Cover Image for Aab-e-Hayat (आबे-हयात) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1920•31 मिनट

आबे-हयात

Aab-e-Hayat

प्रेमचंद की कहानी 'आबे-हयात' डॉक्टर घोष और उनके चार वृद्ध मित्रों द्वारा आबे-हयात (अमृत) पीकर पुनः युवा होने तथा मानव स्वभाव की चंचलता और मूर्खताओं के दोहराव की एक विचारोत्तेजक कहानी है।

पात्र:डॉक्टर घोष, चंचल कुंवर, बाबू दयाराम, ठाकुर विक्रमसिंह, लाला करोड़ीमल
स्थान:डॉक्टर घोष की प्रयोगशाला

आबे-हयात का मूल पाठ

डॉक्टर घोष अजीबो-गरीब आदमी थे। एक बार उन्होंने अपने चार मुअज्जिज (प्रतिष्ठित) दोस्तों को तजरबागाह (प्रयोगशाला) में मिलने के लिए बुलाया। उनमें से तीन असहाब इतने किब्रसिन (वृद्ध) थे कि उनकी दाढ़ियां भी सफेद हो गई थीं। उनके नाम थे-बाबू दयाराम, ठाकुर विक्रमसिंह और लाला करोड़ीमल। चौथी एक बेवा थी जिनका नाम मुसम्मात (श्रीमती) चंचल कुंवर था। बुढ़ापे ने उनके जिस्म पर झुर्रियां डाल दी थीं। यह चारों अशखास (व्यक्ति) बहुत मलूल-ओ-महजूं (उदास और शोकान्वित) रहा करते थे।

उनकी जिन्दगियां तल्ख हो गई थीं और सबसे बड़ा सितम यही था कि वे अभी तक बकेदेहयात (जीवित) थे। लाला करोड़ीमल शबाव में एक मुतमव्विल ताजिर (सम्पन्न व्यापारी) थे। मगः उन्होंने अपनी सारी दौलत सटूटे में उड़ा दी थी और अब सिर्फ मुहज्जब गदा गरी (शिप्ट भिक्षावृत्ति) पर गुज़रान करते थे। ठाकुर विक्रमसिंह ऐश-ओ-तरब (भोग-विलास और आनन्द) के बन्दे थे। उन्होंने अपनी दौलत ही नहीं, अपनी सेहत भी हवसरानियों (भोग- लिप्साओं) पर कुर्बान कर दी थी और अब उनका जिस्म मुतअद्दिद अमराज़ (रोग समूह) का मामन (केन्द्र) बना हुआ था। वह बहुत परेशान और अफ़सुर्दा ख़ातिर (उदास-मन) रहा करते थे। बाबू दयाराम किसी जमाने में वकील थे और क़ोमी तहरीकों में भी कुछ हिस्सा लिया था। मगर किसी-न-किसी वजह से वह बदनाम हो गये थे और अब कोई उनकं क़रीब न फटकता था। गोशा-ए-नाकामी में पड़े दिन काट रहे थे। रहीं गुसम्मात चंचल कुंवर-किसी जमाने में उनके हुस्न का शोहरा था। बहुत अर्से से वह मुतवरिक मुक़ामात (पवित्र स्थानों) की जियारत (तीर्थ-स्थान) करने में मारूफ़ थीं। शुरफ़ाए-शहर (नगर के सम्मानित व्यक्ति) यहां तक कि उनके अज्जीज-ओ-रिश्तेदार भी उनसे मुहतरिज़ (बचकर, परहेज) रहते थे। करोड्ठीमल, दयाराम, विक्रमसिंह-तीनों हजरात किसी जमाने में इन मुसम्मात के अश्शाक़ (प्रेमी) थे। यहां तक कि एक बार बाहमी रक़ाबत (परस्पर लाग-डांट) के बाइस उनमें खून-ख़राबे की नौबत भी आ चुकी थी मगर अब वे पिछली बातें ख्वाव-ओ-खयाल हो गईं थीं। उनकी याद भी दिलफ़िगार (कप्टप्रद) हो गई थी। डॉक्टर घोष उन आदमियों को बैठने का इशारा करके बोले-'“'दोस्तों ! आपको मालूम है कि में अपना वक्त छोटे-मोटे तजुर्वात करने में सफ किया करता हूं। आज मुझे एक तजुर्बे में आपकी मदद की जरूरत है। अगर रायतों (कहीं बातों) पर एबतार किया जाए तो डॉक्टर घोष की लैबोरेटरी एक अजूबा चीज़ थी। कमरा तारीक (अंधकार) पुरानी वजा (किस्म, चाल, ढंग) का था। मकड़ियों के जाले खिड़कियों पर पर्दे का काम दे रहे थे ओर फ़र्श पर बरसों की गर्द जमी हुई थी। दीवारों से मिली हुई कई साखू की आल्मारियां थीं। उनमें मुजल्लिद (स्जिल्द) कितावें चुनी हुई थीं। बीच की आल्मारी में भेगें की एक मूरत रखी हुई थी। कुछ लोगों का खयाल था कि मुशकिलात में डॉक्टर साहव इसी मूरत से मशवरा किया करते थे। कमरे के सबसे अंधेरे गोशे में एक ऊंची-पतली आल्मारी थी। उसमें से एक इन्सान का उस्तुख्वानी (अस्थि-पंजर) ढांचा कुछ-कुछ नजर आता था। उसी के क़रीब दो आल्मारियों के बीच में एक धुंधला-सा आईना रखा हुआ था, जिसका सुनहरी चौख़टा मेला हो रहा था। कहा जाता था कि डॉक्टर साहब के दस्त-ए-शिफा (स्वास्थ्य लाभ कराने वाला हाथ) से मरे हुए मरीजों की रूहें इसी आईने में रहती थीं और जव कभी वे आईने की तरफ देखते थे तो वे सबकी सब उनकी तरफ घूरने लगती थीं। कमरे की दूसरी तरफ एक हसीना की क़दे-आदम तस्वीर थी मगर मुझ्रे ऐयाम (समय बीतने) से चेहरे और कपड़े का रंग उड़ गया था। पचास बरस का अर्सा हुआ डॉक्टर साहब ने इसी हसीना से शादी करने की तजवीज की थी। मगर शादी के चन्द रोज-कब्ल (पूर्व) वह बीमार पड़ी और अपने तालिब (अभिलाषी) डॉक्टर की दवा खाकर इस दुनिया से चल बसी थी। तजुर्बेगाह की सबसे अजीब चीज का जिक्र करना अभी वाक़ी है। यह एक सियाह जिलल्‍्द की जखीम (मोटी) किताब थी। इस किताब का नाम किसी को न मालूम था, लेकिन लोग यह जानते थे कि यह जादू की किताब है। एक बार ख़ादिम ने गर्द झड़ने के लिए इस किताब को उठाया था। किताब के उठाते ही आल्मारी में रखा हुआ उस्नुख्वानी ढांचा कांप उठा । हसीना की तस्वीर एक क़दम आगे बढ़ गई और सदहा ख़ीफनाक़ सूरतें आईने में झांकने लगीं। इतना ही जहीं, भैरों की मूरत के तेबर बदल गये और उसके मुंह से 'वस करो, बस करो' की आवाज निकलने लगी थी।

