहना, में दो-चार दिन के लिए जरा बाहर जाऊँगी। इस तरह तो यहाँ जिन्दगी-भर तुम्हारी रोटियाँ तोड़ती रहूँगी,पर दिल की आग केसे ठण्डी होगी? इस बेहया को इसकी जाल कहाँ कि उसकी भावज कहाँ चली गयी। वह तो दिल में खुश होगा कि अच्छा हुआ उसके मार्ग का कांटा हट गया। ज्यों ही पता चला कि में अपने मेके नहीं गयी, कहीं और पड़ी हूँ, वह तुरन्त मुझे बदनाम कर देगा और तब सारा समाज उसी का साथ देगा। अब मुझे कुछ अपनी फिक्र करनी चाहिए।

तुलिया ने पूछा -- कहाँ जाना चाहती हो बहिन? कोई हर्ज न हो तो में भी साथ चलूँ। अकेली कहाँ जाओगी?

“उस सांप को कुचलने के लिए कोई लाठी खोजूँगी।'

तुलिया इसका आशक न समझ सकी। उसके मुख की ओर ताकने लगी।

ठकुराइन ने निर्लज्जता के साथ कहा -- तू इतनी मोटी-सी बात भी नहीं समझी! साफ-साफ ही सुनना चाहती हे? अनाथ स्त्री के पास अपनी रक्षा का अपने रूप के सिवा दूसरा कोन अस्त्र हे? अब उसी अस्त्र से काम लूँगी। जानती है, इस रूप के क्‍या दाम होंगे? इस भेड़िये का सिर। इस परगने का हाकिम जो कोई भी हो उसी पर मेरा जादू चलेगा। ओर ऐसा कोन मर्द है जो किसी युवती के जादू से बच सके, चाहे वह ऋषि ही क्‍यों न हो। धर्म जाता हे जाय, मुझ परवाह नहीं। में यह नहीं देख सकती कि में बन-बन की पत्तियाँ तोड़ूँ और वह शोहदा मूँछों पर ताव देकर राज करे।

तुलिया को मालूम हुआ कि इस अभिमानिनी के हृदय पर कितनी गहरी चोट हैं इस व्यथा को शान्‍्त करने के लिए वह जान ही पर नहीं खेल रही हे, धर्म पर खेल रही हे जिसे वह प्राणों से भी प्रिय समझती है। बंसीसिंह की वह प्रार्थी मूर्ति उसकी आँखों के समाने आ खड़ी हुई। वह बलिष्ठ था, अपनी फोलादी शक्ति से वह बड़ी आसानी के साथ तुलिया पर बल प्रयोग कर सकता था,

ओर उस रात के सन्नाटे में उस अनाथा की रक्षा करने वाला ही कोन बेठा हुआ था। पर उसकी सतीत्व-भरी भर्त्सना ने बंसीसिंह को किस तरह मोहित कर लिया, जेसे कोई काला भयंकर नाग महुअर का सुरीला राग सुनकर मस्त हो गया हो। उसी सच्चे सूरमा की कुली-मर्यादा आज संकट में है। क्‍या तुलिया उस मर्यादा को लुटने देगी ओर कुछ न करेगी? नहीं-नहीं! अगर बंसीसिंह ने उसके सत्‌ को अपने प्राणों से प्रिय समझा तो वह भी उसकी आबरू को अपने धर्म से बचायेगी।

उसने ठकुराइन को तसल्ली देते हुए कहा -- अभी तुम कहीं मत जाओ बहिन पहले मुझे अपनी शक्ति आजमा लेने दो। मेरी आबरू चली भी गयी तो कोन हँसेगा। तुम्हारी आबरू के पीछे तो एक कुल की आबछरू हे।

ठकुराइन ने मुस्कराकर उसको देखा। बोली -- तू यह कला क्या जाने तुलिया?

“कौन-सी कला?

“यही मर्दों को उल्लू बनाने की।'

में नारी हूँ?

"लेकिन पुरुषों का चरित्र तो नहीं जानती?

“यह तो हम-तुम दोनों माँ के पेट से सीखकर आयी हें।'

'कुछ बता तो क्‍या करेगी?

