दरवाज़ा का मूल पाठ
मेरी जान हमेशा आफत में रहती है। अव्वल तो घर के लड़के दम नहीं लेने देते। मेरे दोनों पट्टों को जोर से टकराना उनका खेल है। मेरी पसलियाँ चूर हो जाती है। दूसरे हवा के तेज झोंके और भी बलाये-जाँ इस बेरहमी से मुझे जेरोजबर (अस्त-व्यस्त, उधल-पुथल) करते हैं कि अलामान (परमात्मा खैर करे), इस पर तुर्रा ये कि मेरी फुगाने-दर्द (दुःखभरी चीख) पर साहबेख़ाना (गृहस्वामी) को भी तरस नहीं आता। वह उल्टे मुझी पर नाराज होते हैं। में घर का राजदार हूँ और जाहिरदारी (दिखावा, बनावट) को निभाना मेरा काम है। अक्सर "'ए . झाहबेखाना के मौजूद होने पर भी मुझे बन्द कर दिया जाता है। ख़ासकर किसी चंदे की वसूलियाँ, बजाज के तकाज़े के दिन मुझे बंद कर दिया जाता है और वे अपना-सा मुँह लेकर लौट जाते हैं। में सीनासिपर (छाती तानकर) अपने आका को नदामत (लज्जा) और हीलामाजी (बहानेबाजी, चालबाजी) से बचा लेता हूँ। मगर पिछले दिनों जब मुझे बंद देखकर डाकिया मनीऑर्डर वापिस ले गया तो साहबेख़ाना मुझी को कोसने लगे। मेरी नेकियों का कोई भी नाम नहीं लेता, मगर बुराइयों पर सबके सब बरहम (क्रोधित) हो जाते हैं।
जमाने का अजब ढंग है। मुझे अपने फराहिजे मंसबी (कर्त्तव्यों का पालन) देने में कितनी गालियाँ खानी पड़ती हैं। मुझे बन्द पाकर लुक्माये लजीज (स्वादिष्ट भोजन) की ख्वाहिश से बेताव कुत्ते कितने बरहम (क्रुद्ध) हो जाते हैं और कितन मायूस, और चोर तो मेरी जान के गाहक हैं। कभी बगली पघूँसें मारते हैं, कभी चूल खिसका देते हैं। कभी कुछ हत्ता (जहाँ तक) के गदागरों (भिखारियों) को भी मुझसे बुग्ज (अप्रकट द्वेष) है। मुझे बन्द पाकर कोसते हैं और नाकाम वापिस लौट जाते हैं।
आह ! उम्रे-रफ़्ता (व्यतीत आयु) की याद कितनी हसरतनाक (दुःखपूर्ण) है ? मैंने कभी अच्छे दिन देखे हैं। वह दिन नहीं भूलता, जब मलिका (स्वामिनी) नयी-नवेली दुल्हन बनी, गहनों से लदी, शर्म से सर झुकाये पालकी से उतरी थीं। उस वक्ूषत पहले मैंने ही उनकी रुख़रोशन (मुख-दीप्ति) का नजारा किया था और उनके कमल-से नाजुक पैरों का बोर्सा लिया था। एक रोज जब बाबूजी शाम को ठिसी वजह से घर नहीं आये, तो इन्तजार में बैठे-बैठे उठता कर वह नवेली दुल्हन हया से गद॑न झुकाये, दीवारों से लजाती मेरी गोद में आकर खड़ी हो गयी और कितनी देर तक मेरे पहलुओं में लिपटी हुई सामने के वसीह मैदान की तरफ ताकती रही। उसके दिल में उस वक्त कैसी धड़क थी और आँखों में कितना फिकर आमेज इश्तियाक् (चिन्तापूर्ण उत्कण्ठा)। बाबू साहब को आड़े से आते देखकर वह किस तरह खुशी से उमड़ी हुई जल्दी से घर में चली गयी, यह पुरमजा (आनन्दपूर्ण) बातें कभी भूल सकती हैं ? बाबूजी उज्यूँ-य्यूँ बूढ़े होते जाते हैं, उन्हें मुझसे उस होता जाता है। अब वह अक्सर मेरे पहलुओं में बैठे रहते हैं, शायद उन्हें मेरी जुदाई का ग़म सताया करता है। अभी जब वह बीमार थे तो मालकिन कितनी बार मुझसे लिपट-लिपटकर रोई थीं, मालूम नहीं क्या !