डॉक्टर घोष की जबान से तजुर्वे का जिक्र सुनकर उनकं चारों दोस्तों ने समझा कि या तो हमें हवा से खाली शीशे की नली में किसी चूहे की मौत का तमाशा दिखाया जाएगा या खुर्दवीन से मकड़ी के जाले का मुलाहिजा (अनुशीलन) करना होगा या किसी क्रिस्म की और कोई दूर अज़कार (वर्णनातीत) बेवुकी बात होगी, क्योंकि ऐसे ही तजुर्बात के मुशाहदे के लिए डॉक्टर साहब पहले भी बीमियों बार अपने दास्तों को दिक़् कर चुके थ। उन्हें इस मुजब्विजा तजुर्वे (निणायिक प्रयोग) से कुछ ज्यादा शीक़ न पैदा हआ। मगर डॉक्टर साहव उनके जवाब का इन्तजार किए बैगर उठ खड़े हाए और नंगड़ाते हुए कमरे के दूसरे गोशे से वही जखीम किताव उठा लाये जो हफे आम (आम भाषा) में जादू की किताव मशहूर थी। उन्होंने २क्ष ।+ताय को खोला ओर औरगक़ (प्रष्टों) में मे एक गुलाव का फूल निकाला जो कभी सुर्ख होगा. पर उस वक्‍त मटियाला हो रहा था। उसकी पंखुड़ियां ऐसी खुश्क हो गई थीं गोया छूत ही चूर-चूर हो जाएंगी ।

डॉक्टर साहब ठण्डी सांस लेकर आएहस्ता से बोल-''आज पचपन साल हुए, यह गुलाब का फूल जो अब बिल्कुल मुरझाया हुआ है आर छूने से चूर-चूर हुआ जाता है, सुर्ख और शगुफ़्ता (ख़िला हुआ) धा। यह उस हसीना का तोहफ़ा था, जिसकी तस्वीर सामने लटक रही है ओर में इसे शादी क॑ दिन अपने कपड़ों में लगाना चाहता था। इन ओराक़ में यह फूल पचपन साल तक दफ़न रहा है। क्‍या यह निस्फ़ सदी (अर्द्ध-शताब्दी) का पुराना फूल फिर हरा हो सकता है ?” मुसम्मात चंचल उबर ने बेदिली गे सिर हिलाकर कहा, “यह तो ऐसा ही है, जैसे कोई पूछे कि किसी बूढ़ी औरत का पुराशकन (झुरीदार) चेहरा फिर चिकना हो सकता है 2”

डॉक्टर घोष ने फ़र्माया, “अच्छा देखो ।”

यह कहकर उन्होंने मेज पर रखे हुए मटके का ढकना उठाया और उस मुरझाये हुए फूल को पानी डाल दिया जो उसमें भरा हुआ था। पहले कुछ दर तक तो फूल पानी पर तैरता रहा। उस पर पानी का कुछ असर न हुआ । लेकिन एक ही लम्हे में हैरतखेज तगय्युर (आश्चर्यजनक परिवर्तन) नजर आने लगा। चिपटी और सूखी हुई पंखुड़ियां हिलीं और उनका रंग आहिस्ता-आहिस्ता सुर्ख़ होने लगा। ऐसा मालूम होता था कि फूल एक गहरी नींद से जाग रहा है। पतला डंठल और पत्तियां “री हो गई और देखते-देखते वह पनजाह (पच्चीस) साला फूल बिल्कुल ताज़ा नौशगुफ़्ता (नवविकसित) मालूम होने लगा। यह अभी अच्छी तरह खिला न था। बीच की कुछ पंखुड़ियां लिपटी हुई थीं। उन पर शबनम की दो बूंदें भी चमक रही थीं।

डॉक्टर साहब के दोस्तों ने लापरवाही से कहा, “तमाशा तो बहुत अच्छा है, लेकिन बताइए, यह हुआ क्‍्योंकर ?” उन लोगों ने बाज़ीगरों के इससे भी कहीं अजीब शोदब्दे (करिश्मे) देखे थे।

डॉक्टर घोष बोले, “क्या आप लोगों ने 'ज़ुल्मात” (वह घोर अंधकार, जो सिकन्दर के अमृत-कुण्ड तक पहुंचने में पड़ा था) का नाम कभी नहीं सुना ?'