“वही जो तुम करने जा रही हो। तुम परगने के हाकिम पर अपना जादू डालना चाहती हो, में तुम्हारे देवर पर ज़ाला फेंकूगी। ' “बड़ा घाघ हे तुलिया।'

“यही तो देखना हे।'

तुलिया ने बाकी रात कार्यक्रम और उसका विधान सोचने में काटी। कुशल सेनापति की भांति उसने धावे ओर मार-काट की एक योजना-सी मन में बना ली। उसे अपनी विजय का विश्वास था। शत्रु निश्शंक था, इस धावे की उसे जरा भी खबर न थी। बंसीसिंह का छोटा भाई गिरधर कंधे पर छः फीट का मोटा लट्ढ रखे अकड़ता चला आता था कि तुलिया ने पुकारा - ठाकुर, तनिक यह घास का गट्टा उठाकर मेरे सिर पर रख दो। मुझसे नहीं उठता।

दोपहर हो गया था। मजदूर खेतों में लोटकर आ चुके थे। बगूले उठने लगे थे। तुलिया एक पेड़ के नीचे घास का गटद्टा रखे खड़ी थी। उसके माथे से पसीने की धार बह रही थी।

ठाकुन ने चॉककर तुलिया की ओर देखा उसी वक्त तुलिया का अंचल खिसक गया ओर नीचे की लाल चोली झलक पड़ी। उसने झट अंचल सम्हाल लिया, पर उताबली में जूड़े में गुँथी हुई फूलों की बेनी बिजली की तरह आँखें में कोंद गयी। गिरधर का मन चंचली हो उठा। आँखों में हल्का-सा नशा पैदा हुआ ओर चेहरे पर हल्की-सी सुर्खी ओर हल्की-सी मुस्कराहट। नस-नस में संगीत-सा गूँज उठा।

उसने तुलिया को हजारों बार देखा था, प्यासी आँखों, ललचायी आँखों से, मगर तुलिया अपने रूप और सत्‌ के घमण्ड में उसकी तरह कभी आँखें तक न उठाती थी। उसकी मुद्रा और ढंग में कुछ ऐसी रुखाई, कुछ ऐसी निठुरता होती थी कि ठाकुर के सारे होसले पस्त हो जाते थे, सारा शोक ठण्डा पड़ जाता था। आकाश में उड़ने वाले पंछी पर उसके जाल ओर दाने का क्‍या असर हो सकता था? मगर आज वह पंछी सामने वाली डाली पर आ बेठा था ओर ऐसा जान पड़ता था कि भूखा है। फिर वह क्‍यों न दाना ओर जाल लेकर देड़ि।

उसने मस्त होकर कहा - में पहुँचाये देता हूँ तुलिया, तू क्यों सिर पर उठायेगी।

“और कोई देख ले तो यही कहे कि ठाकुर को क्‍या हो गया हे? 'मुझे कुत्तों के भूँकने की परवा नहीं है।'

लेकिन मुझे तो है।'

ठाकुर ने न माना। गट्ठटा सिर पर उठा लिया और इस तरह

आकाश में पाँव रखता चला मानो तीनों लोक का खजाना लूटे लिये जाता है।

4

एक महीना गुजर गया। तुलिया ने ठाकुर पर मोहिनी डाल दी थी ओर अब उसे मछली की तरह खेला रही थी। कभी बंसी ढीली कर देती, कभी कड़ी। ठाकुर शिकार करने चला था, खुद जाल में फंस गया। अपना इंसान और धर्म ओर प्रतिष्ठा सब कुछ होम करके वह देवी का वरदान न पा सकता था। तुलिया आज भी उससे उतनी ही दूर थी जितनी पहले।

एक दिन वह तुलिया से बोला -- इस तरह कब तक जलायेगी तुलिया? चल कहीं भाग चलें।

तुलिया ने फंदे को ओर कसा -- हाँ, और क्‍या। जब तुम मुँह फेर लो तो कहीं की न रहूँ। दीन से भी जाऊँ, दुनिया से भी!

ठाकुर ने शिकायत के स्वर में कहा -- अब भी तुझे मुझ पर विश्वास नहीं आता?

'भौरे फूल का रस लेकर उड़ जाते हें।' “ओर पतंगे जलकर राख नहीं हो जाते? 'पतियाऊँ केसे?

'मैंने तेरा कोई हुक्म टाला हे?