इस घर में कौन कृदम रखेगा, अगर उसे मालूम हो जाये कि उसे कभी यहाँ से जाने का अख्तियार नहीं है। मैं घर और बाहर के बीच की कड़ी हूँ। बाहर कितनी वसीह (विस्तृत) मैदान है। कैसे सुहाने, सब्जाजार (घास का मैदान, हरियाली ही हरियाली), कैसी मुस्कराती हुई आबादियाँ, कितनी वसीह दुनियाँ। घर महदूद है, बाहर की कोई इन्तहा नहीं। महदूद (सीमित) और गैरमहदूद (असीमित) के दरमियान रि ता-ए-इत्तिसाल (मिलन का सम्बन्ध) हूं। कृतरे को बहर से मिलाना मेरा काम है। मैं एक किश्ती हूँ, फना (मृत्यु) से बका (जीवन) को ले जाने के लिए।
दरवाज़ा का सारांश
‘दरवाज़ा’ एक घर के किवाड़ के मानवीकृत दृष्टिकोण से लिखी गई प्रेमचंद की एक अत्यंत अनूठी, प्रतीकात्मक एवं विचारोत्तेजक रचना है। कहानी का मुख्य पात्र और वाचक स्वयं एक घर का 'दरवाज़ा' है, जो अपने अस्तित्व, दैनंदिन कष्टों और गृहस्थी के जीवन में अपनी भूमिका की मार्मिक दास्तान सुनाता है। घर के चंचल बच्चे उसके दोनों पट्टों को आपस में ज़ोर-ज़ोर से टकराकर खेलते हैं जिससे उसकी पसलियाँ चूर हो जाती हैं, और तेज़ हवा के झोंके उसे बेरहमी से झकझोरते रहते हैं। इस पर भी गृहस्वामी को उस पर तरस नहीं आता, बल्कि वे उल्टे उसी पर नाराज़ होते हैं। दरवाज़ा घर की मान-मर्यादा और दिखावे (ज़ाहिरदारी) का मुख्य संरक्षक है। जब कोई चंदा वसूलने वाला या महाजन/बजाज तकाज़ा करने आता है, तो मालिक दरवाज़ा बंद कर लेता है और दरवाज़ा सीना तानकर अपने मालिक को लज्जा और बहानों से बचा लेता है। किंतु जब बंद दरवाज़ा देखकर डाकिया मनीऑर्डर लौटा ले जाता है, तो मालिक अपनी भूल सुधारने के बजाय दरवाज़े को ही कोसने लगता है। भोजन की ताक में रहने वाले कुत्ते, चोरी की नीयत से आने वाले चोर और भीख न मिलने से निराश भिखारी—सभी दरवाज़े को बंद देखकर उससे द्वेष रखते हैं और गालियाँ देते हैं।
इसके बाद दरवाज़ा अपने अतीत की सुखद व भावुक स्मृतियों में खो जाता है। वह उस दिन को याद करता है जब घर की स्वामिनी (मालकिन) नई-नवेली दुल्हन बनकर पालकी से उतरी थीं और सबसे पहले दरवाज़े ने ही उनके मुख-सौंदर्य के दर्शन कर उनके कोमल चरणों का स्पर्श पाया था। जब बाबूजी शाम को देर से लौटते थे, तो वही लजीली दुल्हन दरवाज़े की ओट में खड़ी होकर सामने फैले मैदान की ओर टकटकी बाँधकर उत्कंठापूर्वक उनका इंतज़ार किया करती थी। वर्षों के बीतने के साथ अब बाबूजी वृद्ध हो चले हैं और अक्सर दरवाज़े से टेक लगाकर बैठे रहते हैं। अपनी बीमारी के दिनों में मालकिन न जाने कितनी बार दरवाज़े से लिपट-लिपटकर रोई थीं।