दयाराम, “सुना जरूर है, मगर वहां का पानी किसी को मिला कब?”

डॉक्टर घोष, “इसलिए नहीं मिला कि किसी ने उसकी मुनासिब तलाश नहीं की। अब तहक़ीक़ से मालूम हुआ है कि जुल्मात में आबे-हयात का एक चश्मा है। उसके किनारे बड़े-बड़े दरख्त हैं जो कई सदियों के पुराने होने पर भी आज तक हरे-भरे हैं। मुझे इन इन्किशाफ़ों (गवेषणाओं) का दिलदादा (प्रेमी) समझकर मेरे एक दोस्त ने थोड़ा-सा पानी मेरे पास भेजा है। वह इस प्याले में भरा हुआ है।'

ठाकुर विक्रमसिंह को इन बातों का मुतलक़ यक़ीन न हुआ। ताहम उन्होंने पूछा, “हां, होगा, लेकिन यह बतलाइए कि इस पानी का असर इन्सान के जिस्म पर भी हो सकता है ?”

डॉक्टर घोष, “यह आपको अभी एक लख्ते (क्षण) में मालूम हुआ जाता है। आप सब हज़रत इस पानी को बेतकल्लुफ़ पिए, ताकि आपका शबाव एक बार फिर लौट आए। मुझे तो जवान होने की हवस नहीं है, क्योंकि मैं बहुत मुसीबतें झेलकर इस आलम तक पहुंचा हूं। अगर आपको शौक़ हो तो में इस पानी का तजुर्वा करूं ।”

यह कहकर डॉक्टर घोष ने चार शीशे के गिलास निकाले और उन्हें उस पानी से भरने लगे। पानी में कोई जान नवाज (जीवनदायी) कूबत जरूर थी, क्योंकि गिलासों के हाथ से छोटे-छोटे बुलबुले लगातार उठने नगे। वह ऊपर आकर चमकीली फुवार बनते थे और तब फूट जाते थे। इसके सिवा इसमें से एक दिलआवेज (मनोहर) खुशबू निकल रही थी। यह दखकर लोगों को पानी की तासीर का कुछ यक़ीन होने लगा। हालांकि उन्हें यह बावर (विश्वास) न होता था कि कोई वृढ़ा आदमी यह पानी पीकर जवान हो सकता है। ताहम सबके-सव पानी पीने पर आमदा हो गये। डॉक्टर घोष ने उन्हें इस क़दर शायक्र (शौकीन) देखकर उनसे एक लम्हे तअम्मुल (सोच-विचार) करने की दरख्वास्त की और बोले, “मेरे प्यार और मुअज्जिज़ दोस्तो ! आप लोगों को पूरी जिन्दगी का तजुर्वा हो चुका ह, इसलिए पानी को नोश करने से पहले कुछ ऐसे उसूल-ए-ज़िन्दगी मुक़र्रर कर लीजिए, ताकि शबाब की दुश्वारियां दोबारा आपको ख़म्ता-ओ-ख्वार (बरबाद) न करें और आप इस वादिए-तारीक़ (अंधकास्पूर्ण) से बखेरो-आफ़ियत (कुशलतापूर्वक) गुजर जाएं। सोचिये कि गर्मो-सर्द जमाने के इतने तजुर्वे के बाद अगर आप मुहासिन-ए-अख्लाक़ (चरित्र-चित्रण) में नीजवानाने-दुनिया के लिए नमूना न बन सके तो कितने शर्म की बात होगी |”

डॉक्टर साहब का यह वाज (उपदेश) सुनकर इन लोगों के चेहरों पर ख़फीफ़ (हल्की)-सी मुस्कगहट नमूदार हो गई। उन्होंने इसका कुछ जवाब न दिया। यह ख़याल ही मजहकोखेज (जिस पर हंसी आये) सुना कि शबाब की गलतकारियों और लाउबालियों (बेपर्वा और उच्छृंखल काम करना) के ऐसे तल्ख़ तजुर्वे के बाद यह लोग फिर अमूमन (जान-वृझकर) उनमें गिरफ्तार होंगे।

डॉक्टर साहब न अन्दाजे तनत्तुफ़ (कृपापूर्वक) से कहा-“अब आप लोग इसे शौक से पियें। मुझे बेइन्तहा मसर्रत है कि मुझे अपने तजुर्वे के लिए आप जैसे लायक़ आदमी मिल गये।”