'तुम समझते होगे कि तुलिया को एक रंगीन साड़ी ओर दो-एक छोटे-मोटे गहने देकर फँसा लूँगा। में ऐसी भोली नहीं हूँ।' तुलिया ने ठाकुर के दिल की बात भांप ली थी। ठाकुर हेरत में आकर उसका मुँह ताकने लगा।

तुलिया ने फिर कहा -- आदमी अपना घर छोड़ता है तो पहले कहीं बेठने का ठिकाना कर लेता हे।

ठाकुर प्रसन्न होकर बोला -- तो तू चलकर मेरे घर में मालेकिन बनकर रूह। में तुझसे कितनी बार कह चुका।

तुलिया आँखें मटकाकर बोली -- आज मालेकिन बनकर रहूँ कल लोंडी बनकर भी न रहने पाऊँ, क्यों?

“तो जिस तरह तेरा मन भरे वह कर। में तो तेरा गुलाम हूँ।' “बचन देते हो?

हाँ, देता हूँ। एक बार नहीं, सो बार, हजार बार।'

'फिर तो न जाओगे?

“वचन देकर फिर जाना नामर्दों का काम है।'

“तो अपनी आधी जमीन-जायदाद मेरे नाम लिख दो।'

ठाकुर अपने घर की एक कोठरी, दस-पाँच बीघे खेत, गहने-कपड़े तो उसके चरणों पर चढ़ा देने को तैयार था, लेकिन आधी जायदाद उसके नाम लिख देने का साहस उसमें न था। कल को तुलिया उससे किसी बात पर नाराज हो जाय, तो उसे आधी जायदाद से हाथ धोना पड़े। ऐसी ओरत का क्या एतबार! उसे गुमान तक न था कि तुलिया उसके प्रेम की इतनी कड़ी परीक्षा लेगी। उसे तुलिया पर क्रोध आया। यह चमार की बिटिया जरा सुन्दर क्या हो गयी हे कि समझती हे, में अप्सरा हूँ। उसी मुहब्बत केवल उसके रूप का मोह थी। वह मुहब्बत, जो अपने

को मिटा देती है और मिट जाना ही अपने जीवन की सफलता समझती हे, उसमें न थी।

उसने माथे पर बल लाकर कहा - में न जानता था, तुझे मेरी जमीन-जायदाद से प्रेम हे तुलिया, मुझसे नहीं!

तुलिया ने छूटते ही जवाब दिया -- तो कया में न जानती थी कि तुम्हें मेरे रूप और जवानी ही से प्रेम है, मुझसे नहीं?

'तू प्रेम को बाजार का सोदा समझती हे?

हाँ, समझती हूँ। तुम्हारे लिए प्रेम चार दिन की चांदनी होगी, मेरे लिए तो अंधेरा पाख हो जायगा। में जब अपना सब कुछ तुम्हें दे रही हूँ तो उसके बदले में सब कुछ लेना भी चाहती हूँ। तुम्हें अगर मुझसे प्रेम होता तो तुम आधी क्या पूरी जायदाद मेरे नाम लिख देते। में जायदाद क्या सिर पर उठा ले जाऊँगी? लेकिन तुम्हारी नीयत मालूम हो गयी। अच्छा ही हुआ। भगवान न करे कि ऐसा कोई समय आवे, लेकिन दिन किसी के बराबर नहीं जाते, अगर ऐसा कोई समय आया कि तुमको मेरे सामने हाथ पसारना पड़ा तो तुलिया दिखा देगी कि औरत का दिल कितना उदार हो सकता है।'

तुलिया झल्लायी हुई वहाँ से चली गयी, पर निराश न थी,न बेदिल। जो कुछ हुआ वह उसके सोचे हुए विधान का एक अंग

था। इसके आगे क्‍या होने वाला हे इसके बारे में भी उसे कोई सन्देह न था।

ठाकुर ने जायदाद तो बचा ली थी,पर बड़े महँगे दामो। उसके दिल का इतमीनान गायब हो गया था। जिन्दगी में जेसे कुछ रूह ही न गया हो। जायदाद आँखों के समाने थी, तुलिया दिल के अन्दर। तुलिया जब रोज समाने आकर अपनी तिर्छी चितवनों से उसके हृदय में बाण चलाती थी,तब वह ठोस सत्य थी। अब जो तुलिया उसके हृदय में बेठी हुई थी, वह स्वप्न थी जो सत्य से कहीं ज्यादा मादक हे, विदरक हे।