अंत में दरवाज़ा एक गहरा दार्शनिक चिंतन व्यक्त करता है। वह कहता है कि वह घर और बाहर के विस्तृत संसार के बीच की एक अनिवार्य कड़ी है। घर की अपनी सीमाएँ हैं (महदूद), जबकि बाहर की दुनिया अनंत और असीम (ग़ैर-महदूद) है। दरवाज़ा सीमित और असीम के बीच मिलन का सेतु है; वह बूँद (क़तरे) को सागर (बहर) से मिलाने वाला माध्यम और नश्वरता (फ़ना) से शाश्वत जीवन (बक़ा) की ओर ले जाने वाली एक नौका है।
प्रकाशन इतिहास
इस कहानी का प्रथम प्रकाशन उर्दू पत्रिका अलनाज़िर के जनवरी 1917 के अंक में हुआ था। इसका हिन्दी रूप इसी शीर्षक से प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित है।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- मानवीकरण और अभिनव कथा-शिल्प: प्रेमचंद ने एक निर्जीव वस्तु (घर के दरवाज़े) को संवेदनशील, विचारशील और भावुक चरित्र के रूप में प्रस्तुत करके कथा-शिल्प का अनूठा प्रयोग किया है। यह मानवीकरण पाठक को जीवन और परिवेश को एक सर्वथा नए कोण से देखने की दृष्टि देता है।
- सामाजिक दिखावा (ज़ाहिरदारी) और मानव की कृतघ्नता: दरवाज़ा गृहस्वामी के खोखले सामाजिक आचरण, आर्थिक तंगहाली और लेनदारों से उसकी लाज बचाने के लिए ढाल बनता है। किंतु जब बंद दरवाज़े के कारण मनीऑर्डर लौट जाता है, तो मालिक सारा दोष दरवाज़े पर ही मढ़ देता है। यह मनुष्य के स्वार्थी और कृतघ्न स्वभाव का यथार्थवादी चित्रण है।
- पारिवारिक इतिहास और काल-प्रवाह की मूक गवाही: दरवाज़ा परिवार की तीन पीढ़ियों के सुख-दुःख, नई दुल्हन के गृह-प्रवेश, युवा दांपत्य के प्रेम और प्रतीक्षा, बुढ़ापे की लाचारी और बीमारी की व्यथा का मूक साक्षी है। इसके माध्यम से समय के सतत प्रवाह और जीवन के परिवर्तनों को सुंदरता से पिरोया गया है।
- सीमित और असीम का दार्शनिक व रहस्यवादी रूपक: रचना के अंत में दरवाज़ा एक भौतिक वस्तु से ऊपर उठकर आध्यात्मिक रूपक बन जाता है। वह घर (सीमित लौकिक संसार) और बाहर (असीम ब्रह्मांड) के बीच का सेतु बनता है। बूँद का सागर से मिलना और नश्वरता (फ़ना) से अमरता (बक़ा) की यात्रा का रूपक जीवन और मुक्ति के गहरे दर्शन को स्पर्श करता है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'दरवाज़ा' प्रेमचंद की कथा-यात्रा में अपनी तरह की एक दुर्लभ, प्रयोगधर्मी और दार्शनिक रचना है। यह सिद्ध करती है कि प्रेमचंद केवल सामाजिक यथार्थ के ही कथाकार नहीं थे, बल्कि निर्जीव जड़-जगत में भी सूक्ष्म मानवीय संवेदना, हास्य-व्यंग्य और गहन दार्शनिक अर्थ भर देने की उनकी कल्पनाशीलता अद्वितीय थी।