नहीफ (दुर्बल) हाथों से इन चारों आदमियों ने गिलासों को उठाकर होंठों से लगाया। अगर फिलवाके (यथार्थतः) डॉक्टर साहब के खयाल के मुताबिक इस पानी में जांबख्श असर था तो इन आदमभियों से ज्यादा दुनिया में शायद ही किसी को इसकी जरूरत होगी। उनके बुशरों (मुखाकृतियों) से ऐसा गुमान होता था कि उन्होंने शवाब की सूरत ही नहीं देखी और मादरजाद (जन्मजात) बूढ़े थे, गोया वे हमेशा से ऐसे ही खस्ता, मायूस और सफ़ेद हो रहे थे। ये लोग डॉक्टर साहब की मेज के चारों तरफ़ झुके हुए बैठे थे। आने वाली जवानी की खुशी भी उनक॑ चेहरों पर रौनक न पैदा कर सकती थी। उनके जिस्म और दिल विल्कुल बेजान हो गये थे। पानी पीकर उन्होंने गिलास मेज पर रख दिए।

मगर एक लम्हे में उन लोगों की हालत में एक खुशगवार तब्दीली नमूदार हुई। उनके चेहरे राशन हो गये। रीनक़ नजर आने लगी। उनके जर्द और बेरंग रुखसारों पर सुर्खी पैदा हो गई। उन्होंने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। उन्हें ऐसा 4लूम हुआ कि फिलवाके (यथार्थतः) कोई बर्क़ी कूव्वत (विद्युतीय शक्ति) उनके जिस्म से उन अलामतों (चिढ्ढों) को मिटा रही *, 'निन्‍्टें बेरहम जमाना अर्सेदराज से नक्श करता रहा है। मुसम्मात चंचल कुंवर को ऐसा महसूस हुआ कि मुझ पर फिर जोबन आ रहा है। उसने एक अन्दाज से चेहरे पर मूंघट बढ़ा लिया।

सब लोग खुश होकर बोले-““थोड़ा-सा आबे-हयात और अता कीजिये। हम कुछ जवान जरूर हो गये हं लेकिन अभी कुछ कसर है। लाइये, जल्द एक गिलास और पिलाइये ।'!

डॉक्टर घोष, जो बैठे हुए अपने तजुर्बे को आलिमाना दिलचस्पी के अन्दाज से देख रहे थे, बोले, “जरा सब्र कीजिये। आप लोगों को बूढ़ा होने में बहुत दिन लगे थे, मगर जवान होने में आध घंटा लग जाए तो आपको बेसव न होना चाहिए। यह पानी हाजिर है आप लोग जितना चाहें पी सकते हैं।''

यह कहकर डॉक्टर साहब ने चारों गिलासों को दुबारा भरा। खुम (घड़े) में अब भी इतना पानी बाक़ी था कि शहर के आधे बूढ़े अपने नाती-पोतों के हमसिन (समवयस्क) हो सकते थे। अभी गिलासों में बुलवुले उठ ही रहे थे और चारों आदमियों ने झपटकर मेज से गिलास उठा लिये और एक ही जुरा (घूंट) में ख़ाली कर दिया। यक़ीनन यह आबे-हयात था। अभी पानी उन लोगों के हलक़ से उतरा ही था कि उनकी सूरत में इन्क़लाब पैदा होने लगा। उनकी आंखों में शबाब का-सा नूर आ गया। सफ़ेद बाल सियाह होने लगा। एक लम्हा और गुज़रा। मेज के गिर्द चार बूढ़ों की जगह तीन नौजवान मर्द बैठे थे और एक हसीन और गुलफाम नाजनीन (पुष्पांगी सुन्दरी)! ठाकुर विक्रमसिंह ने चंचल कुंवर की का मस्ताना निगाह से देखकर कहा, “प्यारी चंचल, तुम पर इस वक्‍त गजब का निखार हैं"