कभी-कभी तुलिया स्वप्न की एक झलक-सी नजर आ जाती, ओर स्वप्न ही की भांति विलीन भी हो जाती। गिरधर उससे अपने दिल का दर्द कहने का अवसर ढूँढ़ता रहता लेकिन तुलिया उसके साये से भी परहेज करती। गिरधर को अब अनुभव हो रहा था कि उसके जीवन को सूखी बनाने के लिए उसकी जायदाद जितनी जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी तुलिया है। उसे अब अपनी कृपणता पर क्रोध आता। जायदाद क्‍या तुलिया के नाम रही, कया

उसके नाम। इस जरा-सी बात में क्‍या रक्खा है। तुलिया तो इसलिए अपने नाम लिखा रही थी कि कहीं में उसके साथ बेवफाई कर जाऊँ तो वह अनाथ न हो जाय। जब मैं उसका बिना कोड़ी का गुलाम हूँ तो बेवफाई केसी? में उसके साथ बेवफाई करूँगा, जिसकी एक निगाह के लिए, एक शब्द के लिए तरसता रहता हूँ। कहीं उससे एक बार एकान्त में भेंट हो जाती तो उससे कह देता -- तूला, मेरे पास जो कुछ हे, वह सब तुम्हारा है। कहो बखशिशनामा लिख हूँ, कहो बयनामा लिख दूँ। मुझसे जो अपराध हुआ उसके लिए नादिम हूँ। जायदाद से मनुष्य को जो एक संस्कार-गत प्रेम है, उसी ने मेरे मुँह से वह शब्द निकलवाये। यही रिवाजी लोभ मेरे ओर तुम्हारे बीच में आकर खड़ा हो गया। पर अब मैंने जाना कि दुनिया में वही चीज सबसे कीमती है जिससे जीवन में आनन्द ओर अनुराग पेदा हो। अगर दरिद्रता ओर वेराग्य में आनन्द मिले तो वही सबसे प्रिय वस्तु हे, जिस पर आदमी जमीन ओर मिल्कियत सब कुछ होम कर देगा। आज भी लाखों माई के लाल हें, जो संसार के सुखों पर लात मारकर जंगलों ओर पहाड़ों की सैर करने में मस्त हैं। ओर उस वक्त में इतनी मोटी-सी बात न समझा। हाय रे दुर्भाग्य!

एक दिन ठाकुर के पास तुलिया ने पेगाम भेजा -- में बीमार हूँ, आकर देख जाव, कोन जाने बचूँ कि न बच ।

इधर कई दिन से ठाकुर ने तुलिया को न देखा था। कई बार उसके द्वार के चक्कर भी लगाए,पर वह न दीख पड़ी। अब जो यह संदेशा मिला तो वह जैसे पहाड़ से नीचे गिर पड़ा। रात के दस बजे होंगे। पूरी बात भी न सुनी ओर दोड़ा। छाती धड़क रही थी ओर सिर उड़ा जाता था, तुलिया बीमार है! क्या होगा भगवान! तुम मुझे क्‍यों नहीं बीमार कर देते? में तो उसके बदले मरने को भी तैयार हूँ। दोनों ओर के काले-काले वृक्ष मोत के दूतों की तरह दोड़े चले आते थे। रह-रहकर उसके प्राणों से एक ध्वनि निकलती थी,हसरत ओर दर्द में डूबी हुई -- तुलिया बीमार है!

उसकी तुलिया ने उसे बुलाया है। उस कृतघ्नी, अधम, नीच, हत्यारे को बुलाया हे कि आकर मुझे देख जाओ, कोन जाने बचँ कि न बचूँ। तू अगर न बचेगी तुलिया तो में भी न बचुँगा, हाय, न बचुँगा!! दीवार से सिर फोड़कर मर जाऊँगा। फिर मेरी और तेरी चिता एक साथ बनेगी, दोनों के जनाजे एक साथ निकलेंगे।

उसने कदम और तेज किए। आज वह अपना सब कुछ तुलिया के कदमों पर रख देगा। तुलिया उसे बेवफा समझती है। आज वह दिखाएगा, वफा किसे कहते हैं। जीवन में अगर उसने वफा न की तो मरने के बाद करेगा। इस चार दिन की जिन्दगी में जो कुछ न कर सका वह अनन्त युगों तक करता रहेगा। उसका प्रेम कहानी बनकर घर-घर फेल जाएगा।

मन में शंका हुई, तुम अपने प्राणों का मोह छोड़ सकोगे? उसने जोर से छाती पीटी ओर चिल्ला उठा - प्राणों का मोह किसके लिए? ओर प्राण भी तो वही है, जो बीमार है। देखूँ मोत केसे प्राण ले जाती हे, ओर देह को छोड़ देती हे।