तन्वरी-ए-सुबह (प्रातःकालीन प्रकाश) से जिस तरह तारीकी (अन्धकार) हटने लगती है उस तरह चंचल कुंवर का चेहरा शगुफ्ता होता जाता था। उसे पुराना तजुर्बा था कि ठाकुर साहब की मदूह सराइयाँ (तारीफें) हमेशा सच्ची नहीं होतीं, इसलिए वह दौड़ी हुई आईने के सामने गई और उसमें अपनी सूरत देखने लगी। उसे अब भी ख़ौंफ़ था कि कहीं बुढ़ापे की मकरूह सूरत (घृणित रूप) न नज़र आए। बाक़ी तीनों आदमियों के अन्दाज से ऐसा मालूम होता था कि इस पानी में कुछ नशा-अंगेज सिफ्त है। शायद इसका यह ही सबब हो कि बुढ़ापे का बोझ सिर से उतर जाने के बाइस ख़ुशी के मारे मतवाले हो गये थे। बाबू दयाराम मुल्की मसायल पर गौर कर रहे थे, लेकिन उन मसायल का तअल्लुक़ जमाना-ए-हाल से था या माजी या इस्तिक़बाल (अतीत या भविष्य) से, इसका पता लगाना मुश्किल था। कभी तो वह ब-आवाज बुलन्द हुब्बे-वतन (देश-भक्ति), ख़िदमते क़ौम या हुकूके-इन्सान (माननीय अधिकारों) पर तक़रीर करने लगते। कभी किसी खुफ़िण मामले के मुतअल्लिक ऐसी दबी ज़बान से सरगोशी (चुपके से कहना) करते कि उन्हे अपनी ही आवाज न सुनाई देती थी और कभी रुक-रुककर निहायते मुअद्दिबाना अन्दाज़ (विनम्र रीति) से बोलने लगते, गोया किसी हाकिमे-आला (उच्चाधिकारी) के रूबरू बोल रहे हों। ठाकुर विक्रमसिंह भी कोई चलती हुई चीज गुनगुना रहे थे और गिलास पर अंगुलियों से ताल भी देते जाते थे। उनकी आंखें चंचल कुंवर के हसीन चेहरे की तरफ़ लगी हुई थीं। मेज की दूसरी तरफ़ सेठ करोड़ीमल रोकड़ और खाते की धुन में मद्द (लीन) थे और सोच रहे थे कि अगर हिमालय पहाड़ से बरफ के तोदे काट-काटकर लाये जाएं तो कितना नफा हो, और चंचल कुंवर आईने के सामने खड़ी अपनी सूरत देख-देखकर खुशी से मुस्करा रही थी। रह-रहकर वह अपना चेहरा आईने की क़रीब ले जाकर यह देखने की कोशिश करती थी कि कोई पुराना दाग तो वाक़ी नहीं रहा। उन्हें अपने निख्चार पर अब भी कामिल इत्मीनान न हुआ। उन्हें याद आता था कि मैं शवाब में इससे ज़्यादा हसीन थी। आखिर वह एक अन्दाज से घूंघट उठाये हुए मेज के क़रीब आई और बोलीं, “डॉक्टर साहब, बराहे-करम मुझे एक गिलास और दे दीजिए ।” डॉक्टर घोष ने हंसकर कहा, “हां-हां शौक़ से लीजिये। यह देखिए, मैं गिलास भरे देता हूं। आबे-हयात से लबरेज गिलास मेज पर रखे हुए थे। उनसे निकलने वाली महीन फुहारें हीरों के रैजों (करों) की तरह चमक रही थीं। सूरज डूब चुका था। इसलिए कमरे में ज़्यादा अंधेरा हो गया था, लेकिन खुम में से चांदनी की हल्की-सी रोशनी निकलकर डॉक्टर और उनके दोस्तों के चेहरों पर पड़ रही थी। डॉक्टर साहब के चेहरों पर पड़ी झुरियों और उसकी जर्दी इस रोशनी में और भी वाजे (प्रकट) हो रही थी। तीसरा गिलास पीते ही इन चारों आदमियों की रगों में जवानी की उमंगें लहरें मारने लगीं। अब उनका उन्फुवाने शबाब (जवानी की उठान) था। जोशे-मसर्रत उनके दिलों में न समाता था। मायूमी और गमेजाफ (शोक-पीड़ा) और बेकसी का बुढ़ापा अब उन्हें एक ख्याब-सा मालूम होता था, जिसे उन्होंने अर्सा हुआ देखा था। उन्हें अब हर एक चीज में एक ख़ास रौनक नजर आने लगी। वह रूहानी शगुफ़्तगी जिससे वे लोग क़ब्ल अजवक्त (समय से पूर्व) महरूम (वंचित) हो चुके थे और जिसके बगैर दुनिया के दिलफरेब नज़ारे उन्हें धुंधली तस्वीरों की तरह नज़र आते थे, फिर उन पर तमननाओं का जादू करने लगीं। उन्हें ऐसा मालूम होता था कि हम एक नयी दुनिया के नये वजूद (अस्तित्व में) हैं। सबके सब झुककर बोले, “हम जवान हो गये। हम जवान हो गये ।””

फिलवाक़ई (यथार्थतः) यह सुबुकसर (ओछे) नौजवानों की एक जमाअत थी, जिन्हें तक़ाजाए सिन (आयु की मांग) ने शोरीदासरी (दीवानगी) पर मायल (प्रवृत्ृ) कर दिया था। उनकी खुशफुलियों (मनोविनोद) का सबसे अजीब पहलू यह था कि उन लोगों को इस पीरी (वृद्धावस्था) और नक़ाहत (निर्बलता) का मजहका (उपवास) उड़ाने की दिली तहरीक (इच्छा, कोशिश) हो रही थी जिससे अभी-अभी उनकी गुलूखलासी (छुटकारा) हुई थी। वह अपनी पुरानी वजा के कपड़ों को देखकर खूब क़हक़हे मारकर हंसने लगे। एक साहब वजे मुफ़ासिल (ऋतु-परिवर्तन) के दर्द से कराहते हए बूढ़े बाबा की नक़ल करके लंगड़ा-लंगड़ाकर चलने लगे। दूसरे साहव नाक पर ऐनक रखकर जादू की किताव को गौर से पढ़ने का बहाना करने लगे। तीसरे साहब एक आरामकुर्सी पर बैठ गये और डॉक्टर घोष की बुजुर्गना मतानत (दृढ़ता) की नक़ल करने लगे। फिर सबके सब बगलें बजा-बजाकर कमरे में कूदने-फांदने लगे। मुसम्मात चंचल कुंवर एक दिलरुवाना अन्दाज़ से डॉक्टर साहब के पास आई। उनके गुलाब-से रुख़सारों (कपोलों) पर एक दिलप़्रेब और शरारत-आमेज शोखी थी। डॉक्टर साहब से बोलीं, 'प्यारे डॉक्टर, उठ खड़े हो, जरा मेरे साथ नाचो |”

इस पर चारों आदमियों ने यह सोचकर क़हक़हा मारा कि डॉक्टर साहब इस हसीना के पहलू म कस हवन्नक़ (मूर्ख) मालूम होंगे।

डॉक्टर साहब ने मतानत से कहा, “मुझे माफ कीजिये ! में बूढ़ा हूं, गठिये ने नाक में दम कर रखा है। मेरे नाचने के दिन कब के रुखसत हो गये, लेकिन इन तीन नौजवानों में से कोई भी तुम्हारे साथ नाचने के लिए जान दे देगा।"