उसने धड़कते हुए दिल ओर थरथराते हुए पाँवों से तुलिया के घर में कदम रक्खा। तुलिया अपनी खाट पर एक चादर ओढ़े सिमटी पड़ी थी, और लालटेन के अन्धरे प्रकाश में उसका पीला मुख मानो मौत की गोद में विश्राम कर रहा था।

उसने उसके चरणों पर सिर रख दिया ओर आँसुओं में डूबी हुई आवाज से बोला -- तूला, यह अभागा तुम्हारे चरणों पर पड़ा हुआ है। क्‍या आँखें न खोलेगी?

तुलिया ने आँखें खोल दीं ओर उसकी ओर करुण दृष्टि डालकर कराहती हुई बोली -- तुम हो गिरधर सिंह, तुम आ गए? अब में

आराम से मरूँगी। तुम्हें एक बार देखने के लिए जी बहुत बेचेन था। मेरा कहा -- सुना माफ कर देना ओर मेरे लिए रोना मत। इस मिट्टी की देह में क्या रक्खा हे गिरधर! वह तो मिट्टी में मिल जाएगी। लेकिन में कभी तुम्हारा साथ न छोड़ूँगी। परछाईं की तरह नित्य तुम्हारे साथ रहँगी। तुम मुझे देख न सकोगे, मेरी बातें सुन न सकोगे, लेकिन तुलिया आठों पहर सोते-जागते तुम्हारे साथ रहेगी। मेरे लिए अपने को बदनाम मत करना गिरधर! कभी किसी के सामने मेरा नाम जबान पर न लाना। हाँ, एक बार मेरी चिता पर पानी के छीटे मार देना। इससे मेरे हृदय की ज्वाला शान्त हो जायगी।

गिरधर फूट-फूटकर रो रहा था। हाथ में कटार होती तो इस वक्त जिगर में मार लेता ओर उसके सामने तड़पकर मर जाता।

जरा दम लेकर तुलिया ने फिर कहा - में बचुँगी नहीं गिरधर, तुमसे एक बिनती करती हूँ, मानोगी?

गिरधर ने छाती ठोककर कहा -- मेरी लाश भी तेरे साथ ही निकलेगी तुलिया। अब जीकर क्या करूँगा ओर जिऊँ भी तो केसे? तू मेरा प्राण हे तुलिया।

उसे ऐसा मालूम हुआ तुलिया मुस्कराई।

“नहीं-नहीं, ऐसी नादानी मत करना। तुम्हारे बाल-बच्चे हैं, उनका पालन करना। अगर तुम्हें मुझसे सच्चा प्रेम हे, तो ऐसा कोई काम मत करना जिससे किसी को इस प्रेम की गन्ध भी मिले। अपनी तुलिया को मरने के पीछे बदनाम मत करना।

गिरधर ने रोकर कहा -- जैसी तेरी इच्छा।

'मेरी तुमसे एक बिनती है।'

“अब तो जिऊँगी ही इसीलिए कि तेरा हुक्म पूरा करूँ, यही मेरे जीवन का ध्येय होगा। '

'मेरी यही विनती है कि अपनी भाभी को उसी मान-मर्यादा के

साथ रखना जेसे वह बंसीसिंह के सामने रहती थी। उसका आधा उसको दे देना।

'लेकिन भाभी तो तीन महीने से अपने मेके में है, और कह गई हे कि अब कभी न आऊँगी।!'

“यह तुमने बुरा किया हे गिरधर, बहुत बुरा किया है। अब मेरी समझ में आया कि क्‍यों मुझे बुरे-बुरे सपने आ रहे थे। अगर चाहते हो कि में अच्छी हो जाऊँ, तो जितनी जल्दी हो सके, लिखा- पढ़ी करके कागज-पत्तर मेरे पास रख दो। तुम्हारी यह बददियानती ही मेरी जान का गाहक हो रही है। अब मुझे मालूम

हुआ कि बंसीसिंह क्‍यों मुझे बार-बार सपना देते थे। मुझे और कोई रोग नहीं है। बंसीसिंह ही मुझे सता रहे हें। बस, अभी जाओ। देर की तो मुझे जीता न पाओगे। तुम्हारी बेइन्साफी का दंड बंसीसिंह मुझे दे रहे हें।'

गिरधर ने दबी जबान से कहा -- लेकिन रात को केसे लिखा-पढ़ी होगी तूली। स्टाम्प कहाँ मिलेगा? लिखेगा कोन? गवाह कहाँ हैं?

“कल साँझ तक भी तुमने लिखा-पढ़ी कर ली तो मेरी जान बच जाएगी, गिरधर। मुझे बंसीसिंह लगे हुए हैं, वही मुझे सता रहे हें, इसीलिए कि वह जानते हें तुम्हें मुझसे प्रेम है। में तुम्हारे ही प्रेम के कारन मारी जा रही हूँ। अगर तुमने देर की तो तुलिया को जीता न पाओगे। !

में अभी जाता हूँ तुलिया। तेरा हुक्म सिर ओर आँखों पर। अगर तूने पहले ही यह बात मुझसे कह दी होती तो क्‍यों यह हालत होती? लेकिन कहीं ऐसा न हो, में तुझे देख न सकूँ और मन की लालसा मन में ही रह जाय। '

नहीं-नहीं, में कल साँझ तक नहीं मरूँगी, विश्वास रक्खो। '

गिरधर उसी छन वहाँ से निकला ओर रातों-रात पच्चीस कोस की मंजिल काट दी। दिन निकलते-निकलते सदर पहुँचा, वकीलों से सलाह-मशविरा किया, स्टाम्प लिया, भावज के नाम आधी जायदाद

लिखी, रजिस्ट्री कराई, ओर चिराग जलते-जलते हेरान-परीशान, थका-माँदा, बेदाना-पानी, आशा ओर दुराशा से काँपता हुआ आकर तुलिया के सामने खड़ा हो गया। रात के दस बज गए थे। उस वक्त न रेलें थीं, न लारियाँ, बेचारे को पचास कोस की कठिन यात्रा करनी पड़ी। ऐसा थक गया था कि एक-एक पग पहाड़ मालूम होता था। पर भय था कि कहीं देर तो अनर्थ हो जाएगा।

तुलिया ने प्रसन्न मन से पूछा -- तुम आ गए गिरधर? काम कर आए?

गिरधर ने कागज उसके सामने रख दिया ओर बोला -- हाँ तूला, कर आया, मगर अब भी तुम अच्छी न हुई तो तुम्हारे साथ मेरी जान भी जायगी। दुनिया चाहे हँसे, चाहे रोये, मुझे परवाह नहीं हे। कसम ले लो, जो एक घूंट पानी भी पिया हो।

तुलिया उठ बैठी और कागज को अपने सिरहाने रखकर बोली -- अब में बहुत अच्छी हूँ। सबेरे तक बिलकुल अच्छी हो जाऊँगी तुमने मेरे साथ जो नेकी की हे, वह मरते दम तक न भूलूँगी। लेकिन अभी-अभी मुझे जरा नींद आ गई थी। मेंने सपना देखा कि बंसीसिंह मेरे सिरहाने खड़े हैं ओर मुझसे कह रहे हें, तुलिया, तू ब्याहता है, तेरा आदमी हजार कोस पर बेठा तेरे नाम की माला जप रहा है। चाहता तो दूसरी कर लेता, लेकिन तेरे नाम

पर बेठा हुआ है ओर जन्म-भर बेठा रहेगा। अगर तूने उससे दगा की तो में तेरा दुश्मन हो जाऊँगा, ओर फिर जान लेकर ही छोड़५ूँगा। अपना भला चाहती हे तो अपने सत्‌ पर रह। तूने उससे कपट किया, उसी दिन में तेरी सांसत कर डालूँगा। बस, यह कहकर वह लाल-लाल आँखों से मुझे तरेरते हुए चले गए। गिरधर ने एक छन तुलिया के चेहरे की तरफ देखा, जिस पर इस समय एक देवी तेज विराज रहा था, एकाएक जैसे उसकी आँखों के सामने से पर्दा हट गया और सारी साजिश समझ में आ गई। उसने सच्ची श्रद्धा से तुलिया के चरणों को चूमा और बोला -- समझ गया तुलिया, तू देवी हे।