ठाकुरसिंह ने फ़र्माया, “चंचल, मेरे साथ नाचो ॥”

बाबू दयाराम बोले, “नहीं, वह मेरे साथ नाचेगी ।”

लाला करोड़ीमल न कहा, “वाह, में इनका पुराना रफ़ीक़ हूं। पचास साल हुए उन्होंने मेरे साथ नाचने का वायदा किया था ।”

यह कहते-कहते तीनों आदमी चंचल कुंवर क॑ गिर्द खड़े हो ग्ये। एक ने बेताब होकर उसके दोनों हाथ पकड़ लिये। दूसरे ने उसकी कमर में हाथ डाल दिया और तीसरे साहब ने उसके अम्बरी जुल्फ़ों (सुगन्धित केशों) का बोसा लेना शुरू किया। चंचल कुंवर लजाती थीं, त्यौरियां बदलती थीं, कोसती थी, हंसती थी, तड़फड़ाती थीं। उसकी गर्म-गर्म सांस बारी-बारी से उन तीनों आदमियों के मुंह पर वह काम कर रही थी जो हवाए-सर्द (ठण्डी हवा) नशा करती है। वह उनके बीच से निकलने के लिए जोर कर रही थी, लेकिन कुछ बस न चलता था। एक जादूतराज माशूका (मायावी प्रेमिका) की हमदोशी (साथ) के लिए ऐसी सरगर्म रक़ीबाना कश्मकश (ैत्रीपूर्ण खींचातानी, संघषी का नजारा किसी ने कम देखा होगा। मगर कमरे में रखे हुए क़द्दे-आदम शीशे में कुछ और ही माजरा नजर आता था। वहां तीन कुहनसाल (वयोवृद्ध) और खृ. गहाल बूढ़े एक ख़मीदा कमर, (झुकी हुई कमर) मक्रूह (विकृत, घृणित) और झुर्रीदार बुढ़िया से हम-आगोश होने के लिए दस्तोगरीबां (गले में हाथ डालना) थे।

लेकिन वे नौजवान थे। उनकी मस्ती इसका सुबूत थी। चंचल कुंवर की इश्वागरी (भाव-भंगिमा) और परहेज से बेखुद होकर तीनों रक़ीबों ने बाहम ख़शमर्गी नजरें (कुपित दृष्टि) डालनी शुरू कीं। हसीन माशूक्रा से चिपटे हुए वे एक-दूसरे पर पिल पड़े। हाथापाई और धौल-धप्पा शुरू हुआ। इस झमेले में मेज को ठोकर लगी और वह उलट गई। शीशे का खुम गिरकर चूर-चूर हो गया और वह आबे-जिन्दगी एक दरख़शां (चमकीली) धार की सूरत में फर्श पर बह निकला। एक नीमजान (अधमरी) तितली जमीन पर पड़ी सिसक रही थी। उसके पर इस धार से तर हो गये। वह फुर्र से उड़कर डॉक्टर घोष की टोपी पर जा बैठी। डॉक्टर घोष बोले, “बस-बस, यारो ! बस। चंचल कुंवर, वस ! अब बहुत हुआ ! मुझे यह हंगामा क़तई पसन्द नहीं।”

वे सबके सब ख़ामोश हो गये। उन्हें लरजा-सा आ गया। उन्हें ऐसा मालूम हुआ कि पीरे-फरतूत जमाना (बहुत वृद्ध जमाना) हमें शबाब के इस सब्जाजार (हरियाली) से फिर पीरी (वृद्धा) की तारीक वादी (अंधेरी घाटी) की तरफ खींचे लिये जाता है। उन्होंने डॉक्टर घोष की तरफ देखा | वह उस पंजाह (पचास) साला फूल को लिये हस्बे साबिक़ (यथापूर्व) बैठे हुए थे, जिसे उन्होंने ख़ुम के टुकड़े में से निकाल लिया था। उनके हाथों का इशारा पाते ही चारों वादए-मस्ती (उमंग की लहर) के मतवाले अपनी-अपनी जगहों पर आ बैठे, हालांकि वे जवान थे, पर इस कशमकश और ख़रमस्ती (मूर्खतापूर्ण उन्‍्माद) ने उन्हें वेदम कर दिया था।

डॉक्टर घोष ने फूल को शफक़् (प्रातःकालीन अथवा संध्या की लालिमा) को रोशनी में देखकर कहा, “अफ़सोस, यह फूल फिर मुरझाया जाता है।'

यह विल्कुल सही था। इन लोगों के देखते-देखते फूल ऐसा खुश्क़ और चुरमुरा हो गया, जैसा खुम में डालते वक्‍त था। डॉक्टर ने उसकी पंखुड़ियों पर लगी हुई पानी की बूंदों को हिलाकर गिरा दिया और उसे अपने सूखे हुए होंठों से लगाकर बोले, “मेरे लिए यह अब भी ताजा और शगुफ्ता है।'

डॉक्टर साहब के मुंह से यह अल्फाज निकल रहे थे कि तितली फड़फड़ाई और उनके सिर पर जमीन पर गिर पड़ी। डॉक्टर साहब के दोस्तों के जिस्म में फिर गशा (कम्पन) हुआ। एक अजीब क़िस्म की बुरूदत (शीतलता) मालूम नहीं उनके जिस्म या दिल पर डोरती चली जाती थी। वे एक-दूसरे की तरफ़ ताक रहे थे। उन्हें गसा ख़याल होता था कि हर एक लम्हा उनके गुले-शबाब (यीवन-पुष्प) को तोड़कर उसकी जगह एक-एक दाग छोड़ता चला जाता था। क्‍या यह बिल्कुल मुगालता-नज़री (दृष्टिभम) था ? क्‍या मुद्ृर-उल-उमर (आयु-सीमा) की तब्दीलियां इतने मुख्तसर लम्हों में समेट दी गई थीं और वे सबके सब चार कुहनसाल बूढ़े थे जो अपने पुराने दोस्त डॉक्टर घोष के साथ बैठे हुए थे। इन लोगों ने मायूसाना लहजें में कहा-''क्या हम फिर इतनी जल्दी बूढ़े हो गये?"