देवी का सारांश

प्रेमचंद की कहानी ‘देवी’ तुलिया नामक एक दलित महिला के असाधारण नैतिक साहस, निष्ठा और आत्मत्याग की गाथा है। लगभग सौ वर्ष की आयु पार कर चुकी तुलिया चमार जाति से संबंध रखती है, किंतु पूरा गाँव उसके सतीत्व, गरिमा और स्वाभिमान के कारण उसका आदर करता है। तुलिया का विवाह बचपन में हुआ था और उसका पति विवाह के तुरंत बाद परदेस चला गया था। पचास वर्षों तक पति के नियमित पत्रों और मनीऑर्डर के सहारे तुलिया ने अपने पतिव्रत धर्म को जीवित रखा और अपने जीवन को पूर्णतः उसी स्मृति के प्रति समर्पित कर दिया।

कहानी में नया मोड़ तब आता है जब अतीत में तुलिया पर मोहित होने वाले ठाकुर बंसीसिंह की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई गिरधर सिंह बंसीसिंह की विधवा (ठकुराइन) और उसके अनाथ बच्चे को प्रताड़ित कर घर से निकाल देता है। स्वाभिमानी तुलिया उस विधवा को अपनी झोपड़ी में आश्रय देती है। जब ठकुराइन न्याय पाने के लिए अपने सतीत्व को दांव पर लगाने का कठोर निर्णय लेती है, तो तुलिया ठाकुर कुल की मर्यादा और सतीत्व की रक्षा का संकल्प लेती है।

तुलिया चतुरता से गिरधर सिंह पर अपनी मोहिनी का जाल बिछाती है। वह बीमार होने का नाटक करके गिरधर सिंह को यह विश्वास दिलाती है कि स्वर्गीय बंसीसिंह की आत्मा उसे बेइंसाफी का दंड दे रही है और उसकी जान केवल तभी बच सकती है जब गिरधर अपनी आधी जायदाद ठकुराइन के नाम लिख दे। गिरधर रातों-रात 25 कोस की कठिन यात्रा करके अदालत से जायदाद का बैनामा ठकुराइन के नाम पंजीकृत करवाता है। अंत में जब तुलिया अपने अटूट पतिव्रत का परिचय देती है, तो गिरधर की आँखें खुल जाती हैं और वह तुलिया के नैतिक तेज और निःस्वार्थ त्याग के आगे नतमस्तक होकर उसे 'देवी' स्वीकार करता है।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • पतिव्रत और नैतिक श्रेष्ठता: कहानी तुलिया के माध्यम से दर्शाती है कि सच्चा सतीत्व और चरित्र-बल किसी भी भौतिक सुख या बाह्य परिस्थितियों से परे होता है। पचास वर्षों तक केवल पत्रों के सहारे जीवन व्यतीत करने वाली तुलिया का निष्ठावान चरित्र उसके जीवन को दिव्य रूप प्रदान करता है।

  • जातिगत सीमाओं से परे मानवीय गरिमा: प्रेमचंद ने दिखाया है कि धर्म और नैतिकता किसी उच्च कुल या जाति की बपौती नहीं हैं। दलित समाज से आने के बावजूद तुलिया का आचरण और विचार गाँव के समृद्ध जमींदारों से कहीं अधिक पवित्र और अनुकरणीय हैं।

  • नारी-सहानुभूति और त्याग: जब बंसीसिंह की विधवा को उसके अपनों ने ठुकरा दिया, तब तुलिया ने न केवल उसे अपनी झोपड़ी में आश्रय दिया, बल्कि उसकी कुल-मर्यादा और अधिकार की रक्षा के लिए अपनी चातुर्य और बुद्धि का प्रयोग किया।

  • कुटिलता पर नैतिक तेज की विजय: गिरधर सिंह के लोभ और वासना को तुलिया अपनी बुद्धि, धर्मपरायणता और नैतिक तेज से परास्त करती है। वह बिना हिंसा या सीधे टकराव के एक अन्यायी जमींदार को सही राह पर लाती है और विधवा को उसका अधिकार वापस दिलाती है।

  • कहानी का व्यापक महत्त्व: ‘देवी’ केवल एक स्त्री की धर्मपरायणता की कथा नहीं है, बल्कि यह अन्याय के विरुद्ध बुद्धि-बल, त्याग और चरित्र की शक्ति का उद्घोष करती है। कहानी सिद्ध करती है कि वास्तविक 'देवी' वह है जो दूसरों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित कर देती है।

इस रचना को उद्धृत करें

शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "देवी." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1935, https://munshipremchand.com/works/short-stories/devi. Accessed 22 Sep. 2026.