हां, उनका शवाब रुखूसत हो चुका था। इस आवे-हयात (सुधा-रस) में शराब के नशे से भी सरीय तासीर (अधिक प्रभाव) थी । इससे पैदा होने वाली शोरीदगी (प्रभाव) सिफ़ तन्जीर (भयग्रस्त) हो चुकी थी। बुढ़ापे ने फिर उन पर अपना सियाह लबादा डाल दिया था। चंचल कुंवर ने एक आलमं-बेबसी (विवशता की दशा) में अपना चेहरा मुस्तर सिफत (जुड़ी) अंगुलियों से ढक लिया। उसके दिल में बेअख्तियार ख़्वाहिश पैदा हुई कि जब हुस्न ही न रहा तो क्‍यों न इस पर कफ़न का पर्दा पड़ जाये नसाईयत (सदुपयोग) का यही एक हुस्न उसमें बाक़ी रह गया था।

एक लम्ह की ख़ामोशी के बाद डॉक्टर घोष ने फ़र्माया, “दोस्तो ! अफ़सोस है कि आप फिर बूढ़े हो गये। देखिए, आवे-हयात से ज़मीन तर है, लेकिन अब मुझे इसका मुतलक़ गम नहीं, क्योंकि अगर चश्मे-हयात (अमृत-धार) मेरे दरवाज़े ही पर लहरें मारे तो भी मैं उससे अपने होंठ न तर करूं, चाहे लम्हों के बदले उसका नशा बरसों तक क्‍यों न क़ायम रहे। आप लोगों से आज मुझे भी इबरत (शिक्षा) हासिल हुई है।”

लेकिन डॉक्टर साहव के अहवाब (मित्रों) को यह इबरत न हुई। उन्होंने चश्मे-हयात के सफ़र का मुसम्मिम (पक्का) इरादा किया, जहां वह सुबह-दोपहर-शाम हसवे-ख़्वाहिश (इच्छानुसार) आवे-हयात (सुधा-रस) नोश करें और सदाबहार जवानी का लुत्फ़ उठायें।


आबे-हयात का सारांश

‘आबे-हयात’ (जीवन का अमृत) डॉक्टर घोष और उनके चार वृद्ध मित्रों के माध्यम से मानव स्वभाव, यौवन की चंचलता और बुढ़ापे की विवशता पर बुना गया एक विचारोत्तेजक व दार्शनिक आख्यान है। डॉक्टर घोष अपनी प्राचीन व रहस्यमयी प्रयोगशाला में अपने चार वयोवृद्ध मित्रों को एक अनोखे प्रयोग में भाग लेने हेतु आमंत्रित करते हैं। इन चारों मित्रों का जीवन अतीत की गलतियों के कारण अत्यंत दुखद व निराशापूर्ण था—लाला करोड़ीमल ने सट्टे में अपनी अपार संपत्ति गँवा दी थी और अब साधारण भिक्षावृत्ति पर आश्रित थे; ठाकुर विक्रमसिंह ने भोग-विलास और वासनाओं में धन व स्वास्थ्य दोनों नष्ट कर दिए थे और रोगों के शिकार थे; बाबू दयाराम वकालत और राजनीति में बदनाम होकर गुमनामी का जीवन काट रहे थे; और मुसम्मात चंचल कुंवर अपने ज़माने की विख्यात सुंदरी थीं जिनके लिए कभी ये तीनों पुरुष आपस में लड़ा करते थे, किंतु अब उनका सौंदर्य झुर्रियों में बदल चुका था।

डॉक्टर घोष उन्हें 55 वर्ष पुराना अपना एक सूखा और मटियाला गुलाब का फूल दिखाते हैं, जो उनकी दिवंगत मंगेतर का उपहार था। जब वे उस फूल को एक मटके में रखे जल में डालते हैं, तो वह मुरझाया हुआ फूल क्षण भर में ताज़ा, लाल और सुगंधित होकर नवविकसित रूप में खिल उठता है। डॉक्टर घोष बताते हैं कि यह 'ज़ुल्मात' के चश्मे से लाया गया 'आबे-हयात' (अमृत) है। वे अपने मित्रों को इसे पीने का प्रस्ताव देते हैं, किंतु साथ ही चेतावनी देते हैं कि वे जीवन के कटु अनुभवों से सीख लेकर कुछ नैतिक सिद्धांत तय कर लें ताकि यौवन की पुरानी गलतियों और उच्छृंखलताओं को पुनः न दोहराएँ। चारों मित्र इस उपदेश को हँसी में उड़ा देते हैं।

अमृत का पहला घूँट पीते ही चारों के चेहरों पर सुर्खी और चमक लौट आती है। दूसरा गिलास पीते ही उनका पूर्ण कायाकल्प हो जाता है—झुर्रियाँ मिट जाती हैं, बाल काले हो जाते हैं और वे पूरी तरह युवा हो जाते हैं। चंचल कुंवर आईने के सामने जाकर अपने रूप पर मुग्ध होने लगती हैं। किंतु यौवन लौटते ही चारों के भीतर उनकी पुरानी कमजोरियाँ भी जाग उठती हैं—करोड़ीमल बर्फ के व्यापार और मुनाफे के जोड़-तोड़ में लग जाते हैं, दयाराम राजनीतिक भाषण देने लगते हैं और विक्रमसिंह पुनः चंचल कुंवर पर डोरे डालने लगते हैं। तीसरा गिलास पीते ही वे मदहोश होकर अपनी ही वृद्धावस्था, लाचारी और गठिया के दर्द का फूहड़ उपहास उड़ाने लगते हैं। इसके बाद तीनों पुरुष चंचल कुंवर के साथ नाचने की होड़ में आपस में झगड़ पड़ते हैं। कमरे में छीना-झपटी और हाथापाई शुरू हो जाती है, जिसमें मेज उलट जाती है और अमृत का मटका फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो जाता है। सारा अमृत फर्श पर बह जाता है।

अमृत का प्रवाह रुकते ही उसका नशा काफूर होने लगता है। डॉक्टर घोष के हाथ में रखा गुलाब का फूल पुनः सूखकर मुरझा जाता है और फर्श पर गिरी तितली दम तोड़ देती है। देखते ही देखते चारों मित्रों का यौवन ढल जाता है और वे पुनः जर्जर, झुर्रीदार और लाचार बूढ़े बन जाते हैं। डॉक्टर घोष कहते हैं कि उन्हें इस प्रयोग से यह बड़ी सीख मिली है कि यदि अमृत का चश्मा उनके दरवाजे पर भी बहे, तो भी वे उसे कभी नहीं पिएँगे। किंतु उनके चारों मित्र इस कटु अनुभव से कोई सीख नहीं लेते और सदाबहार जवानी पाने के लिए उस अमृत के चश्मे की खोज में सुदूर यात्रा पर निकलने की हठ ठान लेते हैं।


प्रकाशन इतिहास

इस कहानी का प्रथम प्रकाशन उर्दू में, उर्दू मासिक पत्रिका सुबहे-उम्मीद के मार्च 1920 के अंक में हुआ था। उर्दू में यह असंकलित रही। इसका हिन्दी रूप इसी शीर्षक से सोलह अप्राप्य कहानियाँ तथा प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित है। यह रचना नथानिएल हॉथॉर्न की एक प्रसिद्ध अंग्रेजी कहानी का उर्दू रूपांतरण है।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • मानव स्वभाव की अपरिवर्तनीयता और अनुभव की निरर्थकता: कहानी का सबसे तीखा व्यंग्य यह है कि बुढ़ापे की लाचारी, तल्ख अनुभवों और वर्षों के कष्टों के बावजूद मनुष्य जब पुनः अवसर पाता है, तो वह अपनी पुरानी मूर्खताओं, वासनाओं और त्रुटियों को ही दोहराता है। आयु और ठोकरें मनुष्य के मूल स्वभाव को नहीं बदल पातीं।
  • यौवन का मिथ्या अभिमान और क्षणभंगुरता: आबे-हयात से प्राप्त यौवन क्षणिक सिद्ध होता है। प्रेमचंद ने दिखाया है कि शारीरिक सौंदर्य, स्फूर्ति और बाह्य आकर्षण अत्यंत नश्वर हैं, जबकि वासना और अहंकार मनुष्य को विवेकहीन बनाकर हास्यास्पद स्थिति में धकेल देते हैं।
  • आईना और यथार्थ का गहरा विरोधाभास: कहानी में प्रयोगशाला के आदमकद शीशे का दृश्य प्रतीकात्मक है। जहाँ चारों मित्र स्वयं को मदमस्त नौजवान समझ रहे थे, वहीं शीशे में तीन जर्जर बूढ़े एक झुकी कमर वाली कुरूप बुढ़िया के आलिंगन के लिए आपस में लड़ते दिखाई देते हैं। यह दृश्य आत्म-भ्रम और यथार्थ के अंतर को बेनकाब करता है।
  • विवेकशील तटस्थता बनाम अंधी तृष्णा: डॉक्टर घोष का चरित्र एक प्रबुद्ध और विवेकशील दृष्टा का है, जो स्वयं आबे-हयात पीने की वासना से दूर रहता है और अंत में प्राकृतिक नश्वरता को स्वीकार करने का निष्कर्ष निकालता है। इसके विपरीत, चारों मित्र सब कुछ गँवाकर पुनः बूढ़े हो जाने पर भी सबक नहीं लेते और अंतहीन वासना की तृप्ति के लिए अमृत-कुण्ड की खोज में निकलने का हठ करते हैं।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'आबे-हयात' जीवन, मृत्यु, समय और अमरता के सनातन द्वंद्व पर एक उत्कृष्ट दार्शनिक रूपक (एलिगरी) है। प्रेमचंद ने विदेशी आख्यान को अपनी मुहावरेदार भाषा और मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि से सजाकर यह अमर संदेश दिया है कि जीवन की वास्तविक गरिमा प्राकृतिक नियमों और सीमाओं को स्वीकार करने में है; अमरता या कृत्रिम यौवन की लालसा मनुष्य को केवल आत्म-विनाश और उपहास का पात्र बनाती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "आबे-हयात." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1920, https://munshipremchand.com/works/short-stories/aab-e-hayat. Accessed 22 Sep. 2026.